भारत का आर्थिक इतिहास
भारत एक समय मे सोने की चिडिया कहलाता था। अंगस मैडिसन (Angus Maddison) नामक आर्थिक इतिहासकार ने अपनी पुस्तक 'द वर्ड इकनॉमी : अ इलेनिअल परस्पेक्टिव' में कहा है कि पहली शती से लेकर दसवीं सदी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। पहली शदी में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) विश्व के कुल जीडीपी का 32.9%% था ; सन् १००० में यह 28.9% था ; और सन् १७०० में 24.4% था।
भारत की अर्थव्यवस्था को मोटे तौर पर तीन भागों मे बांटा जा सकता है:
- ब्रिटिश काल से पहले
- ब्रिटिश काल मे
- आज़ादी के बाद
अनुक्रम |
[संपादित करें] ब्रिटिश काल के पूर्व भारत में उद्योग-धंधे
[संपादित करें] वस्त्र उद्योग
वस्त्र उद्योग में सूती, ऊनी और सिल्क प्रमुख थे। सूती वस्त्र उद्योग बड़ा व्यापक था। इस उद्योग में बहुत से लोग लगे हुए थे। कपास का धुनना और कातना आमतौर पर घरों में ही होता था, परन्तु किन्हीं क्षेत्रों में इस कार्य में विशिष्टता प्राप्त हो गई थी। बारीक से बारीक सूत काता जाता था। थेवेनॉट को अहमदाबाद के समीप कारीगरों का एक समूह मिला जिसका कोई निश्चित घर था और जो एक गाँव से दूसरे गाँव को काम की तलाश में जाता था। यह बिनौलों से कपड़ा निकालने, रूई को साफ करने और धुनने का कार्य करते थे। भारत के ग्रामों मे ही नहीं, बड़े बड़े नगरों में जुलाहे परिवार रहते थे जो वस्त्रनिर्माण का कार्य करते थे। तैयार कपड़े को धोने का कार्य धोबी करते थे जो वस्त्र-निर्माण का कार्य करते थे। तैयार कपड़े को धोने का कार्य धोबी करते थे। तैयार कपड़े को धोने के लिए पहले गर्म पानी में औटाया जाता था। इसके पश्चात उसे धोया और धूप में सुखाया जाता था। मोटे कपड़े को धोते समय धोबी उसे पत्थर पर पीटते थे। बारीक कपड़ों को पीटा नहीं जाता था। उसे धूप में सुखाने के लिये फैला दिया जाता था। कपड़ा धोने के लिये विशेष प्रकार के पानी की आवश्यकता पड़ती थी। नर्मदा नदी का पानी कपड़े की धुलाई के लिये इस नदी के पानी में लाया जाता था। नर्मदा नदी के तट पर बसा भड़ौंच नगर कपड़े की धुलाई के लिए प्रसिद्ध था। इस प्रकार ढाका के समीपवर्ती क्षेत्रों में बहुत से धोबी रहते थे, क्योंकि यहाँ का पानी कपड़े धोने के बड़ा उपर्युक्त था। कपड़े को नील से डाई किया जाता था। भारतीय कपडें की विदेशी में बड़ी माँग थी। विश्व के लगभग हर भाग में भारत से कपड़ा जाता था। ढाका की मलमल संसार-प्रसिद्ध थी। इसका धागा बहुत बारीक होता था जो चर्खे पर हाथ से काता जाता था। मलमल का थान एक अँगूठी के बीच से निकल सकता था। यूरोपीय यात्रियों ने इसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की है। उच्च कोटि सी मलमल विभिन्न नामों के पुकारी जाती थी, जैसे मलमल खास (बादशाह की मलमल), सरकारें आली (नवाब की मलमल), आबे खाँ (बहता हुआ पानी) इत्यादि। भड़ौच में निर्मित `बफ्ता' वस्त्र की सारे देश और विदेशों में बड़ी मांग थी। यात्री टेवरनियर ने `बफ्ता' विभिन्न रंगों में रंगा जाता था। रँगने के लिये इसे आगरा और अहमदाबाद लाया जाता था। `बफ्ता' की लम्बाई १५ गज और चौड़ाई २५ इंच होती थी। अधिक चौड़ाई का `बफ्ता' ३६ इंच चौड़ा होता था। सफेद कपड़े का जिसे अँग्रेज व्यापारी `केलिको' कहते थे, बड़ी मात्रा में निर्माण होता था। इसके अतिरिक्त बढ़िया और कीमती कपड़े का भी निर्माण होता था। इसमें सोने और चाँदी के तार पड़े होते थे। सूरत, आगरा, बनारस और अहमदाबाद इस प्रकार के वस्त्र निर्माण के प्रमुख केन्द्र थे।
