भारतीय संविधान

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
भारत
Emblem of India.svg

यह लेख यह श्रेणी के सम्बन्ध में है:

भारत की राजनीति


केन्द्र सरकार

संविधान

कार्यकारिणी

विधायिका

न्यायपालिका

स्थानीय

भारतीय आमचुनाव


अन्य देशप्रवेशद्वार:राजनीति
प्रवेशद्वार:भारत सरकार

भारत, संसदीय प्रणाली की सरकार वाला एक प्रभुसत्तासम्पन्न, समाजवादी धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। यह गणराज्य भारत के संविधान के अनुसार शासित है। भारत का संविधान संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर, 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी, 1950 से प्रभावी हुआ। 26 जनवरी का दिन भारत में गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

अनुक्रम

संक्षिप्त परिचय[संपादित करें]

भारत का संविधान दुनिया का सबसे बडा लिखित संविधान है। इसमें अब 450 अनुच्छेद,तथा 12 अनुसूचियां हैं और ये 22 भागों में विभाजित है । परन्तु इसके निर्माण के समय मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, जो 22 भागों में विभाजित थे इसमें केवल 8 अनुसूचियां थीं। संविधान में सरकार के संसदीय स्‍वरूप की व्‍यवस्‍था की गई है जिसकी संरचना कुछ अपवादों के अतिरिक्त संघीय है। केन्‍द्रीय कार्यपालिका का सांविधानिक प्रमुख राष्‍ट्रपति है। भारत के संविधान की धारा 79 के अनुसार, केन्‍द्रीय संसद की परिषद् में राष्‍ट्रपति तथा दो सदन है जिन्‍हें राज्‍यों की परिषद् राज्‍यसभा तथा लोगों का सदन लोकसभा के नाम से जाना जाता है। संविधान की धारा 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् होगी जिसका प्रमुख प्रधान मंत्री होगा, राष्‍ट्रपति इस मंत्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार अपने कार्यों का निष्‍पादन करेगा। इस प्रकार वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद् में निहित है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है जो वर्तमान में नरेन्द्र मोदी हैं।

मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोगों के सदन (लोक सभा) के प्रति उत्तरदायी है। प्रत्‍येक राज्‍य में एक विधान सभा है। जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में एक ऊपरी सदन है जिसे विधान परिषद् कहा जाता है। राज्‍यपाल राज्‍य का प्रमुख है। प्रत्‍येक राज्‍य का एक राज्‍यपाल होगा तथा राज्‍य की कार्यकारी शक्ति उसमें विहित होगी। मंत्रिपरिषद्, जिसका प्रमुख मुख्‍य मंत्री है, राज्‍यपाल को उसके कार्यकारी कार्यों के निष्‍पादन में सलाह देती है। राज्‍य की मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से राज्‍य की विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है।

संविधान की सातवीं अनुसूची में संसद तथा राज्‍य विधायिकाओं के बीच विधायी शक्तियों का वितरण किया गया है। अवशिष्‍ट शक्तियाँ संसद में विहित हैं। केन्‍द्रीय प्रशासित भू-भागों को संघराज्‍य क्षेत्र कहा जाता है।

अनुसूचियाँ[संपादित करें]

  1. पहली अनुसूची - (अनुच्छेद 1 तथा 4) - राज्य तथा संघ राज्य क्षेत्र का वर्णन ।
  2. दूसरी अनुसूची - [अनुच्छेद 102(3), 65(3), 75(6),97, 125,148(3), 158(3),164(5),186 तथा 221] - मुख्य पदाधिकारियों के वेतन-भत्ते

भाग-क-राष्ट्रपति और राज्यपाल के वेतन-भत्ते, भाग-ख- लोकसभा तथा विधानसभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, राज्यसभा तथा विधान परिषद् के सभापति तथा उपसभापति के वेतन-भत्ते, भाग-ग- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते, भाग-घ- भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षकके वेतन-भत्ते।

  1. तीसरी अनुसूची - [अनुच्छेद 75(4),99, 124(6),148(2), 164(3),188 और 219] - व्यवस्थापिका के सदस्य, मंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, न्यायाधीशों आदि के लिए शपथ लिए जानेवाले प्रतिज्ञान के प्रारूप दिए हैं।
  2. चौथी अनुसूची - [अनुच्छेद 4(1),80(2)] - राज्यसभा में स्थानों का आबंटन राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों से।
  3. पाँचवी अनुसूची - [अनुच्छेद 244(1)] - अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जन-जातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित उपबंध।
  4. छठी अनुसूची - [अनुच्छेद 244(2), 275(1)] - असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के विषय मे उपबंध।
  5. सातवीं अनुसूची - [अनुच्छेद 246] - विषयों के वितरण से संबंधित सूची-1 संघ सूची, सूची-2 राज्य सूची, सूची-3 समवर्ती सूची।
  6. आठवीं अनुसूची - [अनुच्छेद 344(1), 351] - भाषाएँ - 6 भाषाओं का उल्लेख।
  7. नवीं अनुसूची - [अनुच्छेद 31 ख ] - कुछ भुमि सुधार संबंधी अधिनियमों का विधिमान्य करण।
  8. दसवीं अनुसूची - [अनुच्छेद 102(2), 191(2)] - दल परिवर्तन संबंधी उपबंध तथा परिवर्तन के आधार पर अ
  9. ग्यारवी अनुसूची - पन्चायती राज/ जिला पंचायत से सम्बन्धित यह अनुसूची संविधान मे 73वे संवेधानिक संशोंधन(1993) द्वारा जोड़ी गई।
  10. बारह्ववी अनुसूची - यह अनुसूची संविधान मे ७४ वे संवेधानिक संशोंधन द्वारा जोड़ी गई।

इतिहास[संपादित करें]

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जुलाई १९४५ में ब्रिटेन ने भारत संबन्धी अपनी नई नीति की घोषणा की तथा भारत की संविधान सभा के निर्माण के लिए एक कैबिनेट मिशन भारत भेजा जिसमें ३ मंत्री थे। १५ अगस्त, १९४७ को भारत के आज़ाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य ९ दिसम्बर १९४६ से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। जवाहरलाल नेहरू,डॉ भीमराव अम्बेडकर डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल,मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। इस संविधान सभा ने २ वर्ष, ११ माह, १८ दिन मे कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। भारत के संविधान के निर्माण में डॉ भीमराव अंबेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इसलिए उन्ह संविधान का निर्माता कहा जाता है।

भारतीय संविधान की प्रकृति[संपादित करें]

संविधान प्रारूप समिति तथा सर्वोच्च न्यायालय ने इस को संघात्मक संविधान माना है, परन्तु विद्वानों में मतभेद है । अमेरीकी विद्वान इस को छदम-संघात्मक-संविधान कहते हैं, हालांकि पूर्वी संविधानवेत्ता कहते है कि अमेरिकी संविधान ही एकमात्र संघात्मक संविधान नहीं हो सकता । संविधान का संघात्मक होना उसमें निहित संघात्मक लक्षणों पर निर्भर करता है, किन्तु माननीय सर्वोच्च न्यायालय (पि कन्नादासन वाद) ने इसे पूर्ण संघात्मक माना है ।

आधारभूत विशेषताएं[संपादित करें]

शक्ति विभाजन[संपादित करें]

यह भारतीय संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण है, राज्य की शक्तियां केंद्रीय तथा राज्य सरकारों मे विभाजित होती हैं। दोनों सत्ताएँ एक-दूसरे के अधीन नही होती है, वे संविधान से उत्पन्न तथा नियंत्रित होती हैं।

संविधान की सर्वोचता[संपादित करें]

संविधान के उपबंध संघ तथा राज्य सरकारों पर समान रूप से बाध्यकारी होते हैं। केन्द्र तथा राज्य शक्ति विभाजित करने वाले अनुच्छेद निम्न दिए गए हैं:

  1. अनुच्छेद 54,55,73,162,241।
  2. भाग -5 सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय राज्य तथा केन्द्र के मध्य वैधानिक संबंध।
  3. अनुच्छेद 7 के अंतर्गत कोई भी सूची।
  4. राज्यो का संसद मे प्रतिनिधित्व।
  5. संविधान मे संशोधन की शक्ति अनु 368इन सभी अनुच्छेदो मे संसद अकेले संशोधन नही ला सकती है उसे राज्यो की सहमति भी चाहिए।

अन्य अनुच्छेद शक्ति विभाजन से सम्बन्धित नहीं हैं:

  1. लिखित सविन्धान अनिवार्य रूप से लिखित रूप मे होगा क्योंकि उसमे शक्ति विभाजन का स्पषट वर्णन आवश्यक है। अतः संघ मे लिखित संविधान अवश्य होगा।
  2. सविन्धान की कठोरता इसका अर्थ है सविन्धान संशोधन मे राज्य केन्द्र दोनो भाग लेंगे।
  3. न्यायालयो की अधिकारिता- इसका अर्थ है कि केन्द्र-राज्य कानून की व्याख्या हेतु एक निष्पक्ष तथा स्वतंत्र सत्ता पर निर्भर करेंगे।

विधि द्वारा स्थापित:

  1. न्यायालय ही संघ-राज्य शक्तियो के विभाजन का पर्यवेक्षण करेंगे।
  2. न्यायालय सविन्धान के अंतिम व्याख्याकर्ता होंगे भारत मे यह सत्ता सर्वोच्च न्यायालय के पास है।

ये पांच शर्ते किसी सविन्धान को संघात्मक बनाने हेतु अनिवार्य है। भारत मे ये पांचों लक्षण सविन्धान मे मौजूद है अत्ः यह संघात्मक हैं। परंतु भारतीय संविधान मे कुछ विभेदकारी विशेषताए भी है:

भारतीय संविधान मे कुछ विभेदकारी विशेषताए भी है[संपादित करें]

1 यह संघ राज्यों के परस्पर समझौते से नहीं बना है
2 राज्य अपना पृथक संविधान नही रख सकते है, केवल एक ही संविधान केन्द्र तथा राज्य दोनो पर लागू होता है
3 भारत मे द्वैध नागरिकता नही है। केवल भारतीय नागरिकता है
4 भारतीय संविधान मे आपातकाल लागू करने के उपबन्ध है [352 अनुच्छेद] के लागू होने पर राज्य-केन्द्र शक्ति पृथक्करण समाप्त हो जायेगा तथा वह एकात्मक संविधान बन जायेगा। इस स्थिति मे केन्द्र-राज्यों पर पूर्ण सम्प्रभु हो जाता है
5 राज्यों का नाम, क्षेत्र तथा सीमा केन्द्र कभी भी परिवर्तित कर सकता है [बिना राज्यों की सहमति से] [अनुच्छेद 3] अत: राज्य भारतीय संघ के अनिवार्य घटक नही हैं। केन्द्र संघ को पुर्ननिर्मित कर सकती है
6 संविधान की 7 वीं अनुसूची मे तीन सूचियाँ हैं संघीय, राज्य, तथा समवर्ती। इनके विषयों का वितरण केन्द्र के पक्ष मे है
6.1 संघीय सूची मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय हैं
6.2 इस सूची पर केवल संसद का अधिकार है
6.3 राज्य सूची के विषय कम महत्वपूर्ण हैं, 5 विशेष परिस्थितियों मे राज्य सूची पर संसद विधि निर्माण कर सकती है किंतु किसी एक भी परिस्थिति मे राज्य केन्द्र हेतु विधि निर्माण नहीं कर सकते
क1 अनु 249—राज्य सभा यह प्रस्ताव पारित कर दे कि राष्ट्र हित हेतु यह आवश्यक है [2\3 बहुमत से] किंतु यह बन्धन मात्र 1 वर्ष हेतु लागू होता है
क2 अनु 250— राष्ट्र आपातकाल लागू होने पर संसद को राज्य सूची के विषयों पर विधि निर्माण का अधिकार स्वत: मिल जाता है
क3 अनु 252—दो या अधिक राज्यों की विधायिका प्रस्ताव पास कर राज्य सभा को यह अधिकार दे सकती है [केवल संबंधित राज्यों पर]
क4 अनु253--- अंतराष्ट्रीय समझौते के अनुपालन के लिए संसद राज्य सूची विषय पर विधि निर्माण कर सकती है
क5 अनु 356—जब किसी राज्य मे राष्ट्रपति शासन लागू होता है, उस स्थिति मे संसद उस राज्य हेतु विधि निर्माण कर सकती है
7 अनुच्छेद 155 – राज्यपालों की नियुक्ति पूर्णत: केन्द्र की इच्छा से होती है इस प्रकार केन्द्र राज्यों पर नियंत्रण रख सकता है
8 अनु 360 – वित्तीय आपातकाल की दशा मे राज्यों के वित्त पर भी केन्द्र का नियंत्रण हो जाता है। इस दशा मे केन्द्र राज्यों को धन व्यय करने हेतु निर्देश दे सकता है
9 प्रशासनिक निर्देश [अनु 256-257] -केन्द्र राज्यों को राज्यों की संचार व्यवस्था किस प्रकार लागू की जाये, के बारे मे निर्देश दे सकता है, ये निर्देश किसी भी समय दिये जा सकते है, राज्य इनका पालन करने हेतु बाध्य है। यदि राज्य इन निर्देशों का पालन न करे तो राज्य मे संवैधानिक तंत्र असफल होने का अनुमान लगाया जा सकता है
10 अनु 312 मे अखिल भारतीय सेवाओं का प्रावधान है ये सेवक नियुक्ति, प्रशिक्षण, अनुशासनात्मक क्षेत्रों मे पूर्णत: केन्द्र के अधीन है जबकि ये सेवा राज्यों मे देते है राज्य सरकारों का इन पर कोई नियंत्रण नहीं है
11 एकीकृत न्यायपालिका
12 राज्यों की कार्यपालिक शक्तियां संघीय कार्यपालिक शक्तियों पर प्रभावी नही हो सकती है।

संविधान की प्रस्तावना[संपादित करें]

संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु प्राय: उनसे पहले एक प्रस्तावना प्रस्तुत की जाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित तथा विश्व मे सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। प्रस्तावना के माध्यम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएँ, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है इसी कारण यह ‘हम भारत के लोग’ इस वाक्य से प्रारम्भ होती है। केहर सिंह बनाम भारत संघ के वाद मे कहा गया था कि संविधान सभा भारतीय जनता का सीधा प्रतिनिधित्व नही करती अत: संविधान विधि की विशेष अनुकृपा प्राप्त नही कर सकता, परंतु न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए संविधान को सर्वोपरि माना है जिस पर कोई प्रश्न नही उठाया जा सकता है।

संविधान की प्रस्तावना:

" हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद
द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

संविधान की प्रस्तावन 13 दिसम्वर 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा पास की गयी प्रस्तावन को आमुख भी कहते हैं।

संविधान के तीन भाग[संपादित करें]

संविधान के तीन प्रमुख भाग हैं। भाग एक में संघ तथा उसका राज्यक्षेत्रों के विषय में टिप्पणीं की गई है तथा यह बताया गया है कि राज्य क्या हैं और उनके अधिकार क्या हैं। दूसरे भाग में नागरिकता के विषय में बताया गया है कि भारतीय नागरिक कहलाने का अधिकार किन लोगों के पास है और किन लोगों के पास नहीं है। विदेश में रहने वाले कौन लोग भारतीय नागरिक के अधिकार प्राप्त कर सकते हैं और कौन नहीं कर सकते। तीसरे भाग में भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के विषय में विस्तार से बताया गया है। • संविधान की प्रस्तावना बाहर सेट मुख्य उद्देश्य है जो संविधान सभा को प्राप्त करने का इरादा है. • 'उद्देश्य' संकल्प डॉ। भीम राव अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित है और संविधान सभा द्वारा पारित, अंततः भारत के संविधान की प्रस्तावना बन गया. • जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने मनाया है, प्रस्तावना संविधान के निर्माताओं के मन को जानने की कुंजी है. • यह भी भारत के लोगों के आदर्शों और आकांक्षाओं का प्रतीक है. • संविधान (42 वां संशोधन) अधिनियम, 1976 प्रस्तावना में संशोधन और शब्द समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और प्रस्तावना के लिए वफ़ादारी जोड़ी. • प्रस्तावना प्रकृति में गैर न्यायोचित है, राज्य के नीति theDirective सिद्धांतों की तरह और कानून की एक अदालत में लागू नहीं किया जा सकता है. यह न तो राज्य के तीन अंगों को मूल शक्ति (निश्चित और वास्तविक शक्ति) प्रदान कर सकते हैं, और न ही संविधान के प्रावधानों के तहत अपनी शक्तियों की सीमा. • संविधान की प्रस्तावना विशिष्ट प्रावधान नहीं ओवरराइड कर सकते हैं. दोनों के बीच किसी भी संघर्ष के मामले में, बाद अभिभावी होगी. तो •, यह एक बहुत ही सीमित भूमिका निभानी है. • उच्चतम न्यायालय ने मनाया प्रस्तावना संविधान के प्रावधानों के आसपास अस्पष्टता को दूर करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

प्रस्तावना के प्रयोजन


• प्रस्तावना वाणी है कि यह भारत के लोगों को जो अधिनियमित था अपनाया और खुद को संविधान दिया है. • इस प्रकार, संप्रभुता लोगों के साथ अंत में निहित है. • यह भी लोगों की जरूरत है कि प्राप्त किया जा करने के आदर्शों और आकांक्षाओं को वाणी है. • आदर्शों आकांक्षाओं से अलग कर रहे हैं. जबकि पूर्व हे परमेश्वर के रूप में भारत के संविधान की घोषणा के साथ हासिल किया गया है, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य, बाद न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे, जो अभी तक प्राप्त किया जा शामिल है. आदर्शों आकांक्षाओं को प्राप्त करने का मतलब हैं.

प्रस्तावना


हम, भारत के लोगों, सत्यनिष्ठा से एक संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य में भारत का गठन करने के लिए और अपने सभी नागरिकों को सुरक्षित हल होने: न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक; सोचा, अभिव्यक्ति, विश्वास, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता; स्थिति के और अवसर की समानता, और उन सब के बीच बढ़ावा देने व्यक्ति और राष्ट्र की एकता और अखंडता की गरिमा आश्वस्त बिरादरी; हमारी संविधान सभा नवम्बर, 1949 के इस बीस छठे दिन में, एतद्द्वारा, अपनाने करते अधिनियमित और अपने आप को इस संविधान दे.

प्रभु 'संप्रभु' शब्द पर जोर दिया कि भारत के बाहर कोई अधिकार नहीं है जिस पर देश के किसी भी निर्भर रास्ते में है.

समाजवादी 'समाजवादी' शब्द करके, संविधान लोकतांत्रिक साधनों के माध्यम से समाज के समाजवादी पैटर्न की उपलब्धि का मतलब है.

लौकिक • है कि भारत एक 'सेकुलर राज्य' है का मतलब है कि भारत के गैर - धार्मिक या अधार्मिक, या विरोधी धार्मिक नहीं करता, लेकिन बस है कि राज्य में ही धार्मिक और नहीं है "सर्व धर्म Samabhava" प्राचीन भारतीय सिद्धांत निम्नानुसार है. • यह भी मतलब है कि राज्य के नागरिकों के खिलाफ किसी भी तरह से धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा. • राज्य का संबंध धर्म विश्वास करने के लिए सही है या नहीं एक धर्म में विश्वास सहित एक व्यक्ति का निजी मामला हो सकता है. हालांकि, भारत अर्थ है पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्ष नहीं है, अपनी विशिष्ट सामाजिक - सांस्कृतिक वातावरण के कारण.

यह संविधान का एक हिस्सा है? • Kesavananda केरल मामले (1971) की भारती बनाम राज्य में उच्चतम न्यायालय के 1960 के पहले निर्णय खारिज (Berubari मामले) और यह स्पष्ट है कि यह संविधान का एक हिस्सा है और संसद के संशोधन के रूप में सत्ता के अधीन है संविधान के किसी अन्य प्रावधान, संविधान के मूल ढांचे प्रदान के रूप में प्रस्तावना में पाया नष्ट नहीं है. हालांकि, यह संविधान का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है. • नवीनतम S.R. बोम्मई मामले में, 1993 में तीन सांसद, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में भाजपा सरकारों की बर्खास्तगी के बारे में, जस्टिस रामास्वामी ने कहा, "संविधान की प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न हिस्सा है सरकार, संघीय ढांचे की एकता और अखंडता के लोकतांत्रिक रूप. राष्ट्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, सामाजिक न्याय और न्यायिक समीक्षा संविधान के बुनियादी सुविधाओं कर रहे हैं ". • प्रश्न प्रस्तावना जब यह एक बुनियादी सुविधा है संशोधन किया गया था क्यों के रूप में उठता है. 42 संशोधन करके, प्रस्तावना 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' और 'अखंडता' को शामिल करने के लिए संशोधन किया गया था के रूप में यह मान लिया था कि इन संशोधनों को स्पष्ट कर रहे हैं और प्रकृति में योग्यता. वे पहले से ही प्रस्तावना में निहित हैं

लोकतंत्रीय • शब्द का अर्थ है 'डेमोक्रेटिक कि लोगों द्वारा चुने गए शासकों केवल सरकार चलाने का अधिकार है. • भारत 'प्रतिनिधि लोकतंत्र' की एक प्रणाली है, जहां सांसदों और विधायकों को सीधे लोगों द्वारा चुने गए हैं निम्नानुसार है. पंचायतों और नगर पालिकाओं (73 और 74 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992) के माध्यम से जमीनी स्तर पर लोकतंत्र ले • प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि, प्रस्तावना न केवल राजनीतिक, लेकिन यह भी लोकतंत्र सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्रों की परिकल्पना की गई है.

गणतंत्र 'गणतंत्र' शब्द का मतलब है कि वहाँ भारत में कोई वंशानुगत शासक और राज्य के सभी प्राधिकारी हैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लोगों द्वारा चुने गए मौजूद है.

