भारतीय मुस्लिम राष्ट्रवाद
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क्या भारत के मुसलमानों का रवैया लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और नागरिक अधिकारों जैसे शाश्वत मूल्यों के बारे में शेष विश्व के मुसलमानों से भिन्न है? क्या हमारे देश में पंथनिरपेक्षता के मापदंड अलग-अलग समुदाय के लिए भिन्न-भिन्न है? इन यक्ष प्रश्नों का उत्तार हाल की कुछ घटनाओं में निहित है। जहां कहीं भी मुसलमान अल्पसंख्या में होते है तो साधारणतया वे पंथनिरपेक्षता का समर्थन करते है, किंतु जैसे ही उनकी संख्या एक सीमा से बढ़ जाती है तो लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता जैसे मूल्य 'कुफ्र' हो जाते है। इस्लाम सर्वोपरि हो जाता है एवं गैर मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक बन जाते है। बांग्लादेश और पाकिस्तान इसके उदाहरण है। इसका छोटा रूप हम हरियाणा में करनाल से सटे मुंडोरगारी गांव में देख सकते है। यहां मुसलमानों की आबादी पांच हजार है और गांव में केवल एक ही गैर-मुसलमान दलित परिवार है। यहां कठमुल्लों का इतना दबदबा है कि गांव में एक भी टेलीविजन नहीं है। बाहरी दुनिया का हाल जानने के लिए केवल रेडियो सुनने की अनुमति है। फोटो खिंचवाने पर प्रतिबंध है। उच्च शिक्षा पर मनाही है। महाभारत कालीन सभ्यता का केंद्र रहे और आज एक प्रगतिशील राज्य के रूप में पहचान बनाने वाले हरियाणा में यह तालिबानी संस्कृति का एक द्वीप कैसे और क्यों विकसित हुआ? दूसरा उदाहरण पिछले सप्ताह का है। हैदराबाद के मेहदीपट्टनम स्थित नारायण जूनियर कालेज के मुसलमान छात्र भड़क उठे। देर से आए दो छात्रों ने जब रमजान का महीना होने और सहरी के कारण थक जाने को देरी का कारण बताया तो प्रोफेसर ने कथित तौर पर इसे 'सिली एक्स्क्यूज' कहा। इस बात पर मुसलमान छात्रों ने कालेज में हंगामा खड़ा किया और भवन को भारी नुकसान पहुंचाया। ंप्रोफेसर द्वारा माफी मांगने के बावजूद छात्रों का आक्रोश थमा नहीं। इस घटना से पूर्व विगत 13 जुलाई को हैदराबाद के ही सेंट एन महिला कालेज में छात्राओं ने भी खासा बवाल मचाया था। राजनीति शास्त्र की शिक्षिका प्रशांति ने सलमान रुश्दी की चर्चा करते वक्त कथित तौर पर इस्लाम की आलोचना की थी। इसके विरोध में मुसलमान छात्राओं ने विरोध प्रदर्शन किया और शिक्षिका को गिरफ्तार करने की मांग की। मजलिस-ए-इत्तोहादुल मुस्लमीन, तेलंगाना राष्ट्र समिति, तेलगुदेशम जैसे कथित सेकुलर दल छात्राओं के समर्थन में फौरन आ खड़े हुए। शिक्षिका ने क्षमायाचना की, फिर भी उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया। अब वह जमानत पर रिहा है। गांधी जयंती अब दुनिया में इस वर्ष से अहिंसा दिवस के रूप में मनाई जाएगी, किंतु कश्मीर में हालात कुछ और ही है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने गांधी जयंती के अवसर पर एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ..गांधी दर्शन ही प्रगति का मार्ग है। यह बात वहां के मुसलमानों को रास नहीं आई। कश्मीर के मुफ्ती बशीरुद्दीन ने इसकी कड़ी आलोचना करते हुए कहा, गांधी अपने समुदाय के लिए प्रासंगिक हो सकते है, किंतु मुसलमानों के लिए केवल पैगंबर साहब ही अनुकरणीय है। मुफ्ती ने आजाद से 'इस्लाम विरोधी' टिप्पणी के लिए प्रायश्चित करने को कहा है। गांधी जी ने मुस्लिमों की हर उचित-अनुचित मांगों का समर्थन किया। कठमुल्लों से प्रभावित मुस्लिम समाज को संतुष्ट करने के लिए खिलाफत आंदोलन में कांग्रेस को भी घसीट ले गए, किंतु वह जीवनपर्यत मुसलमानों का विश्वास नहीं जीत पाए। स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों की भागीदारी नाम मात्र की थी। पाकिस्तान के निर्माण तक अधिकांश मुसलमानों ने अपना समर्थन अपने दीन की पार्टी-मुस्लिम लीग को ही दिया। विभाजन के