प्रिण्टेड कपड़े की भी बड़ी माँग थी। कपड़े पर प्रिन्ट या तो हाथ से ब्रुश की सहायता से किया जाता था, या लकड़ी पर बने छापे द्वारा, जिस पर ब्लाक बना होता था। कपड़ा जिस पर ब्रुश से प्रिन्ट किया जाता था, `कलमदार' या `कलमकार' कपड़ा कहलाता था। दूसरा तरीका, लकड़ी पर खोदकर छापा बना लिया जाता था, उसे रँग में भिगोकर कपड़े पर लगा दिया जाता था। इंगलिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के व्यापारी इस कपड़े को `प्रिन्ट' या `चिन्ट' के नाम से पुकारते थे लकड़ी के छापे की अपेक्षा हाथ से ब्रुश की सहायता से प्रिन्ट करना कठिन था।
बच्चे आमतौर पर बड़ों की `प्रिन्ट' के कार्य में सहायता करते थे। १६७० ई। में फायर कोरोमण्डल तट की वर्णन करते हुए लिखा है-- "पेंटिंग का काम बड़ो के साथ-साथ छोटे बच्चों द्वारा भी किया जाता है। वे कपड़े को जमीन पर फैलाते हैं और अनेक प्रकार से बड़ों की इस कार्य में सहायता करते हैं। "पेंटिंग का कार्य आमतौर पर लकड़ी की बनी मेज पर या तख्ते पर होता था। वर्कशाप अधिकतर खुली जगह में होती थीं और ऊपर शेड पड़ा होता था। प्रिन्टेड क्लाथ के लिए कारोमण्डल तट बड़ा प्रसिद्ध था। यहाँ कपड़ा अन्य स्थानों की अपेक्षा सस्ता, अच्छा और चमकदार होता था।
ऊनी वस्त्र उद्योग के केन्द्र कश्मीर, काबूल, आगरा, लाहौर और पटना थे। कश्मीर के शाल, कम्बल, पट्टू और पश्मीना प्रसिद्ध थे। फतेहपुर सीकरी में ऊनी दरियाँ बनती थी। ऊनी वस्त्रों का प्रयोग सामान्यत: धनी वर्ग करता था। कीमत अधिक होने के कारण ऊनी वस्त्र का प्रयोग जन-साधारण की सामार्थ्य से बाहर था। जन-साधारण के लिये सस्ते और खुरदरे कम्बलों का निर्माण किया जाता था। इंगलिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इंगलैड में बनी ऊनी कपड़े के लिये भारत में बाजार बनाने का प्रयत्न किया, परन्तु उसे इसमें अधिक सफलता नहीं मिली।
सिल्क उद्योग के लिए बनारस, अहमदाबाद और मुर्शिदाबाद प्रमुख थे। बंगाल से न केवल बड़ी मात्रा में सिल्क का निर्यात होता था, बल्कि सिल्क का कपड़ा भी बनता था। बनारस सिल्क की साड़ी और सिल्क पर जरी के कार्य के लिये प्रसिद्ध था। सूरत में सिल्क की दरियां बनती थी। सिल्क के कपड़े पर जरी का काम भी सुरत में होता था।
देश-विदेश में भारतीय कपड़े की बड़ी माँग थी। भारतीय वस्त्र उद्योग संसार के विभिन्न भागों की कपड़े की माँग की पूर्ति करता था। यूरोपीय व्यापारियों के कारण भारतीय कपड़े के निर्यात को बड़ा बढ़ावा मिला। यूरोप भारतीय कपड़े की खपत का प्रमुख केन्द्र बन गया। कपड़े की माँग की पूर्ति स्थानीय बजाज करते थे। वे बड़े व्यापारियों से कपड़ा खरीदते थे। कपड़े को छोटे विक्रेता फेरी वाले थे जो न केवल नगर की गलियों में कपड़ा बेचते थे, बल्कि गाँव में भी कपड़े बेचते थे। गाँव में साप्ताहिक हाट या पेंठ लगती थी जहाँ बजाज कपड़ा बेचते थे। स्थिति को देखते हुए वे आम तौर पर नगद पैसा लेने की माँग नहीं करते थे। और खरीदार किसान फसल के समय उधार धन चुकाता था। कभी-कभी जुलाहे अपना कपड़ा लाकर बाजार में बेचते थे। कासिम बाजार के आस-पास रहने वाले जुलाहे अपना कपड़ा बेचने के लिए नगर के बाजार में लाते थे।