प्रस्तावना राज्यों है कि प्रत्येक नागरिक उद्देश्यों के लिए सुरक्षित कर रहे हैं 1. न्यायमूर्ति: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक • न्याय के बारे में, एक बात स्पष्ट है कि भारतीय संविधान के राजनीतिक न्याय के लिए राज्य और अधिक से अधिक कल्याण प्रकृति में उन्मुख बनाने के द्वारा सामाजिक और आर्थिक न्याय प्राप्त करने का मतलब हो जाने की उम्मीद है. • भारत में राजनीतिक न्याय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार द्वारा योग्यता के किसी भी प्रकार के बिना गारंटी है. • जबकि सामाजिक न्याय सम्मान की abolishingjmy Jitle (18 Art.) द्वारा सुनिश्चित किया जाता है और अस्पृश्यता (17 Art.), निर्देशक सिद्धांतों के माध्यम से मुख्य रूप से आर्थिक न्याय की गारंटी है.

2. लिबर्टी: सोचा, अभिव्यक्ति, विश्वास, विश्वास और पूजा की • लिबर्टी एक मुक्त समाज का एक अनिवार्य विशेषता है कि एक व्यक्ति के बौद्धिक, मानसिक और आध्यात्मिक संकायों के पूर्ण विकास में मदद करता है. • भारतीय संविधान छह आर्ट के तहत व्यक्तियों को लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है. 19 और धर्म की कला के तहत स्वतंत्रता का अधिकार. 25-28.

3. की स्थिति, अवसर: समानता • स्वतंत्रता का फल पूरी तरह से जब तक वहाँ स्थिति और अवसर की समानता है महसूस नहीं किया जा सकता है. • हमारा संविधान यह गैरकानूनी बना देता है, धर्म, जाति, लिंग, या सभी के लिए खुला सार्वजनिक स्थानों अस्पृश्यता (17 Art.) को खत्म करने, फेंकने द्वारा और जन्म स्थान (15 Art.) के आधार पर ही राज्य द्वारा किसी भेदभाव सम्मान के खत्म शीर्षक (ArtJ8). • हालांकि, राष्ट्रीय मुख्यधारा में समाज के अब तक उपेक्षित वर्गों को लाने के लिए, संसद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों (सुरक्षा भेदभाव) के लिए कुछ कानून पारित कर दिया गया है.

4. बिरादरी भाईचारे के रूप में संविधान में निहित भाईचारे की भावना लोगों के सभी वर्गों के बीच प्रचलित मतलब है. यह राज्य धर्मनिरपेक्ष बनाने, समान रूप से सभी वर्गों के लोगों को मौलिक और अन्य अधिकारों की गारंटी, और उनके हितों की रक्षा के द्वारा प्राप्त किया जा मांग की है. हालांकि, बिरादरी एक उभरती प्रक्रिया है और 42 संशोधन द्वारा 'अखंडता' शब्द जोड़ा गया था, इस प्रकार यह एक व्यापक अर्थ दे.


के.एम. मुंशी 'राजनीतिक कुंडली' के रूप में करार दिया. बयाना बार्कर यह संविधान की कुंजी कहता है. ठाकुरदास भार्गव 'संविधान की आत्मा' के रूप में मान्यता दी. शब्द 'समाज के सोशलिस्टिक पैटर्न' अवादी सत्र में 1955 में कांग्रेस द्वारा भारतीय राज्य का एक लक्ष्य के रूप में अपनाया गया था.

       समाजिक न्याय
       सामाजिक न्याय का आशय आम तौर पर समाज में लोगो के मध्य समता, एकता, मानव अधिकार, की स्थापना करना है तथा व्यक्ति की गरीमा को विशेष महत्व प्रदान करना है । यह मानव अधिकार और समानता की अवधारणाओं पर आधारित है और प्रगतिशील कराधन, आय, सम्पत्ति के पुनर्वितरण, के माध्यम से आर्थिक समतावाद लाना सामाजिक न्याय का मुख्य उद्देश्य हैं । भारतीय समाज में सदियों से सामाजिक न्याय की लडाई आम जनता और शासक तथा प्रशासक वर्ग के मध्य होती आई है । यही कारण हेै कि इसे हम कबीर की वाणी बुद्ध की शिक्षा, महावीर की दीक्षा, गांधी की अहिंसा, सांई की सीख, ईसा की रोशनी, नानक के संदेश में पाते हैं ।
       सदियों से मानव सामाजिक न्याय को प्राप्त करने भटकता रहा है और इसी कारण दुनिया में कई युद्ध, क्रांति, बगावत, विद्रोह, हुये हैं जिसके कारण कई सत्ता परिवर्तन हुए हैं । जिन राज्यों और प्रशासकों ने सामाजिक न्याय के विरूद्ध कार्य किया उनकी सत्ता हमेशा क्रांतिकारियों के निशानों में रही है । इसलिए प्रत्येक शासक ने अपनी नीतियों मे सामाजिक न्याय को मान्यता प्रदान की है । इसे हम चाणक्य की राजनीति, अकबर की नीतियों, शेरशाह सूरी के सुधारों, में देखते हैं । 
       हमारा भारतीय समाज पहले वर्ण व्यवस्था पर आधारित था जो धीरे  धीरे बदलकर जाति व्यवस्था मंे परिवर्तित हो गया, उसके बाद असमानता, अलगाववाद, क्षेत्रवाद, रूढीवादीता, समाज में उत्पन्न हुई जिसका लाभ विदेशियों के द्वारा उठाया गया और ‘‘फूट डालो और राज्य करों’’ की नीति अपनाकर भारत को एक लम्बी अवधि तक पराधीन रखा।
       लेकिन लोगो की एकता अखण्डता और भाईचारे की भावना से आजादी की लडाई लडने पर भारत 15 अगस्त सन् 1947 को आजाद हुआ और उसके बाद भारत में सामाजिक न्याय की स्थापना, व्यक्ति का शासन, सोच की स्वतंत्रता, भाषण प्रेस की आजादी, संघ बनाने की स्वतंत्रता हो, इसके लिए सर्वोच्च कानून बनाये जाने की आवश्यकता समझी गई और डॉ.राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा का गठन किया गया जिसमें डॉ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जैसे महान् व्यक्तित्व को मसौदा समिति का अध्यक्ष मनोनीत किया गया ।
       संविधान सभा की कई बैठको के बाद भारत के संविधान की रचना की गई, जो विश्व का सबसे बडा, लिखित, अनूठा, संविधान है जिसमें सामाजिक न्याय को सर्वोच्चता प्रदान की गई है । यह दुनिया का सामाजिक न्याय को दर्शित करने वाला एक प्रमाणिक अभिलेख है ।
       हमारे संविधान मंे सामाजिक और आर्थिक न्याय की गारंटी समस्त नागरिकों को तथा जीवन जीने की गारंटी प्रत्येक व्यक्ति को दी गई है। सामाजिक न्याय का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित के बीच सामान्जस्य स्थापित करना है । इसलिए कल्याणकारी राज्य की कल्पना संविधान निर्माताओं ने की है। बहुजन हितांयैं, बहुजन सुखांयै को ध्यान में रखते हुये समाजवादी व्यस्था स्थापित की गई है ।
       भारतीय समाजवाद अन्य राष्ट्ों के समाजवाद से अलग है । यहां पर सत्ता समाज में निहित रहती है, परन्तु उसका उपयोग समाज के हित के लिए हो इसलिए सरकार नियंत्रण रखती है । सामाजिक न्याय के लिए संविधान में जो प्रावधान दिये गये हैं उनका मुख्य उद्देश्य वितरण की असमानता को दूर करना तथा असमानों में संव्यवहारों में असमानता को दूर करना व कानून का प्रयोग वितरण योग साधन के रूप में समाज में धन का उचित बटवारां करने में किया जाये। इसका विशेष ध्यान रखा गया है ।
        हमारे संविधान की उद्देशीयका संविधान का आधारभूत ढांचा है । जिसमें सामाजिक, आर्थिक राजनैतिक न्याय प्रदान किये जाने की गारंटी प्रदान की गई है । इसके लिए भारतीय संविधान के भाग-3 में मौलिक अधिकार दिये गये हैं । भाग-4 में राज्यों को नीतिनिदेशक तत्व बताये गये है, जो राज्य की नीति का आधारस्तम्भ बताये गये हैं ।
       मूल अधिकार सम्बंधी भाग-3 अधिकारों का घोषणा पत्र, मेग्नाकार्टा, बिल आफ राइट्स, आदेश, हैं जिसके संबंध में न्यायधिपति श्री भगवती ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ 1979 भाग-1 उच्चतम न्यायालय निर्णय पत्रिका 243 मामले में कहा है कि‘‘इन मूल अधिकारों का गहन उद्गम स्वतंत्रता का संघर्ष है । उन्हें संविधान में इस आशा और प्रत्याशा के साथ सम्मिलित किया गया था कि एक दिन

सही स्वाधीनता का वृक्ष भारत में विकसित होगा । ये उस जाति के अवचेतन मन में अमिट तौर पर अंकित थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए


पूरे 30 वर्षो तक लडाई लडी और संविधान अधिनियमित किया गया तो जिन्होंने मूल अधिकारों के रूप में अभिव्यक्ति पायी । ये मूल अधिकार इस देश की जनता द्वारा वैदिक काल से संजोये गये आधारभूत मूल्यों का प्रतिनिधत्व करते हैं और वे व्यक्ति की गरिमा का संरक्षण करने और ऐसी दशांए बनाने के लिए परिकल्पित हैं जिनमें हर एक मानव अपने व्यक्त्वि का पूर्ण विकास कर सके । वे मानव अधिकारों के आधार भूत ढांचे के आधार पर गारंटी का एक ताना-बाना बुनते है और व्यक्तिगत स्वाधीनता पर इसके विभिन्न आयामों में अतिक्रमण न करने की राज्य पर नकारात्मक बाध्यता अधिरोपित करते हैं।’’

       सामाजिक न्याय प्रदान किये जाने के लिए सर्व प्रथम हमारे संविधान के भाग 4 में उल्लेखित राज्य की नीतिनिदेशक तत्व एक लोकहितकारी राज्य और समाजवादी समाज की स्थापना के संबध में महत्वपूर्ण कदम है । जिसके संबंध में डॉ. अम्बेडकर का कहना है कि हम कल्याणकारी राज्य के नागरिक है । हमारा कर्तव्य केवल शांति व्यवस्था बनाये रखना और जनता के प्राण की स्वतंत्रता और सम्पत्ति की सुरक्षा तक ही सीमित नहीं है बल्कि जन साधारण के सुख ओर समृद्धि की अभिवृद्धि करना है । इसलिए राज्यों को नीति निर्देशक तत्व दिये गये हैं ताकि वे इनका पालन करके जनता के हित के लिए आर्थिक लोक तंत्र की स्थापना कर सकते हैं । अपनी नीतियों के निर्धारण और कानून बनाने में वह इन्हें शामिल कर सकते हैं । 
       डॉ. अम्ब्ेाडकर के अनुसार नीति निर्देशक तत्व भारतीय संविधान की अनोखी व्यवस्था है । जिसके संबंध में उनका कहना है कि हमारा संविधान संसदीय प्रजातंत्र की स्थापना करता है ।संसदीय प्रजातंत्र से तात्पर्य है-एक व्यक्ति एक वोट । हमारा यह भी तात्पर्य है कि प्रत्येक सरकार अपने प्रतिदिन के कार्य-कलापों में तथा एक विषय के अन्त में, जब कि मतदाताओ और निर्वाचक-मण्डल की सरकार द्वारा किये गये कार्यो का मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है, कसौटी पर कसी जायेगी । राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना का उददेश्य यह है कि हम कुछ निश्चित लोगों को यह अवसर न दें कि वे निरंकुशवाद को कायम रख सकें । जब हमने राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना की है, तो हमारी यह भी इच्छा है कि आर्थिक  लोकतंत्र का आदर्श भी स्थापित करें ।

प्रश्न यह है कि क्या हमारे पास कोई निश्चित तरीका है जिससे हम आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना कर सकते हैं ? विभिन्न ऐसे तरीके हैं जिनमें लोगों का विश्वास है कि आर्थिक लोकतंत्र समझते हैं, और बहुत से लोग समाजवादी समाज की स्थापना को सबसे अच्छा आर्थिक लोकतंत्र मानते है, और बहुत से लोग कम्युनिज्म की स्थापना को सर्वोत्तम आर्थिक समाजवाद का रूप मानते हैं । इस तथ्य पर ध्यान देते हुए कि आर्थिक लोकतंत्र लाने के विभिन्न तरीके हैं, हमने जो भाषा प्रयुक्त की है, उसमें जानबूझकर नीति- निदेशक तत्वों में ऐसी चीज रखी है जो निश्चित या अनम्य नहीं है । हमनेइसीलिए विविध तरीकों से आर्थिक लोकतंत्र के आदर्श तक पहंुचने के लिए चिन्तनशील लोगों के लिए पर्याप्त स्थान छोडा है । इस संविधान की रचना में

हमारे वस्तुतः दो उद्देश्य हैं-

   1-     राजनीतिक लोकतंत्र का रूप निर्धारित करना, और
   2-    यह स्थापित करना कि हमारा आदर्श लोकतंत्र है और इसका भी विधान करना कि प्रत्येक सरकार, जो कोई भी सत्ता में हो, आर्थिक लोकतंत्र लाने का प्रयास करेगी ।
       सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान किये जाने के लिए नीति निदेशक तत्व राज्य को यह निर्देश देते है कि वे लोक कल्याण की अभिवृद्धि करके ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना का प्रयास करें जिनमें सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक न्याय प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुनिश्चित हों ।
       ये वे निदेश है जो संविधान की प्रस्तावना में अन्तर्निहित हैं, जिनके अनुसार राज्य का कर्तव्य अपने नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक न्याय प्रदान करना है । उन्हें विचार अभिव्यक्ति, धर्म, विश्वास, उपासना, की स्वतंत्रता प्रदान करना है । उन्हें प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्रदान करना है तथा व्यक्ति की गरीमा राष्ट् की एकता और अखण्डता और बन्धुता को बढाना है । तभी हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बना सकते है ।    
       नीतिनिदेशक तत्व समाजिक न्याय प्रदान किये जाने की दिशा में उठाये गये महत्वपूर्ण कदम है जिसमें सामाजिक न्याय की विवेचना विस्तार तथा व्यापक रूप से की गई है । इसलिए ग्रेनविल ऑस्टिन ने निदेशक तत्वों की महत्ता                

को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है -भारतीय संविधान प्रथमतः और सर्वोपरि रूप में एक सामाजिक दस्तावेज है । इसके अधिकांश उपबन्ध या तो प्रत्यक्षतः सामाजिक क्रान्ति के उद्देश्य को पूरा करने के लिए आवश्यक दशाओं की स्थापना करते हुये सामाजिक क्रांति के लक्ष्यों को आगे बढाने के लिए या तो सीधे उपबन्धित हैं, या फिर सम्पूर्ण संविधान में राष्ट्ीय पुनर्जागरण का लक्ष्य व्याप्त होते हुए भी सामाजिक क्रान्ति के लिए वचनबद्धता का जो मर्म है, वह भाग-3 और 4 के मूल अधिकारों तथा राज्य की नीति निदेशक तत्वों में है। यह संविधान की आत्मा है।’’

       संविधान शास्त्रीयों के अनुसार नीति निर्देशक तत्व और मूल अधिकारो के बीच में कोई विरोधाभाष नहीं है । डॉ. अम्ब्ेाडकर के अनुसार यह कहना निरर्थक है कि नीति निर्देशक तत्वों का कोई महत्व नहीं हैं । मेरे विचार के अनुसार तो निदेशक तत्व बहुत ही महत्व के हैं, क्यों कि उनसे यह प्रस्थापित होता है कि हमारा आदर्श लोकतंत्र है। हम यह नही चाहते थें कि बिना किसी ऐसे मार्ग-दशर््ान के कि हमारा आर्थिक आदर्श क्या है, हमारा सामाजिक संगठन किस प्रकार का हो मात्र एक संसदात्मक प्रकार की सरकार संविधान में उपबन्धित विविध साधनों के माध्यम द्वारा गठित करा ली जाये । अतः हम लोगों ने संविधान में जानबूझकर नीति निर्देशक तत्वों का समावेश किया है ।’’
        इन सिंद्धातों में व्यापक लोक साधारण के हितो की रक्षा की भावना सन्निहित है । इसी कारण संविधान के 25वे संशोधन द्वारा राज्यों को निर्देशक तत्वों के सबंध में विधि बनाये जाने की शक्ति प्रदान की गई । जिसमें नीति निदेशक तत्वों को मूल अधिकारो पर प्राथमिकता दी गई है । और इसके अनुसार निदेशक तत्वों को कार्यन्वित करने के लिए बनायी गई किसी भी विधि को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती थी कि वह अनुच्छेद 14 और 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारो से अंसगत है या उसे छीनती है या न्यून करती है ।
       इसीलिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय प्रदान किये जाने अनुच्छेद 38 में नया खण्ड 2 जोडकर नीति निर्देशक तत्व भी जोडा गया है कि राज्य विशेष रूप से आय की असमानता को कम करने का प्रयास करेंगा न केवल व्यक्तियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुये लोगो के समूहों के बीच प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरो की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा । इस प्रकार आर्थिक असमानता दूर करने का प्रयास किया गया है ।
       आर्थिक न्याय प्रदान किये जाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 39 में निर्देश दिये गये है कि-
       क- पुरूष और स्त्री सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो ।
       ख- समुदाय की भौतिक सम्पदा का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हितों का सर्वोत्तम साधन बन सके । इस खण्ड के अधीन उददेश्यों की पूर्ति करने के लिए राज्य उत्पादन के साधनों का राष्ट्ीयकरण कर सकता है ।
       ग- आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन के साधन का सर्वसाधारण के अहित के लिए केन्द्रण न हो ।
       घ- पुरूषों और स्त्रियों दोनो के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन हो ।
       ड- कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालको की सुकुमार अवस्था का दुरूपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगार में न जाना पडे जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो ।
       च- बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जांए ओर बालको तथा अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाये ।
       इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 38 और 39 में विधि शास्त्र का वितरण न्याय का सिंद्धात शामिल किया गया है । जिसका उद्देश्य नागरिकों के लिए आर्थिक विषमता को समाप्त करना है । इसी कारण संसद ने समान परिश्रमिक अधिनियम 1976 पारित किया । जिसमें समान कार्य के लिए समान वेतन को संवैधानिक लक्ष्य मानते हुये इसे मूल अधिकार के बराबर दर्जा दिया गया

है । जमीदारी उन्मूलन अधिनियम लोक प्रयोजन के लिए पारित किया गया है ।

       सामाजिक सुरक्षा संबधी अनेक उपबन्ध नीतिनिर्देशक तत्वों में शामिल किया गया है जिसमें प्रमुख निम्नलिखित हैः-


   क-    उद्योगो के प्रबंध में कर्मकारांे का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए

अनुच्छेद 43क राज्य से यह अपेक्षा करता है कि राज्य उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य प्रकार से किसी उद्योग में लगे हुये उपक्रमों व स्थापनों अथवा अन्य संगठनों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए कदम उठायेगा ।

   ख-    कुछ अवस्थाओं में काम, शिक्षा और लोक-सहायता पाने का अधिकार प्रदान किये जाने के लिए अनुच्छेद 41 राज्य को यह निदेश देता है कि वह अपनी सामार्थ्य और विकास की भीतर प्रत्येक व्यक्ति के लिए काम पाने, शिक्षा प ाने तथा बेकारी, बुढापा, बीमारी और अंगहानि तथा अनर्ह अभाव की दशाओ में सार्वजनिक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त करने का कार्य साधक उपबन्ध करेगा ।
   ग-    काम की न्याय तथा मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 42 राज्य को काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता का उपबन्ध करने के लिए निदेश देता है । यही कारण है कि आज 6 माह का प्रसूति अवकाश और 15 दिन पितृत्व अवकाश प्रदान किया जाता है । 
   घ-    कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि तथा कुटीर उद्योगो को बढावा देने के लिए अनुच्छेद 43 राज्य से अपेक्षा करता है कि वह कर्मकारों को काम निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर और उसका सम्पूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशेषरूप से ग्रामों में कुटीर उद्योग को बढाने का प्रयास करेगा । कई राज्यों द्वारा सूती कपडे बनाने वाली लघु सहकारी समितियों को

छूट दी गई है ।

       समाज के दुर्बल वर्गो के शिक्षा और अर्थ सम्बंधी हितों की अभिवृद्धि करने के लिए अनुच्छेद 46 इस बात का आह्वान करता है कि राज्य जनता के दुर्बल वर्गो के, विशेषतया अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित आदिम जातियों की शिक्षा तथा अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा तथा सामाजिक अन्याय तथा सब प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा ।
       अनुच्छेद-46 राज्य को जन के दुर्बलता और विशेषतया अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित आदिम जातियों के शिक्षा तथा आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से उन्नति करने तथा सब प्रकार के शोषण से उनका संरक्षण करने का निदेश देता है ।
       संविधान के भाग-3 में भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए अनेक उलबन्ध हैं । अनुच्छेद-14 भारत के प्रत्येक व्यक्ति को विधि के समक्ष समता ओर विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है । अनुच्छेद- 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश पर राज्य द्वारा भेदभाव करने का प्रतिषेध करता हैं । इस अनुच्छेद की कोई भी बात राज्य को सामाजिक और शिक्षात्मक दृष्टि से पिछडंे हए वर्गो या अनुसूचित जातियों या अनुसूचित आदिम जातियों की उन्नति के लिए विशेष उपबन्ध करने में बाधक न होगी ।
       अनुच्छेद-16 सरकारी नौकरियों के लिए अवसर की समानता की गारंटी करता है और इसके संबंध में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग उदभव, जन्मस्थान, निवास के आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है । किन्तु राज्य उक्त वर्गो के व्यक्तियों के लिए, यदि उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका है, नियुक्तियों या पदों पर आरक्षण का प्रावधान कर सकता है । अनुच्छेद-17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है जो भारतीय समाज का एक महान कलंक था । अनुच्छेद-19-5 अनुसूचित आदिम जातियों के हितें की सरंक्षा के लिए इस अनुच्छेद के खण्ड घ, ड और च में प्रदत्त मूल अधिकारों पर निर्बन्धन लगाता है ।
       अनुच्छेद-29 से लेकर 30 तक में अल्पसंख्यकों की संस्कृति के संरक्षण के लिए उपबन्ध किया गया है । भारत में रहने वाले नागरिको के किसी वर्ग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाये रखने का अधिकार प्राप्त है । सभी अल्पसंख्यक वर्गो को, चाहे वे धर्म या भाषा पर आधारित हो, अपनी रूचि की शिक्षा-संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा । शिक्षा-संस्थाआंे को सहायता देने में राज्य किसी विद्यालय के विरूद्ध इस आधार पर विभेद न करेगा कि वह किसी अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबंध में है ।
       अनुच्छेद-275 अनुसूचित आदिम जातियों के कल्याण हेतु राज्यों को

