हिन्दीतर भारतीय भाषाओं के आधुनिक शब्दकोश

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भारतीय हिंदीतर भाषा के कोशों का निर्माण भी प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक बराबर चल रहा है।

तमिल[संपादित करें]

तमिल भाषा में कोशनिर्माण की परंपरा बहुत प्राचीन कही जाती है। उनका प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ 'तांलकाप्पियम' कहा जाती है। उसी व्याकरण ग्रंथ में ग्रंथकार ने सूत्र शैली में शब्दकोश तैयार किया था। गंथ के लेखक ने तमिल भाषा के शब्दों को चार वर्गों में विभक्त किया है— (१) सामान्य देशी शब्द० (२) साहित्यिक शब्द, (३) विदेशी भाषाओं से व्युत्पन्न शब्द और (४) संस्कृत से व्युत्पन्न शब्द। इसमें शब्दसंग्रह वर्णानुक्रम से रखा गया है। इसका प्रकाशन यद्यपि अट्ठारहवीं शताब्दी का है तथापि इसकी रचना ईसा की प्रथम द्वितीय शताब्दी में बताई जाती है। तमिल का दूसरा कोश 'तिवाकरम' है। १२ खडों का यह कोश अमरकोश के आधार पर बना है। इसमें दस खंडों में वर्गमूलक शब्दसंचय है, ११ वाँ खंड नानार्थ शब्दों का और १२ वाँ समूहवाचक शब्दों का है।

१६७९ ई० में प्रथम तमिल-पुर्तगाली कोश बना और १७१० ई० में फादक वेशली ने पूर्णतः अकारादि क्रम पर निर्मित 'कतुर अकाराति' नामक कोश तैयार किया। तमिल का प्रथम अंग्रेजी कोश लूथर के अनुयायी धर्मप्रचारकों द्वारा १७७९ ई० में मलाबार एंड इंग्लिश डिक्शनरी नाम से प्रकाशित हुआ। उसी का दूसरा संस्करण सशेधित रूप से तमिल में 'इंग्लिश डिक्शनरी' के नाम में १८०९ ई० में मुद्रित हुआ। १८५१ ई० में एक त्रिथाषी कोश (अंग्रेजी, तेलगू और तमिल का) प्रकाशित हुआ। इनकी सहायता से अनेक तमिल कोश बनते आ रहे हैं। इस संपन्न और प्राचीन भाषा में व्याकरण और कौशों की संपन्न परंपरा है। मद्रास विश्वविद्यालय द्वारा तमिल का एक विशाल कोश तौयार हुआ है जो अनेक जिल्दों में प्रकाशित है। इसकी शब्दयोजना तमिल वर्णमाला के अनुसार है। इसकी भूमिका में तमिल—कोश—परंपरा के विकास का विस्तृत विवरण दिया गया है।

इनसे अतिरिक्त प्राचीन और अर्वाचीन कालों में अनेल तमिल कोश निर्मित हुए। इनमें अनेक नवीन कोश ऐसे हैं जिनमें तमिल में अर्थ दिया गया है; कुछ में अग्रेजी द्वारा शब्दार्थ बताया गया है—जैसे 'तमिल लेक्सिकन' और कुछ नए कोश ऐसे भी है जिनमें भारतीय भाषाओं का अर्थबोधन के लिये आश्रय लिया गया है। इन्हीं में एकाध तामिल हिंदी कोश भी है।

अन्य द्रविण भाषाएँ[संपादित करें]

दक्षिण की अन्य द्रविड भाषाओं में भी १९ वीं शती के पूर्वार्ध से ही कोशों की रचना चली आ रही है। इन भाषाओं में आज अनेक उत्तम और विशाल कोश प्रकाशित है या हो रहे हैं। तेलगू के त्रिभाषी कोश की ऊपर चर्चा हुई है। चार्लिस फिलिप्स ब्राउन द्वारा १८५२ ई० में अंग्रेजी तेलगू कोश निर्मित होकर छापा गया। ए तेलगू—इंग्लिश डिक्शनरी का १९०० ई० में निर्माण पी० शंकरनारायण ने किया। १९१५ ई० में आक्सपोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस से भी एक तेलगू केश प्रकाशित किया गया। विलियम ऐंडर्सन ने इससे बी बहुत पहले ही, अर्थात १८१२ ई० में अंग्रेजी-मलयालम का कोश बनाया ता। जान गैरेट का अंग्रेजी कर्नाटकी (कनारी) कोश १८६५ ई० में प्रकाशित हुआ। बाद में भी एफ्० कितल द्वारा संपादित (१८९४ ई० में) कन्नड का भी एक कोश छपा।

