प्रवेशद्वार:जैन धर्म

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जैन धर्म प्रवेशद्वार

सत्वेषु मैत्रिं गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम्। माध्यस्थ्यभावं विपरीतवृतौ, सदा ममात्मा विदधातु देवः॥

                                 आचार्य अमितगति

हे जिनेन्द्र! सब जीवों से हों मैत्री भाव हमारे, गुणधारी सत्पुरुषन पर हों हर्षित मन अधिकारे। दुःख दर्द पीडित प्राणिन पर करुँ दया हर बारे, नहीं प्रेम नहिं द्वेष वहाँ विपरीत भाव जो धारे॥

O Lord! Make my self such that I may have love for all beings, joy in the meritorious, unstinted sympathy for all distressed and tolerance towards the perversely inclined.

प्रवीण

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जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है । 'जैन' कहते हैं उन्हें, जो 'जिन' के अनुयायी हों। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' माने-जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं 'जिन'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान्‌ का धर्म।

जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र है-

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं॥

अर्थात अरिहंतो को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार। ये पाँच परमेष्ठी हैं।


जैन धर्म मे 24 तीर्थंकरों को माना जाता है |

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चयनित लेख

जैन प्रतीक चिन्ह

वर्ष १९७५ में १००८ भगवान महावीर स्वामी जी के २५००वें निर्वाण वर्ष अवसर पर समस्त जैन समुदायों ने जैन धर्म के प्रतीक चिह्न का एक स्वरूप बनाकर उस पर सहमति प्रकट की थी। आजकल लगभग सभी जैन पत्र-पत्रिकाओं, वैवाहिक कार्ड, क्षमावाणी कार्ड, भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस, दीपावली आमंत्रण-पत्र एवं अन्य कार्यक्रमों की पत्रिकाओं में इस प्रतीक चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यह प्रतीक चिह्न हमारी अपनी परम्परा में श्रद्धा एवं विश्वास का द्योतक है। जैन प्रतीक चिह्न किसी भी विचारधारा, दर्शन या दल के ध्वज के समान है, जिसको देखने मात्र से पता लग जाता है कि यह किससे संबंधित है, परंतु इसके लिए किसी भी प्रतीक चिह्न का विशिष्ट (यूनीक) होना एवं सभी स्थानों पर समानुपाती होना बहुत ही आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि प्रतीक ध्वज का प्रारूप बनाते समय जो मूल भावनाएँ इसमें समाहित की गई थीं, उन सभी मूल भावनाओं को यह चिह्न अच्छी तरह से प्रकट करता है।


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चयनित ग्रंथ

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क्या आप जानते हैं??

  • ...कि 108 मणियाँ या मनके होते है और मुख्य उपनिषदों की संख्या भी 108 ही है?
  • ... कि ब्रह्म के 9 व आदित्य के 12 इस प्रकार इनका गुणन 108 होता है?
  • ... कि जैन मतानुसार भी अक्ष माला में 108 दाने रखने का विधान है, और यह विधान गुणों पर आधारित है?
  • ... कि मानव जीवन की 12 राशियाँ हैं। ये राशियाँ 9 ग्रहों से प्रभावित रहती हैं। इन दोनों संख्याओं का गुणन भी 108 होता है।
  • ... कि नभ में 27 नक्षत्र हैं। इनके 4-4 पाद या चरण होते हैं। 27 का 4 से गुणा 108 होता है। ज्योतिष में भी इनके गुणन अनुसार उत्पन्न 108 महादशाओं की चर्चा की गई है।
  • ... कि ऋग्वेद में ऋचाओं की संख्या 10 हजार 800 है। 2 शून्य हटाने पर 108 होती है।
  • ... कि शांडिल्य विद्यानुसार यज्ञ वेदी में 10 हजार 800 ईंटों की आवश्यकता मानी गई है। 2 शून्य कम कर यही संख्या शेष रहती है।
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विकिपरियोजनाएं

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चयनित धार्मिक व्यक्ति

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चयनित चित्र

भगवान बाहुबली, का विश्व की सबसे बड़ी एकपाषाणीय मूर्ति
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श्रेणियाँ

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जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकर

क्रम सं तीर्थंकार जन्म नगरी जन्म नक्षत्र माता का नाम पिता का नाम वैराग्य वृक्ष चिह्न
ऋषभदेव जी अयोध्या उत्तराषाढ़ा मरूदेवी नाभिराजा वट वृक्ष बैल
अजितनाथ जी अयोध्या रोहिणी विजया जितशत्रु सर्पपर्ण वृक्ष हाथी
सम्भवनाथ जी श्रावस्ती पूर्वाषाढ़ा सेना जितारी शाल वृक्ष घोड़ा
अभिनन्दन जी अयोध्या पुनर्वसु सिद्धार्था संवर देवदार वृक्ष बन्दर
सुमतिनाथ जी अयोध्या मद्या सुमंगला मेधप्रय प्रियंगु वृक्ष चकवा
पद्मप्रभु जी कौशाम्बीपुरी चित्रा सुसीमा धरण प्रियंगु वृक्ष कमल
सुपार्श्वनाथ जी काशीनगरी विशाखा पृथ्वी सुप्रतिष्ठ शिरीष वृक्ष साथिया
चन्द्रप्रभु जी चंद्रपुरी अनुराधा लक्ष्मण महासेन नाग वृक्ष चन्द्रमा
पुष्पदन्त जी काकन्दी मूल रामा सुग्रीव साल वृक्ष मगर
१० शीतलनाथ जी भद्रिकापुरी पूर्वाषाढ़ा सुनन्दा दृढ़रथ प्लक्ष वृक्ष कल्पवृक्ष
११ श्रेयान्सनाथ जी सिंहपुरी वण विष्णु विष्णुराज तेंदुका वृक्ष गेंडा
१२ वासुपुज्य जी चम्पापुरी शतभिषा जपा वासुपुज्य पाटला वृक्ष भैंसा
१३ विमलनाथ जी काम्पिल्य उत्तराभाद्रपद शमी कृतवर्मा जम्बू वृक्ष शूकर
१४ अनन्तनाथ जी विनीता रेवती सूर्वशया सिंहसेन पीपल वृक्ष सेही
१५ धर्मनाथ जी रत्नपुरी पुष्य सुव्रता भानुराजा दधिपर्ण वृक्ष वज्रदण्ड
१६ शांतिनाथ जी हस्तिनापुर भरणी ऐराणी विश्वसेन नन्द वृक्ष हिरण
१७ कुन्थुनाथ जी हस्तिनापुर कृत्तिका श्रीदेवी सूर्य तिलक वृक्ष बकरा
१८ अरहनाथ जी हस्तिनापुर रोहिणी मिया सुदर्शन आम्र वृक्ष मछली
१९ मल्लिनाथ जी मिथिला अश्विनी रक्षिता कुम्प कुम्पअशोक वृक्ष कलश
२० मुनिसुव्रतनाथ जी कुशाक्रनगर श्रवण पद्मावती सुमित्र चम्पक वृक्ष कछुआ
२१ नमिनाथ जी मिथिला अश्विनी वप्रा विजय वकुल वृक्ष नीलकमल
२२ नेमिनाथ जी शोरिपुर चित्रा शिवा समुद्रविजय मेषश्रृंग वृक्ष शंख
२३ पार्श्र्वनाथ जी वाराणसी विशाखा वामादेवी अश्वसेन घव वृक्ष सर्प
२४ महावीर जी कुंडलपुर उत्तराफाल्गुनी त्रिशाला
(प्रियकारिणी)
सिद्धार्थ साल वृक्ष सिंह
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