केन्द्र द्वारा सहायक अनुदान का उपबन्ध करता है । अनुच्छेद-325 के अनुसार निर्वाचन हेतु एक साधारण निर्वाचक-नामावली होगी तथा केवल धर्म, मूलवंश,


जाति, लिंग के आधार पर कोई व्यक्ति किसी ऐसी नामावली में सम्मिलित किये जाने के लिए अपात्र न होगा ।

       अनुच्छेद-164 उडीसा, बिहार और मध्य प्रदेश राज्यों में आदिम अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए एक विशेष मंत्री का उपबन्ध करता है । अनुच्छेद-330 से लेकर 342 तक में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित आदिम जातियों, ऐंग्लो-इंडियन्स और पिछडे वर्गो के लिए विशेष उपबन्ध लोक सभा में सीटों के आरक्षण राज्यों में नौकरी में आरक्षण, पिछडा वर्ग नियुक्ति आयोग, अल्पसंख्यक आयुक्त की नियुक्ति आदी के प्रावधान किये गये है । अनुच्छेद- 347,350, 350क, 350ख, भाषायी अल्पसंख्यकों के संरक्षण की व्यवस्था करते हैं ।    अनुसूचित जाति, जनजाति बाहूल्य क्षेत्रों को संविधान के अंतर्गत विशेष क्षेत्र घोषित कर उसके निवासियों को विशेषाधिकार प्रदान किये गये है ।   
       बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए अनुच्छेद 45 अशिक्षा को दूर करने के उद्देश्य से राज्य को 14 वर्ष तक की आयु तक के सभी बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबन्ध करने का निदेश देता है । 14 वर्ष के बालकों को निःशुल्क शिक्षा देना राज्य का संविधानिक दायित्व माना गया है । क्यों कि अनुच्छेद 21 के अधीन शिक्षा पाने का अधिकार एक मूल अधिकार है । किन्तु उच्च शिक्षा पाने के मामले में यह अधिकार राज्य की आर्थिक क्षमता पर निर्भर करेगा ।
       पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को उंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्तव्य बताते हुये कहा गया है कि अनुच्छेद 47 के अधीन राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य होगा कि वह लोगों के पोषाहार-स्तर और जीवन- स्तर को उंचा करने और लोक-स्वास्थ्य में सुधार करने का प्रयास करें तथा विशिष्टतया मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के औषधीय प्रयोजनों को छोडकर, उपयोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करें ।
       इसी कारण मुम्बई राज्य द्वारा बम्बई मध्य निषेध अधिनियम लागू किया गया है । गुजरात में भी शराब की बिक्री पर रोक लगाई गई है । बार डांस को प्रतिबंधित किया गया है । 
       समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता को सर्वाधिक महत्व प्रदान करते हुये अनुच्छेद 39क राज्य को यह निदेश देता है कि वह सुनिश्चित करे कि विधिक व्यवस्था इस प्रकार काम करे कि सभी को अवसर के आधार सुलभ हों और वह विशिष्टतया आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाये तथा उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीति से निः श्ुाल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करें । इस प्रकार निःशुल्क विधिक सहायत शीघ्र परीक्षण की व्यवस्था की गई है । राज्यों में विधिक सेवा प्राधिकरण बनाये गये है । लोक अदालत, सुलह, समझौते के आधार पर प्रकरणो के निपटारे का प्रयास किया जा रहा है ।
       समाज कल्याण संबंधी निदेशक तत्व भी शामिल किये गये हैं  राष्ट्ीय पिता महात्मा गांधी के ग्राम राज्य की कल्पना साकार करने के लिए पंचायती राज्य व्यवस्था स्थापित करने संविधान में 73वे-74वें संशोधन शामिल किये गये हैं । तथा गावों में पंचायतो और शहर में नगर पालिकाओं को महत्व प्रदान किया गया है।जिसके संबंध में अनुच्छेद 40 राज्य को निदेश देता है कि वह ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठायेगा और उनको ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हो । इन संस्थाओ को नागरिक प्रशासन की शक्ति दी गई है । गांवों में सडक, गली, तालाब, कुओं, का निर्माण करवाने शिक्षा और सफाई की व्यवस्था करने के अधिकार दिये गये हैं ।
       इस प्रकार सामाजिक, आर्थिक, न्याय प्रदान करने निदेशक तत्वों को ध्यान में रखते हुये अखिल भारतीय खादी और ग्राम उद्योग बोर्ड की स्थापना की गई है । राज्यों में अनिर्वाय शिक्षा लागू की गई है । देश में पूजी का सामान्य बटवारा किये जाने के लिए बैंको का राष्ट्ीय करण किया गया है । भूतपूर्व महाराज के प्रिवी पर्स को समाप्त किया गया है । जमीदारी प्रथा समाप्त करके भूमि जोतने वाले को भूमि स्वामी बना दिया है । राज्यों में खेतीहर किसानो, मजदूरो की दिशा एंव दशा सुधारने अनेक कानून पारित किये हैं । खेती की सीमा निर्धारित कर दी है ।    
       हमारे भारतीय समाज में बहु विवाह, मानव बली, सती प्रथा, पशु हत्या, सदियों से व्याप्त है जिसे धार्मिक रंग देकर कानूनी वैद्धता अपने धर्म के नाम से प्रदान की गई है, जब कि यह सभी कार्य सामाजिक बुराई में शामिल है और


लोक आचरण के विरूद्ध है ।इसलिए संविधान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता की बात नीतिनिदेशक तत्वों में कही है और प्रत्येक विवाह के पंजीयन को कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया गया है ।

       अनुच्छेद 44 यह अपेक्षा करता है कि राज्य भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास होगा ।
       कृषि और पशुपालन का संघटन सुधारने के लिए अनुच्छेद 48 राज्य को निदेश देता है कि वह कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों पर संगठित करने का प्रयास करेगा तथा विशेषयता गायों और बछडो तथा अन्य दुधारू और वाहक ढोरों की नस्ल के परिरक्षण और सुधारने के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठायेगा । इसी कारण कईराज्यों ने गौ वध अधिनियम पारित किये हैं ।
       पर्यावरण का संरक्षण तथा वन्य जीवों की रक्षा करने के लिए अनुच्छेद 48क यह अपेक्षा करता है कि राज्य देश के पर्यावरण की सुरक्षा तथा उनमें सुधार करने का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा का प्रयास करेगा । इसके लिए कई राज्यों में प्रोजेक्ट टाइगर जैसी बहुअयामी योजना चल रही है । वनो को संरक्षित घोषित किया गया है । जंगली जानवरों के संरक्षण के लिए नेश्नल पार्क बनाये गये हैं और वन अपराध में कठोर दण्ड के प्रावधान किये गये हैं । 
       राष्ट्ीय महत्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण प्रदान करने के लिए अनुच्छेद49 यह उपबंधित करता है कि राज्य कलात्मक या ऐतिहासिक अभिरूचि वाले प्रत्येक स्मारक या स्थान या वस्तु की यथा स्थिति लुंठन, विरूपण, विनाश, अपसारण, व्ययन अथवा निर्यात से रक्षा करना राज्य का अधिकार होगा ।
       कार्यपालिका से न्यायपलिका का टकराव रोकने पृथक्करण संबंधी प्रावधान किये गये है जिन्हें कई राज्यों में अपनाया भी है अनुच्छेद 50 यह अपेक्षा करता है कि राज्य लोक-सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने के लिए कदम उठायेगा ।
       अन्तर्राष्ट्ीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि के लिए अनुच्छेद 51 यह उपबंधित करता है कि राज्य अन्तर्राष्ट्ीय क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्ीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि करेगा, राज्यों के बीच न्याय रखने का और सम्मानपूर्ण सम्बंधों के बनाये रखने का प्रयास करेगा, एक-दूसरे से व्यवहारों में अन्तर्राष्ट्ीय विधि और संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढाने का प्रयास किया जायेगा और    अन्तर्राष्ट्ीय विवादों का मध्यस्थता द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा ।
       व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, अध्यात्मिक, राजनीतिक, शारीरिक, मानसिक, विकास के लिए मूल अधिकार भाग-3 में प्रदान किये गये हैं जो वे आधारभूत अधिकार हैं जिनके अभाव में व्यक्ति का बहुमुखी विकास संभव नहीं है। यह अधिकार प्राकृतिक, अपर्रिहार है इसलिए इन्हें अप्रतिदेय माना गया है । यह सामाजिक न्याय के मापदण्ड और संरक्षक दोनो हैं । इनके बिना सामाजिक न्याय की प्राप्ति असंभव है ।        
       हमारे मान्नीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा केशवानंद भारती के मामले मे ंयह कहा गया कि मूल अधिकार तथा निदेशक तत्व हमारे संविधान के अन्तःकरण है । मूल अधिकार का प्रयोजन एक समतावादी समाज का निर्माण करना और समाज के उत्पीडन या बन्धनों से सब नागरिकों को मुक्त करना और सबके लिए स्वतंत्रता की उपलब्धि करना है । निदेशक तत्वों का प्रयोजन कुछ ऐसे सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को नियत करना है जो अहिंसात्मक क्रान्ति द्वारा तत्काल प्राप्त किये जा सकते हैं । मूल अधिकारों तथा निदेशक तत्वों के बीच कोई विरोध नही है । वे एक-दूसरे के पूरक हैं । इसी कारण पंडित जवाहरलाल नेहरू को कहना पडा है कि मूल अधिकार ओर नीति निदेशक तत्वो के मध्य विवाद होने पर निर्देशक तत्वों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए  क्यों कि इन सिद्धंातों में व्यापक लोक साधारण के हितों की रक्षा की भावना सन्निहित है ।
        नीति निर्देशक तत्व सामाजिक न्याय प्राप्ति के वे लक्ष्य है जो हमे प्राप्त करना है उन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु हमे मूल अधिकारो के रूप में  वे साधन दिये गये हैं जिनके माध्यम से हमें उन लक्ष्यों की प्राप्ति करना है । आर्थिक, सामाजिक और राजनेतिक क्षेत्र में मानव के सुखी एंव उन्नत जीवन के लिए प्राकृतिक और अप्रतिदेय मूल अधिकार भाग- 3 में संविधान में दिये गये हैं ।
       जिसके संबंध में कहा गया है कि राज्य ऐसे कोई विधि नहीं बनायेगा  जो मूल अधिकारो से असंगत हो । संविधान के अनुच्छंेद 13 में  घोषित किया गया है कि भारत में  प्रदत्त कोई भी विधि जिसमें अध्यादेश, आदेश, उपनिधि, नियम,


अधिसूचना, रूढियां और प्रावधान सम्मिलित है । वे मूल अधिकारों के असंगत नहीं होगी और उस मात्रा तक शून्य होगी जिस मात्रा तक वे भाग-3 के उपबंधों से अंसगत है । इसलिए कहा गया है कि राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बना सकता जो भाग-3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती हो अथवा अन्यून करती हो ।

       सामाजिक न्यायप्रदान किए जाने संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक में प्रत्येक व्यक्ति को सम्मता का अधिकार दिया गया है और विधि के समक्ष समान संरक्षण प्रदान किया गया है । समान परिस्थिति वाले व्यक्ति के साथ समान व्यवहार किया जायेगा । इस प्रकार संविधान में समान न्याय का शासन प्रदान किया गया है क्यों कि कोई व्यक्ति कानून के उपर नहीं है । यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे किसी भी पद या अवस्था में हो देश की समान विधि के अधीन रहता है ।
       समान न्याय का सिद्धांत युक्तियुक्त वर्गीकरण की अनुमति देता है । वर्ग विभेद की अनुमति नहीं देगा। नैसर्गिंक न्याय का सिद्धांत अनुच्छेद 14 में निहित है । नैसर्गिंक न्याय के नियम नैतिकता और सदाचार से उदभूत हुए हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये धारणाएं विधि शासन का अभिन्न अंग बन गई है और इससे इकंार नहीं किया जा सकता कि किसी समाज में विधिक नियमों के बनाने में इनका महत्वपूर्ण स्थान है ।
       सामाजिक, आर्थिक न्याय सामाजिक नैतिकता की धारणा से उत्पन्न हुऐ है । जो आर्थिक शोषण के विरूद्ध है और विकसित समाज कलांतर में इन नैतिक और सदाचार के नियमों को विधिक नियमों में परिवर्तित कर लेता है । सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 में प्रत्येक नागरिक को धर्म, जाति, लिंग, मूलवंश, जन्म स्थान के आधार पर विभेद करने से प्रतिबंधित किया गया है ।
       स्त्रियों और बालकों के लिए राज्यों को विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति दी गई है । राज्यों को शैक्षणिक रूप से पिछडे वर्गो अनुसूचित जातियों एंव जन जातियों के लिए विशेष व्यवस्था करने के लिए कहां गया है। महिलाओ के उत्थान के लिए उन्हें नौकरी में विशेष आरक्षण बालश्रम रोकने स्कूली शिक्षा प्रदान करने विशेष अधिकार दिये गये हैं ।
       महिलाओ के उत्थान के लिए राष्ट्ीय महिला आयोग अधिनियम 1990 की स्थापना की गई है । जिसका मुख्य कार्य महिलाओं के संविधानिक व विधिक अधिकारों की रक्षा करना, निगरानी रखना, और उनमें सुधार के लिए सरकार को सिफारिश करना। समाज में फेली कुरीतियों को दूर  करने के लिए किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान में प्रवेश के लिए किसी निर्योग्यता दायित्व या प्रतिबंध के आधीन अनुच्छेद-15-2 के अनुसार नहीं रखा गया है। राज्य को पिछडे वर्ग के नागरिकों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान बनाने के लिए अनुच्छेद-15-4 में निर्देशित किया गया है ।
       सामाजिक न्यायप्रदान करने के लिए सामाजिक आर्थिक रूप से पिछडे लोगो को नौकरी में आरक्षण  प्रदान किया गया है । लोक सेवा में अवसर की समानता का अधिकार अनुच्छेद 16 में दिया गया है । सामान्य कार्य के लिए सामान्य वेतन दिये जाने का प्रावधान रखा गया है ।राज्याधीन नौकरियों या पदो पर नियुक्ती के सबंध में सब नागरिकों को अवसर की समानता प्रदान की गई है ।

धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्म स्थान, निवास के आधार पर नौकरी में कोई अयोग्यता या भेद भाव नहीं किया जायेगा। इसी प्रकार अनुच्छेद-325 के अनुसार धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को निर्वाचक नामावली में शामिल किये जाने से अयोग्य नहीं माना जायेगा । प्रत्येक 18 वर्ष के वयस्क को मताधिकार प्रदान किया गया है ।

       भारतीय समाज सदियों से रूढि प्रथा अन्धविश्वास सामाजिक कुरितियों से ग्रस्त रहा है । जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के नाम पर समाज को बांटा गया है । इस सामाजिक असामनता को समाप्त करने के लिए अस्पृश्यता निवारण अधिनियम 1955 अनुच्छेद 17 के अनुसार बनाया गया है । अछूतपन के विरूद्ध गारंटी दी गई है । अछूतपन के आधार पर किसी को अयोग्य ठहराना दण्डनीय है। कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक पूजा स्थल में जा सकता है । किसी घाट पवित्र कुओं, तालाब, जलधारा, झरने में नहा सकता है। अस्पृश्यता से उत्पन्न अयोग्यता को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है । जन्म रोग मृत्यु से उत्पन्न सामाजिक बुराईयों का अंत किया गया है । उपाधी तथा उपहारों पर रोक लगाई गई है । ताकि सामाजिक समानता अनुच्छेद-18 के अनुसार बनी रहे ।
       संविधान में किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण देैहिक स्वाधीनता से


विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा संविधान का यह अनुच्छेद 21 न सिर्फ कार्यपालिका के विरूद्ध विधिक संरक्षण प्रदान करता है बल्कि विधान मण्डल के विरूद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है और विधान मण्डल ऐसी कोई विधि पारित नहीं कर सकता जो किसी व्यक्ति को उसके प्राण और देैहिक स्वतंत्रता से वंचित करती हो । विधान मण्डल द्वारा बनाई विधि, उचित, युक्तियुक्त, नैसर्गिक न्याय के सिंद्धातो के अनुरूप होनी चाहिए।

       एक सुव्यवस्थित समाज के लिए व्यक्तिगत स्वंतत्रता अनिवार्य है। कोई भी अधिकार आत्यन्तिक नहीं हो सकता इसलिए विधि का बंधन लगाया गया है । अनुच्छेद 21 में दैहिक स्वंतत्रता  में वे सभी तथ्य शामिल है जो व्यक्ति को पूर्ण बनाते हैं । इसके अंतर्गत अनुच्छेद 19 में प्रदत्त वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने की स्वतंत्रता, संघ बनाने की स्वंतत्रता, भ्रमण की स्वतंत्रता, आवास की स्वतंत्रता, शांतिपूर्वक और हथियारो के बिना इकट्ठा होने की स्वतंत्रता, पेशा, व्यवसाय, वार्णिज्य, एंव व्यापार की स्वतंत्रता शामिल है ।
       अनुच्छेद-21 में प्रदत्त स्वतंत्रताएं केवल नागरिकों को प्राप्त हैं ।जिन पर लोकहित में सामाजिक न्याय प्रदान किये जाने देश की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुये समाज कल्याण के हित के लिए युक्तियुक्त पावंदी लगाई गई है । यह पावंदी मौलिक तथा प्रक्रिया संबंधी विधि के अंतर्गत लगाई गई है । जैसे-शराब बनाना, नशीले पौधे उगाना, देह व्यापार करना, आदि पर पावंदियां लगाई गई है । प्रेस की आजादी, फिल्मों में सैन्सरशिप आदि समाज के कल्याण के लिए उठाये गये कदम ।
       दैेहिक स्वतंत्रता का अर्थ शारीरिक  स्वतंत्रता मात्र से नहीं है। इसके अंतर्गत वे सभी प्रकार के अधिकार शामिल है जो व्यक्ति को पूर्ण बनाते है और उसके अधिकारों को संरक्षण प्रदान करते है तथा सभी प्रकार के मनोवैज्ञानिक अवरोधों को हटाते हैं, व्यक्ति के निजी जीवन में किसी भी प्रकार का अप्राधीकृत हस्तक्षेप चाहे वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सभी से संरक्षण प्रदान करते है ।
       अनुच्छे 21 में प्रयुक्त प्राण शब्द का अर्थ केवल मानव जीवन नहीं है और यह न केवल शरीर के अंग भंग करने से निषेध करता है बल्कि इसके अंतर्गत एकांतता का अधिकार भी शामिल है । यह केवल भौतिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है वरण् इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार शामिल है । इसमें विदेश भ्रमण का अधिकार, व्यापार, व्यवसाय का अधिकार, एकांतता का अधिकार, मानव गरीमा के साथ जीने का अधिकार, न्यूनतम मजदूरी प्राप्त करने का अधिकार, जीवकोपार्जन का अधिकार प्रदूषण रहित जल और वायु के उपयोग का अधिकार, लोकहितवाद, प्रस्तुत करने का अधिकार, काम का अधिकार, वैधानिक रूप से पद मुक्ति का अधिकार, सडक पर व्यापार का अधिकार, बेगार न करने का अधिकार शामिल है ।
       अनुच्छे 21 में मानव गरीमा को बनाये रखते हुये जीने के अधिकार में लोक स्वास्थ को बढाये रखने एंव उसमें सुधार करने का अधिकार भी शामिल है एक स्वस्थ शरीर मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है । सार्वजनिक स्वास्थ को सुरक्षित रखना एंव सुधार के लिए कदम उठाना एक कल्याणकारी राज्य का परम कर्तव्य है ।
       अनुच्छेद 21 में प्राण शब्द से तात्पर्य मनुष्य का जीवन है इसलिए इसके अंतर्गत जीविकोपार्जन, जीवनयापन का उत्तम स्तर, कर्मकारो के काम के स्थान का आरोग्यपूर्ण होना तथा आराम का समय दिया जाना भी सम्मिलित है । इससे कर्मकारो के काम की क्षमता में वृद्धि होती है । एक स्वस्थ कर्मकार ही अपने परिश्रम के फल का लाभ उठा सकता है । चिकित्सा सुविधाएं कर्मकारो के स्वास्थ्य को संरक्षित रखने के लिए अत्यावश्यक है ।
       सी.ई.एस.सी. लिमि.बनाम सुभाषचन्द्र बोस 1992 भाग-1 एस.सी.सी. 441 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि सामाजिक न्याय का अधिकार एक मूल अधिकार है । कर्मकारों का स्वास्थ प्राण के अधिकारों का एक आवश्यक तत्व है और स्वास्थ से तात्पर्य केवल बीमारी से रक्षा करना नहीं बल्कि पूर्ण शारीरिक मानसिक और सामाजिक कल्याण से है ।
       श्रमजीवी महिलाओं का यौन शोषण प्रतिकर एंव पुनर्वास के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत प्रतिपादित किये गये है । पीडित व्यक्ति की पहचान को गोपनीय रखा गया है । हथकडी लगाने को प्रतिबंधित किया गया है । अमानवीय व्यवहार के विरूद्ध संरक्षण प्रदान किया गया है । मानव प्रतिष्ठा को आदर्श बनाया गया है ।
       शारीरिक रूप से विकलांग अंधे, अर्ध अंधे व्यक्तियों को भारतीेय


