मालविकाग्निमित्रम्

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मालविकाग्निमित्रम् कालिदास द्वारा रचित संस्कृत नाटक है। यह पाँच अंकों का नाटक है जिसमे मालवदेश की राजकुमारी मालविका तथा विदिशा के राजा अग्निमित्र का प्रेम और उनके विवाह का वर्णन है। वस्तुत: यह नाटक राजमहलों में चलने वाले प्रणय षड्यन्त्रों का उन्मूलक है तथा इसमें नाट्यक्रिया का समग्र सूत्र विदूषक के हाथों में समर्पित है।

यह शृंगार रस प्रधान नाटक है और कालिदास की प्रथम नाट्य कृति माना जाता है। ऐसा इसलिये माना जाता है क्योंकि इसमें वह लालित्य, माधुर्य एवं भावगाम्भीर्य दृष्टिगोचर नहीं होता जो विक्रमोर्वशीय अथवा अभिज्ञानशाकुन्तलम् में है।

कालिदास ने प्रारम्भ में ही सूत्रधार से कहलवाया है -

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्त: परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥

अर्थात पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय। विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।

वस्तुतः यह नाटक नाट्य-साहित्य के वैभवशाली अध्याय का प्रथम पृष्ठ है। लगभग 2200 वर्ष पूर्व के युग का चित्रण करते इस नाटक में शुंग वंश के काल की कला, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था आदि की उल्लेखनीय झलक मिलती है। इस नाटक में कालिदास द्वारा स्वांग, चतुष्पदी छन्द तथा गायन के साथ अभिनय के भी संकेत किये गए हैं, जो इंगित करते हैं कि उस युग में भी लोकनाट्य के तत्व विद्यमान थे।

कालिदास ने इस नाटक में अत्यन्त मनोहर नृत्य-अभिनय का उल्लेख किया है। वह चित्र अपने में इतना प्रभावशाली, रमणीय और सरस है कि समूचे तत्कालीन साहित्य में अप्रतिम माना जाता है। नाटक में दो नृत्याचार्यों में अपनी कला निपुणता के सम्बन्ध में झगड़ा होता है और यह निर्णय होता है कि दोनों अपनी-अपनी शिष्याओं का नृत्य-अभिनय दिखाएँ। यह भी निर्णय होता है कि पक्षपातरहित निर्णय के लिए जानी जानेवाली विदुषी, भगवती कौशिकी निर्णय करेंगी कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है। दोनों आचार्य तैयार होते हैं, मृदंग बज उठता है, प्रेक्षागृह में दर्शकगण यथास्थान बैठ जाते हैं और प्रतियोगिता प्रारम्भ होती है। इस प्रकार के दृश्य का पूर्ववर्ती साहित्य में कहीं उल्लेख नहीं हुआ है जबकि परवर्ती फिल्मों और धारावाहिकों में इससे प्रेरणा लेकर आज भी यह दृश्य प्रस्तुत किया जाता है।

कथावस्तु[संपादित करें]

नाटक की कथावस्तु राजकुमारी मालविका और विदिशा नरेश अग्निमित्र के मध्य प्रेम पर केन्द्रित है। विदर्भ राज्य की स्थापना अभी कुछ ही दिनों पूर्व हुई थी। इसी कारण इस नाटक में विदर्भ राज्य को "नवसरोपणशिथिलस्तरू" (जो सद्यः स्थापित है) कहा गया है। यज्ञसेन इस समय विदर्भ का राजा है जो पूर्व मौर्य सम्राट् वृहद्रथ के मन्त्री का सम्बन्धी था। विदर्भराज ने अग्निमित्र की अधीनता को स्वीकार नहीं किया। दूसरी ओर कुमार माधवसेन यद्यपि यज्ञसेन का सम्बन्धी (चचेरा भाई) था, परन्तु अग्निमित्र ने उसे अपनी ओर मिला लिया। जब माधवसेन गुप्त रूप से अग्निमित्र से मिलने जा रहा था, यज्ञसेन के सीमारक्षकों ने उसे बन्दी बना लिया। अग्निमित्र इससे अत्यन्त क्रुद्ध हो गया। उसने यज्ञसेन के पास यह सन्देश भेजा कि वह माधवसेन को मुक्त कर दे। किन्तु यज्ञसेन ने माधवसेन को इस शर्त पर छोड़ने का आश्वासन दिया कि शुंगों के बन्दीगृह के बन्दी पूर्व मौर्य सचिव तथा उनके साले का मुक्त करते है तो ही कुमार माधवसेन को मुक्त किया जाएगा। इससे अग्निमित्र और क्रुद्ध हो गए और उन्होंने अपने सेनापति वीरसेन, जो उनके मित्र भी थे, से आक्रमण करने का आदेश दे दिया।

