रत्नावली
रत्नावली हर्ष द्वारा रचित एक संस्कृत नाटक जिसमें राजा उदयन और राजकुमारी रत्नावली की कहानी वर्णित है। यह चार अंकों की एक नाटिका है। इस नाटिका में होली मनाये जाने का सबसे प्रथम उल्लेख मिलता है।
शास्त्रीय दृष्टि से रत्नावली नाटिका अत्यंत सफल नाटिका मानी जाती है। संस्कृत नाट्य साहित्य में श्रीहर्षवर्धन या श्रीहर्ष देव का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हर्षवर्धन एक सफल शासक होने के साथ-साथ एक सफल महाकवि भी थे।
रत्नावली की नाट्य कलात्मकता प्रियदर्शिका नाटिका से अधिक परिष्कृत है। नाट्यशाश्त्रीय नियमों का पालन इसमें इतना सर्वांगीण हुआ है कि दशरूपक तथा साहित्यदर्पण में इससे सर्वाधिक उदाहरण दिए गए हैं। रत्नावली नाटिका की कथावस्तु सिंहल देश की राजकुमारी रत्नावली तथा महाराज उदयन की प्रेम कथा पर आधारित है। नाटिका के प्रथम अंक में राजा उदयन का मंत्री यौगन्धरायण सिद्ध पुरुष के मुख से यह सुनकर कि सिंहल देश की राजकन्या रत्नावली का पति जो व्यक्ति होगा वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। प्रभु भक्त मंत्री यौगन्धरायण उक्त घोषणा पर दृढ़ आस्था एवं पूर्ण विश्वास राज्य की उन्नति के लिए रत्नावली के साथ उदयन का विवाह कराने का संकल्प लेता है। यौगन्धरायण की यह सोच उसकी स्वामीभक्ति को प्रदर्शित करती है।
रत्नावली नाटिका के चतुर्थ अंक में वासवदत्ता का रत्नावली के प्रति प्रेम, त्याग और अपूर्व योगदान की कथा वर्णित है । वासवदत्ता अपनी बहन रत्नावली को ना पहचानने के कारण जो कष्ट देती है उस पर क्षुब्ध होती है। वह रत्नावली को बहन कह कर गले लगाती है, और बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित कर उसे उसका हाथ राजा को पकड़ाते हुए निवेदन करती है कि वो रत्नावली को स्वीकार कर उसके साथ अत्यंत स्नेहपूर्ण व्यवहार करें जिससे उसे दूरस्थ बंधुओं की याद ना आए।
नाटिका के तृतीय अंक में वासवदत्ता में महारानी होने के बावजूद भी क्षमायाचना का गुण है। उसका यह गुण अत्यंत ही सराहनीय है। वासवदत्ता को अपने आचरण पर भी ग्लानि एवं पाश्चाताप होता है । वह जब विदूषक और सागरिका को कारागार में डाल देती है तब वह पश्चाताप की अग्नि में जलने लगती है। कौन महारानी किसी को सजा देने पर पश्चाताप की अग्नि में जलती है ? इसमें गर्व, छल, ईर्ष्या का नामोनिशान नहीं है। वह कुछ समय तक तो सोचती है कि इसके अनंतर वह निश्चय करती है कि मुझे अपनी अशिष्टता के लिए राजा के समक्ष जाकर क्षमायाचना करनी चाहिए।
हर्ष की रत्नावली ही सर्वप्रथम सफल नाटिका है जिसमें शास्त्रीयता का पूरी तरह से पालन किया गया है। साथ ही रंगमंच पर अभिनीत होने योग्य सभी विशेषताएं इस में पाई जाती है। अतः हर्ष को एक क्षमता संपन्न सफल नाट्यकार कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं है।