प्रशासनिक सेवाओ में नौकरी का अधिकार है इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे ंउनको भागीदारी में उत्साहित करना सरकार का कर्तव्य है । इसके लिए उन्हें ब्रेल लिपि या लेखक की सहायता प्रदत्त कराना सरकार का दायित्व बनाया गया है । चिकित्सीय सहायता प्राप्त करने का अधिकार भी इसमें शामिल है ।

        अनुच्छेद 21 में प्राण दैहिक स्वतंत्रता केदियों को भी दी गई है । उन्हें निःशुल्क विधिक सहायता देना उनका शीघ्र न्याय करना शीघ्रता परीक्षण, एकांत कारावास, केदियों को लोहे की बेडिया न लगाना, जेल में अच्छा खाना देना, व्यक्ति को हथकडी न लगाना, परीक्षाणाधीन केदी को सिद्धदोष केदियों से दूर रखना । केदियों से अमानवीय व्यवहार न करना । एंकान्त वास में अधिक अवधि तक न रखना, आवश्यक सुविधाओं से वंचित न रखना । आदि अधिकार बंदियों को दिये गये है ।
       अनुच्छेद 20 में प्रदत्त अधिकार की एक अपराध के लिए एक बार दण्डित किया जायेगा । किसी व्यक्ति को अपने विरूद्ध साक्ष्य देने बाध्य नहीं किया जायेगा। किये गये अपराध के लिए एक बार दण्डित किया जायेगा । यह अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को उसके कल्याण के लिए प्रदान किया गया है और व्यक्ति का सामाजिक, आर्थिक विकास हो उसे अपने मानव होने का गर्व हो इसके लिए  अपराधी व्यक्ति को भी संवैधानिक सरंक्षण अनुच्छेद 22 में प्रदान किये गये हैं
       अनुच्छेद 22 के अनुसार गिरफतार व्यक्ति को शीघ्रताशीघ्र गिरफतारी का कारण बताया जायेगा उसे अपने मन पंसद वकील से परामर्श का अधिकार होगा । 24 घंटे के अंदर निकटतम मजिस्ट्ेट के समक्ष पेश किया जायेगा ।
       पुलिस अभिरक्षा में अमानवीय व्यवहार, अवैध गिरफतारी के विरूद्ध संरक्षण दिया गया है । गिरफतार किये जाने पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत माननीय उच्चतम न्यायालय ने जोगेन्दर सिंह विरूद्ध उत्तरप्रदेश राज्य 1994 भाग 4 एस.एस.सी. 260 और डी.केेेे.वसु के मामले में दिशा निर्देश प्रतिपादित किये गये हैं । जिसके फलस्वरूप दण्ड प्रक्रिया सहिता में संशोधन किया गया है ।
       आजीवन कारावास सजा काट रहे व्यक्ति द्वारा मानव वध करने पर केवल मृत्यु दण्ड संबंधी प्रावधान धारा-303 भा.द.सं. का मिटठू बनाम पंजाब राज्य ए.आई.आर. 1983 सुप्रीम कोर्ट 473 के मामले में विलोपित किया गया है । मृत्यु दण्ड को आजीवन कारावास में बदलने की शक्ति दी गई है । नागरिको के संवैधानिक अधिकारो के उल्लंघन पर न्यायालय को प्रतिकर दिलाने की शक्ति प्रदान की गई है ।
       संविधान में प्रदत्त अनुच्छेद 21 को अपात्काल में भी निलंबित नहीं किया जा सकता है और संवैधानिक उपचारो का अधिकार जो डॉ. अम्बेडकर के अनुसार जिसके बिना यह संविधान शून्य है जो संविधान की आत्मा है का प्रयोग किया जा सकता है और यह अधिकार हमें मूल अधिकारो की गारेंटी प्रदान करके सामाजिक न्याय प्रदान करता है ।
       सामाजिक न्याय का प्रमुख स्त्रोत संवैधानिक उपचारो का  अधिकार है क्यों कि उपचारो के अभाव में अधिकारो का अस्तित्व संभव नहीं है। इसके लिए न केवल दुखित व्यक्ति बल्कि लोकहित के लिए कोई भी व्यक्ति लोकहित वाद प्रस्तुत कर सकता है ।
       न्यायालय द्वारा सामाजिक न्याय के लिए पर्यावरण सरंक्षण, प्रदूषण निवारण, बंधुआ मजदूरी, अभिरक्षा में मौत, आदि से संबधित लोकहित याचिकाओं में महत्वपूर्ण दिशा निर्देश पारित कर सामाजिक न्याय के नए रास्ते खोले हैं ।
       शोषण के विरूद्ध व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक न्याय प्रदान करने अनुच्छेद 23 में कहा गया है कि मानव के क्रय विक्रय बेगार एंव बलात श्रम को प्रतिषेधित किया गया है । इन्हें दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है । नारी का क्रय विक्रय रोका गया है । बेगार प्रथा को समाप्त किया गया है । स्वतंत्रता के पूर्व भारतीय समाज में यह दो महत्वपूर्ण कुरीतियां थी । भारतीय नवाब राजा, जमीदार, कमजोर वर्ग तथा गरीबों से बेगार लेते थे । उन्हें मजदूरी नहीं देते थे । गरीबी के कारण स्त्रीयों का क्रय विक्रय होता था। जिस पर रोक लगाई गई है ।
       उत्तर प्रदेश में रिमूवल आफ सोशल डिसएवल्ट्ी एक्टस् पारित किया गया है, जिसके अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति की सेवा करने से इस आधार पर इन्कार नहीं कर सकता कि वह अनुसूचित जाति का है। यदि वह उन्हीं शर्तो पर अन्य हिन्दूओं के प्रति ऐसी सेवा करता रहा है ।
       संविधान में सामाजिक न्याय प्रदान किये जाने धार्मिक कट्टरता को खत्म किये जाने धर्म निरपेक्ष राज्य की परिकल्पना की है जिसका अर्थ है कि राज्य का स्वंय अपना कोई धर्म नहीं होगा और न ही अपने नागरिकों में धर्म के आधार


पर राज्य भेद-भाव रख्ेागा । धर्म के मामले में तटस्थता बरती गई है । प्रत्येक धर्म को समान आधिकार प्रदान किया गया है ।

        भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय प्रदान करने हेतु जो मूल अधिकार दिये गये है उनकी सुरक्षा के लिए संवैधानिक उपचारो के अधिकार अनुच्छेद 32,226,136,141,142, आदि में दिये गये हैं और नागरिकों को मूल अधिकारों को गारंटी के साथ सुरक्षा प्रदान की गई है, जिसके लिए उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय को एक सजग प्रहरी के रूप में कार्य करते हैं ।
       लेकिन सामाजिक, आथर््िाक और राजनीतिक न्याय प्रदान किये जाने संबंधी उपरोक्त संवैधानिक उपबंध केवल संविधान के ‘‘आइना’’ में छबि बनकर रह गये हैं। लोगो का जीवन स्तर निम्न है, गरीबी, बेकारी, भुखमरी, अशिक्षा, अज्ञानता व्याप्त है । आर्थिक सामनता, सामाजिक न्याय आम जनता से कोसो दूर है । इसलिए लक्ष्य प्राप्ति के लिए शीघ्रता और कठोरता से इन सावैधानिक उपबंधों को लागू किया जाना आवश्यक है । 
       आज हमारे देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय प्राप्त करना आम जनता के लिए परीलोक की कहानी है। सामाजिक न्याय चुनावी मरूस्थल में मृगतृष्णा के रूप में जनता को दिखाया जाता है ।सभी राजनैतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय प्रदान किये जाने के नारे से भरे रहते हैं, लेकिन कोई भी दलगत जातिगत, व्यक्तिगत राजनीति से उठकर देशहित में न्याय प्रदान नहीं कर पाता है ।
       देश की अधिकाशं जनता, गांव में रहती है । गांव में आज भी आजादी के 65 साल बाद भी बिजली, पानी, सडक, की सुविधाओं का अभाव हैं । देश की आधी आबादी लगभग अशिक्षित है । 30 प्रतिशत लोग गरीबी का जीवन जी रहे हैं । एक समय का भोजन भी उनके लिए नसीब नहीं है । आज भी गावं की अधिकाश आबादी दिशा मैदान को जाती है । गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा, जैसी बुनियादी सुवधिओं का अभाव है । यदि सौ रूपये सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय प्रदान किये जाने बजट में प्रदत किए जाते हैं तो मात्र दस रूपये इस काम में आते हैं और नब्बे रूपये भ्रष्टाचार की भेटं चढ जाते हैं । यही कारण है कि आज इससे लडने एक नहीं हजारो हजार बाबा अम्बेडकर देश को चाहिए है।
       देश मे आर्थिक न्याय का यह हाल है कि अमीरों और गरीबों के मध्य खाई बढती जा रही है । आय, वेतन, आर्थिक संसाधनों का असमान वितरण है । प्रति व्यक्ति आय कम है । देश में भ्रष्टाचार के कारण शासकीय नीतियों का लाभ आम जनता प्राप्त नहीं कर पाती है । भ्रष्टाचार का यह हाल है कि आजादी के बाद देश की सडकों के लिए जितना धन दिया गया है उससे सोने की सडके बन सकती थी तथा बांध और तालाबों पर इतना पैसा व्यय किया गया है कि उनकी दिवारे चांदी के बन सकती थी ।
       यही कारण है कि आज हम जनता का लाखों रूपये खर्च करके  साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, अलगांववाद, धार्मिक अंधविश्वास, जैसे कच्चे, पत्थरीले रास्तों पर चल रहे हैं । करोडो रूपये खर्च करके अशिक्षा, बेकारी, गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद, नक्सलवाद, से जूझ रहे हैं और अरबों रूपये खर्च करके भ्रष्ट अधिकारी, कर्मचारी, नेता, व्यापारी, उद्योगपतियो,  के मध्य जी रहे हैं जिसके कारण सामाजिक न्याय सपने की बात लगती है ।
       सामाजिक न्याय को जो अधिकार स्वरूप प्राप्त होआ था आज भीख के रूप में मांगा जा रहा है । इसलिए यदि संविधान में दिये प्रावधानों का कठोरता से पालन किया जाये देश के नेता अधिकारी,  उद्योगपति, व्यापारी, संविधान के अनुसार कार्य करें तो देश के प्रत्येक  नागरिक को संविधान की उद्देशिका के अनुसार सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय गारंटी के रूप में प्राप्त हो सकता है ।
       देश में सामाजिक न्याय का प्रश्न हो तो 50 प्रतिशत से अधिक आबादी अशिक्षित, अर्द्धशिक्षित, अल्पशिक्षित है जिसमें से आजादी के पूर्व के अधिंकाश लोग जो अशिक्षित है वह अंगूठा छाप हैं लेकिन स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक भी सर्व शिक्षा अभियान के नाम पर करोडो रूपये खर्च किये जाने के बाद साक्षरता के नाम पर केवल हस्ताक्षर करना जानते हैं उन्हें अपने अच्छा बुरा समझने की शिक्षा अथवा ज्ञान नहीं दिया जाता है यही कारण है कि आज वे शोषण का शिकार हो रहे हैं ।
       अशिक्षा के कारण उन्हें काम धन्धा प्राप्त नही हो पाता है ओर व्यापार,  व्यवसाय की कमी के कारण वे अपराध की ओर आकर्षित होकर आतंकवाद, नक्सलवाद को बढावा देते हैं ।देश मंे असामान्य वितरण के कारण गरीबी व्याप्त है जिसके कारण अपराध हिंसा बढ रही है । सरकारी दमनचक्र के विरोध में नक्सलवाद, आतंकवाद, पनप रहा है । देश में हजारों बेगुनाह प्रति वर्ष आतंकवाद का शिकार होकर मौत की भेंट चढ जाते हैं ।
       जहां तक देश में स्त्रीयों की दशा का प्रश्न है तो वह दयनीय है, स्त्रीयों सबधी अपराध बढ रहे है । आज भी स्त्री का जन्म होना बुरा माना जाता है जिसके कारण भू्रण हत्या जैसे अपराध बढ रहे हैं जिसके कारण देश के कई राज्यों में स्त्री-पुरूष अनुपात में कमी आई है ।
        स्त्रीयों को आज भी अपनी इच्छा के अनुसार व्यवसाय, व्यापार विवाह करने की छूट नहेीं है उन पर आज भी सदियों पुरानी रूढीयों और प्रथाओं के अनुसार कोई न कोई बंधन लगाये जातेे हैं । आज भी अधिकाशं देश में असंख्य बाल विवाह होते है। एक अकेली स्त्री का समाज मंे रहकर जीवन यापन करना मुश्किल है उस पर अनेक प्रकार के लांछन लाद दिये जाते हैं ।
       देश के गावों में लोगो का जीवन स्तर निम्न है मनोरंजन साधनो का  अभाव है, अधिकांश लोग गांव में आज भी जुआ, शराब, को मनोरंजन का साधन समझते हैं । गांव पानी लाने आज भी मीलो जाना पडता है । घरों में फ्लेश लेटरिन नहीं है लोग खुले आम जानवरों की तरह निस्तार करने मजबूर है ।
       देश में गांव में सडक नहीं है शहर में सडक की यह स्थिति है कि  एक मर्द को भी प्रसुति दर्द का एहसास करा देती है। बिजली नाम के लिए आती है केवल मोहनी के रूप में दर्शन देकर चली जाती है जिसके कारण लाखों हेक्टेयर खेती असिंचित रह जाती है । किसानों को समय पर खाद, बीज, पानी नहीं मिलता है इसके उपर से प्राकृतिक आपदा भी सहन करनी पडती है जिसके कारण कई किसान कर्ज न चुका पाने के कारण आत्म हत्या करते है ं।


       देश के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का अभाव है ।  लोगो को पढने के लिए कोसो मील दूर जाना पडता है । बीमार पडने पर घंटो बाद शहरो में स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती है तब तक अनेक लोग रास्ते में दम तोड चुके होते हैं ।
       देश में न्याय व्यवस्था का यह हाल है कि े न्यायिक प्रक्रिया काफी लम्बी, महंगी है । पिता दावा लाता है पु़त्र निर्णय प्राप्त करता है नाती निर्णय का निष्पादन करवाता हैै। सुलभ, सरल, शीघ्र, सस्ता न्याय केवल किताब की बात है न्यायालय में मुकदमे के बोझ से दबे जा रहे है । रोज नये नये कानून अध्यादेश बन रहे हैं और अदालतों में काम का बोझ बढ रहा है । जिसके कारण न्याय समय पर प्राप्त नहीं हो पा रहा है । जब कि आज जनता का विश्वास केवल न्याय पालिका पर है इसके लिए जरूरी है कि नई न्यायिक प्रणाली विकासित की जाये । जांच विचारण अनवेषण में नयी वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग किया जाये । अधिकांश मामले न्यायालय के बाहर सुलह, समझोते के आधार पर निपटाये जाये । तभी सस्ता सुलभ, शीघ्र न्याय लोगो को प्राप्त हो पायेगा ।
       जहां तक राजनैतिक न्याय की बात है तो वह वोट और नोट के बीच बट गया है ं दागी छबि वाले लोग चुनाव में खडे हो रहे है। धन बल बाहू बल के आधार पर चुनाव जीता जाता है।ं राजनीति में व्याप्त गंदगी में कोई शरीफ व्यक्ति शामिल नहीं होना चाहता है । भूले भटके कोई ऐसा व्यक्ति राजनीति में प्रवेश कर जाता है तो उसे वोट की राजनीति बाहर कर देती है।
       गुप्त मतदान का प्रावधान दिया गया है लेकिन लोगो के वोट नोट और बंदूको के साये में डलवाये जाते हैं ।धर्म,  जाति, भाषा के नाम पर वोट खरीदे जाते हैं । गांव में लोगो को वोट डालने नहीं दिया जाता है। गांव के गांव बंधक बना लिये जाते हैं । देश में चुनाव युद्ध की तरफ लडा जाता है और नाजायज तरीके से चुनाव लडे जाते हैं । चुनाव में प्रत्याशी की बौद्धिक योग्यता को देखकर  लोग वोट नहीं देते हैं । उसकी ताकत और पार्टी की क्षमता को देखकर वोट दिये जाते है।
       चुनाव में खडे लोगो को देखकर कई लोग वोट देने नहीं जाते है । इसके लिए जरूरी है कि घर में बैठकर वोट इंटरनेट के माध्यम से डाले जाने की व्यवस्था की जाये । प्रत्येक व्यक्ति का नाम उसके वयस्क होने के साथ ही मतदाता सूची में अपने आप जोडा जाये । मतदान को अनिवार्य किया जाये ।    जिस प्रकार वोट डालकर प्रत्याशी को चुना जाता है उसी प्रकार उसी प्रतिशत से चुने गये प्रत्याशी को क्षेत्र मे काम न करने की दशा में वापिस बुलाये जाने का अधिकार भी जनता को प्रदान किया जाये ।
       यह देखा गया है कि जन प्रतिनिधि चुने जाने के बाद 5 साल बाद अपने क्षेत्र में शक्ल नहीं दिखाते हैं । क्षेत्र के विकास के लिए कोई कार्य नहीं करते हैं तो ऐसे लोगो के लिए लोकतंत्र में जिसमें जनता का राज्य है और जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधि जनता में से चुनकर जनता का प्रतिनिधित्व करते है। उन्हें जनता के द्वारा वापिस बुलाये जाने का अधिकार भी संविधान में प्रदान किया जाना चाहिए ।
       देश में आर्थिक न्याय का यह हाल है कि गरीब और गरीब अमीर और अमीर होता जा रहा है । शेयर बाजार, देश का व्यापार, व्यवसाय पर बडे व्यापारी उद्योगपति औद्योगिक घरानो का राज्य है । सरकार का अतिआवश्यक वस्तुओ दाल, शक्कर, आटा के बाजार भाव  नियंत्रण नहीं है । महगाई आसमान छू रही है ।पेट्ोल, डीजल, जैसे अति आवश्यक वस्तुओ के दाम सरकार के नियंत्रण के बाहर है । शेयर बाजार में कम दाम पर कम्पनी के एफ.पी.ओ. निकाले जाते हैं बाद में उनकी कीमते बढा दी जाती है । जब कि उन सेयरों की कीमत बढ जाती है तो वहीं कम्पनियां दूसरो से खरीदवाकर उन्हें बाद में बेचकर अधिक पंूजी जुटाकर कर शेयरों की कीमत कम कर देती है । जिससे लोगों की मेहनत मजदूरी की पूंजी डूब जाती है जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है ।
       आज जहां देख्ेा वहां चिट फंड कम्पनियां कार्य कर रही है और अधिक बयाज का लोभ लालच देकर लोगो के पसीने की कमाई जमा करवादेती है और बाद में उन्हे हडप कर गायब हो जाती है । देश में जमा पर नाम मात्र का ब्याज सरकारी बैंक देती है जब कि वही बैक लोगो को बढी हुई ब्याज दर पर ऋण देती है । इसलिए उसी बयाज दर पर बैंक को भी लोगो को जमा पर ब्याज दिया जाना चाहिए । जिससे लोगों का रूंझान सरकारी बैंको की तरफ बढेंगा ।
       जहंा तक राजनीतिक न्याय का प्रश्न है तो व्यक्तिगत हित के लिए राजनीति की जा रही है । विधायका के सदन ऋण भूमि बन जाती है वहीं पर वाक युद्ध लडा जाता है लागो रूपये खर्च होने के बाद भी देश की संसद में कोई काम नहीं हो पाता है ।यदि संसद और विधायक का वाद बढ जाने का प्रश्न है तो सभी सांसद विधायक बहुमत से उसे सर्व सम्मित से पारित कर देता है लेकिन यदि आज आम जनता को राजनीति न्याय दिलाये जाने की किसी भी बिल को पेश कराये जाने की बात है तो उस बिल मे हजारों अडंगे लगाये जाते हैं ।
       जहा तक देश की कार्य पालिका, न्याय पालिका और विधायका का प्रश्न है तो तीनेा ही अपने-अपने क्षेत्र में सामाजिक, न्याय प्रदान किये जाने पूर्णतः  असफल है । न्याय पालिका काम के बोझ से दबी है ।संसाधनों का अभाव है आधारभूत ढाचा अभी भी अग्रेेजों के जमाने का है । एक तथ्य को कई बार प्रमाणित करना पडता है । जिसके कारण लोग न्याय प्रदान करने में हिस्सा नहीं ले पाते हैं ।
       विधायका भी धर्म और जाति की राजनीति में उलझ कर ठीक से कार्य नहीं कर पा रही है । व्यक्तिगत हितों और परिवार के लोगो कोेे बढावा दिया जा रहा है । देश की आम समस्या पर विचार विमर्श नहीं किया जाकर संसद और विधान सभा का समय आपसी बुराइयों और लडाईयों पर निकाला जाता है ।
       कार्यपालिका का प्रश्न है तो वह पेैर से सिर तक भ्रष्टाचार से डूबी हुई है वहां पर कोई भी कार्य विधि एंव नियम के अनुसार नहीं होता है । सभी काम व्यक्ति की हेसीयत के अनुसार किया जाते हैं।
       यही कारण हेै कि आज सामाजिक न्याय जो लोगो को अधिकार स्वरूप प्राप्त होना था उसकीे भीख मांगी जा रही हैं। यदि संविधान के अनुसार कार्य किया जाये तो सामाजिक न्याय दूर की बात नहीं है । शाम के अंधेरे के बाद सुबह होती है । रास्ता भूले लोग अपने घर वापिस आते हैं । यदि व्यक्तिगत हित छोडकर देश हित में संविधान के अनुसार कार्य किया जाये तो सामाजिक न्याय परिलोक की बात नहीं है ।