इस प्रकार, विदर्भ पर शुंगों का आक्रमण हुआ। युद्ध में यज्ञसेन आत्म समर्पण करने के लिए बाध्य हुआ। माधवसेन मुक्त कर दिया गया। विदर्भ राज्य को दोनों चचेरे भाइयों के बीच बाँट दिया गया। वर्धा नदी को उन दोनों राज्यों की सीमा निर्धारित किया गया।वर्धा नदी के एक तरफ माधवसेन और दूसरी तरफ यज्ञसेन को राजा बनाया जाता है। दोनो अग्निमित्र के आधीन शासन करना शुरू करते है।

इधर विदर्भ राज्य पर अधिकार हेतु संघर्ष की स्थिति में माधवसेन अपनी बहन मालविका को सुरक्षा हेतु अन्यत्र भेज देते हैं। परिस्थितिवश मालविका भागकर विदिशा आती है, यहां राज्य के महामात्य (मंत्री) से मुलाकात होती है जो उन्हें वेष बदलकर रहने की अनुमति देता है। अग्निमित्र के राजमहल में ही, अग्निमित्र की पहली पत्नी महारानी धारिणी मालविका को संगीत-नृत्य सिखाने हेतु नाट्यचार्य गणदास को नियुक्त करती हैं।

विदर्भ विजय से अग्निमित्र शुंग की प्रतिष्ठा में अच्छी अभिवृद्धि हुई। एक दिन अग्निमित्र विदर्भ जाते है वहाँ राजा माधवसेन के महल में किसी चित्रकार द्वारा बनाये राजा माधवसेन की बहन मालविका का चित्र देखते है और उससे उन्हें प्रेम हो जाता है।

धारिणी प्रयत्‍‌न करती है कि राजा अग्निमित्र मालविका के रूप-सौन्दर्य पर मुग्ध न हो जाएं। फिर भी इसकी जानकारी अग्निमित्र को हो जाती है, वह मालविका की सुन्दरता पर मोहित हो जाते हैं। राजा के मित्र और विदूषक गौतम के प्रयासों से दोनों का मिलन होता है। कुछ समय बाद विदिशा में सांस्कृतिक आयोजन होता है, जिसमें राजा अग्निमित्र मालविका को बिना किसी विचार के विजयी घोषित कर देते हैं। नाटक के अन्त में मालविका की राजसी पृष्ठभूमि के सम्बन्ध में ज्ञात होने पर धारिणी स्वयं मालविका और अग्निमित्र का विवाह करवा देती है।

संगठन एवं कथा-संयोजन[संपादित करें]

प्रथम अङ्क[संपादित करें]

नाटक के प्रारम्भ में रानी धारिणी मालविका को राजा की दृष्टि से छिपाये रखना चाहती हैं। रानी धारिणी की आज्ञा से मालविका के नृत्य और गायन की शिक्षा की प्रगति के संबंध में नाट्याचार्य गणदास से जानकारी करने के लिए जा रही वकुलावलिका की भेंट कौमुदिनी से हो जाती है जो रानी के लिए सांकित अँगूठी लेकर स्वर्णकार के यहाँ से लौट रही थी। उन दोनों की वार्ता से ज्ञात होता है कि मालविका के सौन्दर्य के कारण रानी धारिणी उसे राजा अग्निमित्र की दृष्टि से दूर रखना चाहती है। परन्तु एक दिन चित्रशाला में चित्र देखती हुई महादेवी के निकट उपस्थित होकर राजा मालविका का चित्र देख लेता है, और उसके बारे में पूछने पर वसुलक्ष्मी बालभाव से कह देती हैं कि यह मालविका है। मालविका को देखकर राजा उसके सौंदर्य पर मोहित हो गया। कौमुदिनी धारिणी के पास चली जाती है और वकुलावलिका गणदास के पास, गणदास मालविका की निपुणता और गृहणशक्ति की प्रशंसा करता है। इसी को देवी अपने विश्वासपात्र नाट्याचार्य गणदास के पास संगीत नृत्य की शिक्षा के लिए रख छोड़ती है और मालूम होता है कि वह बड़ी कुशलता से नृत्य की प्रायोगिक शिक्षा ग्रहण कर रही है।