बँगला कोश[संपादित करें]

बँगला के कोशों की परंपरा—बँगाल भाषा का विकास होने के बाद से—बराबर चल रही है। ईधुनिक ढंग के कोशों में प्रकृति- वाद अभिघान नामक विशाल बँगाल कोश उल्लेखनीय है जिसका संपादन राधाकमल विद्यालंकार ने किया। १८११ ई० में यह प्रकाशित हुआ। यह शब्दोकोश वस्तुतः संस्कृत बँगाल शब्दकोश है। इसका पूर्णतः परिशोधित और परिवर्धित संस्करण १९११ ई० में श्रीशरच्चंद्र शास्त्री द्वारा संपादित होकर प्रकाशित हुआ। इसका षष्ठ संस्करण तक देखने को मिला है। कदाचित् इससे भी पहले बंगला पुर्तगाली डिक्शनरी बन चुकी थी। पादरी मेनुअल ने बँगला व्याकरण के साथ बँगला—पुर्तगाली—बँगला केश (संभवतः) बनाए थे। कहा जाता है कि रामपुर के पादरी केरे साहब ने १८२५ ई० बहुत बँगला—इंगलिश—कोश बनाला था। ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से १८३३ ई० में बँगला—संस्कृत—इंगलिश—डिक्शनरी तैयार करवाई गई थी। हाउंटर और रामकमल सेन का बँगलाइंगलिश कोश भी अत्यंत प्रसिद्ध है। पादरी केरे के बँगला अंग्रेजी कोश में ८०००० शब्द थे। इनके अतिरिक्त भी अनेक छोटे बड़े बँगला अंग्रेजी कोश भी बने। केवल बँगला लिपि और भाषा में ही ज्ञानेंद्र मोहन दास का बँगला भाषार आभिधान (द्वितीय संस्कारण १९२७) और पाँच जिल्दोंवाला हरिचरण वंद्योपाध्याय द्वारा निर्मित बंगीय शब्दकोश दोनों उत्कृष्ट रचनाएँ मानी जाती है। बँगला में उन्नीसवीं शताब्दी से आजतक छोटे बडे़ शब्दकोशों के निर्माण की परंपरा चली आ रही है। छोटे कोशों में चलंतिका अत्यंत लोकप्रिय है। सैकडों अन्य कोश भी आज तक रचे गए और प्रकाशित हो चुके हैं। श्री योगेशचंद्र राय का बँगला शब्दकोश भी प्रसिद्ध रचना है। इस ग्रंथ में अनेक आधारिक और सहायक ग्रंथों की चर्चा है। उनमें बँगला से संबद्ध निम्नाकित कोशों के नाम उपलब्ध हैं—

(१) डिक्शनरी आव् बंगाली लैंग्वेज (सं० कैरे—१८२५ ई०)

(२) ए डिक्शनरी आव् बंगाली लैंग्वेज (सं० जाँन सी० मार्श- मैन—१८२७ ई०)

(३) बंगाली वीकैब्यूलरी (सं० एच्० पी० फास्टर—१७९९ ई०)

(४) बंगाली वीकैब्यूलरी (मोहनप्रसाद ठाकुर—१८१० ई०)

(५) डिक्शनरी आव् बंगाली लैग्वेज (सं० डब्लू० मार्टन— १८२८ ई०)

(६१) ए डिक्शनरी आव् हंगाली ऐंड इंगलिश (सं० ताराचंद चक्रवर्ती—१८२७ ई०)।

(७) शब्दसिंधु (अमरकोश के संस्कृत शब्दों की आकारादिवर्णा- नुक्रामानुसार योजना तथा बँगला व्याख्या—१८०८ ई०)