संविधान भाग ५ नीति निर्देशक तत्व[संपादित करें]

भाग 3 तथा 4 मिल कर संविधान की आत्मा तथा चेतना कहलाते है क्यों कि किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए मौलिक अधिकार तथा निति निर्देश देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नीति निर्देशक तत्व जनतांत्रिक संवैधानिक विकास के नवीनतम तत्व हैं सर्वप्रथम ये आयरलैंड के संविधान मे लागू किये गये थे। ये वे तत्व है जो संविधान के विकास के साथ ही विकसित हुए है। इन तत्वॉ का कार्य एक जनकल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। भारतीय संविधान के इस भाग में नीति निर्देशक तत्वों का रूपाकार निश्चित किया गया है, मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देशक तत्व मे भेद बताया गया है और नीति निदेशक तत्वों के महत्व को समझाया गया है।

भाग 4 क मूल कर्तव्य[संपादित करें]

मूल कर्तव्य मूल सविधान में नहीं थे, इन्हे ४२ वें संविधान संशोधन द्ववारा जोड़ा गया है। ये रूस से प्रेरित होकर जोड़े गये तथा संविधान के भाग ४ (क) के अनुच्छेद ५१ - अ मे रखे गये हैं । ये कुल ११ है ।

51 क. मूल कर्तव्य- भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह-

(क) संविधान का पालन करे और उस के आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे ; (ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उन का पालन करे; (ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे; (घ) देश की रक्षा करे और आह्वान करने किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे; (ङ) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है; (च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उस का परिरक्षण करे; (छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिस के अंतर्गत वन, झील नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उस का संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे; (ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे; (झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे; (ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिस से राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले; (ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा का अवसर प्रदान करे।

भाग 5 संघ[संपादित करें]

पाठ 1 संघीय कार्यपालिका[संपादित करें]

संघीय कार्यपालिका मे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,मंत्रिपरिषद तथा महान्यायवादी आते है। रामजवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य वाद मे सुप्रीम कोर्ट ने कार्यपालिका शक्ति को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है-

  • 1 विधायिका न्यायपालिका के कार्यॉ को पृथक करने के पश्चात सरकार का बचा कार्य ही कार्यपालिका है।
  • 2 कार्यपालिका मॅ देश का प्रशासन, विधियॉ का पालन सरकारी नीति का निर्धारण, विधेयकॉ की तैयारी करना, कानून व्यव्स्था बनाये रखना सामाजिक आर्थिक कल्याण को बढावा देना विदेश नीति निर्धारित करना आदि आता है।

राष्ट्रपति[संपादित करें]

संघ का कार्यपालक अध्यक्ष है संघ के सभी कार्यपालक कार्य उस के नाम से किये जाते है अनु 53 के अनुसार संघ की कार्यपालक शक्ति उसमॅ निहित है इन शक्तियॉ/कार्यों का प्रयोग क्रियांवय्न राष्ट्रपति सविन्धान के अनुरूप ही सीधे अथवा अधीनस्थ अधिकारियॉ के माध्यम से करेगा। वह सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनानायक भी होता है,सभी प्रकार के आपातकाल लगाने व हटाने वाला युद्ध शांति की घोषणा करने वाला होता है वह देश का प्रथम नागरिक है तथा राज्य द्वारा जारी वरीयता क्रम मे उसका सदैव प्रथम स्थान होता है। भारतीय राष्ट्रपति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है तथा उसकी आयु कम से कम ३५ वर्ष होनी चाहिए। राष्ट्रपति का चुनाव, उस पर महाभियोग की अवस्थाएँ, उसकी शक्तियाँ, संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति की स्थिति, राष्ट्रपति की संसदीय शक्ति तथा राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियों का वर्णन इस अध्याय में किया गया है।

उपराष्ट्रपति[संपादित करें]

उपराष्ट्रपति का राज्य सभा का पदेन सभापति होना--उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा: परंतु जिस किसी अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति, अनुच्छेद 65 के अधीन राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस अवधि के दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा और वह अनुच्छेद 97 के अधीन राज्य सभा के सभापति को संदेय वेतन या भत्ते का हकदार नहीं होगा।

65. राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान या उसकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति का राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन--(1) राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में उपराष्ट्रपति उस तारीख तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार निर्वाचित नया राष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करता है।

(2) जब राष्ट्रपति अनुपस्थिति, बीमारी या अन्य किसी कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब उपराष्ट्रपति उस तारीख तक उसके कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है।

उपराष्ट्रपति को उस अवधि के दौरान और उस अवधि के संबंध में, जब वह राष्ट्रपति के रूप में इस प्रकार कार्य कर रहा है या उसके कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ होंगी तथा वह ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का जो संसद, विधि द्वारा, अवधारित करे, और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, हकदार होगा।

66. उपराष्ट्रपति का निर्वाचन--(1) उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा।

(2) उपराष्ट्रपति संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा और यदि संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का कोई सदस्य उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है।

(3) कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र तभी होगा जब वह-- (क) भारत का नागरिक है, (ख) पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, और (ग) राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित है।

(4) कोई व्यक्ति, जो भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र नहीं होगा। स्पष्टीकरण--इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए, कोई व्यक्ति केवल इस कारण कोई लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल 2 * * * है अथवा संघ का या किसी राज्य का मंत्री है।

67. उपराष्ट्रपति की पदावधि--(1) उपराष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा: परंतु-- (क) उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा; (ख) उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोकसभा सहमत है; किंतु इस खंड के प्रयोजन के लिए कई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो; (ग) उपराष्ट्रपति, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है। 68. उपराष्ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति की पदावधि--(1) उपराष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाएगा। (2) उपराष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से हुई उसके पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, रिक्ति होने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र किया जाएगा और रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति, अनुच्छेद 67 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपने पद ग्रहण की तारीख से पाँच वर्ष की पूरी अवधि तक पद धारण करने का हकदार होगा।

69. उपराष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान--प्रत्येक उपराष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष निम्नलिखित प्ररूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थात्‌: -- ईश्वर की शपथ लेता हूँ

मैं, अमुक ---------------------------------कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूँ, श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूँगा।

मंत्रिपरिषद[संपादित करें]

संसदीय लोकतंत्र के मह्त्वपूर्ण सिद्धांत 1. राज्य प्रमुख, सरकार प्रमुख न होकर मात्र संवैधानिक प्रमुख ही होता है
2. वास्तविक कार्यपालिका शक्ति, मंत्रिपरिषद जो कि सामूहिक रूप से संसद के निचले सदन के सामने उत्तरदायी होगा के पास होगी
3 मंत्रिपरिषद के सद्स्य संसद के सद्स्यों से लिए जायेंगे

परिषद का गठन[संपादित करें]

1. प्रधानमंत्री के पद पे आते ही यह परिषद गठित हो जाती है यह आवश्यक नही है कि उसके साथ कुछ अन्य मंत्री भी शपथ ले केवल प्रधानमंत्री ही मंत्रिपरिषद होगा
2 मंत्रिपरिषद की सद्स्य संख्या पर मौलिक संविधान मे कोई रोक नही थी किंतु 91 वे संशोधन के द्वारा मंत्रिपरिषद की संख्या
लोकसभा के सद्स्य संख्या के 15% तक सीमित कर दी गयी वही राज्यों मेभी मंत्रीपरिषद की
संख्या विधानसभा के 15% से अधिक नही होगी पंरंतु न्यूनतम 12 मंत्री होंगे

मंत्रियों की श्रेणियाँ[संपादित करें]

संविधान मंत्रियों की श्रेणी निर्धारित नही करता यह निर्धारण अंग्रेजी प्रथा के आधार पर किया गया है
कुल तीड़्न प्रकार के मंत्री माने गये है

  • 1. कैबिनेट मंत्री—सर्वाधिक वरिष्ठ मंत्री है उनसे ही कैबिनेट का गठन होता है मंत्रालय मिलने पर वे उसके अध्यक्ष होते है उनकी सहायता हेतु राज्य मंत्री तथा उपमंत्री होते है उन्हें कैबिनेट बैठक मे बैठने का अधिकार होता है अनु 352 उन्हें मान्यता देता है

कृप्या सभी कैबिनेट मंत्रालयों, राज्य मंत्रालय की सूची पृथक से जोड दे

  • 2. राज्य मंत्री द्वितीय स्तर के मंत्री होते है सामान्यत उनहे मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार नही मिलता किंतु प्रधानमंत्री चाहे तो यह कर सकता है उन्हें कैबिनेट बैठक मे आने का अधिकार नही होता।
  • 3. उपमंत्री कनिष्ठतम मंत्री है उनका पद सृजन कैबिनेट या राज्य मंत्री को सहायता देने हेतु किया जाता है वे मंत्रालय या विभाग का स्वतंत्र प्रभार भी नही लेते है।
  • 4. संसदीय सचिव सत्तारूढ दल के संसद सद्स्य होते है इस पद पे नियुक्त होने के पश्चात वे मंत्री गण की संसद तथा इसकी समितियॉ मे कार्य करने मे सहायता देते है वे प्रधान मंत्री की इच्छा से पद ग्रहण करते है वे पद गोपनीयता की शपथ भी प्रधानमंत्री के द्वारा ग्रहण करते है वास्तव मे वे मंत्री परिषद के सद्स्य नही होते है केवल मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है।

मंत्रिमंडल[संपादित करें]

मंत्रि परिषद एक संयुक्त निकाय है जिसमॆं 1,2,या 3 प्रकार के मंत्री होते है यह बहुत कम मिलता है चर्चा करता है या निर्णय लेता है वहीं मंत्रिमंडल मे मात्र कैबिनेट प्रकार के मंत्री होते है यह समय समय पर मिलती है तथा समस्त महत्वपूर्ण निर्णय लेती है इस के द्वारा स्वीकृत निर्णय अपने आप परिषद द्वारा स्वीकृत निर्णय मान लिये जाते है यही देश का सर्वाधिक मह्त्वपूर्ण निर्णय लेने वाला निकाय है

  • सम्मिलित उत्तरदायित्व अनु 75[3] के अनुसार मंत्रिपरिषद संसद के सामने सम्मिलित रूप से उत्तरदायी है इसका लक्ष्य मंत्रिपरिषद मे संगति लाना है ताकि उसमे आंतरिक रूप से विवाद पैदा ना हो।
  • व्यक्तिगत उत्तरदायित्व अनु 75[2] के अनुसार मंत्री व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति के सामने उत्तरदायी होते है किंतु यदि प्रधानमंत्री की सलाह ना हो तो राष्ट्रपति मंत्री को पद्च्युत नही कर सकता है।

भारत का महान्यायवादी[संपादित करें]

भारत का महान्यायवादी संसद के किसी भी सदन का सदस्य न रहते हुए भी संसद की कार्रवाई में भाग ले सकता है। वह भारत का नागरिक होना चाहिए. वह अपनी निजी वकालत कर सकता है, परन्तु वह भारत सरकार के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं लड़ सकता है.

प्रधानमंत्री[संपादित करें]

प्रधानमंत्री की दशा समानों मे प्रधान की तरह है वह कैबिनेट का मुख्य स्तंभ है मंत्री परिषद का मुख्य सद्स्य भी वही है अनु 74 स्पष्ट रूप से मंत्रिपरिषद की अध्यक्षता तथा संचालन हेतु प्रधानम्ंत्री की उपस्तिथि आवश्यक मानता है उसकी मृत्यु या त्यागपत्र की द्शा मे समस्त परिषद को पद छोडना पडता है वह अकेले ही मंत्री परिषद का गठन करता है राष्ट्रपति मंत्री गण की नियुक्ति उस की सलाह से ही करता है मंत्री गण के विभाग का निर्धारण भी वही करता है कैबिनेट के कार्य का निर्धारण भी वही करता है देश के प्रशासन को निर्देश भी वही देता है सभी नीतिगत निर्णय वही लेता है राष्ट्रपति तथा मंत्री परिषद के मध्य संपर्क सूत्र भी वही है परिषद का प्रधान प्रवक्ता भी वही है परिषद के नाम से लडी जाने वाली संसदीय बहसॉ का नेतृत्व करता है संसद मे परिषद के पक्ष मे लडी जा रही किसी भी बहस मे वह भाग ले सकता है मन्त्री गण के मध्य समन्वय भी वही करता है वह किसी भी मंत्रालय से कोई भी सूचना मंगवा सकता है इन सब कारणॉ के चलते प्रधानम्ंत्री को देश का सबसे मह्त्वपूर्ण राजनैतिक व्यक्तित्व माना जाता है

प्रधानमंत्री सरकार के प्रकार

प्रधानमंत्री सरकार संसदीय सरकार का ही प्रकार है जिसमे प्रधानमंत्री मंत्रि परिषद का नेतृत्व करता है वह कैबिनेट की निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है वह कैबिनेट से अधिक शक्तिशाली है उसके निर्णय ही कैबिनेट के निर्णय है देश की सामान्य नीतियाँ कैबिनेट द्वारा निर्धारित नहीं होती है यह कार्य प्रधानमंत्री अपने निकट सहयोगी चाहे वो मंत्रि परिषद के सद्स्य ना हो की सहायता से करता है जैसे कि इंदिरा गाँधी अपने किचन कैबिनेट की सहायता से करती थी
प्रधानमंत्री सरकार के लाभ

  • 1 तीव्र तथा कठोर निर्णय ले सकती है
  • 2 देश को राजनैतिक स्थाईत्व मिलता है

इससे कुछ हानि भी है

  • 1 कैबिनेट ऐसे निर्णय लेती है जो सत्ता रूढ दल के हित मे हो न कि देश के हित मे
  • 2 इस के द्वारा गैर संवैधानिक शक्ति केन्द्रों का जन्म होता है

कैबिनेट सरकार

संसदीय सरकार का ही प्रकार है इस मे नीति गत निर्णय सामूहिक रूप से कैबिनेट [मंत्रि मंडल ] लेता है इस मे प्रधानमंत्री कैबिनेट पे छा नही जाता है इस के निर्णय सामान्यत संतुलित होते है लेकिन कभी कभी वे इस तरह के होते है जो अस्पष्ट तथा साहसिक नही होते है। 1989 के बाद देश मे प्रधानमंत्री प्रकार का नही बल्कि कैबिनेट प्रकार का शासन रहा है।

प्रधानमन्त्री के कार्य

१- मन्त्रीपरिषद के गठन का कार्य २- प्रमुख शासक ३- नीति निर्माता ४- ससद का नेता ५- विदेश निती का निर्धारक

कार्यकारी सरकार[संपादित करें]

बहुमत समाप्त हो जाने के बाद जब मंत्रि परिषद त्यागपत्र दे देती है तब कार्यकारी सरकार अस्तित्व मे आती है अथवा प्रधानमंत्री की मृत्यु/ त्यागपत्र की दशा मे यह स्थिति आती है। यह सरकार अंतरिम प्रकृति की होती है यह तब तक स्थापित रहती है जब तक नयी मंत्रिपरिषद शपथ ना ले ले यह इसलिए काम करती है ताकि अनुच्छेद 74 के अनुरूप एक मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति की सहायता हेतु रहे। वी.एन.राव बनाम भारत संघ वाद में उच्चतम न्यायालय ने माना था कि मंत्रि परिषद सदैव मौजूद रहनी चाहिए यदि यह अनुपस्थित हुई तो राष्ट्रपति अपने काम स्वंय करने लगेगा जिस से सरकार का रूप बदल कर राष्ट्रपति हो जायेगा जो कि संविधान के मूल ढाँचे के खिलाफ होगा। यह कार्यकारी सरकार कोई भी वित्तीय/नीतिगत निर्णय नही ले सकती है क्योंकि उस समय लोक सभा मौजूद नही रहती है वह केवल देश का दैनिक प्रशासन चलाती है। इस प्रकार की सरकार के सामने सबसे विकट स्थिति तब आ गयी थी जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को 1999 मे कारगिल युद्ध का संचालन करना पडा था। किंतु विकट दशा मे इस प्रकार की सरकार भी कोई भी नीति निर्णय ले सकती है।

सुस्थापित परंपराए[संपादित करें]

एक संसदीय सरकार में ये पंरपराए ऐसी प्रथाएँ मानी जाती है जो सरकार के सभी अंगों पर वैधानिक रूप
से लागू मानी जाती है उनका वर्णन करने के लिये कोई विधान नहीं होता है ना ही संविधान मे किसी देश के शासन के बारे मे पूर्ण वर्णन किया जा सकता है संविधान निर्माता भविष्य मे होने वाले विकास तथा देश के शासन पर उनके प्रभाव का अनुमान नहीं लगा सकते अतः वे उनके संबंध मे संविधान में प्रावधान भी नहीं कर सकते है
इस तरह संविधान एक जीवित शरीर तो है परंतु पूर्ण वर्णन नही है इस वर्णन मे बिना संशोधन लाये परिवर्तन भी नहीं हो सकता है वही पंरपराए संविधान के प्रावधानॉ की तरह वैधानिक नहीं होती वे सरकार के संचालन में स्नेहक का कार्य करते है तथा सरकार का प्रभावी संचालन करने मे सहायक है
पंरपराए इस लिए पालित की जाती है क्योंकि उनके अभाव मे राजनैतिक कठिनाइया आ सकती है इसी कारण उन्हें संविधान का पूरक माना जाता हैब्रिटेन मे हम इनका सबसे विकसित तथा प्रभावशाली रूप देख सकते है
इनके दो प्रकार है प्रथम वे जो संसद तथा मंत्रिपरिषद के मध्य संयोजन का कार्य करती है यथा अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर परिषद का त्यागपत्र दे देना
द्वितीय वे जो विधायिका की कार्यवाहिय़ों से संबंधित है जैसे किसी बिल का तीन बार वाचन संसद के तीन सत्र राष्ट्रपति द्वारा धन बिल को स्वीकृति देना उपस्पीकर का चुनाव विपक्ष से करना जब स्पीकर सत्ता पक्ष से चुना गया हो आदि
सरकार के संसदीय तथा राष्ट्रपति प्रकार
संसदीय शासन के समर्थन मे तर्क
1. राष्ट्रपतीय शासन मे राष्ट्रपति वास्तविक कार्य पालिका होता है जो जनता द्वारा निश्चित समय के लिये चुना जाता है वह विधायिका के प्रति उत्तरदायी भी नेही होता है उसके मंत्री भी विधायिका के सदस्य नही होते है तथा उसी के प्रति उत्ततदायी होंगे न कि विधायिका के प्रति
वही संसदीय शासन मे शक्ति मंत्रि परिषद के पास होती है जो विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है
2. भारत की विविधता को देखते हुए संसदीय शासन ज्यादा उपयोगी है इस मे देश के सभी वर्गों के लोग मंत्रि परिषद मे लिये जा सकते है
3. इस् शासन मे संघर्ष होने [विधायिका तथा मंत्रि परिषद के मध्य] की संभावना कम रहती है क्यॉकि मंत्री विधायिका के सदस्य भी होते है
4 भारत जैसे विविधता पूर्ण देश मे सर्वमान्य रूप से राष्ट्रपति का चुनाव करना लगभग असंभव है
5 मिंटे मार्ले सुधार 1909 के समय से ही संसदीय शासन से भारत के लोग परिचय रखते है {सही}}

भाग पाँच, अध्याय 2, संसद[संपादित करें]

राज्य सभा[संपादित करें]

राज्यों को संघीय स्तर पर प्रतिनिधित्व देने वाली सभा है जिसका कार्य संघीय स्तर पर राज्य हितॉ का संरक्षण करना है। इसे संसद का दूसरा सदन कह्ते है इसके सदस्य दो प्रकार से निर्वाचित होते है राज्यॉ से 230 को निर्वाचित करते है तथा राष्ट्रपति द्वारा 12 को मनोनीत करते है। वर्तमान मे यह संख्या क्रमश 245 है ये सद्स्य 6 वर्ष हेतु चुने जाते है इनका चयन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के द्वारा होता है मत एकल संक्रमणीय प्रणाली से डाले जाते है। मत खुले डाले जाते है.सद्स्य जो निर्वाच्त होना चाहते है देश के किसी भी संसदीय क्षेत्र से एक निर्वाचक के रूप मे पंजीकृत होने चाहिए।

राज्यसभा की विशेष शक्तियाँ[संपादित करें]

राज्यसभा के पास तीन विशेष शक्तिया होती है

  1. अनु. 249 के अंतर्गत राज्य सूची के विषय पर 1 वर्ष का बिल बनाने का हक
  2. अनु. 312 के अंतर्गत नवीन अखिल भारतीय सेवा का गठन 2/3 बहुमत से करना
  3. अनु. 67 ब उपराष्ट्रपति को हटाने वाला प्रस्ताव राज्यसभा मे ही लाया जा सकेगा

राज्य सभा का संघीय स्वरूप[संपादित करें]

  1. राज्य सभा का गठन ही राज्य परिषद के रूप मे संविधान के संघीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व देने के लिये हुआ था
  2. राज्य सभा के सद्स्य मंत्रि परिषद के सदस्य बन सकते है जिससे संघीय स्तर पर निर्णय लेने मे राज्य का प्रतिनिधित्व होगा
  3. राष्ट्रपति के निर्वाचन तथा महाभियोग तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन मे समान रूप से भाग लेती है
  4. अनु 249,312 भी राज्य सभा के संघीय स्वरूप तथा राज्यॉ के संरक्षक रूप मे उभारते है
  5. सभी संविधान संशोधन बिल भी इस के द्वारा पृथक सभा कर तथा 2/3 बहुमत से पास होंगे
  6. संसद की स्वीकृति चाहने वाले सभी प्रस्ताव जो कि आपातकाल से जुडे हो भी राज्यसभा द्वारा पारित होंगे

राज्य सभा के गैर संघीय तत्व[संपादित करें]