[संपादित करें] आभूषण उद्योग
देश में आभूषण पहनने का आम रिवाज था। आजकल की तरह आभूषण पहनना सामाजिक प्रतिष्ठा का चिन्ह था। बादशाह, शाही परिवार एवं सामंत वर्ग रत्नजटिल आभूषणों का प्रयोग करता था। भारतीय नारी की आभूषण-प्रियता संसारप्रसिद्ध है। आभूषणों के निर्माण में निपुण कारीगर लगे हुए थे। आभूषण उद्योग देशव्यापी था। नारी के शरीर के विभिन्न अंगों के लिये अलग-अलग आभूषण थे। मुगलकाल में विभिन्न अंगों में पहनने के लिये निम्नलिखित आभूषणों का प्रचलन था-
सीसफूल सिर का आभूषण था। माथे के आभूषण था। माथे के आभूषण टीका या माँगटीका, झूमर और बिन्दी थे। माथे पर बिन्दी लगाने का आम रिवाज था और बिन्दी में मोती जड़े होते थे। आभूषण थे। गले के आभूषण हार, चन्द्रहार, माला मोहनमाला, माणिक्य माला, चम्पाकली, हँसली, दुलारी, तिलारी, चौसर, पँचलरा और सतलरा थे। दुलारी दो लड़ों, तिलारी तीन लड़ों, चौसर चार लड़ों, पँचलरा पाँच लड़ों और सतलरा सात लड़ों का आभूषण था। कमर का आभूषण तगड़ी या करधनी था। इसमें घुँघरू लगे होते थे जो चलते समय बजते थे। अँगूठी या मूँदरी अँगूली का आभूषण था जिसका बड़ा प्रचलन था। आरसी अँगूठे का आभूषण था, इसमें एक दर्पण लगा होता था। जिसमें मुँह देखा जा सकता था। पौंची, कंगन, कड़ा, चूड़ी और दस्तबन्द कलाई के आभूषण थे। भुजा के आभूँषण बाजूबन्द या भुजबन्द थे। बाजुबन्द का संस्कृत नाम भुजबन्द था। पैरों के आभूषण पाजेब, कड़ा थे। पैरों की अँगुलियों में बिछुए पहने जाते थे। पैरों के आभूषण आमतौर पर चाँदी के बने होते थे, जबकि दूसरे आभूषण सोने के बनते थे। गरीब लोग चाँदी के आभूषण पहनते थे।
बहुमुल्य रत्नों का विदेशों से आयात भी होता था और दक्षिण भारत की खानों से भी हीरे निकाले जाते थे। टेवरनियर हीरों का एक प्रसिद्ध व्यापारी था। दक्षिण भारत में हीरों की एक खान का वर्णन करते हुए टेवरनियर लिखता है कि इसमें हजारों की संख्या में मजदूर काम करते थे। भूमि के एक बड़े प्लाट को खोदा जाता था। आदमी इसे खोदते थे, स्त्रियांॅ और बच्चे उस मिट्टी को एक स्थान पर ले जाते थे। जो चारों ओर दीवारों से घिरा होता था। मिट्टी के घड़ों में पानी लाकर उस मिट्टी को धोया जाता था। ऊपरी मिट्टी दीवार में छेदों के द्वारा बहा दी जाती थी और रेत बच रहता था। इस प्रकार जो तत्त्व बचता था, उसे लकड़ी डण्डों से पीटा जाता था और अंत से हाथ से हीरे चुन लिये जाते थे।
मजदूरों को बहुत कम मजदूरी मिलती थी। टेवरनियर के अनुसार मजदूरी ३ पेगोडा वार्षिक थी। हीरे चोरी न हो जायें, इसके लिए ५० मजदूरों पर निगरानी रखने के लिए १२ से १५ तक चौकीदार होते थे। टेवरनियर एक घटना का वर्णन करता है जबकि एक मजदूर ने एक हीरे को अपनी आँखों के पलक के नीचे छुपा लिया था। लकड़ी का काम
