कुन्दकुन्द स्वामी

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आचार्य कुन्दकुन्द जैन दिगम्बर समप्रदाय के सर्वोपरि आचार्य माने जाते हैं। इनका जन्म कौण्डकुण्ड नगर में हुआ था जिसके काऱण इनका नाम कुन्दकुन्द पड़ा।इन्होने 11 वर्ष की उम्र में दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण की थी। इनके दीक्षा गुरू का नाम जिनचंद्र था। ये जैन धर्म के प्रकाण्ड विद्वान थे। इनके द्वारा रचित समयसार, नियमसार, प्रवचन, अष्टपाहुड, पंचास्तिकाय, पंच परमागम ग्रंथ हैं। ये विदेह क्षेत्र भी गए। वहाँ पर इन्होने सींमंधर नाथ की साक्षात दिव्यध्वनी को सुना। वे ५२ वर्षों तक जैन धर्मं के संरक्षक एवं आचार्य रहे| वे जैन साधुओं की मूल संघ क्रम में आते हैं| वे प्राचीन ग्रंथों में इन नामों से भी जाने जातें हैं-

१. पदमनंदि
२. एलाचार्य
३. वक्रग्रीव
४. गृद्दपिच्छ

आचार्य कुन्दकुन्द को श्री गौतम गणधर के बाद एक मात्र संपूर्ण जैन शास्त्रों के ज्ञाता माना गया है| दिगम्बरों के लिए इनके नाम का शुभ महत्त्व है और भगवान महावीर और गौतम गणधर के बाद पवित्र स्तुति में तीसरा स्थान है|

मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी|
मंगलं कुन्दकुंदाद्यो, जैन धर्मोऽस्तु मंगलं||

आचार्य कुन्दकुन्द तत्त्वार्थसूत्र के रचियता आचार्य उमास्वामी के गुरु थे|