  1. संघीय क्षेत्रॉ को भी राज्य सभा मे प्रतिनिधित्व मिलता है जिससे इसका स्वरूप गैर संघीय हो जाता है
  2. राज्यॉ का प्रतिनिधित्व राज्यॉ की समानता के आधार पे नही है जैसा कि अमेरिका मे है वहाँ प्रत्येक राज्य को
    सीनेट मे दो स्थान मिलते है किंतु भारत मे स्थानॉ का आवंटन आबादी के आधार पे किया गया है
  3. राज्य सभा मे मनोनीत सद्स्यों का प्रावधान है

राज्य सभा का मह्त्व[संपादित करें]

  1. किसी भी संघीय शासन मे संघीय विधायिका का ऊपरी भाग संवैधानिक बाध्यता के चलते राज्य हितॉ की संघीय
    स्तर पर रक्षा करने वाला बनाया जाता है इसी सिद्धांत के चलते राज्य सभा का गठन हुआ है, इसी कारण राज्य सभा को सदनॉ
    की समानता के रूप मे देखा जाता है जिसका गठन ही संसद के द्वितीय सदन के रूप मे हुआ है
  2. यह जनतंत्र की मांग है कि जहाँ लोकसभा सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है विशेष शक्तियॉ का उपभोग करती है
    , लोकतंत्र के सिद्धांत के अनुरूप मंत्रिपरिषद भी लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होने के लिये बाध्य करते है किंतु ये दो कारण किसी भी प्रकार
    से राज्यसभा का मह्त्व कम नही करते है
  3. राज्यसभा का गठन एक पुनरीक्षण सदन के रूप मे हुआ है जो लोकसभा द्वारा पास किये गये प्रस्तावॉ की पुनरीक्षा करे
    यह मंत्रिपरिषद मे विशेषज्ञों की कमी भी पूरी कर सकती है क्योंकि कम से कम 12 विशेषज्ञ तो इस मे मनोनीत होते ही है
  4. आपातकाल लगाने वाले सभी प्रस्ताव जो राष्ट्रपति के सामने जाते है राज्य सभा द्वारा भी पास होने चाहिये
  5. राज्य सभा का महत्व यह है कि जहाँ लोकसभा सदैव सरकार से सहमत होती है जबकि राज्यसभा सरकार की नीतिय़ों का निष्पक्ष मूल्याँकन कर सकती है
  6. मात्र नैतिक प्रभाव सरकार पे डालती है किंतु यह लोकस्भा के प्रभाव की तुलना मे ज्यादा होता है

राज्य सभा के पदाधिकारी उनका निर्वाचन, शक्ति, कार्य, उत्तरदायित्व तथा पदच्युति[संपादित करें]

लोकसभा[संपादित करें]

यह संसद का लोकप्रिय सदन है जिसमे निर्वाचित मनोनीत सद्स्य होते है संविधान के अनुसार लोकसभा का विस्तार राज्यॉ से चुने गये 530, संघ क्षेत्र से चुने गये 20 और राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 2 आंग्ल भारतीय सदस्यॉ तक होगा वर्तमान मे राज्यॉ से 530, संघ क्षेत्रॉ
से 13 तथा 2 आंग्ल भारतीय सद्स्यॉ से सदन का गठन किया गया है
कुछ स्थान अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित है
प्रत्येक राज्य को उसकी आबादी के आधार पर सद्स्य मिलते है अगली बार लोकसभा के सदस्यॉ की संख्या वर्ष 2026 मे निर्धारित किया जायेगा वर्तमान मे यह 1971 की जनसंख्या पे आधारित है इससे पहले प्रत्येक दशक की जनगणना के आधार पर सदस्य स्थान निर्धारित होते थे यह कार्य बकायदा 84 वे संविधान संशोधन से किया गया था ताकि राज्य अपनी आबादी के आधार पर ज्यादा से ज्यादा स्थान प्राप्त करने का प्रयास नही करे
लोकसभा की कार्यावधि 5 वर्ष है पर्ंतु इसे समय से पूर्व भंग किया जा सकता है

लोकसभा की विशेष शक्तियाँ[संपादित करें]

  1. मंत्री परिषद केवल लोकस्भा के प्रति उत्तरदायी है अविश्वास प्रस्ताव सरकार के विरूद्ध केवल यही लाया जा सकता है
  2. धन बिल पारित करने मे यह निर्णायक सदन है
  3. राष्ट्रीय आपातकाल को जारी रखने वाला प्रस्ताव केवल लोकस्भा मे लाया और पास किया जायेगा

लोकसभा के पदाधिकारी[संपादित करें]

स्पीकर[संपादित करें]

लोकसभा का अध्यक्ष होता है इसका चुनाव लोकसभा सदस्य अपने मध्य मे से करते है इसके दो कार्य है
1. लोकसभा की अध्यक्षता करना उस मे अनुसाशन गरिमा तथा प्रतिष्टा बनाये रखना इस कार्य हेतु वह किसी न्यायालय के सामने उत्तरदायी नही होता है
2. वह लोकसभा से संलग्न सचिवालय का प्रशासनिक अध्यक्ष होता है किंतु इस भूमिका के रूप मे वह न्यायालय के समक्ष उत्तरदायी होगा
उसकी विशेष शक्तियाँ
1. दोनो सदनॉ का सम्मिलित सत्र बुलाने पर स्पीकर ही उसका अध्यक्ष होगा उसके अनुउपस्थित होने पर उपस्पीकर तथा उसके भी न होने पर राज्यसभा का उपसभापति अथवा सत्र द्वारा नांमाकित कोई भी सदस्य सत्र का अध्यक्ष होता है
2. धन बिल का निर्धारण स्पीकर करता है यदि धन बिल पे स्पीकर साक्ष्यांकित नही करता तो वह धन बिल ही नही माना जायेगा उसका निर्धारण अंतिम तथा बाध्यकारी होगा
3. सभी संसदीय समितियाँ उसकी अधीनता मे काम करती है उसके किसी समिति का सदस्य चुने जाने पर वह उसका पदेन अध्यक्ष होगा
4. लोकसभा के विघटन होने पर भी उसका प्रतिनिधित्व करने के लिये स्पीकर पद पर कार्य करता रहता है नवीन लोकसभा चुने जाने पर वह अपना पद छोड देता है

स्पीकर प्रोटेम [कार्यवाहक][संपादित करें]

जब कोई नवीन लोकसभा चुनी जाती है तब राष्ट्रपति उस सदस्य को कार्यवाहक स्पीकर नियुक्त करता है जिसको संसद मे सदस्य होने का सबसे लंबा अनुभव होता है वह राष्ट्रपति द्वारा शपथ ग्रहण करता है
उसके दो कार्य होते है
1. संसद सदस्यॉ को शपथ दिलवाना
2. नवीन स्पीकर चुनाव प्रक्रिया का अध्यक्ष भी वही बनता है

उपस्पीकर[संपादित करें]

विधायिका[संसद - राज्य विधायिका] मे बहुमत के प्रकार[संपादित करें]

1. सामान्य बहुमत – उपस्थित सदस्यॉ तथा मतदान करने वालॉ के 50% से अधिक सदस्य ही सामान्य बहुमत है इस बहुमत का सदन की कुल सदस्य संख्या से कोई संबंध नही होता है
भारतीय संविधान के अनुसार अविश्वास प्रस्ताव, विश्वास प्रस्ताव, कामरोको प्रस्ताव, सभापति, उपसभापति तथा अध्यक्षॉ के चुनाव हेतु सदन के यदि संविधान संशोधन का प्रस्ताव राज्य विधायिकाओं को भेजना हो, सामान्य बिल, धन बिल, राष्ट्रपति शासन, वित्तीय आपातकाल लगाने हेतु सामान्य बहुमत को मान्यता प्राप्त है यदि बहुमत के प्रकार का निर्देश न होने पर उसे सदैव सामान्य बहुमत समझा जाता है
2. पूर्ण बहुमत – सदन के 50% से अधिक सदस्यॉ का बहुमत [खाली सीटे भी गिनी जाती है] लोकसभा मे 273, राज्यसभा मे 123 सदस्यॉ का समर्थन . इसका राजनैतिक मह्त्व है न कि वैधानिक महत्व
3. प्रभावी बहुमत- मतदान के समय उपस्थित सदन के 50% से अधिक सदस्यॉ [खाली सीटॉ को छोडकर] यह तब प्रयोग आती है जब लोक सभा अध्यक्ष उपाध्यक्ष या राज्यसभा के उपसभापति को पद से हटाना हो या जब राज्यसभा उपराष्ट्रपति को पद से हटाने हेतु मतदान करे
4.विशेष बहुमत – प्रथम तीनो प्रकार के बहुमतॉ से भिन्न होता है इसके तीन प्रकार है
[क] अनु 249 के अनुसार- उपस्थित तथा मतदान देने वालॉ के 2/3 संख्या को विशेष बहुमत कहा गया है
[ख] अनु 368 के अनुसार – संशोधन बिल सदन के उपस्थित तथा सदन मे मत देने वालो के 2/3 संख्या जो कि सदन के कुल सदस्य संख्या का भी बहुमत हो [लोकसभा मे 273 सदस्य]इस बहुमत से संविधान संशोधन, न्यायधीशॉ को पद से हटाना तथा राष्ट्रीय आपातकाल लगाना, राज्य विधान सभा द्वारा विधान परिषद की स्थापना अथवा विच्छेदन की मांंग के प्रस्ताव पारित किये जाते है
[ग] अनु 61 के अनुसार – केवल राष्ट्रपति के महाभियोग हेतु सदन के कुल संख्या का कम से कम 2/3 [लोकसभा मे 364 सदस्य होने पर]

लोकसभा के सत्र[संपादित करें]

– अनु 85 के अनुसार संसद सदैव इस तरह से आयोजित की जाती रहेगी कि संसद के दो सत्रॉ के मध्य 6 मास
से अधिक अंतर ना हो पंरपरानुसार संसद के तीन नियमित सत्रॉ तथा विशेष सत्रों मे आयोजित की जाती है
सत्रॉ का आयोजन राष्ट्रपति की विज्ञप्ति से होता है
1. बजट सत्र वर्ष का पहला सत्र होता है सामान्यत फरवरी मई के मध्य चलता है यह सबसे लंबा तथा महत्वपूर्ण सत्र माना जाता है इसी सत्र मे बजट प्रस्तावित तथा पारित होता है सत्र के प्रांरभ मे राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है
2. मानसून सत्र जुलाई अगस्त के मध्य होता है
3. शरद सत्र नवम्बर दिसम्बर के मध्य होता है सबसे कम समयावधि का सत्र होता है
विशेष सत्र – इस के दो भेद है 1. संसद के विशेष सत्र.
2. लोकसभा के विशेष सत्र
संसद के विशेष सत्र – मंत्रि परिषद की सलाह पर राष्ट्रपति इनका आयोजन करता है ये किसी नियमित सत्र के मध्य अथवा उससे पृथक आयोजित किये जाते है
एक विशेष सत्र मे कोई विशेष कार्य चर्चित तथा पारित किया जाता है यदि सदन चाहे भी तो अन्य कार्य नही कर सकता है
लोकसभा का विशेष सत्र – अनु 352 मे इसका वर्णन है किंतु इसे 44 वें संशोधन 1978 से स्थापित किया गया है यदि
लोकसभा के कम से कम 1/10 सद्स्य एक प्रस्ताव लाते है जिसमे राष्ट्रीय आपातकाल को जारी न रखने
की बात कही गयी है तो नोटिस देने के 14 दिन के भीतर सत्र बुलाया जायेगा
सत्रावसान – मंत्रिपरिषद की सलाह पे सदनॉ का सत्रावसान राष्ट्रपति करता है इसमे संसद का एक सत्र समाप्त
हो जाता है तथा संसद दुबारा तभी सत्र कर सकती है जब राष्ट्रपति सत्रांरभ का सम्मन जारी कर दे सत्रावसान की दशा मे संसद के
समक्ष लम्बित कार्य समाप्त नही हो जाते है
स्थगन – किसी सदन के सभापति द्वारा सत्र के मध्य एक लघुवधि का अन्तराल लाया जाता है इस से
सत्र समाप्त नही हो जाता ना उसके समक्ष लम्बित कार्य समाप्त हो जाते है यह दो प्रकार का होता है
1. अनिश्चित कालीन 2. जब अगली मीटिग का समय दे दिया जाता है
लोकसभा का विघटन— राष्ट्रपति द्वारा मंत्रि परिष्द की सलाह पर किया है इससे लोकसभा का जीवन समाप्त हो जाता है इसके बाद आमचुनाव ही होते है विघटन के बाद सभी लंबित कार्य जो लोकसभा के समक्ष होते है समाप्त हो जाते है किंतु बिल जो राज्यसभा मे लाये गये हो और वही लंबित होते है समाप्त न्ही होते या या बिल जो राष्ट्रपति के सामने विचाराधीन हो वे भी समापत नही होते है या राष्ट्रपति संसद के दोनॉ सदनॉ की लोकसभा विघटन से पूर्व संयुक्त बैठक बुला ले

विधायिका संबंधी कार्यवाही[संपादित करें]

/प्रक्रियाबिल/विधेयक के प्रकार कुल 4 प्रकार होते है
1.

सामान्य बिल[संपादित करें]

– इसकी 6 विशेषताएँ है
1. परिभाषित हो
2. राष्ट्रपति की अनुमति हो
3. बिल कहाँ प्रस्तावित हो
4. सदन की विशेष शक्तियॉ मे आता हो
5.कितना बहुमत चाहिए
6. गतिवरोध पैदा होना
यह वह विधेयक होता है जो संविधान संशोधन धन या वित्त विधेयक नही है यह संसद के किसी भी सदन मे लाया जा सकता है यदि अनुच्छेद 3 से जुडा ना हो तो इसको राष्ट्रप्ति की अनुंशसा भी नही चाहिए
इस बिल को पारित करने मे दोनो सदनॉ की विधायी शक्तिय़ाँ बराबर होती है इसे पारित करने मे सामान्य बहुमत
चाहिए एक सदन द्वारा अस्वीकृत कर देने पे यदि गतिवरोध पैदा हो जाये तो राष्ट्रपति दोनो सद्नॉ की संयुक्त बैठक मंत्रि परिषद की
सलाह पर बुला लेता है
राष्ट्रपति के समक्ष यह विधेयक आने पर वह इस को संसद को वापस भेज सकता है या स्वीकृति दे सकता है या अनिस्चित काल हेतु रोक सकता है

धन बिल[संपादित करें]

विधेयक जो पूर्णतः एक या अधिक मामलॉ जिनका वर्णन अनुच्छेद 110 मे किया गया हो से जुडा हो धन बिल कहलाता है ये मामलें है
1. किसी कर को लगाना,हटाना, नियमन
2. धन उधार लेना या कोई वित्तेय जिम्मेदारी जो भारत सरकार ले
3. भारत की आपात/संचित निधि से धन की निकासी/जमा करना
4.संचित निधि की धन मात्रा का निर्धारण
5. ऐसे व्यय जिन्हें भारत की संचित निधि पे भारित घोषित करना हो
6. संचित निधि मे धन निकालने की स्वीकृति लेना
7. ऐसा कोई मामला लेना जो इस सबसे भिन्न हो
धन बिल केवल लोकसभा मे प्रस्तावित किए जा सकते है इसे लाने से पूर्व राष्ट्रपति की स्वीकृति आवशय्क है इन्हें पास करने के लिये सदन का सामान्य बहुमत आवश्यक होता है
धन बिल मे ना तो राज्य सभा संशोधन कर सकती है न अस्वीकार
जब कोई धन बिल लोकसभा पारित करती है तो स्पीकर के प्रमाणन के साथ यह बिल राज्यसभा मे ले जाया जाता है राज्यसभा इस
बिल को पारित कर सकती है या 14 दिन के लिये रोक सकती है किंतु उस के बाद यह बिल दोनॉ
सदनॉ द्वारा पारित माना जायेगा राज्य सभा द्वारा सुझाया कोई भी संशोधन लोक सभा की इच्छा पे निर्भर करेगा कि वो स्वीकार करे
या ना करे जब इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा तो वह सदैव इसे स्वीकृति दे देगा
फायनेसियल बिल वह विधेयक जो एक या अधिक मनीबिल प्रावधानॉ से पृथक हो तथा गैर मनी मामलॉ से भी संबधित हो एक फाइनेंस विधेयक मे धन प्रावधानॉ के साथ साथ सामान्य विधायन से जुडे मामले भी होते है इस प्रकार के विधेयक को पारित करने की शक्ति दोनो सदनॉ मे समान होती

संविधान संशोधन विधेयक[संपादित करें]

अनु 368 के अंतर्गत प्रस्तावित बिल जो कि संविधान के एक या अधिक प्रस्तावॉ को संशोधित करना चाहता है संशोधन बिल कहलाता है यह किसी भी संसद सदन मे बिना राष्ट्रपति की स्वीकृति के लाया जा सकता है इस विधेयक को सदन द्वारा कुल उपस्थित सदस्यॉ की 2/3 संख्या तथा सदन के कुल बहुमत द्वारा ही पास किया जायेगा दूसरा सदन भी इसे इसी प्रकार पारित करेगा किंतु इस विधेयक को सदनॉ के पृथक सम्मेलन मे पारित किया जायेगा गतिरोध आने की दशा मे जैसा कि सामान्य विधेयक की स्थिति मे होता है सदनॉ की संयुक्त बैठक नही बुलायी जायेगी 24 वे संविधान संशोधन 1971 के बाद से यह अनिवार्य कर दिया गया है कि राष्ट्रपति इस बिल को अपनी स्वीकृति दे ही दे

विधेयक पारित करने मे आया गतिरोध[संपादित करें]

जब संसद के दोनॉ सदनॉ के मध्य बिल को पास करने से संबंधित विवाद हो या जब एक सदन द्वारा पारित बिल को दूसरा अस्वीकृत कर दे या इस तरह के संशोधन कर दे जिसे मूल सदन अस्वीकर कर दे या इसे 6 मास तक रोके रखे तब सदनॉ के मध्य गतिवरोध की स्थिति जन्म लेती है अनु 108 के अनुसार राष्ट्रपति इस दशा मे दोनॉ सदनॉ की संयुक्त बैठक बुला लेगा जिसमे सामान्य बहुमत से फैसला हो जायेगा अब तक मात्र तीन अवसरॉ पे इस प्रकार की बैठक बुलायी गयी है
1. दहेज निषेध एक्ट 1961
2.बैंकिग सेवा नियोजन संशोधन एक्ट 1978
3.पोटा एक्ट 2002
संशोधन के विरूद्ध सुरक्षा उपाय 1. न्यायिक पुनरीक्षा का पात्र है
2.संविधान के मूल ढांचे के विरूद्ध न हो
3. संसद की संशोधन शक्ति के भीतर आता हो
4. संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन तीनॉ अंगो का संतुलन बना रहे
5. संघ के ढाँचे से जुडा होने पर आधे राज्यॉ की विधायिका से स्वीकृति मिले
6. गठबंधन राजनीति भी संविधान संशोधन के विरूद्ध प्रभावी सुरक्षा उपाय देती है क्योंकि एकदलीय पूर्ण बहुमत के दिन समाप्त हो चुके

अध्यादेश जारी करना[संपादित करें]

अनु 123 राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है यह तब जारी होगा जब राष्ट्रपति संतुष्ट हो जाये कि परिस्थितियाँ ऐसी हो कि तुरंत कार्यवाही करने की जरूरत है तथा संसद का 1 या दोनॉ सदन सत्र मे नही है तो वह अध्यादेश जारी कर सकता है यह अध्यादेश संसद के पुनसत्र के 6 सप्ताह के भीतर अपना प्रभाव खो देगा यधपि दोनो सदनॉ द्वारा स्वीकृति देने पर यह जारी रहेगा यह शक्ति भी न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण की पात्र है किंतु शक्ति के गलत प्रयोग या दुर्भावना को सिद्ध करने का कार्य उस व्यक्ति पे होगा जो इसे चुनौती दे अध्यादेश जारी करने हेतु संसद का सत्रावसान करना भी उचित हो सकता है क्यॉकि अध्यादेश की जरूरत तुरंत हो सकती है जबकि संसद कोई भी अधिनियम पारित करने मे समय लेती है अध्यादेश को हम अस्थाई विधि मान सकते है यह राष्ट्रपति की विधायिका शक्ति के अन्दर आता है न कि कार्यपालिका वैसे ये कार्य भी वह मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है यदि कभी संसद किसी अध्यादेश को अस्वीकार दे तो वह नष्ट भले ही हो जाये किंतु उसके अंतर्गत किये गये कार्य अवैधानिक नही हो जाते है राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति पे नियंत्रण
1. प्रत्येक जारी किया हुआ अध्यादेश संसद के दोनो सदनो द्वारा उनके सत्र शुरु होने के 6 हफ्ते के भीतर स्वीकृत करवाना होगा इस प्रकार कोई अध्यादेश संसद की स्वीकृति के बिना 6 मास + 6 सप्ताह से अधिक नही चल सकता है
2. लोकसभा एक अध्यादेश को अस्वीकृत करने वाला प्रस्ताव 6 सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पूर्व पास कर सकती है
3. राष्ट्रपति का अध्यादेश न्यायिक समीक्षा का विषय़ है

संसद मे राष्ट्रपति का अभिभाषण[संपादित करें]

यह सदैव मंत्रिपरिषद तैयार करती है यह सिवाय सरकारी नीतियॉ की घोषणा के कुछ नही होता है सत्र के अंत मे इस पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया जाता है यदि लोकसभा मे यह प्रस्ताव पारित नही हो पाता है तो यह सरकार की नीतिगत पराजय मानी जाती है तथा सरकार को तुरंत अपना बहुमत सिद्ध करना पडता है संसद के प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र मे तथा लोकसभा चुनाव के तुरंत पश्चात दोनॉ सदनॉ की सम्मिलित बैठक को राष्ट्रपति संबोधित करता है यह संबोधन वर्ष के प्रथम सत्र का परिचायक है इन सयुंक्त बैठकॉ का सभापति खुद राष्ट्रपति होता है
अभिभाषण मे सरकार की उपलब्धियॉ तथा नीतियॉ का वर्णन तथा समीक्षा होती है[जो पिछले वर्ष मे हुई थी] आतंरिक समस्याओं से जुडी नीतियाँ भी इसी मे घोषित होती है प्रस्तावित विधायिका कार्यवाहिया जो कि संसद के सामने उस वर्ष के सत्रॉ मे लानी हो का वर्णन भी अभिभाषण मे होता है अभिभाषण के बाद दोनो सद्न पृथक बैठक करके उस पर चर्चा करते है जिसे पर्यापत समय दिया जाता है

संचित निधि[संपादित करें]

– संविधान के अनु 266 के तहत स्थापित है यह ऐसी निधि है जिस मे समस्त एकत्र कर/राजस्व जमा,लिये गये ऋण जमा किये जाते है यह भारत की सर्वाधिक बडी निधि है जो कि संसद के अधीन रखी गयी है कोई भी धन इसमे बिना संसद की पूर्व स्वीकृति के निकाला/जमा या भारित नहीं किया जा सकता है अनु 266 प्रत्येक राज्य की समेकित निधि का वर्णन भी करता हैsanchit nidhi se koi bhi bina rastrapati k anumati ke tatha sansad k anumati k rashi nahi nikal sakta hai.

