वैराग्यशतकम्

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वैराग्यशतकम् भर्तृहरि के तीन प्रसिद्ध शतकों जिन्हें कि शतकत्रय कहा जाता है, में से एक है। इसमें वैराग्य सम्बन्धी सौ श्लोक हैं। शतकत्रय में अन्य दो हैं- शृंगारशतकम्नीतिशतकम्


थीम[संपादित करें]

पानी की तरंग और बुलबुले के समान इस चंचल और नश्वर जीवन में प्राणियों को भला सुख कहाँ मिल सकता है। वृद्धावस्था में जीर्ण तथा झुर्रियों वाले अंगों से युक्त होकर मनुष्य नर के समान परदे के पीछे चला जाता है - भोगों को भोगना समाप्त नहीं होता अपितु व्यक्ति ही समाप्त हो जाता है - "भोगा न भुक्ता, वयमेव भुक्ताः"। इस प्रकार भृतहरि ने यहाँ संसार की आसारता और वैराग्य के महत्त्व का प्रतिपादन किया है। इस शतक में काव्य-प्रतिभा और दार्शनिकता का अद्भुत समन्वय किया गया है। इसमें सांसारिक आकर्षणों और भोगों के प्रति उदासीनता के उभरते हुये भावों का चित्रण दिखायी देता है। कवि की तो यही कामना है कि किसी पुण्यमय अरण्य में शिव-शिव का उच्चारण करते हुये उसका समय बीतता जाये।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]