इस मिश्रविष्कम्भक के बाद दूसरे दृश्य में राजा अग्निमित्र पत्र लेख लिए हुए मन्त्री के साथ दिखाई पड़ता है। उनके सम्भाषणों से ज्ञात होता है कि पहले राजा ने विदर्भ शासक को पत्र दिया था उसके प्रत्युत्तर में ही यह लेख आया है अमात्य वाहतक बतलाता है कि वैदर्भ अपना विनाश चाहता है पत्र से ज्ञात होता है कि अग्निमित्र से माधवसेन की मित्रता है तथा वह प्रतिश्रुत सम्बन्धी है। माधवसेन अपनी कुमारी बहिन को देने का वचन दे चुका है इसी अपने पितृव्य पुत्र भाई माधवसेन को अग्निमित्र के पास विदिशा जाते हुए रास्ते में ही यज्ञसेन के अंतपाल ने बहिन तथा स्त्री सहित पकड़ लिया उसी की मुक्ति के लिए अग्निमित्र के विदर्भ शासक को संदेश देने पर वह प्रत्युत्तर में अभिसंधि के रूप में अपने साले मौर्य सचिव को छोड़ने को लिखता है।

मौर्यसचिव विमुञ्चति यदि पूज्यः संयतं मम श्यालम् ।
भोक्तामाधवसेनं ततोऽहमपि बन्धनात्सद्यः ॥

अग्निमित्र कार्य विनिमय की इस अभिसंधि से रूष्ट होकर विदर्भ के समूलोन्मूलन के लिए आज्ञा देता है। अमात्य भी राजा के वक्तव्य का शास्त्र द्वारा समर्थन करता है। फलतः उसने अपने साले धारिणी के भाई को विदर्भ देश पर आक्रमण करके शत्रु को पराजित करने के लिए भेज दिया। दूसरी ओर अमात्य के निष्क्रमण के पश्चात कार्यान्तर (नर्म) सचिव विदूषक, जिसकी प्रतीक्षा राजा बड़ी उत्सुकता से कर रहा है प्रवेश करता है। इसके बाद राजा विदूषक से मालविका विषयक अपनी काम पीड़ा को कहता है और कोई उपाय ढूंढने का उपाय करता हैं। उसके द्वारा ज्ञात होता है कि राजा से चित्र में देखी मालविका के प्रत्यक्ष दर्शन के उपाय को भेजा है और अब उसका उपाय भी कर दिया गया है। तभी गणदास तथा हरिदत्त दोनो तू-तू मैं-मैं करते हुए प्रवेश करते है। यही विदूषक की कूटनीति प्रयोग विस्तार पाता है। दोनों नाट्याचार्य एक दूसरे को विद्या आदि में हेय समझते हैं परस्पर निन्दा करते हैं और राजा से ही प्राश्चिक के रूप में इसका निर्णय चाहते हैं कि दोनो में शास्त्र तथा प्रयोग ज्ञान में श्रेष्ठ कौन है।

लब्धास्पदोऽस्माति विवादभीरोस्तिति क्षमाणस्य परेण निन्दाम्।
यस्यागमः केवलजीविकायै तं ज्ञानपण्यं वणिज वदन्ति॥

