खिलाफत आन्दोलन
खिलाफत आन्दोलन (1919-1924) भारत में मुख्यत: मुसलमानों द्वारा चलाया गया राजनीतिक-धार्मिक आन्दोलन था। इस आन्दोलन का उद्देश्य तुर्की में खलीफा के पद की पुन:स्थापना कराने के लिये अंग्रेजों पर दबाव बनाना था।
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[संपादित करें] परिचय
सन् 1908 ई. में तुर्की में युवा तुर्की दल द्वारा शक्तिहीन खलीफा के प्रभुत्व का उन्मूलन खलीफत (खलीफा के पद) की समाप्ति का प्रथम चरण था। इसका भारतीय मुसलमान जनता पर नगण्य प्रभाव पड़ा। किंतु, 1912 में तुर्की-इतालवी तथा बाल्कन युद्धों में, तुर्की के विपक्ष में, ब्रिटेन के योगदान को इस्लामी संस्कृति तथा सर्व इस्लामवाद पर प्रहार समझकर भारतीय मुसलमान ब्रिटेन के प्रति उत्तेजित हो उठे। यह विरोध भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध रोषरूप में परिवर्तित हो गया। इस उत्तेजना को अबुलकलाम आजाद, जफर अली खाँ तथा मोहम्मद अली ने अपने समाचारपत्रों अल-हिलाल, जमींदार तथा कामरेड और हमदर्द द्वारा बड़ा व्यापक रूप दिया।
प्रथम महायुद्ध में तुर्की पर ब्रिटेन के आक्रमण ने असंतोष को प्रज्वलित किया। सरकार की दमननीति ने इसे और भी उत्तेजित किया। राष्ट्रीय भावना तथा मुस्लिम धार्मिक असंतोष का समन्वय आरंभ हुआ। महायुद्ध की समाप्ति के बाद राजनीतिक स्वत्वों के बदले भारत को रौलट बिल, दमनचक्र, तथा जलियानवाला बाग हत्याकांड मिले, जिसने राष्ट्रीय भावना में आग में घी का काम किया। अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी ने जमियतउल्-उलेमा के सहयोग से खिलाफत आंदोलन का संगठन किया तथा मोहम्मद अली ने 1920 में खिलाफत घोषणापत्र प्रसारित किया। राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व गांधी जी ने ग्रहण किया। गांधी जी के प्रभाव से खिलाफत आंदोलन तथा असहयोग आंदोलन एकरूप हो गए। मई, 1920 तक खिलाफत कमेटी ने महात्मा गांधी की अहिंसात्मक असहयोग योजना का समर्थन किया। सितंबर में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन ने असहयोग आंदोलन के दो ध्येय घोषित किए - स्वराज्य तथा खिलाफत की माँगों की स्वीकृति। जब नवंबर, 1922 में तुर्की में मुस्तफा कमालपाशा ने सुल्तान खलीफा मोहम्मद चतुर्थ को पदच्युत कर अब्दुल मजीद को पदासीन किया और उसके समस्त राजनीतिक अधिकार अपहृत कर लिए तब खिलाफत कमेटी ने 1924 में विरोधप्रदर्शन के लिए एक प्रतिनिधिमंडल तुर्की भेजा। राष्ट्रीयतावादी मुस्तफा कमाल ने उसकी सर्वथा उपेक्षा की और 3 मार्च, 1924 को उन्होंने खलीफी का पद समाप्त कर खिलाफत का अंत कर दिया। इस प्रकार, भारत का खिलाफत आंदोलन भी अपने आप समाप्त हो गया।
[संपादित करें] कारण
गांधी ने 1920-21 में खिलाफत आंदोलन क्यों चलाया इसके दो दृष्टिकोण हैं:-
- एक वर्ग का कहना था कि गांधी की उपरोक्त रणनीति व्यवहारिक अवसरवादी गठबंधन का उदाहरण था।मोहनदास करमचंद गाँधी ने कहा था "यदि कोई बाहरी शक्ती इस्लाम की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए और न्याय दिलाने के लिए आक्रमण करती है तो वो उसे वास्तविक सहायता न भी दें तो उसके साथ उनकी पूरी सहानुभूति रहेगी "(गांधी सम्पूर्ण वांग्मय - १७.५२७- 528)| गांधी एक अवसरवादी जननेता थे। वे अंग्रजी राज के खिलाफ एक सफल व्यावहारिक गठबंधन तैयार कर रहे थे। उनके पास दिव्य चेतन शक्ति थी। वे समझ चुके थे कि अब भारत में शासन करना अंग्रेजों के लिए आर्थिक रूप से महंगा पड़ रहा है। अब उन्हें हमारे कच्चे माल की उतनी आवश्यकता नहीं है। अब सिन्थेटिक उत्पादन बनाने लगे हैं। अंग्रेजों को भारत से जो लेना था वे ले चुके हैं। अब वे जायेंगे। अत: अगर शांति पूर्वक असहयोग आंदोलन चलाया जाए, सत्याग्रह आंदोलन चलाया जाए तो वे जल्दी चले जाएंगे। इसके लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता आवश्यक है। दूसरी और अंग्रेजों ने इस राजनीतिक गठबंधन को तोड़ने की चाल चली। जिन्ना, अंबेदकर, सावरकर तीनों अंग्रेजों की चाल में आ गए। अंग्रेज गए लेकिन देश को बांट कर गए। भारत पाकिस्तान के बीच सेना खड़ी कर गए। सेना को अत्याधुनिक हथियार चाहिए। हथियार पश्चिम से ही मिलेगा। युध्द की स्थयी आशंका के दबाव में काले अंग्रेजों का राज भारत-पाकिस्तान में चलता रहेगा।