ग्लासरी आँव जुडिशल ऐंड रेवेन्यू टर्म्स नामक जामसन के अंग्रेजी बँगला कोश का टाड संस्कारण १८३४ ई० में प्रकाशित हुआ एच्० एच्० विलसन का जो कोश १८५५ ई० में प्रकाशित हुआ उसमें अरबी फारसी, हिंदी, हिंदुस्तानी, उडिया, मराठी, गुजराती, तेलगू, कर्नाटकी (कनारी), मलायालम आदि के साथ साथ बँगला के शब्द भी थे। श्रीतारानाथ का शब्दस्तोममहानिधि भी अच्छा कोश कहा जाता है।

मराठी कोश[संपादित करें]

मराठी भाषा में कोशनिर्माण की परंपरा संभवतः उस यादवकाल से प्रारंभ होती है जब महाराष्ट्री प्राकृत के अनंतर आधुनिक मराठी का स्वतंत्र भाषा के रूप में विकास हुआ और वह प्रौढ़ हो गई। उस युग में कुछ कोश बनाए गए थे। हेमाद्रि पंडितों द्वारा रचित अनेक कोशों का उल्लेख मिलता है। संत ज्ञानेश्वर ने अपनी कृति ज्ञानेश्वरी के क्लिष्ट शब्दों की—अकारादि क्रम से अनुक्रमणिका बनाते हुए उसी के साथ सरल मराठी में पर्याय शब्द दिए हैं। उसी के द्वारा मराठी से संबद्ध १२ वीं शती के उन कोशों का संकेत मिलता है जो आज अनुपलब्ध हैं। शिवाजी द्वारा भी उनके समय में 'राज-व्यवहार-कोश' बना था जिसमें मराठी, फारसी और संस्कृत—तीनों भाषाओं की सहायता ली गई थी। रघुनाथ पंडितराव द्वारा ३८४ पद्यों का यह छंदोबद्ध कोश ऐसा त्रिभाषी कोश है जो अपने ढंग का विशेष कोश कहा जा सकता है। संस्कृत और फारसी के भी अर्थपर्यासूचक ऐसे कोश संस्कृत माध्यम से मुगल शासनकाल में बने थे।

आगे चलकर पाश्चात्यों के संपर्क और प्रभाव से 'मराठी इंगलिश' के अनेक कोश बने। चीफ कैप्टन गोल्सवर्थ ने अंग्रेजी—मराठी का एक विशाल कोश १८३१ ई० में बनाया था। थामस कैंडी के सहयोग से उस कोशों के संशोधित और परिवर्धित अनेक संस्करण छपे। मराठी के इन कोशों की परंपरा १९ वीं शताब्दी के आरंभ से अबतक चली आ रही है। कोशों की दृष्टि से मराठी भाषा अत्यंत संपन्न है। अंग्रेजी कोशों में केरी, कर्नल केनेडी और गोल्सवर्थ कैडी के मराठी इंगलिश कोश महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। इनके अतिरिक्त १९ वीं शती के कुछ प्रमुख मराठी कोश हैं—(१) महाराष्ट्र भाषे चा कोश (इसके प्रथम भाग का प्रकाशन १८२९ ई० से प्रारंभ हो गया था); (२) रघुनाथ भास्कर गाडबोले का हंसकोश (१८६३ ई०); (३) बोडकर का रत्नकोश (१८६९ ई०) और (४) मराठी भाषा का नवीन कोश (१८९० ई०)। बीसवीं सदी के कोशों में—वा० गो० आप्टे का— मराठी शब्दरत्नाकर और विद्याधर का सरस्वती कोश आधिक प्रसिद्ध है। सामान्य शब्दार्थ कोशों के अतिरिक्त मराठी—व्युत्पत्तिकोश (कृष्णाजी पांडुरंगा कुलकर्णी—१९४६ ई०) अत्यंत प्रसिद्ध व्युत्पत्ति- कोश है। इसमें मराठी भाषा का पूर्ण प्रयोग हुआ है। मराठी में विश्वकोश लोकोक्तिकोश, वाक्संप्रदायकोश, (अनेक) ज्ञानकोश और शब्दार्थकोश है। गोविंदराव काले का एक पारिभाषिक शब्दकोश भी है जिसमें अंग्रेजी सैनिक शब्दों का शब्दार्थ संग्रह मिलता है। मराठी हिंदी कोश भी अनेक बने हैं। इनंमें कुछ उत्तम कोटि के भी कोश हैं।