साथ खंडित भारत में तमाम लीगी नेताओं ने रातोंरात कांग्रेस का पंथनिरपेक्षता का चोला पहन लिया, क्योंकि विभाजन के बाद भारत में मुसलमानों का जनसंख्या अनुपात आधे से भी कम रह गया था। कश्मीर में मुसलमानों ने गांधी जी के बारे में जो कहा उसमें कुछ नया नहीं है। लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में सन 1924 में मुस्लिम नेता मोहम्मद अली ने कहा था, मिस्टर गांधी का चरित्र कितना भी पाक क्यों नहीं हो, मेरे लिए मजहबी दृष्टि से वह किसी भी मुसलमान से हेय है।. हां, मेरे मजहब के अनुसार मिस्टर गांधी को किसी भी दुराचारी और पतित मुसलमान से हेय मानता हूं। आज शेष भारत में तो गांधी जी मुसलमानों और 'सेकुलरिस्टों' के लिए आदर्श है,परंतु जम्मू-कश्मीर में केवल 'काफिर' मात्र। क्यों? इस बात में दो राय नहीं कि किसी भी समुदाय की आस्था पर आघात सभ्य समाज में स्वीकार नहीं होना चाहिए। यदि पैगंबर साहब का अपमानजनक कार्टून बर्दाश्त नहीं है तो हिंदू देवी-देवताओं और भारत माता का अश्लील चित्रण करने वाले एफएम हुसैन सेकुलर बिरादरी के हीरो क्यों है? क्यों जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय उन्हे सम्मानित करने की घोषणा करता है? किस नैतिकता से प्रेरित होकर मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह इस जलसे में मुख्य अतिथि होने की सहमति देते है? इससे पूर्व केरल की सेकुलर सरकार ने विगत 17 सितंबर को हुसैन को 'राजा रवि वर्मा' सम्मान देने की घोषणा की थी। केरल उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए हुसैन को सम्मानित करने पर रोक लगा दी। क्या कोई पैगंबर साहब का अपमान करने वाले डच कार्टूनिस्ट को भारत में सम्मानित करने का दुस्साहस कर सकता है? करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़े श्रीराम के विषय में द्रमुक नेता करुणानिधि निरंतर विषवमन कर रहे है, किंतु क्या किसी सेकुलरिस्ट ने उनकी आलोचना की? भारत के प्रधानमंत्री डच कार्टूनिस्ट की तो संसद में निंदा करते है। भारत सरकार प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से इस घटना पर अपना खेद प्रकट करती है, पर भगवान राम के अपमान पर मौन क्यों? करुणानिधि का बचाव करते हुए माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का संकेत देते हुए यह कहा कि उन्हे भी आस्तिकों की तरह अपना विचार रखने का अधिकार है। स्वाभाविक प्रश्न है कि यह अधिकार केवल हिंदुओं से जुड़े मामलों में ही क्यों महत्वपूर्ण हो जाता है? यदि प्रकाश करात नास्तिक है तो वह मुस्लिम जमात के साथ डच कार्टूनिस्ट के खिलाफ सड़कों पर क्यों उतरे थे? विगत आठ मई को एक प्रतिष्ठित ईरानी विश्वविद्यालय के कला विभाग के प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने एक बुर्कानशीं छात्रा के पूर्णत: ढके होने पर टिप्पणी कर दी थी। इससे पूर्व अरब के जायद विश्वविद्यालय की प्रोफेसर क्लाडिया कोबोर्स को ईशनिंदा वाले कार्टून का प्रदर्शन करने के कारण निलंबित कर दिया गया था। सऊदी अरब के शिक्षामंत्री शेख नाहयान बिन मुबारक ने अरब में 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' होने की बात तो की, किंतु साथ ही यह भी कहा कि इस स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम, इस्लाम की शिक्षाओं और परंपराओं की निंदा अथवा आलोचना बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सऊदी अरब, ईरान आदि इस्लामी देश है, इसलिए उनके द्वारा अपने मजहब और संस्कृति का सम्मान करना स्वाभाविक है, किंतु आखिर पंथनिरपेक्षता का उद्घोष करने वाले भारत के सेकुलरिस्टों की चाल और चरित्र समुदायों के आधार पर क्यों बदलती है? 'लेख का अलोचन' शयद उपर लेख लिखने वाले साहब को सन १८५७ कि क्रन्ति को भुल गये है इस क्रन्ति मे सबसे अधिक मुस्लिम ने हिस्सा लिय था