पर इस विवाद के विषय में रानी के सम्भावित पक्षपात के सन्देह से आशंकित होकर राजा भगवती कौशिकी तथा रानी के समक्ष ही विवाद के निर्णय को न्याय समक्ष दोनों को बुला भेजते हैं। यही ज्ञात होता है कि महाराज का पक्षपात हरदत्त की ओर है और महारानी का गणदास की ओर। अतः तटस्थ कोशिकी को ही सर्वसम्मत रूप से मध्यस्थ बनाया जाता है क्योंकि नाट्य निर्णय प्रयोग द्वारा ही सम्भव है। अतः महारानी की अनिच्छा होने पर भी आचार्यों के शिष्यों को नाट्य प्रदर्शन की आज्ञा दे दी जाती है और दोनों नाट्याचार्यों की शिष्याओं को नृत्य कला प्रदर्शन के आधार पर ही उनकी वरिष्ठता निर्धारित करने का निश्चय किया गया।

द्वितीय अङ्क[संपादित करें]

रंगशाला में वयोवृद्ध होने के कारण गणदास को सर्वप्रथम अपनी शिष्या मालविका के नृत्य प्रदर्शन का अवसर प्रदान किया गया मालविका के दर्शन के लिए राजा पूर्व से ही अधीर थे और जब साक्षात राजा ने मालिविका को देखा तो मन्त्रमुग्ध हो उसके सौन्दर्य को देखता ही रहा। राजा महारानी परिव्राजिका एवं विदूषक रंगशाला में मालविका का नृत्य देखते हैं। पारिवाजिका के आदेशानुसार मालविका चलित नृत्य प्रस्तुत करती है उसका नृत्य और गीत राजा को और व्यथित कर देता है। मालविका के उत्कृष्ट नृत्य के कारण प्राश्निक परिव्रजिका गणदास के पक्ष में निर्णय देती है हरदत्त की शिष्या का नृत्य प्रदर्शन उस समय नहीं कराया जा सका क्योंकि दोपहर के भोजन का समय हो गया था। प्रदर्शन के बाद धारिणी मालविका को राजा के सामने से शीघ्र दूर करने को आतुर दीख पड़ती थी। यही मालविका के प्रति राजा का पूर्वानुराग अभिव्यक्त होता है।

सर्वान्तः पुरवनिताव्यापार प्रतिनिवृत्त हृदयस्य ।
सा वामलोचना में स्नेहस्यैकामनीभूता॥

राजा का मन बहुत अशान्त था उसने विदूषक से बहुत शीघ्र ऐसा कोई उपाय ढूंढने के लिए कहा, जिससे उसका मालविका से मिलन हो सके। विदूषक ने बड़ी निपुणता के साथ बकुलावलिका को विश्वास में लेकर उससे मालविका के हृदय में राजा के प्रति प्रेम बीज बोने के लिए कहा।

तृतीय अङ्क[संपादित करें]

तृतीय अङ्क के आरम्भ में प्रवेशक में मधुकरिका और समाहितिका यह संकेत देती है कि यद्यपि मालविका बहुत प्रशंसित हो चुकी है तब भी आजकल परिम्लान सी दीख पड़ती है तथा स्वामी भी उसके प्रति साभिलाष है, केवल धारिणी ही उसकी रक्षा कर रही है। अन्तःपुर के प्रमदवन में स्थित तपनीय अशोक के दोहद के लिए किसी तरूणी को पाद प्रहार करना था और यह कार्य महारानी धारिणी द्वारा ही सम्पन्न किया जाना था, किन्तु आकस्मिक पैर की चोट के कारण धारिणी ने इस कार्य के लिए मालविका को नियुक्त कर दिया और उसे ही प्रमदवन में जाने की अनुमति प्रदान की और यह वचन भी दिया कि यदि पाँच दिन में अशोक के पुष्प पुष्पित हो जायेंगे तो मालविका का मनोरथ पूर्ण कर देगी।

