शब्दकोशों का इतिहास

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शब्दकोशों के आरंभिक अस्तित्व की चर्चा में अनेक देशों और जातियों के नाम जुडे़ हुए हैं। भारत में पुरातनतम उपलब्ध शब्दकोश वैदिक 'निघण्टु' है। उसका रचनाकाल कम से कम ७०० या ८०० ई० पू० है। उसके पूर्व भी 'निघंटु' की परंपरा थी। अत: कम से कम ई० पू० १००० से ही निघंटु कोशों का संपादन होने लगा था। कहा जाता है कि चीन में ईसवी सन् के हजारों वर्ष पहले से ही कोश बनने लगे थे। पर इस श्रुतिपरंपरा का प्रमाण बहुत बाद— आगे चलकर उस प्रथम चीनी कोश में मिलता है, जिसका रचना 'शुओ वेन' (एस-एच-यू-ओ-डब्ल्यू-ई-एन) ने पहली दूसरी शदी ई० के आसपास की थी (१२१ ई० भी इसका निर्माण काल कहा गया है)। चीन के 'हान' राजाओं के राज्य- काल में भाषाशास्त्री 'शुओ बेन' के कोश को उपलब्ध कहा गया है। यूरेशिया भूखंड में एक प्राचीनतम 'अक्कादी-सुमेरी' शब्दकोश का नाम लिया जाता है जिसके प्रथम रूप का निर्माण— अनुमान और कल्पना के अनुसार—ई० पू० ७वीं शती में बताया जाता है। कहा जाता है कि हेलेनिस्टिक युग के यूनानियों नें भी योरप में सर्वप्रथम कोशरचना उसी प्रकार आरंभ की थी जिस प्रकार साहित्य, दर्शन, व्याकरण, राजनीति आदि के वाङ्मय की। यूनानियों का महत्व समाप्त होने के बाद और रोमन साम्राज्य के वैभवकाल में तथा मध्यकाल में भी बहुत से 'लातिन' कोश बने। 'लतिन' का उत्कर्ष और विस्तार होने पर लतिन तथा लातिन + अन्यभाषा-कोश, शनै: शनै: बनते चले गए। सातवीं-आठवीं शती ई० में निर्मित एक विशाल 'अरबी शब्दकोश' का उल्लेख भी उपलब्ध है।

निघंटु : आर्यभाषा का प्रथम शब्दकोश[संपादित करें]

वैदिक शब्दों (विरल या क्लिष्ट) के संग्रह को 'निघंटु' कहते थे। 'यास्क' का निरुक्त वैदिक निघंटु का भाष्य है। यास्क से पूर्ववर्ती निघंटुओं में एकमात्र यही निघंटु उपलब्ध है। पर 'निरुक्त' से जान पड़ता है के 'यास्क' के पूर्व अनेक निघंटु बन चुके थे।

विस्तृत जानकारी के लिये देखें - निघण्टु

संस्कृत के प्राचीन एवं मध्यकालीन शब्दकोश[संपादित करें]

वैदिक निघंटुकोशों और 'निरुक्त ग्रंथों' के अनंतर संस्कृत के प्राचीन और मध्यकालीन कोश हमें उपलब्ध होते हैं। इस संबंध में 'मेक्डानल्ड' ने माना है कि संस्कृत कोशों की परंपरा का उद्भव (निघटु ग्रंथों के अनंतर) धातुपाठों और गणपाठों से हुआ है। पाणिनीय अष्टाध्यायी के पूरक पारिशिष्ट रूप में धातुओं और गणशब्दों का व्याकरणोपयोगी संग्रह इन उपर्युक्त पाठों में हुआ। पर उनमें अर्थनिर्देश न होने के कारण उन्हे केवल धातुसूची और गणसूची कहना अधिक समीचीन होगा।

आगे चलकर संस्कृत के अधिकांश कोशों में जिस प्रकार रचनाविधान और अर्थनिर्देश शैली का विकास हुआ है वह धातुपाठ या गणापाठ की शैली से पूर्णतः पृथक् है। निघंटु ग्रंथों से इनका स्वरूप भी कुछ भिन्न है। निघंटुओं में वैदिक शब्दों का संग्रह होता था। उनमें क्रियापदों, नामपदों और अव्ययों का भी संकलन किया जात था। परंतु संस्कृत कोशों में मुख्यतः केवल नामपदों और अव्ययों का ही संग्रह हुआ।