पंजाबी, काश्मीरी, नेपाली[संपादित करें]

लोदियन मिशन द्वारा १८५४ ई० में पंजाबी शब्दकोश बना था जिसमें गुरूमुखी और रोमन में मूल शब्द थे तथा अंग्रेजी में अर्थ था। इसके बाद पंजाबी कोशों का सिलसिला चलता है तथा पंजाबी के कोश बनने लगे।

इधर २० वीं शती में भाई विशनदास पुरी के संपादकत्व में प्रकाशित (१९२२ ई०) और पंजाब सरकार के भाषा विभाग, पटियाला से प्रकाश्य- माना पंजाबी कोश अत्यंत महत्व के हैं। द्वितीय कोश कदाचित् पंजाबी का सर्वोत्तम कोश है।

काश्मीरी भाषा के अपने मैनुअल में डा० ग्रियर्सन ने व्याकरण बनाया और फ्रजबुक के साथ सात शब्दकोश भी संपादित (१९३२ ई०) किया था। इसके मूलकर्ता ईश्वर कौल थे और संभवतः १८९० ई० के पूर्व इसकी रचना हो चुकी ती। इसका पूर्व भी १८८५ ई० में इस दिशा का कुछ कार्य हो चुका था। टर्नर की नैपाली डिक्शनरी यद्यपि बहुत बाद की है, तथापी उसमें कोशविज्ञान और भाषाविज्ञान का विनियोग जिस सहता के साथ हुआ है वह अत्यंत प्रशंसनीय है।

उर्दू कोश[संपादित करें]

उन उर्दू के कोशों की चर्चा ऊपर हुई है जिन्हें विदेशियों ने बनाया। हिंदी या हिंदुस्तनी कोशों के साथ या इनका मिश्रित रूप ही प्रायः रहा। कभी कभी वे अलग भी थे। इनके पूर्व और बाद में बहुत से ऐसे कोश भी बने जो फारसी लिपि में निर्मित थे। इनमें फरहंगे अस- फिया, तख्मीस्सुल्लुगात, लुगात किसोरी अधिक महत्व के और प्रसिद्ध माने जाते हैं। तत्वतः इनमें हिंदी के शब्दों की संख्या बहुत ज्यादा है। पर लिपिभेद के कारण हिंदी मात्र जानेवाले इनका उपयोग और प्रयोग नहीं कर पाते। 'फरहंगे-ए-इस्तलाहात— वस्तुतः मौं० अब्दुलहक की योजना और प्रेरणा से रचित उर्दू का विशाल कोश है। इनके अतिरिक्त भी अमीर मीनाई का आमीरूल् लुगात तथा करीमुल्लुगात उर्दूकोशों में प्रसिद्ध हैं। श्रीरामचद्र वर्मा, श्रीहरिशंकर शर्मा आदि ने नागरी लिपि में भी कोश बनाए। उत्तर प्रदेश सरकार ने मद्दाह द्वारा संपादित उर्दू हिंदी कोश प्रकाशित किया है जिसे अच्छा कोश कहा जाता है।

गुजराती, उडिया और असमिया[संपादित करें]

गुजराती, उडिया और असमिया में भी अनेक आधुनिक कोश बन चुके हैं और निरंतर बनते जा रहे हैं। नवजीवन प्रकाशन मंदिर का सार्थ गुजराती मंउणी कोश, तता शापुरजी दरालजी का गुजराती इंग्रेजी कोश प्रसिद्ध हैं। असमिया में १८३७ ई० में ब्राउन्सन (अमेरिकी मिशनरी) ने असमिया—इंग्लिश डिक्शनरी बनाई थी। हेमचंद्र बरूआ द्वारा निर्मित 'असमिया—अंग्रेजी कोश', विशेष प्रसिद्ध है। उडिया में भी ऐसे अनेक कोश बन चुके हैं। कहने का सारांश यह है कि भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में आधुनिक कोशों की प्रेरणा पाश्चात्यों से मिली और भारतीयों ने उस कार्य को निरंतर आगे बढाने में योगदान किया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]