प्रतिमानाटक

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प्रतिमानाटक, संस्कृत का प्रसिद्ध नाटक है। यह भास के सर्वोत्तम नाटकों में से एक है। सात अंकों के इस नाटक में भास की कला पर्याप्त ऊँचाईं को प्राप्त कर चुकी है। इसमें भास ने राम वनगमन से लेकर रावणवध तथा राम राज्याभिषेक तक की घटनाओं को स्थान दिया है। महाराज दशरथ की मृत्यु के उपरान्त ननिहाल से लौट रहे भरत अयोध्या के पास मार्ग में स्थित देवकुल में पूर्वजों की प्रतिमायें देखते हैं , वहाँ दशरथ की प्रतिमा देखकर वे उनकी मृत्यु का अनुमान कर लेते हैं। प्रतिमा दर्शन की घटना प्रधान होने से इसका नाम प्रतिमा नाटक रखा गया है।

इस नाटक में भास ने पात्रों का चारित्रिक उत्कर्ष दिखाने का भरसक प्रयास किया है। इतिवृत्त तथा चरित्रचित्रण दोनों दृष्टियों से यह नाटक सफल हुआ है। भावों के अनुकूल भाषा तथा लघु विस्तारी वाक्य भास के नाटकों की अपनी विशेषताएँ हैं। यह करुण रस प्रधान नाटक है तथा अन्य रस इसी में सहायक बनकर आये हैं।

प्रतिमा निर्माण की कथा भास की अपनी मौलिकता है। भास ने इस नाटक में मौलिकता लाने में प्रचलित रामचरित से पर्याप्त पार्थक्य ला दिया है। यद्यपि ये सारी घटनायें प्रचलित कथा से भिन्न हैं , पर नाटकीय दृष्टि से इनका महत्व सुतरां ऊँचा है और पाठक अथवा दर्शक की कौतुहल वृद्धि में ये घटनायें सहायक हुई हैं। इस नाटक में रामायणीय कथा से भिन्नतायें इस प्रकार हैं - प्रथम अंक में सीता द्वारा परिहास में वल्कल पहनना भास की मौलिकता है। तृतीय अंक में प्रतिमा का सम्पूर्ण प्रकरण ही कवि कल्पित है और यह कल्पना ही नाटक की आधारभूमि बनायी गयी है। पाँचवें अंक में सीता का हरण भी यहाँ नवीन ढंग से बताया गया है।

यहाँ राम के उटज में वर्तमान रहने पर ही रावण वहाँ आता है और दशरथ के श्राद्ध के लिए उन्हें कांचनपार्श्व मृग लाने को कहता है तथा उन्हें कांचन मृग दिखाकर दूर हटाता है। यह सम्पूर्ण प्रसंग नाटककार द्वारा गढ़ा गया है। पांचवें अंक में सुमंत्र का वन में जाना तथा लौटकर भरत से सीताहरण बताना कवि कल्पना का प्रसाद है। कैकयी द्वारा यह कहना भी कि उसने ऋषिवचन सत्य करने के लिए राम को वन भेजा, भास की प्रसृति है। अन्ततः सप्तम अंक में राम का वन में ही राज्याभिषेक इस नाटक में मौलिक ही है।

अंकानुसार प्रतिमानाटक की कथा[संपादित करें]

प्रथम अंक - श्रीराम के पट्टाभिषेक का विचार, उसमें विघ्न और राम का वनगमन वर्णित है।
द्वितीय अंक - दशरथ को दुःख और उनका मरण दिखाया गया है।
तृतीय अंक - भरत अपने मामा के घर से वापस अयोध्या आते समय प्रतिमागृह जाते हैं। वहाँ अधिकृत देवकुलिक के मुख से दशरथ की मृत्यु और उसके बाद राम के वनगमन के बारे में सुनकर मूर्छित हो जाते हैं। वहाँ प्रतिमादर्शन के लिये कौसल्या आदि माताएँ भी आयीं हैं। शोकविह्वल भरत कैकेयी को नमस्कार नहीं करते बल्कि उनको कठोर वचन कहते हैं। फिर राम से मिलने चित्रकूट जाते हैं।
चतुर्थांक - राम स मिलकर भरत राज्य पुनः ग्रहण करने की प्रार्थना करते हैं। किन्तु जब राम भरत की प्रार्थना नहीं मानते तब भरत चौदह वर्ष तक राम की पादुकाओं को साक्षी करके राम के राज्य की रक्षा करने के लिए अपने को नियुक्त कर देते हैं।
पंचमांक - परिव्राजकवेषधारी रावण राम की कुटी में आकर अपना परिचय 'श्राद्धकल्प में निष्णात' के रूप में देता है और कहता है कि हिमालय के सप्तम शिखर पर सुवर्णमृग समर्पित करें तो उसके बाद पिता को सद्गति मिलेगी। संयोग से उसी प्रकार का मृग वहाँ दिखाई देता है। राम उस मृग के पीछे दौड़ते हैं। तभी रावण भी सीता को हर लेता है।
छठा अंक - भरत सुमन्त्र के मुख से राम के वनगमन के रहस्य को जानकर, 'माता दोषरहित हैं' यह जानकर कैकेयी से क्षमा माँगते हैं। रावणवध के लिए राम की सहायता के लिए सेना लेकर वन को चल देते हैं।
सप्तम अंक - मध्य मार्ग में ही विजयी राम का भरत से मिलाप होता है। कैकेयी राम को पट्टाधिकार स्वीकार करने की सूचना देतीं हैं। अयोध्या में श्रीराम का पट्टाभिषेक होता है।