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महाभाष्य

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आचार्य पतंजलि ने पाणिनि कृत अष्टाध्यायी के कुछ चुने हुए सूत्रों पर भाष्य लिखा जिसे व्याकरणमहाभाष्य का नाम दिया (महा और भाष्य (समीक्षा, टिप्पणी, विवेचना, आलोचना))। व्याकरण महाभाष्य में कात्यायन वार्तिक भी सम्मिलित हैं जो पाणिनि के अष्टाध्यायी पर कात्यायन के वार्तिक हैं। कात्यायन के वार्तिक कुल लगभग १४०० हैं जो अन्यत्र नहीं मिलते बल्कि केवल व्याकरणमहाभाष्य में आचार्य पतंजलि द्वारा सन्दर्भ के रूप में ही उपलब्ध हैं। इस की रचना लगभग ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में हुई थी।[1][2]

संस्कृत के तीन महान् वैयाकरणों में पतंजलि भी हैं। अन्य दो हैं - पाणिनि तथा कात्यायन (१४० ईसा पूर्व)। महाभाष्य ग्रन्थ में शिक्षा (phonology, including accent), व्याकरण (grammar and morphology) और निरुक्त (etymology) - तीनों की चर्चा हुई है।

रचनाकाल

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इस की रचना ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की मानी जाती है। महाभाष्यकार "पतंजलि" का समय असंदिग्ध रूप में ज्ञात है। शासक पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में आचार्य पतंजलि वर्तमान थे। महाभाष्य के निश्चित साक्ष्य के आधार पर विजयोपरांत पुष्यमित्र के श्रौत (अश्वमेध यज्ञ) में संभवतः पतंजलि पुरोहित थे। यह (इह पुष्यमित्रं याजयाम:) महाभाष्य से सिद्ध है। साकेत और माध्यमिका पर यवनों के आक्रमणकाल में पतंजलि विद्यमान थे। अत: महाभाष्य और महाभाष्यकार पतंजलि - दोनों का समय ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी निश्चित है। द्वितीय शताब्दी ई.पू. में मौर्यों के सेनापति पुष्यमित्र शुंग, मौर्य वंशी बृहद्रथ को हटा के सिंहासन पर बैठे थे। नाना विद्वानों के विचार से २०० ई.पू. से लेकार १४० ई.पू. तक महाभाष्य की रचना का मान्य काल है।

संरचना, विषयवस्तु एवं भाषा शैली

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व्याकरण महाभाष्य की सारी योजना "अष्टाध्यायी" पर आधारित है। इसमें कुल ८५ आह्निक (अध्याय) हैं। भर्तृहरि के अनुसार "महाभाष्य" केवल व्याकरण शास्त्र का ही ग्रंथ नहीं है वरन् समस्त विद्याओं का आगार है। (वाक्यपदीय) । महर्षि पतञ्जलि ने समस्त वैदिक व लौकिक प्रयोगों का अनुशीलन करते हुए तथा पूर्ववर्ती सभी व्याकरणों का अध्ययन कर, समग्र व्याकरणिक विषयों का प्रतिपादन किया है। इसमें व्याकरण विषयक कोई भी प्रश्न अछूता नहीं रहा है।

इस की रचना में पाणिनि व्याकरण के समस्त रहस्य स्पष्ट हो गए और उसी का पठन पाठन होने लगा। "अष्टाध्यायी" के १४ प्रत्याहार सूत्र को मिलाकर ३९९५ सूत्र हैं, किन्तु इस महाभाष्य में १६८९ सूत्रों पर ही भाष्य लिखा गया है। शेष सूत्रों को उसी रूप ग्रहण कर लिया है। व्याकरण के कुछ विद्वानों के मत में आचार्य पतंजलि ने अपने कतिपय सूत्रों में वार्तिककार के मत को भ्रान्त ठहराते हुए पाणिनि के ही मत को प्रामाणिक माना व १६ सूत्रों को अनावश्यक सिद्ध किया है। इन्होंने वार्तिककार कात्यायन के अनेक आक्षेपों का उत्तर देते हुए पाणिनि के प्रति उन की अतिशय भक्ति व्यक्त की है। उन के अनुसार आचार्य पाणिनि का एक भी कथन अशुद्ध नहीं है।

महाभाष्य की निरूपण शैली तर्कपूर्ण व सर्वथा मौलिक है। इस में संभाषणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है तथा विवेचन के मध्य संवादात्मक वाक्यों का समावेश कर विषय को रोचक बनाते हुए पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया गया है। उस की व्याख्यान पद्धति के तीन तत्त्व है - सूत्र का प्रयोजन निर्देश, पदों का अर्थ करते हुए सूत्रार्थ निश्चित करना, और "सूत्र की व्याप्ति बढ़ा कर, सूत्र का नियंत्रण करना" । "महाभाष्य" का उद्देश्य ऐसा अर्थ करना था, जो पाणिनि के अनुकूल या इष्टसाधक हो। अतः जहां कहीं भी सूत्र के द्वारा यह कार्य संपन्न होता न दिखाई पड़ा, वहां पर या तो सूत्र का "योग विभाग" किया गया है या पूर्व प्रतिषेध को ही स्वीकार कर लिया गया है। उन्होंने केवल दो ही स्थलों पर पाणिनि के दोष दर्शाये हैं। "महावाक्य" में स्थान स्थान पर सहज, तिक्त व कटु शैली का भी प्रयोग है। व्यंग्यमयी कटाक्षपूर्ण शैली के उदाहरण तो उस में भरे पड़े हैं।