जहाज, नावें, रथ और बैलगाड़ियाँ इत्यादि बनाने में लकड़ी का प्रयोग होता था। सूरत में पारसी लोग नावें और जहाज बनाने के कार्य में लगे हुए थे। मैसूर में सन्दल की लकड़ी पर सुन्दर कारीगरी का कार्य होता था। भवन-निर्माण में भी लकड़ी का प्रयोग होता था। माल ढोने में बैलगाड़ियों का प्रयोग होता था, इस कारण बड़ी संख्या में इनका निर्माण होता था। पालकी बनाने में भी लकड़ी का प्रयोग होता था। धनवान व्यक्ति और स्त्रियां पालकी में सवारी करते थे। नदियों में नावों द्वारा माल ले जाया जाता था। इससे प्रतीत होता है कि नावों का बड़ी संख्या में निर्माण होता था। फिंच ने आगरा से बंगाल तक १८० नावों के बेड़े के साथ यात्रा की थी। ये नावें छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की थी। गंगा पर ४०० से ५०० टन क्षमता वाले नावें चलती थीं। सूरत, गोवा, बेसीन, ढाका, चटगाँव, मसुलीपट्टम, आगरा, लाहौर और इलाहाबाद इत्यादि में नावें और जहाज बनाये जाते थे। काश्मीर लकड़ी की सुन्दर डिजायनदार चीजें बनाने के लिए प्रसिद्ध था।
[संपादित करें] इमारती सामान एवं भवन-निर्माण
भवन निर्माण में ईंट, पत्थर, चूना, लकड़ी और मिट्टी का प्रयोग होता था। `आइने-अकबरी' में भवन निर्माण में काम आने वाली विभिन्न वस्तुओं के मूल्य दिये हुए है। आईन के अनुसार ईटें तीन प्रकार की होती थी--पकी हुई, अधपकी और कच्ची। इनका मूल्य क्रमश: ३० दाम, २४ दाम और १० दाम प्रति हजार था। लाल पत्थर का मूल्य ३ दाम प्रति मन था। कुशल कारीगर पत्थर को तराशनने का कार्य करते थे। साधारण जनता के मकान मिट्टी के बने होते थे और उन पर छप्पर पड़ा होता था। मिट्टी की बनी इन छोटी कोठरियों में परिवार के सब सदस्य रहते थे। इतना ही नहीं, उनके पशु गाय, बछड़ा भी उसी में रहते थे। परन्तु धनवान व्यक्ति शानदार मकानों में रहते थे। आगरा, दिल्ली और प्रान्तीय राजधानियों में अनेक विशाल भवन बनाये गये जिनका निर्माण कुशल कारीगरों ने किया और जिसके फलस्वरूप अनेक राजों, मजदूरों, पत्थरतराशों, बढ़ई एवं अन्य कारीगरों को रोजगार मिला।
मुगल शासक महान् भवन-निर्माता थे। बाबर ने बहुत-सी इमारतें बनवायें, किन्तु उनमें से केवल दो, पानीपत का काबूल बाग और संभल की जामा मस्जिद आज भी मौजूद है। बाबर के शब्दों में - "मेरे आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा कोल के भवनों के निर्माण में १४९१ पत्थर काटने वाले रोजाना कार्य करते थे।"
हुमायूँ का जीवन संघर्षमय रहा, फिर भी उसने पंजाब के हिसार जिले में फतेहाबाद में एक सुन्दर मस्जिद बनवायी। शेरशाह के भवनों में उसका सहसराम का मकबरा और पुराने किले में बनी `किलाए कुहना मस्जिद' प्रसिद्ध हैं। इनमें जामा मस्जिद और बुलन्द दरवाजा बड़े प्रसिद्ध हैं। अन्य भवन `बीरबल का महल' सुनहला मकान या शाहजादी अम्बर का महल, तुर्की सुल्ताना का महल और दीवाने खास हैं। सिकन्दरा में अकबर का मकबरा भवन-निर्माण कला का अच्छा उदाहरण है। अकबर ने आगरा और लाहौर में किलों का निर्माण कराया। आगरा के किले में प्रमुख भवन दीवाने आम, दीवाने खास और जहाँगीरी महल है। जहाँगीर की रूची भवन-निर्माण की अपेक्षा चित्रकला की ओर अधिक थी, परन्तु उसकी कमी की पूर्ति उसकी प्रिय बेगम नूरजहाँ ने की। नूरजहाँ ने अपने पिता की स्मृति में `इत्तमाद्-उद्दौला' का मकबरा बनवाया। यह संगमरमर का बना है और देखने में बड़ा सुन्दर है। नूरजहाँ ने लाहौर के समीप शाहदरे में जहाँगीर का मकबरा बनवाया।