उधर राजा को दूसरी रानी इरावती के साथ झूला झूलने के लिए प्रमदवन में जाना था। अन्यमनस्क राजा विदूषक के आग्रह पर प्रमदवन आ जाता है और मालविका में मन रमा होने पर भी छोटी रानी इरावती के संदेशानुसार प्रमदवन में उपस्थित होता है वहां राना इरावती की प्रतीक्षा कर ही रहा है कि वहां उसे वकुलावलिका और मा लविका, जो अशोक के दोहद के लिए आयी थी दिखाई पड़ जाती है। यहीं विदूषक द्वारा राजा को ज्ञात होता है कि यद्यपि सम्पत्ति पर साँप के समान ही रानी मालविका पर निगाह रखती है तब भी वकुलावलिका आदि उसे राजा से मिलाने को प्रयत्नशील है और आज मालविका को राजा से मिलने का अवसर मिलता है। वहां उसे वकुलावलिका और मालविका, जो अशोक के दोहद के लिए आयी दिखाई पड़ जाती है पर तभी इरावती की चेटी निपुणिका के साथ प्रवेश कर दोनो मिल ही पाते है कि दूसरी ओर मदमस्त इरावती भी अपनी सेविका निपुणिका के साथ प्रमदवन में आ जाती है। राजा और इरावती दोनो ही अलग-अलग मालविका और वकुलावलिका की राजा के प्रति प्रेम की गुप्त बातें सुनते हैं। मालविका और वकुलावलिका की वार्ता से राजा विषयक प्रेम मालविका प्रकट करती है अपने पर प्रेम की वार्ता को सुन राजा अत्यन्त ही प्रसन्न हो जाता है कि जितना वे मालविका के लिए अधीर है उतना ही मालविका भी उसके प्रेम में आतुर है। ऐसा सुनकर राजा तो प्रेम मे प्रफुल्लित होता है किन्तु उधर रानी इरावती अत्यन्त ही रूष्ट हो जाती है और कटु शब्द सुनाती है। रक्तरञ्जित पैर से मालविका द्वारा अशोक पर पाद प्रहार करते देख कर विदूषक कहता है कि क्या महाराज के मित्र स्वरूप अशोक वृक्ष पर आपके द्वारा पैर से प्रहार करना ठीक रहेगा? तब वकुलावलिका बताती है कि महारानी की आज्ञा से ही यह कार्य सम्पन्न करने यहाँ आई है। राजा आज्ञा दे देते हैं और कहते है कि अपने बायें पैर में पाद प्रहार में कोई कष्ट न हो। तब मालविका राजा के पैर को छूकर क्षमा माँगती है दोनो का स्पर्श होता है। राजा के द्वारा मालविका से अपना प्रेम प्रकट करने के समय ही वहां इरावती पहुंच जाती है। सम्भ्रमपूर्वक राजा इरावती से कहता है कि मैं तुम्हें दूढता रहा किन्तु तुम्हारे न आने पर ही मन बहलाने के लिए इधर चला आया। यहाँ पर इरावती की सपत्नीजन्य ईर्ष्या भड़क उठी। वह राजा को व्यंग्य वाणों से भेदन करती है और वकुलावलिका को फटकारते हुए वहां से जाने लगती है। राजा अग्निमित्र इरावती के चरणों में अपनी पगड़ी रख भी क्षमा प्रार्थना करते हैं व उसके पाँव पकड़ लेते हैं किन्तु वह नहीं मानती है और क्रोध के वशीभूत होकर वहाँ से चली जाती है। विदूषक राजा से कहता है कि इरावती यहाँ से मंगल ग्रह के समान वापस चली गयी हैं अतैव अब आप भी चलिए। राजा भी विचार करता हैं कि जब रानी उसका अनादर कर सकती है तो मै भी उसकी उपेक्षा कर सकता हूँ।

मन्ये प्रियाहृतमनास्तस्याः प्रणिपातलङ्घनं सेवाम् ।
एवं प्रणयवती सा मयि शक्यमुपेक्षितुं कुपिता॥

और ऐसा विचार कर वह अपना ध्यान मालविका पर आसक्त करता है। उसके पश्चात सभी वहां से चले जाते हैं। उधर इरावती ईष्या से जली हुई सीधे जाकर रानी धारिणी को मालविका और वकुलावलिका के विरूद्ध भड़का देती है। धारिणी ने दोनों को कारागृह में डाल दिया और विश्वस्त परिचारिका को कार्य पर लगा दी कि उसकी सर्प चिह्न वाली अंगूठी देखे बिना उन दोनों को मुक्त न किया जाये।