- एक दूसरा दृष्टिकोण भी है। वह मानता है कि गांधी ने इस्लाम के पारम्परिक स्वरूप को पहचाना था। धर्म के ऊपरी आवरण को दरकिनार करके उन्होंने हिन्दु-मुस्लिम एकता के स्वभाविक आधार को देख लिया था। 12वीं शताब्दी से साथ रहते रहते हिन्दु-मुसलमान सह-अस्तित्व सीख चुके थे। दबंग लोग दोनों समुदायों में थे। लेकिन फिर भी आम हिन्द-मुसलमान पारम्परिक जीवन दर्शन मानते थे, उनके बीच एक साझी विराजत भी थी। उनके बीच आपसी झगड़ा था लेकिन सभ्यतामूलक एकता भी थी। दूसरी ओर आधुनिक पश्चिम से सभ्यतामूलक संघर्ष है। गांधी यह भी जानते थे कि जो इस शैतानी सभ्यता में समझ-बूझकर भागीदारी नहीं करेगा वह आधुनिक दृष्टि से भले ही पिछड़ जाएगा लेकिन पारम्परिक दृष्टि से स्थित -प्रज्ञ कहलायेगा। उसे आर्थिक रूप से कुछ कष्ट भले होगा लेकिन वह मोक्ष का अधिकारी होगा।
[संपादित करें] आलोचना
मोहनदास करमचन्द्र गांधी जो की उस समय कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे , उसने इस खिलाफत आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की | ध्यान रहे की खिलाफत आन्दोलन अपने प्रारंभ से ही एक हिंसक आन्दोलन था और इस अहिंसा के कथित पुजारी ने इस हिंसक आन्दोलन को अपना समर्थन दिया (ये वही अहिसा का पुजारी है जिसने चौरी चौरा में कुछ पुलिसकर्मियों के मरे जाने पर अपना आद्नोलन वापस ले लिया था ) और इस गम्न्धी के समर्थन का अर्थ कांग्रेस का समर्थन था | इस खिलाफत आन्दोलन के प्रारंभ से इसका स्वरूप हिन्दुओं के विरुद्ध दंगों का था और गांधी ने उसे अपना नेतृत्व प्रदान करके और अधिक व्यापक और विस्तृत रूप दे दिया |
खिलाफत आन्दोलन दूर देश तुर्की के खलीफा को गद्दी से हटाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आन्दोलन था। असहयोग आन्दोलन भी खिलाफत आन्दोलन की सफलता के लिए चलाया गया आन्दोलन था। आज भी अधिकांश भारतीयों को यही पता है कि असहयोग आन्दोलन स्वतंत्रता प्राप्ति को चलाया गया कोंग्रेस का प्रथम आन्दोलन था। किन्तु सत्य तो यही है कि इस आन्दोलन का कोई भी रास्ट्रीय लक्ष्य नहीं था। यहाँ एक हास्यप्रद बात और है कि तुर्की की जनता ने स्वं ही कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में तुर्की के खलीफा को देश निकला दे दिया था।
भारत में मोहम्मद अली जोहर व शौकत अली जोहर दो भाई खिलाफत का नेतृत्व कर रहे थे। गाँधी ने खिलाफत के सहयोग के लिए ही असहयोग आन्दोलन की घोषणा कर डाली। जब कुछ राष्ट्रवादी कोंग्रेसियों ने इसका विरोध किया तो गाँधी ने यहाँ तक कह डाला, "जो खिलाफत का विरोधी है तो वह कोंग्रेस का भी शत्रु है।"
इतिहास साक्षी है कि जिस समय खिलाफत आन्दोलन फेल हो गया , तो मुसलमानों ने इसका सारा गुस्सा हिदू जनता पर निकला। मुसलमान जहाँ कहीं भी संख्या में अधिक थे ,हिन्दू समाज पर हमला करने लगे. हजारों हिदू ओरतों से बलात्कार हुए। लाखों की संख्या में तलवार के बल पर मुसलमान बना दिए गए. सबसे भयंकर स्थिति केरल में मालाबार में हुए जो इतिहास में मोपला कांड के नाम से जानी जाती है। मोपला कांड में ही अकेले २० हजार हिन्दुओं को काट डाला गया ; २० हजार से ज्यादा को मुस्लमान बना डाला. १० हजार से अधिक हिदू ओरतों के बलात्कार हुए ।
[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ
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