मुगल बादशाहों में शाहजहाँ सबसे महान् भवन-निर्माता था। उसके प्रसिद्ध भवन दिल्ली का लाल किला, जामा मस्जिद और ताजमहल हैं। लाल किले में दीवाने खास सबसे अधिक सुन्दर और अलंकृत है। यहाँ एक खुदे लेख में इसकी सुन्दरता का वर्णन इन शब्दों में किया गया है--
गर फिरदौस बर रूये जमीं अस्त।
हमीं अस्तों हमीं अस्तों, हमीं अस्त।।
यानी, यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो वह यही है, यही है और यही है। शाहजहाँ ने ताजमहल अपनी प्रिय बेगम अर्जमन्द बानू की स्मृति में बनवाया। ताजमहल को बनाने और इसका नक्शा तैयार करने के लिये देश-विदेश के कारीगरों को बुलाया गया। ताजमहल के कई नक्शे प्रस्तुत किये गये और बादशाह ने अंत में एक नक्शे पर अपनी स्वीकृति प्रदान की। पहले ताजमहल का छोटा-सा मॉडल लकड़ी का बनाया गया। जिसे देखकर कारीगरों ने ताज का निर्माण किया। ताजमहल उस्ताद ईसा की देखरेख में तैयार किया गया जिसे १००० रु। मासिक वेतन मिलता था। इसके निर्माण पर ५० लाख रु। खर्च हुआ। औरंगजेब ने लाल किले में अपने प्रयोग के लिये मोती मस्जिद बनवायी और लाहौर में बादशाही मस्जिद का निर्माण कराया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल निर्माण कला का ह्रास हो गया।
[संपादित करें] चमड़ा उद्योग
चमड़ा जूते बनाने, घोड़ों की जीन, पानी भरने की मशक इत्यादि विभिन्न कार्यो में प्रयोग किया जाता था। दिल्ली चमड़ा उद्योग के लिये प्रसिद्ध था। चमड़ा पशुओं के खाल से प्राप्त किया जाता था। स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये यह उद्योग सारे देश में फैला हुआ था।
[संपादित करें] मिट्टी के बर्तन
प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग होता आया है। कुम्हार मिट्टी के बर्तन, पानी पीने के लिये मटके और विभिन्न प्रकार के कलात्मक खिलौने बनाते थे। यह उद्योग सारे देश में फैला हुआ था। जयपुर, बनारस, लखनऊ, दिल्ली, ग्वालियर इस उद्योग के मुख्य केन्द्र थे।
[संपादित करें] हाथीदाँत का काम
हाथी के दाँत की सुन्दर कलात्मक वस्तुएं बनायी जाती थीं, जैसे चूड़ियाँ, कंगन, शतरंज और शतरंज के मोहरे। विभिन्न प्रकार के खिलौने हाथीदाँत से बनाये जाते थे। दिल्ली और मुल्तान हाथी दाँत के काम के लिये प्रसिद्ध थे।
[संपादित करें] तेल और इत्र
तेल कोल्हू से पेर निकाला जाता था। किसानों के घरेलू उद्योग से निकल कर यह भी एक व्यावसायिक उद्योग बन गया था। तेली इस कार्य को करते थे। कोल्हू को चलाने में बैल का प्रयोग किया जाता था। तेल को बाजार में अथवा तेल व्यापारियों को बेच दिया जाता था। तेल सरसों, तिल, गोला आदि का निकाला जाता था। इत्र का भी निर्माण किया जाता था। बनारस, लाहौर और कैम्बे इत्र-निर्माण के केन्द्र थे।
[संपादित करें] चीनी-उद्योग