चतुर्थ अङ्क[संपादित करें]

मालविका के प्रेम में आसक्त और उसी के विषय में चिंतातुर राजा अन्ततः अपने हृदय की मनोव्यथा विदुषक से कहते हैं और मालविका विषयक कारावास का समाचार सुनकर अत्यन्त दुखी हो उठते हैं और मालविका को किसी भी प्रकार से मुक्त कराने के लिए विदूषक से प्रार्थना करते हैं। विदूषक ने एक उपाय सोचकर राजा के कान में बता दिया और कहा कि आज रानी धारिणी का समाचार जानने के लिए वहां जाइये क्योंकि उनके पैर में चोट आ गयी थी। राजा रानी धारिणी की चोट देखने के लिए उनके कमरे में जाते हैं और विदूषक स्वयं केतकी के काटे से सर्पदंश का चिन्ह बना कर वहां पहँच गया, जहाँ पर राजा और रानी धारिणी बैठे थे और वहां बताया कि वो महारानी के लिए पुष्प तोड़ने गया था कि तभी सर्प ने काट लिया। ऐसा सुन रानी ब्रह्महत्या के भय से अत्यन्त चितित हुई। राजा ने चिकित्सा के लिए उसे राजवैद्य ध्रुवसिद्धि के पास भेज दिया। ध्रुवसिद्धि के नाम पर विदूषक के उपचार के बहाने रानी की सर्पमुद्रा को मंगवा लिया और उस सर्पमुद्रा को माधविका को दिखा कर मालविका और वकुलावलिका को मुक्त करा लिया। उधर राजा भी मन्त्री से वाहतक से राजकार्य सम्बन्धी परामर्श करने के बहाने से रानी के पास से उठ बाहर चले आते है। पूर्व संकेतानुसार राजा, विदूषक मालविका और वकुलावलिका सभी समुद्रगृह में एकत्र होते है। राजा और मालविका को एकांत में वार्तालाप के लिए छोड़ कर वकुलावलिका वहीं छिप जाती है और विदूषक बाहर दरवाजे पर पहरा देने लगता है पहरा देते देते वही निद्रालु हो जाता है और स्वप्न में मालविका को राजा के सानिध्य में पाता है। राजा मालविका को बिल्कुल अपने सानिध्य में लिए हुए है

विसृज सुन्दरि संङ्गमसाध्वसं, तव चिरात् प्रभृति प्रणयोन्मुखे।
परिगृहाण गते सहकारतां त्वमतिमुक्त लताचरितं मयि ॥

और विदूषक सपने में बड़बड़ाता है-मालविका राजप्रिया बनो इरावती को राजप्रणय में जीत लो। इतने में वहां इरावती और निपुणिका आ जाती हैं स्वप्न में मालविका को इरावती से बढ़ने वाली बात को सुनकर कुपित होती है और विदूषक के उपर टेड़ेमेड़े लकड़ी के डंडे से खम्भे के द्वारा उसको डराती है जिससे कि सांप-सांप चिल्लाने लगता है। विदूषक का शोर सुनकर राजा उसकी सहायता के लिए बाहर आता है। मालविका रोकती है कि अचानक बाहर मत निकलिए वहां सांप है। इरावती एकाएक राजा के पास जाकर कहती है कि आज दोनों का दिवाभसार हो गया क्या? सभी इरावती को वहाँ देखकर घबरा जाते हैं। इस प्रकार सब कुछ देखकर इरावती अत्यन्त क्रुद्ध हो जाती है। राजा इरावती को बहुत समझाता है कि

नार्हति कृतापराधोऽप्युत्सवदिवसेषु परिजनो बन्धुम्।
इति मोचिते मयैते प्रणिपतितुं मामुपगते च॥

