बक्सर का युद्ध
| बक्सर का युद्ध | |||||||
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| 300px |
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| योद्धा | |||||||
| सेनानायक | |||||||
| शक्ति/क्षमता | |||||||
| 40,000 140 तोपें |
7,072 30 तोपें |
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| मृत्यु एवं हानि | |||||||
| 10,000 मरे गए या घायल हुए 6,000 बंधी बने गए |
1,847 मरे गए या घायल हुए | ||||||
बक्सर का युद्ध अक्टूबर १७६४ में बक्सर नगर के आसपास ईस्ट इंडिया कंपनी और मुगल नबाबों के बीच लड़ा गया था।
बंगाल के नबाब मीर कासिम, अवध के नबाब शुजाउद्दौला, तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना अंग्रेज कंपनी से लड़ रही थी । लड़ाई में अंग्रेजों की जीत हुई और इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उड़ीसा और बांग्लादेश का दीवानी और राजस्व अधिकार अंग्रेज कंपनी के हाथ चला गया ।
अनुक्रम |
[संपादित करें] पृष्ठभूमि
प्लासी के युद्ध के बाद सतारुध हुआ मीर जाफ़र अपनी रक्षा तथा पद हेतु ईस्ट इंडिया कंपनी पर निर्भर था। जब तक वो कम्पनी का लोभ पूरा करता रहा तब तक पद भी बना रहा। उसने खुले हाथो से धन लुटाया, किंतु प्रशाशन सम्भाल नही सका, सेना के खर्च, जमींदारों की बगावातो से स्थिति बिगड़ रही थी, लगान वसूली मे गिरावट आ गई थी, कम्पनी के कर्मचारी दस्तक का जम कर दुरूपयोग करने लगे थे वो इसे कुछ रुपयों के लिए बेच देते थे इस से चुंगी बिक्री कर की आमद जाती रही थी बंगाल का खजाना खाली होता जा रहा था।
हाल्वेल ने माना की सारी समस्या की जड़ मीर जाफ़र है। उसी समय के दौरान जाफर का बेटा मीरन मर गया जिस से कम्पनी को अवसर मिल गया था और उसने मीर कासिम जो जाफर का दामाद था को सत्ता दिलवा दी। इस हेतु २७ सितंबर १७६० एक संधि भी हुई जिसमे कासिम ने ५ लाख रूपये तथा बर्दवान, मिदनापुर, चटगांव के जिले भी कम्पनी को दे दिए। इसके बाद धमकी मात्र से जाफ़र को सत्ता से हटा दिया गया और मीर कासिम सत्ता मे आ गया। इस घटना को ही १७६० की क्रांति कहते है।
[संपादित करें] मीर कासिम का शासन काल १७६०-१७६४
मीर कासिम ने रिक्त राजकोष, बागी सेना, विद्रोही जमींदार जेसी विकत समस्याओ का हल निकाल लिया। बकाया लागत वसूल ली, कम्पनी की मांगे पूरी कर दी, हर क्षेत्र मे उसने कुशलता का परिचय दिया। अपनी राजधानी मुंगेर ले गया, ताकि कम्पनी के कुप्रभाव से बच सके सेना तथा प्रशासन का आधुनिकीकरण आरम्भ कर दिया।
उसने दस्तक पारपत्र के दुरूपयोग को रोकने हेतु चुंगी ही हटा दी। मार्च १७६३ मे कम्पनी ने इसे अपने विशेषाधिकार का हनन मान युद्ध आरम्भ कर दिया। लेकिन इस बहाने के बिना भी युद्ध आरम्भ हो ही जाता क्योंकि दोनों पक्ष अपने अपने हितों की पूर्ति मे लगे थे। कम्पनी को कठपुतली चाहिए थी लेकिन मिला एक योग्य हाकिम।
१७६४ युद्ध से पूर्व ही कटवा, गीरिया, उदोनाला, की लडाईयो मे नवाब हार चुका था उसने दर्जनों षड्यन्त्र्कारियो को मरवा दिया (वो मीर जाफर का दामाद था और जानता था कि सिराजुदोला के साथ क्या हुआ था।)
[संपादित करें] अवध,मीर कासिम, शाह आलम का गठ जोड़
मीर कासिम ने अवध के नवाब से सहायता की याचना की, नवाब शुजाउदौला इस समय सबसे शक्ति शाली था। मराठे पानीपत की तीसरी लड़ाई से उबर नही पाए थे, मुग़ल सम्राट तक उसके यहाँ शरणार्थी था, उसे अहमद शाह अब्दाली की मित्रता प्राप्त थी।
जनवरी १७६४ मे मीर कासिम उस से मिला उसने धन तथा बिहार के प्रदेश के बदले उसकी सहायता खरीद ली। शाह आलम भी उनके साथ हो लिया। किंतु तीनो एक दूसरे पर संदेह करते थे।
[संपादित करें] युद्ध
२३ अक्टूबर १७६४ को युद्ध हुआ जिसमे मुनरो ने तीनो को हरा दिया था।
[संपादित करें] परिणाम
परिणाम बेहद मह्ताव्पूर्ण निकले। सहज ही प्रयास से पूरा अवध कम्पनी को मिल गया था। नवाब शुजाउदौला की हालत इतनी गिर गई की उसने कम्पनी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था (मई १७६५)। शाह आलम भी कम्पनी की शरण मे आ गया था। बंगाल अब कम्पनी का अधीनस्थ राज्य बन गया। अवध उस पर आश्रित तथा मुग़ल सम्राट कम्पनी का पेंशन भोगी। ये सभी कार्य इलाहाबाद की संधि (१६ अगस्त १७६५) से हुआ इस के बाद बंगाल, बिहार, उडिसा, झारखण्ड की दीवानी कम्पनी को मिल गई थी। बंगाल मे द्वैध शासन शुरू हो गया। मीर कासिम ने अवध के नवाब से सहायता की याचना की, नवाब शुजाउदौला इस समय सबसे शक्ति शाली था। मराठे पानीपत की तीसरी लड़ाई से उबर नही पाए थे, मुग़ल सम्राट तक उसके यहाँ शरणार्थी था, उसे अहमद शाह अब्दाली की मित्रता प्राप्त थी जनवरी १७६४ मे मीर कासिम उस से मिला उसने धन तथा बिहार के प्रदेश के बदले उसकी सहायता खरीद ली। शाह आलम भी उनके साथ हो लिया। किंतु तीनो एक दूसरे पर संदेह करते थे।
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