चीनी, गुड़, राब, गन्ने को कोल्हू से पेर कर बनायी जाती थी। गन्ने के रस को लोहे या मिट्टी के मटकों में भरकर आग पर गर्म किया जाता था। गन्ने की खोई गर्म करने के काम आती थी। इस प्रकार गुड़ और बूरे का निर्माण किया जाता था। आरम्भ में यह किसान परिवार का घरेलू उद्योग था। बाद में इस उद्योग ने विशिष्टता प्राप्त कर ली। देश में गुड़ और चीनी की बड़ी खपत थी। गन्ने की पैदावार उत्तर भारत के विस्तृत भू-भाग में होती थी। इस प्रकार यह उद्योग देशव्यापी था, फिर भी इस उद्योग के प्रमुख केन्द्र दिल्ली, आगरा बयाना, पटना, बरार और लाहौर थे। अंग्रेज और डल व्यापारी भारत से चीनी का निर्यात करते थे।
[संपादित करें] धातु उद्योग
[संपादित करें] लोहा
लोहा विभिन्न कार्यो में प्रयुक्त होता था। लोहे का प्रयोग प्रमुख रूप से हथियार बनाने के लिये होता था। यह हथियार आक्रमण और सुरक्षात्मक दोनों प्रकार के होते थे। बन्दूक, तोप, तलवार, भाले, कवच लोहे के बनते थे। गाँव में लोहार होता था जो ग्रामवासियों की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। खेती के औजार मुख्य रूप से लोहे से बने होते थे। किसानों के अतिरिक्त अन्य लोगों, जैसे लोहार, बढ़ई, राज, मजदूर, दर्जी, तेली, हलवाई, माली, कसाई, नाई को अपने कार्यों के लिये जिन औजारों की आवश्यकता होती थी, वे पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से लोहे के बने होते थे। घरेलू बर्तन जैसे कढ़ाई, करछरी, चिमटा और तथा इत्यादि लोहे के बने होते थे। घरेलू उपयोग में काम आने वाला चाकू लोहे का बना होता था। गोलकुण्डा में उच्चकोटि का लोहा और स्टील का निर्माण होता था। कालिंजर, ग्वालियर, कुमायूँ, सुकेत मण्डी (लाहौर) में लोहे की खानें थीं।
[संपादित करें] ब्रिटिश काल में भारत की अर्थव्यवस्था
[संपादित करें] स्वतंत्रत भारत की अर्थव्यवस्था
आज़ादी के बाद भारत के तत्कलीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने निर्गुट आन्दोलन (नॉन-अलाइंड मूव्मेंट) को भारत की प्रमुख विदेश नीति बनाया । इस दौरान भारत ने सोवियत रूस से दोस्ती बढयी । सोवियत रूस मे समाजवाद था । यूँ तो भारत ने समाज वाद को पूरी तरह से नही अप्नाया पर भारत की आर्थिक नीति मे समाज वाद के लक्शण साफ देखेय जा सक्ते थे । भारत मे ज्यादा तर उद्योगो को सरकारी नियंत्रण के अंतर्गत रक्खे जाने के लिये कयी तरह के मियम बनये गये। इस तरनह की नीति को कयी अर्थ्शास्त्रियोँ ने लाइसेंस राज और इंस्पेक्ट अर रज का नाम दिया । बिजली , सडकेँ, पानी, टेलीफोन, रेल यातायात, हवई यातायात, होटल, एन सभी पे सरकारी नियंत्रण था । या तो निजी क्शेत्र को इन उद्योगो मे पूंजी निवेश की अनुमती नही थी या फिर बहुत ही नियंत्रित अनुमती थी । दूसअरे कयी उद्योगो मे (जैसे खिलौने बनाना, रीटेल, वगैरह ) बडी निजी कम्पनियो को पूंजी निवेश की अनुमती नही थी । बैंको को भे सरकारी नियंत्रण मे रखा जाता था ।
1951 से 1979 तक भारतीय आर्थिक विकास दर 3.1 प्रतिशत थी । पर कैपिटा विकास दर 1.0% थी । विश्व मे इसे 'हिन्दू ग्रोथ रेट' के नाम से जाना जाता था । भारतीय उद्योगो का विकास दर 5.4 प्रतिशत था । कृषि विकास दर 3.0 प्रतिशत था । कई कारणो से भारत की आर्थिक विकास बहुत कम था। मुख्य कारण थे-
- कृषि उद्योग मे संस्थागत कमियाँ
- देश मे कम तकनीकी विकास