किन्तु इरावती न मानी और अपनी परिचारिका से रानी धारिणी के पास संदेश भेज दिया कि आपका पक्षपात देखकर मुझे विश्वास हो गया कि आपकी सहायता से ही इन दोनों का मिलाप हुआ है। उसी प्रकार एक दासी ने आकर समाचार दिया कि कुमारी वसुलक्ष्मी को बन्दर ने डरा दिया है, जिससे वह रोना बन्द ही नहीं कर रही है। मालविका और वकुलावलिका को छोड़कर सभी चले जाते है। तभी मधुरिका (मालिनी) आकर बताती है कि अशोक पाँच रातों के भीतर ही पुष्पित हो उठा है प्रसन्न मालविका वकुलावलिका के साथ रानी धारिणी को यह समाचार देने तथा अपना पारितोषिक प्राप्त करने चली जाती है।

पञ्चम अङ्क[संपादित करें]

राजा को धारिणी का यह संदेश मिलता है कि अशोक वृक्ष से पुष्प पुष्पित हो चुके है। अतः वे रक्त शोक के पास पहुंचे वहां उनकी प्रतीक्षा कर रही है। उधर राजा के पास यह भी समाचार आता है कि उनकी सेना ने विदर्भ नरेश यज्ञसेन को परास्त कर माधवसेन को मुक्त करा लिया है।

परभृत कलव्याहारेषु त्वमात्तरतिर्मधु, नयसि, विदिशातीराद्यानेष्वङ्ग इवाङ्ग ।
विजयकारिणामालानत्वं गतः प्रबलस्य ते, वरद!वरदारोधोवृक्षैः सहावनतो रिपुः ॥

राजा और विदूषका रक्ताशोक देखने प्रमदवन जाते है। मालविका वहां वैवाहिक वेष में सजी हुई है व रानी के बिल्कुल समीप खड़ी है। साथ ही में परिब्राजिका कौशिकी तथा परिजनों से युक्त धारिणी राजा के दर्शन के लिए आतुर है। उसी समय राजा अग्निमित्र के पिता पुष्यमित्र का भेजा हुआ दूत वहां आया, जिसने बताया कि राजकुमार वसुमित्र (अग्निमित्र का पुत्र) ने यज्ञाश्व की बड़ी बहादुरी से रक्षा कर ली है। राजा ने धारिणी की प्रशंसा में कहा की आपके पुत्र विजयी होकर वापस लौटे हैं अतैव आप वीरमाता के नाम से जानी जाओगी। यह समाचार सुनकर सभी बहुत प्रसन्न हुए। धारिणी ये समाचार इरावती को भी बताने को कहती है तदन्तर वो राजा से कहती है कि आपने मुझे प्रिय समाचार सुनाया है अतः आप तदनुरूप पारितोषिक स्वीकार करें। उसके पश्चात उसी समय उपहार में भेजी गई दो शिल्प कन्याएं वहाँ उपस्थित की गयी, जिनमें से एक ने मालविका को पहचान लिया और कहा कि यह तो राजकुमारी है उन कन्याओं ने परिव्राजिका को भी पहचान लिया। यह सब देखकर राजा आश्चर्य चकित हुए और सविस्तार जानने की इच्छा प्रकट की। उनक न्याओं ने तथा परिव्राजिका ने पूरी घटना को विस्तार से राजा को बताया।

अप्याकरसमुत्पन्ना मणिजातिरसंस्कृता।
जातपेरूण कल्याणि! न हि संयोगमर्हति॥

मालविका और अपने अज्ञातवास के औचित्य को सिद्ध करती हुई परिव्राजिका ने बताया कि जिस समय मालविका के पिता जीवित थे उसी समय एक सिद्ध पुरूष ने बताया था कि मालविका एक वर्ष तक दासी का काम करने के बाद योग्य पति प्राप्त कर सकेगी। इसलिए मालविका को दासी के रूप में रहते देखकर वह चुप थी। वास्तविकता की जानकारी हो जाने पर उसे दासी कर्म कहीं और करना पड़ता जो उचित नहीं था। इसके पश्चात रानी धारिणी, इरावती की तथा परिव्राजिका, कौशिकी की अनुमति लेकर मालविका का विवाह राजा से करा देती हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]