भारत की लोक निधि[संपादित करें]

--- अनु 266 इसका वर्णन भी करता है वह धन जिसे भारत सरकार कर एकत्रीकरण प्राप्त आय उगाहे गये ऋण के अलावा एकत्र करे भारत की लोकनिधि कहलाती है कर्मचारी भविष्य़ निधि को भारत की लोकनिधि मे जमा किया गया है यह कार्यपालिका के अधीन निधि है इससे व्यय धन महालेखानियंत्रक द्वारा जाँचा जाता है अनु 266 राज्यॉ की लोकनिधि का भी वर्णन करता है

भारत की आपातकाल निधि[संपादित करें]

--- अनु 267 संसद को निधि जो कि आपातकाल मे प्रयोग की जा सकती हो स्थापित करने का अधिकार देता है यह निधि राष्ट्रपति के अधीन है इससे खर्च धन राष्ट्रपति की स्वीकृति से होता है परंतु संसद के समक्ष इसकी स्वीकृति ली जाती है यदि संसद स्वीकृति दे देती है तो व्यय धन के बराबर धन भारत की संचित निधि से निकाल कर इसमे डाल दिया जाता है अनु 267 राज्यॉ को अपनी अपनी आपातकाल निधि स्थापित करने का अधिकार भी देता है

भारित व्यय[संपादित करें]

--- वे व्यय जो कि भारत की संचित निधि पर बिना संसदीय स्वीकृति के भारित होते है ये व्यय या तो संविधान द्वारा स्वीकृत होते है या संसद विधि बना कर डाल देती है कुछ संवैधानिक पदॉ की स्वतंत्रता बनाये रखने के लिये यह व्यय प्रयोग लाये गये है अनु 112[3] मे कुछ भारित व्ययॉ की सूची है
1. राष्ट्रपति के वेतन,भत्ते,कार्यालय से जुडा व्यय है
2. राज्यसभा लोकसभा के सभापतियॉ उपसभापतियॉ के वेतन भत्ते
3.ऋण भार जिनके लिये भारत सरकार उत्तरदायी है [ब्याज सहित]
4.सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों के वेतन भत्ते पेंशन तथा उच्च न्यायालय की पेंशने इस पर भारित है
5. महालेखानियंत्रक तथा परीक्षक [केग] के वेतन भत्ते
6. किसी न्यायिक अवार्ड/डिक्री/निर्णय के लिये आवशयक धन जो न्यायालय/ट्रिब्न्यूल द्वारा पारित हो
7. संसद द्वारा विधि बना कर किसी भी व्यय को भारित व्यय कहा जा सकता है
अभी तक संसद ने निर्वाचन आयुक्तॉ के वेतन भत्ते पेंशन, केन्द्रीय सर्तकता आयोग सदस्यॉ के वेतन भत्ते पेंशन भी इस पर भारित किये है

वित्त व्यवस्था पर संसद का नियंत्रण[संपादित करें]

अनु 265 के अनुसार कोई भी कर कार्यपालिका द्वारा बिना विधि के अधिकार के न तो आरोपित किया जायेगा और न ही वसूला जायेगा अनु 266 के अनुसार भारत की समेकित निधि से कोई धन व्यय /जमा भारित करने से पूर्व संसद की स्वीकृति जरूरी है
अनु 112 के अनुसार राष्ट्रपति भारत सरकार के वार्षिक वित्तीय लेखा को संसद के सामने रखेगा यह वित्तीय लेखा ही बजट है<br /

बजट[संपादित करें]

बजट सरकार की आय व्यय का विवरण पत्र है।
1. अनुमानित आय व्यय जो कि भारत सरकार ने भावी वर्ष मे करना हो
2. यह भावी वर्ष के व्यय के लिये राजस्व उगाहने का वर्णन करता है
3. बजट मे पिछले वर्ष के वास्तविक आय व्यय का विवरण होता है
बजट सामान्यत वित्तमंत्री द्वारा सामान्यतः फरवरी के आखरी दिन लोकसभा मे प्रस्तुत किया जाता है उसी समय राज्यसभा मे भी बजट के कागजात रखे जाते है यह एक धन बिल है।
बजट में सामान्यतः-
१- पिछले वर्ष के वास्तविक अनुमान,
२- वर्तमान वर्ष के संशोधित अनुमान,
३- आगामी वर्ष के प्रस्तावित अनुमान
प्रस्तुत किए जाते है। अतः बजट का संबंध 3 वर्ष के आकडो़ से होता है।

कटौती प्रस्ताव[संपादित करें]

—बजट प्रक्रिया का ही भाग है केवल लोकसभा मे प्रस्तुत किया जाता है ये वे उपकरण है जो लोकसभा सदस्य कार्यपालिका पे नियंत्रण हेतु उपयोग लाते है ये अनुदानॉ मे कटौती कर सकते है इसके तीन प्रकार है

1.नीति सबंधी कटौती--- इस प्रस्ताव का ल्क्ष्य लेखानुदान संबंधित नीति की अस्वीकृति है यह इस रूप मे होती है ‘-------‘ मांग को कम कर मात्र 1 रुपया किया जाता है यदि इस प्रस्ताव को पारित कर दिया जाये तो यह सरकार की नीति संबंधी पराजय मानी जाती है उसे तुरंत अपना विश्वास सिद्ध करना होता है

2. किफायती कटौती--- भारत सरकार के व्यय को उससीमा तक कम कर देती है जो संसद के मतानुसार किफायती होगी यह कटौती सरकार की नीतिगत पराजय नहीं मानी जाती है

3. सांकेतिक कटौती--- इन कटौतीयों का ल्क्ष्य संसद सदस्यॉ की विशेष शिकायतें जो भारत सरकार से संबंधित है को निपटाने हेतु प्रयोग होती है जिसके अंतर्गत मांगे गये धन से मात्र 100 रु की कटौती की जाती है यह कटौती भी नीतिगत पराजय नही मानी जाती है

लेखानुदान (वोट ओन अकाउंट)[संपादित करें]

अनु 116 इस प्रावधान का वर्णन करता है इसके अनुसार लोकसभा वोट ओन अकाउंट नामक तात्कालिक उपाय प्रयोग लाती है इस उपाय द्वारा वह भारत सरकार को भावी वित्तीय वर्ष मे भी तब तक व्यय करने की छूट देती है जब तक बजट पारित नही हो जाता है यह सामान्यत बजट का अंग होता है किंतु यदि मंत्रिपरिषद इसे ही पारित करवाना चाहे तो यही अंतरिम बजट बन जाता है जैसा कि 2004 मे एन.डी.ए. सरकार के अंतिम बजट के समय हुआ था फिर बजट नयी यू.पी.ए सरकार ने पेश किया था
वोट ओन क्रेडिट [प्रत्यानुदान] लोकसभा किसी ऐसे व्यय के लिये धन दे सकती है जिसका वर्णन किसी पैमाने या किसी सेवा मद मे रखा जा सक्ना संभव ना हो मसलन अचानक युद्ध हो जाने पे उस पर व्यय होता है उसे किस शीर्षक के अंतर्गत रखे?यह लोकसभा द्वारा पारित खाली चैक माना जा सकता है आज तक इसे प्रयोग नही किया जा सका है
जिलेटीन प्रयोग—समयाभाव के चलते लोकसभा सभी मंत्रालयों के व्ययानुदानॉ को एक मुश्त पास कर देती है उस पर कोई चर्चा नही करती है यही जिलेटीन प्रयोग है यह संसद के वित्तीय नियंत्रण की दुर्बलता दिखाता है

संसद मे लाये जाने वाले प्रस्ताव[संपादित करें]

अविश्वास प्रस्ताव[संपादित करें]

लोकसभा के क्रियांवयन नियमॉ मे इस प्रस्ताव का वर्णन है विपक्ष यह प्रस्ताव लोकसभा मे मंत्रिपरिषद के विरूद्ध लाता है इसे लाने हेतु लोकसभा के 50 सद्स्यॉ का समर्थन जरूरी है यह सरकार के विरूद्ध लगाये जाने वाले आरोपॉ का वर्णन नही करता है केवल यह बताता है कि सदन मंत्रिपरिषद मे विश्वास नही करता है एक बार प्रस्तुत करने पर यह प्रस्ताव् सिवाय धन्यवाद प्रस्ताव के सभी अन्य प्रस्तावॉ पर प्रभावी हो जाता है इस प्रस्ताव हेतु पर्याप्त समय दिया जाता है इस पर् चर्चा करते समय समस्त सरकारी कृत्यॉ नीतियॉ की चर्चा हो सकती है लोकसभा द्वारा प्रस्ताव पारित कर दिये जाने पर मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को त्याग पत्र सौंप देती है संसद के एक सत्र मे एक से अधिक अविश्वास प्रस्ताव नही लाये जा सकते है
विश्वास प्रस्ताव--- लोकसभा नियमॉ मे इस प्रस्ताव का कोई वर्णन नही है यह आवश्यक्तानुसार उत्पन्न हुआ है ताकि मंत्रिपरिषद अपनी सत्ता सिद्ध कर सके यह सदैव मंत्रिपरिषद लाती है इसके गिरजाने पर उसे त्याग पत्र देना पडता है निंदा प्रस्ताव--- लोकसभा मे विपक्ष यह प्रस्ताव लाकर सरकार की किसी विशेष नीति का विरोध/निंदा करता है इसे लाने हेतु कोई पूर्वानुमति जरूरी नही है यदि लोकसभा मे पारित हो जाये तो मंत्रिपरिषद निर्धारित समय मे विश्वास प्रस्ताव लाकर अपने स्थायित्व का परिचय देती है है उसके लिये यह अनिवार्य है कामरोको प्रस्ताव--- लोकसभा मे विपक्ष यह प्रस्ताव लाता है यह एक अद्वितीय प्रस्ताव है जिसमे सदन की समस्त कार्यवाही रोक कर तात्कालीन जन मह्त्व के किसी एक मुद्दे को उठाया जाता है प्रस्ताव पारित होने पर सरकार पे निंदा प्रस्ताव के समान प्रभाव छोडता है shiv choudhary

संघीय न्यायपालिका[संपादित करें]

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति[संपादित करें]

30 जज तथा 1 मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के प्रावधान का वर्णन संविधान मे है अनु 124[2] के अनुसार् मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय इच्छानुसार राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह लेगा वही अन्य जजॉ की नियुक्ति के समय उसे अनिवार्य रूप से मुख्य न्यायाधीश की सलाह माननी पडेगी
सर्वोच्च न्यायालय एडवोकेट्स आन रिकार्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ वाद 1993 मे दिये गये निर्णय के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालय के जजों के तबादले इस प्रकार की प्रक्रिया है जो सर्वाधिक योग्य उपलब्ध व्यक्तियों की नियुक्ति की जा सके भारत के मुख्य न्यायाधीश का मत प्राथमिकता पायेगा वह एक मात्र अधिकारी होगा उच्च न्यायपालिका मे कोई नियुक्ति बिना उस की सहमति के नहीं होती है संवैधानिक सत्ताओं के संघर्ष के समय भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करेगा राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश को अपने मत पर फिर से विचार करने को तभी कहेगा जब इस हेतु कोई तार्किक कारण मौजूद होगा पुनः विचार के बाद उसका मत राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होगा यद्यपि अपना मत प्रकट करते समय वह सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठम न्यायधीशों का मत जरूर लेगा पुनःविचार की दशा मे फिर से उसे दो वरिष्ठम न्यायधीशों की राय लेनी होगी वह चाहे तो उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय के अन्य जजों की राय भी ले सकता है लेकिन सभी राय सदैव लिखित में होगी
बाद में अपना मत बदलते हुए न्यायालय ने कम से कम 4 जजों के साथ सलाह करना अनिवार्य कर दिया था वह कोई भी सलाह राष्ट्रपति को अग्रेषित नहीं करेगा यदि दो या ज्यादा जजों की सलाह इस्के विरूद्ध हो किंतु 4 जजों की सलाह उसे अन्य जजों जिनसे वो चाहे सलाह लेने से नहीं रोकेगी

न्यायपालिका के न्यायधीशों की पदच्युति[संपादित करें]

—इस कोटि के जजॉ के राष्ट्रपति तब पदच्युत करेगा जब संसद के दोणो सदनॉ के कम से कम 2/3 उपस्थित तथा मत देने वाले तथा सदन के कुल बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव जो कि सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पे लाया गया हो के द्वारा उसे अधिकार दिया गया हो ये आदेश उसी संसद सत्र मे लाया जायेगा जिस सत्र मे ये प्रस्ताव संसद ने पारित किया हो अनु 124[5] मे वह प्रक्रिया वर्णित है जिस से जज पद्च्युत होते है इस प्रक्रिया के आधार पर संसद ने न्यायधीश अक्षमता अधिनियम 1968 पारित किया था इसके अंतर्गत

1. संसद के किसी भी सदन मे प्रस्ताव लाया जा सकता है लोकस्भा मे 100 राज्यसभा मे 50 सद्स्यॉ का समर्थन अनिवार्य है
2. प्रस्ताव मिलने पे सदन का सभापति एक 3 सद्स्य समिति बनायेगा जो आरोपों की जाँच करेगी समिति का अध्यक्ष सप्रीम कोर्ट का कार्यकारी जज होगा दूसरा सदस्य किसी हाई कोर्ट का मुख्य कार्यकारी जज होगा तीसरा सदस्य माना हुआ विधिवेत्ता होगा इस की जाँच रिपोर्ट सदन के सामने आयेगी यदि इस मे जज को दोषी बताया हो तब भी सदन प्रस्ताव पारित करने को बाध्य नही होता किंतु यदि समिति आरोपों को खारिज कर दे तो सदन प्रस्ताव पारित नही कर सकता है
अभी तक सिर्फ एक बार किसी जज के विरूद्ध जांच की गयी है जज रामास्वामी दोषी सिद्ध हो गये थे किंतु संसद मे आवश्यक बहुमत के अभाव के चलते प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सका था

अभिलेख न्यायालय[संपादित करें]

अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को तथा अनुच्छेद 215 उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है यह संकल्पना अंग्रेजी विधि से ली गयी है अभिलेख न्यायालय का अर्थ अनु 129 सुप्रीम कोर्ट को तथा अनु 215 उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है यह संकल्पना इंग्लिश विधि से ली गयी है अभिलेख न्यायालय का अर्थ
1. न्यायालय की कार्यवाही तथा निर्णय को दूसरे न्यायालय मे साक्ष्य के रूप मे प्रस्तुत किया जा सकेगा
2. न्यायालय को अधिकार है कि वो अवमानना करने वाले व्यक्ति को दण्ड दे सके यह शक्ति अधीनस्थ न्यायालय को प्राप्त नही है इस शक्ति को नियमित करने हेतु संसद ने न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 पारित किया है अवमानना के दो भेद है सिविल और आपराधिक जब कोई व्यक्ति आदेश निर्देश का पालन न करे या उल्लंघ न करे तो यह सिविल अवमानना है पर्ंतु यदि कोई व्यक्ति न्यायालय को बदनाम करे जजों को बदनाम तथा विवादित बताने का प्रयास करे तो यह आपराधिक अवमानना होगी जिसके लिये कारावास/जुर्माना दोनो देना पडेगा वही सिविल अवमानना मे कारावास सम्भव नहीं है यह शक्ति भारत मे काफी कुख्यात तथा विवादस्पद है

सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ[संपादित करें]

अनु 130 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली मे होगा पर्ंतु यह भारत मे और कही भी मुख्य न्यायाधीश् के निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति की स्वीकृति से सुनवाई कर सकेगा
क्षेत्रीय खंडपीठों का प्रश्न- विधि आयोग अपनी रिपोर्ट के माध्यम से क्षेत्रीय खंडपीठों के गठन की अनुसंशा कर चुका है न्यायालय के वकीलॉ ने भी प्राथर्ना की है कि वह अपनी क्षेत्रीय खंडपीठों का गठन करे ताकि देश के विभिन्न भागॉ मे निवास करने वाले वादियॉ के धन तथा समय दोनॉ की बचत हो सके,किंतु न्यायालय ने इस प्रश्न पे विचार करने के बाद निर्णय दिया है कि पीठॉ के गठन से
1. ये पीठे क्षेत्र के राज नैतिक दबाव मे आ जायेगी
2. इनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट के एकात्मक चरित्र तथा संगठन को हानि पहुँच सकती है
किंतु इसके विरोध मे भी तर्क दिये गये है

सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार[संपादित करें]

जनहित याचिकाएँ[संपादित करें]

– इस प्रकार की याचिकाओँ का विचार अमेरिका ए जन्मा वहाँ इसे सामाजिक कार्यवाही याचिका कह्ते है यह न्यायपालिका का आविष्कार तथा न्यायधीश निर्मित विधि है
जनहित याचिका भारत मे पी.एन.भगवती ने प्रारंभ की थी ये याचिकाँए जनहित को सुरक्षित तथा बढाना चाहती है ये लोकहित भावना पे कार्य करती है
ये ऐसे न्यायिक उपकरण है जिनका लक्ष्य जनहित प्राप्त करना है इनका ल्क्ष्य तीव्र तथा सस्ता न्याय एक आम आदमी को दिलवाना तथा कार्यपालिका विधायिका को उनके संवैधानिक कार्य करवाने हेतु किया जाता है
ये समूह हित मे काम आती है ना कि व्यक्ति हित मे यदि इनका दुरूपयोग किया जाये तो याचिकाकर्ता पे जुर्माना तक किया जा सकता है इनको स्वीकारना या ना स्वीकारना न्यायालय पे निर्भर करता है

इनकी स्वीकृति हेतु सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नियम बनाये है
1. लोकहित से प्रेरित कोई भी व्यक्ति,संगठन इन्हे ला सकता है
2. कोर्ट को दिया गया पोस्टकार्ड भी रिट याचिका मान कर ये जारी की जा सकती है
3. कोर्ट को अधिकार होगा कि वह इस याचिका हेतु सामान्य न्यायालय शुल्क भी माफ कर दे
4. ये राज्य के साथ ही निजी संस्थान के विरूद्ध भी लायी जा सकती है
इसके लाभ
1. इस याचिका से जनता मे स्वयं के अधिकारों तथा न्यायपालिका की भूमिका के बारे मे चेतना बढती है यह मौलिक अधिकारों के क्षेत्र को वृहद बनाती है इसमे व्यक्ति को कई नये अधिकार मिल जाते है
2. यह कार्यपालिका विधायिका को उनके संवैधानिक कर्तव्य करने के लिये बाधित करती है, साथ ही यह भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की सुनिशिचतता करती है
आलोचनाएं 1. ये सामान्य न्यायिक संचालन मे बाधा डालती है
2. इनके दुरूपयोग की प्रवृति परवान पे है
इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने खुद कुछ बन्धन इनके प्रयोग पे लगाये है

न्यायिक सक्रियता[संपादित करें]

न्यायिक सक्रियता का अर्थ न्यायपालिका द्वारा निभायी जाने वाली वह सक्रिय भूमिका है जिसमे राज्य के अन्य अंगों को उनके संवैधानिक कृत्य करने को बाधय करे यदि वे अंग अपने कृत्य संपादित करने मे सफल रहे तो जनतंत्र तथा विधि शासन के लिये न्यायपालिका उनकी शक्तियों भूमिका का निर्वाह सीमित समय के लिये करेगी यह सक्रियता जनतंत्र की शक्ति तथा जन विश्वास को पुर्नस्थापित करती है
इस तरह यह सक्रियता न्यायपालिका पर एक असंवेदनशील/गैर जिम्मेदार शासन के कृत्यों के कारण लादा गया बोझ है यह सक्रियता न्यायिक प्रयास है जो मजबूरी मे किया गया है यह शक्ति उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट के पास ही है ये उनकी पुनरीक्षा तथा रिट क्षेत्राधिकार मे आती है जनहित याचिका को हम न्यायिक सक्रियता का मुख्य माधयम मान सकते है
इसका समर्थन एक सीमित सीमा तक ही किया जा सकता है इसके विरोध के स्वर भी आप कार्य पालिका तथा विधायिका मे सुन सकते है इसके चलते ही हाल ही मे सुप्रीम कोर्ट ने खुद संयम बरतने की बात सवीकारी है तथा कई मामलों मे हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है


संविधान विकास में उच्चतम न्यायालय की भूमिका[संपादित करें]

एक तरफ यह संविधान का संरक्षक, अंतिम व्याख्याकर्ता, मौलिक अधिकारों का रक्षक, केन्द्र-राज्य विवादों मे एक मात्र मध्यस्थ है वहीँ यह संविधान के विकास मे भी भूमिका निभाता रहा है इसने माना है कि निरंतर संवैधानिक विकास होना चाहिए ताकि समाज के हित संवर्धित हो, न्यायिक पुनरीक्षण शक्ति के कारण यह संवैधानिक विकास मे सहायता करता है सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विकास यह है कि भारत मे संविधान सर्वोच्च है इसने संविधान के मूल ढाँचे का अदभुत सिद्धांत दिया है जिसके चलते संविधान काफी सुरक्षित हो गया है इसे मनमाने ढंग से बदला नही जा सकता है इसने मौलिक अधिकारों का विस्तार भी किया है इसने अनु 356 के दुरूपयोग को भी रोका है भारत का उच्चतम न्यायालय इस उक्ति का पालन करता है कि संविधान खुद नहीं बोलता है यह अपनी वाणी न्यायपालिका के माध्यम से बोलता है.