- भारत की अर्थव्यवस्था का विश्व के दूसरे विकासशील देशो से एकीकृत (इंटिग्रेटेड) न होना
- बंग्लादेशी शरणार्थियों की देश मे बाढ़
- 1965, 1966, 1971, और 1972 पडे हुए चार सूखे
- देश के वित्तीय संस्थानो का पिछ्डा हुआ होना
- विदेशी पूंजी निवेश पर सरकारी रोक
- शेयर बाज़ार मे अनेक बडे और छोटे घपले
- कम साक्षरता दर
- कम पढी-लिखी भारी जंसंख्या
भारत मे सन 1985 से भुगतान संतुलन (बैलैंस औफ पेमेंट) की समस्या शुरू हुई । 1991 मे चन्द्रशेखर सरकार के शासन के दौरान भारत मे बैलैंस औफ पेमेंट की समस्या ने विकराल रूप धारण किया और भारत की पहले से चर्मरायी हुई अर्थ्व्यवस्था घुट्नो पे आ गयी । भारत मे विदेशी मुद्रा का भंडार केवल तीन हफ्ते के आयातो के बराबर रह गया। ये एक बहुत ही गम्भीर समस्या थी ।
[संपादित करें] 1990 के बाद
नरसिंह राव के नेतृत्व वाली भारतीय सरकार ने भारत मे बडे पैमाने मे आर्थिक सुधार करने का फैसला किया । उदारीकरण कह्लाने वाले इन सुधारो के आर्किटेक्ट थे मनमोहन सिंह । मन्मोहन सिन्ह ने आने वाले समय मे भारत की अर्थ्नीति को पूरी तरह से बदल्ने की शुरुआत की । उंके किये हुए आर्थिक सुधार मेंली तीन क्श्रेणियो मे आते है
- उदारीकरण (लिब्रलाइज़ेशन)
- वैश्वीकरण (ग्लोबलाइज़ेशन)
- निजीकरण (प्राइवेटाइज़ेशन)
1996 से 1998 तक पी चिदम्बरम भारत के वित्त मंत्री हुए और उन्होने मनमोहन सिंह की नीतियो को आगे बढाया ।
1998 से 2004 तक देश मे भार्तीय जंता पार्टी की सरकार ने और भी ज़्यादा उदारीकरण और निजीकरण किया।
इस्के बाद 2004 मे आधुनिक भारत की अर्थ्नीति के रचयिता मन्मोहन सिन्ह भारत के प्रधान्मंत्री बने और पी चिदम्बरम वित्त मंत्री ।
इन सभी सालो मे भारत ने कफी तेज़ तरक्की की । अर्थ्व्यवस्था मे आमूल-चूल परिवर्तन हुए और भारत ने विश्व अर्थ्व्यवस्था मे अपना स्थान बनाना शुरू किया।
[संपादित करें] इन्हें भी देखें
- प्राचीन भारत की आर्थिक संस्थाएं
- भारतीय कृषि का इतिहास
- ब्रिटिश काल में भारत की अर्थव्यवस्था
- भारत में जमींदारी उन्मूलन
- भारत में बैंकिंग
- भारत का आर्थिक सुधार
- भारत में भ्रष्टाचार
- विश्व का आर्थिक इतिहास
[संपादित करें] वाह्य सूत्र
- भारतीय अर्थव्यवस्था के उतार चढ़ाव - बीबीसी पर भारत का विस्तृत इतिहास
- सन १७५० से १९१३ के दौरान विश्व की सम्पूर्ण निर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) में विभिन्न देशों का प्रतिशत भागीदारी की सूची
- आधुनिक भारत का आर्थिक इतिहास (गूगल पुस्तक ; लेखक - धनपत पाण्डेय)
- प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास (गूगल पुस्तक ; लेखक - ओमप्रकाश प्रसाद)
- आधुनिक भारत का आर्थिक इतिहास (गूगल पुस्तक ; लेखक - प्रो श्रीधर पाण्डेय)
- Economic History of India
- ‘विश्व अर्थव्यवस्था को भारत का सहारा’
- भारत की भौतिक उन्नति का मार्ग
- आर्थिक सुधारों के दो दशक
- भारत का विचार और ग्राम विकास
- अगर हम कभी अमीर थे, तो आज गरीब क्यों?
- ब्रिटेन ने लूटा भारत का 1000 करोड़ का बेशकीमती खज़ाना !
- भारत की भौतिक उन्नति का मार्ग
- जिस रास्ते से अंग्रेजी आई उसे तो जानो (डा. अजित गुप्ता)