'निरुक्त' के समान अथवा पाली के 'महाव्युत्पत्ति' कोश की तरह इसमें व्युत्पत्तिनिर्देश नहीं है। वैदिक निघंटुओं में संगृहीत शब्दों का संबंध प्रायः विशिष्ट ग्रंथों से (ऋग्वेदसंहिता या अथर्वसंहिता का अथर्वनिघंटु) होता ता। इनकी रचना गद्य में होती थी। परंतु संस्कृत कोश मुख्यतः पद्यात्मक है और प्रमुख रूप से उनमें अनुष्टुप् छंद का योग (अभिधानरन्तमाला आदि को छोड़कर) हुआ है। संस्कृत कोशों द्वारा शब्दो और अर्थ का परिचय कराया गया हैः धनंदय, धरणी' और 'महेश्वर' आदि कोशों के निर्माण का उद्देश्य था संभवतः महत्वपूर्ण विरलप्रयुक्त और कविजनोपयोगी शब्दों का संग्रह बनाना।

संस्कृत कोशों का ऐतिहासिक सिंहावलोकन करने से हमें इस विषय को सामान्य जानकारी प्राप्त हो सकती है। इस संबंध में विद्वानों ने 'अमरसिंह' द्वारा रचित और सर्वाधिक लोकप्रिय 'नामलिंगानुशासन' (अमरकोश) को केंद्र में रखकर उसी आधार पर संस्कृत कोशों को तीन कालखंडों में विभाजित किया है-

  • (१) अमरकोश-पूर्ववर्ती संस्कृत कोश,
  • (२) अमरकोशकाल तथा
  • (३) अमरकोशपरवर्ती संस्कृत कोश।

विस्तृत विवरण के लिये संस्कृत के प्राचीन एवं मध्यकालीन शब्दकोश देखें।

पाली, प्राकृत और अपभ्रंश का कोश वाङ्मय[संपादित करें]

मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं का वाङ्मय भी कोशों से रहित नहीं था। पालि भाषा में अनेक कोश मिलते हैं। इन्हें बौद्धकोश भी कहा गया है। उनकी मुख्य उपयोगिता पालि भाषा के बौद्ब-साहित्य के समझाने में थी। उनकी रचना पद्यबद्ध संस्कृतकोशों की अपेक्षा गद्यमय निघंटुओं के अधिक समीप है। बहुधा इनका संबंध विशेष ग्रंथों से रहा है।

विस्तृत विवरण के लिये पालि, प्राकृत और अपभ्रंश का कोश वाङ्मय देखें।

हिंदी के मध्यकालीन शब्दकोश[संपादित करें]

विस्तृत विवरण के लिये हिंदी के मध्यकालीन शब्दकोश देखें।

संस्कृत के आधुनिक महाकोश[संपादित करें]

भारत में आधुनिक पद्धति पर बने संस्कृत कोशों की दो वर्गों में रखा जा सकता है

  • (१) इनमें एक विधा वह थी जिसमें अंग्रेजी अथवा जर्मन आदि भाषाओँ के माध्यम से संस्कृत के कोश बने। इस पद्धति के प्रवर्तक अथवा आदि निर्माता पाश्चात्य विद्बान् थे। कोशविद्या की नूतन दृष्टि से संपन्न नवकोश की रचनाशैली के अनुसार से कोश बने।
  • दूसरी और नवीन पद्धति के अनुसार नूतन प्रेरणाओं को लेकर संस्कृत में ऐसे कोश बने जिसका माध्यम भी सस्कृत ही था। इस प्रकार के कोशों में विशेष रूप से दो उल्लेखनीय हैः
*(१) शब्दकल्पद्रुम
*(२) वाचस्पत्यम्

विस्तृत विवरण के लिये संस्कृत के आधुनिक कोश देखें।

पश्चिम में आधुनिक कोशविद्या[संपादित करें]

पश्चिम विद्वानों के संपर्क से भारत में जिस कोश-रचना-पद्धति का १८वीं शती में विकास हुआ, पश्चिम में पहले से ही वह प्रचलित हो चुकी थी। अत: योरप की कोश-रचना-पद्धति के विकास का ऐतिहासिक सिंहावलोकन करना आवश्यक है।

विस्तृत विवरण के लिये पश्चिम में आधुनिक कोशविद्या तथा अंग्रेजी शब्दकोशों का इतिहास देखें।

भारत में जो आधुनिक कोश बने वे इन्हीं पाश्चात्य कोशों की पद्धति पर चले। उनके निर्माण में पूरी सफलता चाहे न भी मिल सकी हो पर उनकी पद्धति भी वही थी जिसे हम आधुनिक कोशविज्ञान की रचनाशैली कहते हैं।

हिंदुस्तानी, हिंदी, उर्दू के कोश[संपादित करें]

विस्तृत विवरण के लिये हिन्दुस्तानी, हिन्दी एवं उर्दू के आधुनिक शब्दकोश देखें।

हिंदीतर भाषाओं में कोश[संपादित करें]

विस्तृत विवरण के लिये हिन्दीतर भारतीय भाषाओं के आधुनिक शब्दकोश देखें।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]