संविधान भाग 6[संपादित करें]

पाठ 1 राज्य कार्यपालिका[संपादित करें]

राज्यपाल
राज्यपाल् कार्यपालिका का प्रमुख होता है वह राज्य मे केन्द्र का प्रतिनिधि होता है तथा राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत ही पद पे बना रहता है वह कभी भी पद से हटाया जा सकता है
उसका पद तथा भूमिका भारतीय राजनीति मे दीर्घ काल से विवाद का कारण रही है जिसके चलते काफी विवाद हुए है सरकारिया आयोग ने अपनी रिपोर्ट मे इस तरह की सिफारिश दी थी
1. एक राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति राज्य के मुख्यमंत्री की सलाह के बाद ही राष्ट्रपति करे
2. वह जीवन के किसी क्षेत्र का महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हो
3. वह राज्य के बाहर का रहने वाला हो
4. वह राजनैतिक रूप से कम से कम पिछले 5 वर्शो से राष्ट्रीय रूप से सक्रिय ना रहा हो तथा नियुक्ति वाले राज्य मे कभी भी सक्रिय ना रहा हो
5. उसे सामान्यत अपने पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने दिया जाये ताकि वह निष्पक्ष रूप से काम कर सके
6. केन्द्र पर सत्तारूढ राजनैतिक गठबन्धन का सद्स्य ऐसे राज्य का राज्यपाल नही बनाया जाये जो विपक्ष द्वारा शासित हो
7. राज्यपाल द्वारा पाक्षिक रिपोर्ट भेजने की प्रथा जारी रहनी चाहिए
8. यदि राज्यपाल राष्ट्रपति को अनु 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा करे तो उसे उन कारणॉ, स्थितियों का वर्णन रिकार्ड मे रखना चाहिए जिनके आधार पे वह इस निष्क़र्ष पे पहुँचा हो

इसके अलावा राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख है जो अपने कर्तव्य मंत्रिपरिषद की सलाह सहायता से करता है परंतु उसकी संवैधानिक स्थिति उसकी मंत्रिपरिषद की तुलना मे बहुत सुरक्षित है वह राष्ट्रपति के समान असहाय नहीं है राष्ट्रपति के पास मात्र विवेकाधीन शक्ति ही है जिसके अलावा वह सदैव प्रभाव का ही प्रयोग करता है किंतु संविधान राजयपाल को प्रभाव तथा शक्ति दोनों देता है उसका पद उतना ही शोभात्मक है उतना ही कार्यातमक भी है
राज्यपाल उन सभी विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग भी करता है जो राष्ट्रपति को मिलती है इसके अलावा वो इन अतिरिक्त शक्तियों का प्रयोग भी करता है
अनु 166[2] के अंर्तगत यदि कोई प्रशन उठता है कि राजयपाल की शक्ति विवेकाधीन है या नहीं तो उसी का निर्णय अंतिम माना जाता है
अनु 166[3] राज्यपाल इन शक्तियों का प्रयोग उन नियमों के निर्माण हेतु कर सकता है जिनसे राज्यकार्यों को सुगमता पूर्वक संचालन हो साथ ही वह मंत्रियों मे कार्य विभाजन भी कर सकता है
अनु 200 के अधीन राज्यपाल अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग राज्य विधायिका द्वारा पारित बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु सुरक्षित रख सकने मे कर सकता है
अनु 356 के अधीन राज्यपाल राष्ट्रपति को राज के प्रशासन को अधिग्रहित करने हेतु निमंत्रण दे सकता है यदि यह संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं चल सकता हो
विशेष विवेकाधीन शक्ति
पंरपरा के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति को भेजी जाने वाली पाक्षिक रिपोर्ट के सम्बन्ध मे निर्णय ले सकता है कुछ राज्यों के राज्यपालों को विशेष उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना होता है विशेष उत्तरदायित्व का अर्थ है कि राज्यपाल मंत्रिपरिषद से सलाह तो ले किंतु इसे मानने हेतु वह बाध्य ना हो और ना ही उसे सलाह लेने की जरूरत पडती हो

राज्य विधायिका[संपादित करें]

संविधान मे 6 राज्यों हेतु द्विसदनीय विधायिका का प्रावधान किया गया है
उपरी सदन स्थापना तथा उन्मूलन अनु 169 के अनुसार यह शक्ति केवल संसद को है
ऊपरी सदन का महत्व –यह सदन प्रथम श्रेणी का नही होता यह विधान सभा द्वारा पारित बिल को अस्वीकृत संशोधित नहीं कर सकता है केवल किसी बिल को ज्यादा से ज्यादा 4 मास के लिये रोक सकता है इसके अलावा मंत्रिपरिषद मे विशेषज्ञों की नियुक्ति हेतु इसका प्रयोग हो सकता है क्योंकि यहाँ मनोनीत सदस्यों की सुविधा भी है
विधायिका की प्रक्रियाएँ तीन प्रकार के बिल धन, फाइनेंस तथा सामान्य होते है, धन बिल संसद की तरह ही पास होते है, फाइनेंस बिल केवल निचले सदन मे ही पेश होते है, सामान्य बिल जो ऊपरी सदन मे पेश होंगे व पारित हो यदि बाद मे निचले सदन मे अस्वीकृत हो जाये तो समाप्त हो जाते है
निचले सदन द्वारा पारित बिल को ऊपरी सदन केवल 3 मास के लिये रोक सकता है उसके बाद वे पारित माने जाते है

राज्य न्यायपालिका[संपादित करें]

राज्य न्यायपालिका मे तीन प्रकार की पीठें होती है एकल जिसके निर्णय को उच्च न्यायालय की डिवीजनल/खंडपीठ/सर्वोच्च न्यायालय मे चुनौती दी जा सकती है
खंड पीठ 2 या 3 जजों के मेल से बनी होती है जिसके निर्णय केवल उच्चतम न्यायालय में चुनौती पा सकते हैं
संवैधानिक/फुल बेंच सभी संवैधानिक व्याख्या से संबधित वाद इस प्रकार की पीठ सुनती है इसमे कम से कम पाँच जज होते हैं

अधीनस्थ न्यायालय[संपादित करें]

इस स्तर पर सिविल आपराधिक मामलों की सुनवाई अलग अलग होती है इस स्तर पर सिविल तथा सेशन कोर्ट अलग अलग होते है इस स्तर के जज सामान्य भर्ती परीक्षा के आधार पर भर्ती होते है उनकी नियुक्ति राज्यपाल राज्य मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर करता है
फास्ट ट्रेक कोर्ट – ये अतिरिक्त सत्र न्यायालय है इनक गठन दीर्घावधि से लंबित अपराध तथा अंडर ट्रायल वादों के तीव्रता से निपटारे हेतु किया गया है
ये अतिरिक्त सत्र न्यायालय है इनक गठन दीर्घावधि से लंबित अपराध तथा अंडर ट्रायल वादों के तीव्रता से निपटारे हेतु किया गया है
इसके पीछे कारण यह था कि वाद लम्बा चलने से न्याय की क्षति होती है तथा न्याय की निरोधक शक्ति कम पड जाती है जेल मे भीड बढ जाती है 10 वे वित्त आयोग की सलाह पर केद्र सरकार ने राज्य सरकारों को 1 अप्रेल 2001 से 1734 फास्ट ट्रेक कोर्ट गठित करने का आदेश दिया अतिरिक्त सेशन जज याँ उंचे पद से सेवानिवृत जज इस प्रकार के कोर्टो मे जज होता है इस प्रकार के कोर्टो मे वाद लंबित करना संभव नहीं होता हैहर वाद को निर्धारित स्मय मे निपटाना होता है
आलोचना 1. निर्धारित संख्या मे गठन नहीं हुआ
2. वादों का निर्णय संक्षिप्त ढँग से होता है जिसमें अभियुक्त को रक्षा करने का पूरा मौका नहीं मिलता है
3. न्यायधीशों हेतु कोई सेवा नियम नहीं है

लोक अदालत -- जनता की अदालतें है ये नियमित कोर्ट से अलग होती है पदेन या सेवानिवृत जज तथा दो सदस्य एक सामाजिक कार्यकता, एक वकील इसके सद्स्य होते है सुनवाई केवल तभी करती है जब दोनों पक्ष इसकी स्वीकृति देते हो ये बीमा दावों क्षतिपूर्ति के रूप वाले वादों को निपता देती है
इनके पास वैधानिक दर्जा होता है वकील पक्ष नहीं प्रस्तुत करते हैं
इनके लाभ – 1.न्यायालय शुल्क नहीं लगते
2. यहाँ प्रक्रिया संहिता/साक्ष्य एक्ट नहीं लागू होते
3. दोनों पक्ष न्यायधीश से सीधे बात कर समझौते पर पहुचँ जाते है
4. इनके निर्णय के खिलाफ अपील नहीं ला सकते है
आलोचनाएँ 1. ये नियमित अंतराल से काम नहीं करती है
2. जब कभी काम पे आती है तो बिना सुनवाई के बडी मात्रा मे मामले निपटा देती है
3. जनता लोक अदालतों की उपस्थिति तथा लाभों के प्रति जागरूक नहीं है

जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति[संपादित करें]

संवैधानिक प्रावधान स्वतः जम्मू तथा कश्मीर पे लागू नहीं होते केवल वहीं प्रावधान जिनमे स्पष्ट रूप से कहा जाए कि वे जम्मू कश्मीर पे लागू होते है उस पर लागू होते है
जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति का ज्ञान इन तथ्यों से होता है
1. जम्मू कश्मीर संविधान सभा द्वारा निर्मित राज्य संविधान से वहाँ का कार्य चलता है ये संविधान जम्मू कश्मीर के लोगों को राज्य की नागरिकता भी देता है केवल इस राज्य के नागरिक ही संपत्ति खरीद सकते है या चुनाव लड सकते है या सरकारी सेवा ले सकते है
2. संसद जम्मू कश्मीर से संबंध रखने वाला ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती है जो इसकी राज्य सूची का विषय हो
3. अवशेष शक्ति जम्मू कश्मीर विधान सभा के पास होती है
4. इस राज्य पर सशस्त्र विद्रोह की दशा मे या वित्तीय संकट की दशा मे आपात काल लागू नहीं होता है
5. संसद राज्य का नाम क्षेत्र सीमा बिना राज्य विधायिका की स्वीकृति के नहीं बदलेगीं
6. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति राज्य मुख्यमंत्री की सलाह के बाद करेगी
7. संसद द्वारा पारित निवारक निरोध नियम राज्य पर अपने आप लागू नहीं होगा
8. राज्य की पृथक दंड संहिता तथा दंड प्रक्रिया संहिता है
९।

केन्द्र राज्य संबंध[संपादित करें]

विधायिका स्तर पर सम्बन्ध[संपादित करें]

संविधान की सातंवी अनुसूची विधायिका के विषय़ केन्द्र राज्य के मध्य विभाजित करती है संघ सूची मे महत्वपूर्ण तथा सर्वाधिक विषय़ है
राज्यों पर केन्द्र का विधान संबंधी नियंत्रण
1. अनु 31[1] के अनुसार राज्य विधायिका को अधिकार देता है कि वे निजी संपत्ति जनहित हेतु विधि बना कर ग्रहित कर ले परंतु ऐसी कोई विधि असंवैधानिक/रद्द नहीं की जायेगी यदि यह अनु 14 व अनु 19 का उल्लघंन करे परंतु यह न्यायिक पुनरीक्षण का पात्र होगा किंतु यदि इस विधि को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु रखा गया और उस से स्वीकृति मिली भी हो तो वह न्यायिक पुनरीक्षा का पात्र नहीं होगा
2. अनु 31[ब] के द्वारा नौवीं अनुसूची भी जोडी गयी है तथा उन सभी अधिनियमों को जो राज्य विधायिका द्वारा पारित हो तथा अनुसूची के अधीन रखें गये हो को भी न्यायिक पुनरीक्षा से छूट मिल जाती है लेकिन यह कार्य संसद की स्वीकृति से होता है
3. अनु 200 राज्य का राज्यपाल धन बिल सहित बिल जिसे राज्य विधायिका ने पास किया हो को राष्ट्रपति की सहमति के लिये आरक्षित कर सकता है
4. अनु 288[2] राज्य विधायिका को करारोपण की शक्ति उन केन्द्रीय अधिकरणों पर नहीं देता जो कि जल संग्रह, विधुत उत्पादन, तथा विधुत उपभोग, वितरण, उपभोग, से संबंधित हो ऐसा बिल पहले राष्ट्रपति की स्वीकृति पायेगा
5. अनु 305[ब] के अनुसार राज्य विधायिकाको शक्ति देता है कि वो अंतराज्य व्यापार वाणिज़्य पर युक्ति निर्बधंन लगाये परंतु राज्य विधायिका मे लाया गया बिल केवल राष्ट्रप्ति की अनुशंसा से ही लाया जा सकता है

केन्द्र राज्य प्रशासनिक संबंध[संपादित करें]


अनु 256 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्तियाँ इस तरह प्रयोग लायी जाये कि संसद द्वारा पारित विधियों का पालन हो सके । इस तरह संसद की विधि के अधीन विधिंयों का पालन हो सके । इस तरह संसद की विधि के अधीन राज्य कार्यपालिका शक्ति आ गयी है । केन्द्र राज्य को ऐसे निर्देश दे सकता है जो इस संबंध मे आवश्यक हो

अनु 257 ----- कुछ मामलों मे राज्य पर केन्द्र नियंत्रण की बात करता है । राज्य कार्यपालिका शक्ति इस तरह प्रयोग ली जाये कि वह संघ कार्यपालिका से संघर्ष ना करे केन्द्र अनेक क्षेत्रों मे राज्य को उसकी कार्यपालिका शक्ति कैसे प्रयोग करे इस पर निर्देश दे सकता है यदि राज्य निर्देश पालन मे असफल रहा तो राज्य मे राष्ट्रपति शासन तक लाया जा सकता है
अनु 258[2] के अनुसार --- संसद को राज्य प्रशासनिक तंत्र को उस तरह प्रयोग लेने की शक्ति देता है जिनसे संघीय विधि पालित हो केन्द्र को अधिकार है कि वह राज्य मे बिना उसकी मर्जी के सेना, केन्द्रीय सुरक्षा बल तैनात कर सकता है

अखिल भारतीय सेवाएँ भी केन्द्र को राज्य प्रशासन पे नियंत्रण प्राप्त करने मे सहायता देती है अनु 262 संसद को अधिकार देता है कि वह अंतराज्य जल विवाद को सुलझाने हेतु विधि का निर्माण करे संसद ने अंतराज्य जल विवाद तथा बोर्ड एक्ट पारित किये थे
अनु 263 राष्ट्राप्ति को शक्ति देता है कि वह अंतराज्य परिषद स्थापित करे ताकि राज्यों के मध्य उत्पन्न मत विभिन्ंता सुलझा सके

निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली/कार्य[संपादित करें]

1 निर्वाचन आयोग के पास यह उत्तरदायित्व है कि वह निर्वाचनॉ का पर्यवेक्षण, निर्देशन तथा आयोजन करवाये वह राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति, संसद,राज्यविधानसभा के चुनाव करता है
2 निर्वाचक नामावली तैयार करवाता है
3 राजनैतिक दलॉ का पंजीकरण करता है
4. राजनैतिक दलॉ का राष्ट्रीय, राज्य स्तर के दलॉ के रूप मे वर्गीकरण, मान्यता देना, दलॉ-निर्दलीयॉ को चुनाव चिन्ह देना
5. सांसद/विधायक की अयोग्यता[दल बदल को छोडकर]पर राष्ट्रपति/राज्यपाल को सलाह देना
6. गलत निर्वाचन उपायॉ का उपयोग करने वाले व्यक्तियॉ को निर्वाचन के लिये अयोग्य घोषित करना
निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ अनु 324[1] निर्वाचन आयोग को निम्न शक्तियाँ देता है
1. सभी निर्वाचनॉ का पर्यवेक्षण, नियंत्रण,आयोजन करवाना
2.सुप्रीम कोर्ट के निर्णयानुसार अनु 324[1] मे निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ कार्यपालिका द्वारा नियंत्रित नहीं हो सकती उसकी शक्तियां केवल उन निर्वाचन संबंधी संवैधानिक उपायों तथा संसद निर्मित निर्वाचन विधि से नियंत्रित होती है निर्वाचन का पर्यवेक्षण, निर्देशन, नियंत्रण तथा आयोजन करवाने की शक्ति मे देश मे मुक्त तथा निष्पक्ष चुनाव आयोजित करवाना भी निहित है जहां कही संसद विधि निर्वाचन के संबंध मे मौन है वहां निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिये निर्वाचन आयोग असीमित शक्ति रखता है यधपि प्राकृतिक न्याय, विधि का शासन तथा उसके द्वारा शक्ति का सदुपयोग होना चाहिए
निर्वाचन आयोग विधायिका निर्मित विधि का उल्लघँन नहीं कर सकता है और न ही ये स्वेच्छापूर्ण कार्य कर सकता है उसके निर्णय न्यायिक पुनरीक्षण के पात्र होते है
निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ निर्वाचन विधियों की पूरक है न कि उन पर प्रभावी तथा वैध प्रक्रिया से बनी विधि के विरूद्ध प्रयोग नही की जा सकती है
यह आयोग चुनाव का कार्यक्रम निर्धारित कर सकता है चुनाव चिन्ह आवंटित करने तथा निष्पक्ष चुनाव करवाने के निर्देश देने की शक्ति रखता है
सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी शक्तियों की व्याख्या करते हुए कहा कि वह एकमात्र अधिकरण है जो चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करे चुनाव करवाना केवल उसी का कार्य है
जनप्रतिनिधित्व एक्ट 1951 के अनु 14,15 भी राष्ट्रपति,राज्यपाल को निर्वाचन अधिसूचना जारी करने का अधिकार निर्वाचन आयोग की सलाह के अनुरूप ही जारी करने का अधिकार देते है

भारत मे निर्वाचन सुधार[संपादित करें]

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम संशोधन 1988 से इस प्रकार के संशोधन किये गये हैं.
1. इलैक्ट्रानिक मतदान मशीन का प्रयोग किया जा सकेगा. वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव मे इनका सर्वत्र प्रयोग हुआ
2. राजनैतिक दलों का निर्वाचन आयोग के पास अनिवार्य पंजीकरण करवाना होगा यदि वह चुनाव लडना चाहे तो कोई दल तभी पंजीकृत होगा जब वह संविधान के मौलिक सिद्धांतों के पालन करे तथा उनका समावेश अपने दलीय संविधान मे करे
3. मतदान केन्द्र पर कब्जा, जाली मत

त्रुटियां[संपादित करें]

परस्पर वीरोधी, मिलकत या संपदा का अधिकार मूल अधिकार रहा । कई साल तक शिक्षा का मूल अधिकार न होकर नीति के निदेशक के कारण भ्रष्टाचार में वृद्धि होती रही ओर गरीब, गरीब होते रहें ।

फेडरेशन तथा कनफेडरेशन का भेद[संपादित करें]

फेडरेशन[संपादित करें]

  1. दो या अधिक संघटको का औपचारिक संगठन
  2. सम्प्रभु तथा स्वतंत्र परंतु उसके संघटक सम्प्रभु तथा स्वतंत्र नही होते
  3. संघटक संघ से स्वतंत्र होने की शक्ति नही रखते है
  4. संघ तथा उसके निवासियो के मध्य वैधानिक सम्बन्ध होता है [नागरिकता] नागरिको के अधिकार तथा कर्तव्य होते है

कनफेडरेशन[संपादित करें]

  1. दो या अधिक संघटको का ढीला संघठन [रास्त्र मन्डल ]
  2. संघटक सम्प्रभु तथा स्वतंत्र होते है परंतु खुद कनफेडरेशन मे ये गुण नही होते है
  3. संघटक स्वतंत्र होने की शक्ति रखते है
  4. निवासी परिसंघ के नागरिक नही होते बल्कि उसके संघट्को के नागरिक होते है

शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत[संपादित करें]

यह सिद्धांत फ्रेंच दार्शनिक मान्टेस्कयू ने दिया था उसके अनुसार राज्य की शक्ति उसके तीन भागो कार्य, विधान, तथा न्यायपालिकाओ मे बांट देनी चाहिये
ये सिद्धांत राज्य को सर्वाधिकारवादी होने से बचा सकता है तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है
अमेरिकी सविन्धान पहला ऐसा सविन्धान था जिस मे ये सिद्धांत अपनाया गया था
शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत भारतीय सविन्धान मे------ सविन्धान मे इसका साफ वर्णन ना होकर सकेत मात्र है इस हेतु सविन्धान मे तीनो अंगो का पृथक वर्णन है संसदीय लोकतंत्र होने के कारण भारत मे कार्यपालिका तथा विधायिका मे पूरा अलगाव नही हो सका है कार्यपालिका[मंत्रीपरिषद] विधायिका मे से ही चुनी जाती है तथा उसके निचले सदन के प्रति ही उत्तरदायी होती है
अनु 51 के अनुसार कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को पृथक होना चाहिए इस लिये ही 1973 मे दंड प्रक्रिया सन्हिता पारित की गयी जिस के द्वारा जिला मजिस्टृटो की न्यायिक शक्ति लेकर न्यायिक मजिस्टृटो को दे दी गयी थी