"महाभाष्य" में व्याकरण के मौलिक व महनीय सिद्धान्तों का भी प्रतिपादन किया गया है। इसमें लोक विज्ञान व लोक व्यवहार के आधार पर मौलिक सिद्धांत की स्थापना की गई है, तथा व्याकरण को "दर्शन" का स्वरूप प्रदान किया गया है। इस में स्फोटवाद की मीमांसा करते हुए शब्द को ब्रह्म का रूप माना गया है। इस के प्रारंभ में ही यह विचार व्यक्त किया गया है कि शब्द उस ध्वनि को कहते हैं, जिस के व्यवहार करने से पदार्थ का ज्ञान हो। लोक में ध्वनि करने वाला बालक "शब्दकारी" कहा जाता है। अतः ध्वनि ही शब्द है। यह ध्वनि स्फोट का दर्शक होती है। शब्द नित्य है, और उस नित्य शब्द का ही अर्थ होता है। नित्य शब्द को ही "स्फोट" कहते हैं। स्फोट की न तो उत्पत्ति होती है और न नाश। शब्द के दो भेद है - नित्य और कार्य । स्फोट स्वरूप शब्द नित्य होता है तथा ध्वनिस्वरूप शब्द कार्य। स्फोट वर्ण नित्य होते हैं, वे उत्पन्न नहीं होते। उन की अभिव्यक्ति व्यंजक ध्वनि के द्वारा ही होती है।

इस ग्रंथ के पठन पाठन की परंपरा तीन बार खण्डित हुई। आचार्य चन्द्रगोमी ने प्रथम बार एक पाण्डुलिपि बड़े परिश्रम से प्राप्त कर तथा उसे परिष्कृत कर उस परम्परा की पुनः स्थापना की। दूसरी बार खण्डित परम्परा क्षीरस्वामी ने स्थापित की। तीसरी बार स्वामी विरजानन्द तथा शिष्य दयानन्द स्वामी ने की। वर्तमान प्रति में अनेक प्रक्षेपक हैं। कुछ मूल पाठ भ्रष्ट या लुप्त हो गए हैं।

महाभाष्य की महत्ता के अनेक कारण हैं। प्रथम हेतु है उस की पाण्डित्यपूर्ण विशिष्ट व्याख्याशैली। विवादास्पद स्थलों का पूर्वपक्ष उपस्थित करने के बाद उत्तरपक्ष उपस्थित किया है। शास्त्रार्थ प्रक्रिया में पूर्व और उत्तर पक्षों का व्यवहार चला आ रहा है। इस के अतिरिक्त आवश्यक होने पर उस पक्ष का भी उपन्यास किया है। विषय प्रतिपादन दूसरी विशेषता है। महाभाष्य की व्याख्या का क्रम तो अष्टाध्यायी और तदंतर्गत चार पादों और उनके सूत्रों का क्रम है। पर भाष्य के अपने क्रम में व्याख्या का नियोजन विभक्त है, जिसका अर्थ यह भी होता है कि एक "महाभाष्य" लिखा जाता रहा।

"पतंजलि" ने अपने महाभाष्य में व्याकरण की दार्शनिक शब्दनित्यत्ववाद या स्फोटवाद अथवा शब्दब्रह्मवाद का किया है। इस सिद्धांत को भर्तृहरि ने विस्तार के से वाक्यपदीय में पल्लवित किया है। महाभाष्य की महत्ता का यह कारण है। साहित्यिक दृष्टि से महाभाष्य का गद्य अत्यन्त अकृत्रिम, मुहावरे पूर्ण, धाराप्रावाहिक और स्पष्टार्थबोध है। भर्तृहरि ने इस पर टीका लिखी थी पर उसका अधिकांश अनुपलब्ध है। केय्यट की "प्रदीप" नामक टीका और नागोजि भट्ट उद्योत नाम से "प्रदीपटीका" प्रकाशित है। आचार्य भट्टोजि दीक्षित ने अपने "शब्दकौस्तुभ" की रचना महाभाष्य के आधार पर की।

संस्कृत व्याकरण में "मुनित्रय" को बहुत ही उच्च और प्रामाणिक पद दिया गया है। अष्टाध्यायी के रचनाकार आचार्य पाणिनि, वार्त्तिककार कात्यायन और महाभाष्यकार पतंजलि - इन्हीं तीनों को "मुनित्रय" कहा गया है। व्याकरणशास्त्र के इतिहास में पाणिनीय व्याकरण की शाखा के अतिरिक्त पूर्व और परवर्ती अनेक व्याकरण शाखाएँ रही हैं। परंतु "मुनित्रय" से पोषित और समर्थित व्याकरण की पाणिनीय शाखा को जो प्रसिद्धि, मान्यता और लोकप्रियता प्राप्त हुई वह अन्य शाखाओं को नहीं मिल सकी - जिसका कारण महाभाष्य ही माना गया है। अष्टाध्यायी पर "कात्यायन" ने वार्त्तिकों की रचना द्वारा व्याकरणसिद्धांतों को अधिक पूर्ण और स्पष्ट बनाया। "पतंजलि" ने मुख्यत: वार्त्तिकों की व्याख्या को महाभाष्य द्वारा आगे बढ़ाया। अनेक स्थलों पर उन्होंने कात्यायनमत का प्रत्याख्यान और पाणिनिमत की मान्यता भी सिद्ध की है। कभी-कभी उन सूत्रों की भी विवेचना की है जो कात्यायन ने छोड़ दिए थे।

इस महाभाष्य की रचनापीठिका का निर्देश करते हुए वाक्यपदीयकार "भर्तृहरि" ने बताया है कि जब व्याकरण के पाठक संक्षेपरुचि और अल्पविद्यापरिग्रह बन गए, "संग्रह" ग्रंथ (जिसके कर्ता परंपरा के अनुसार व्याडि हैं) अस्त हो गया तब तीर्थदर्शी गुरु पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की, जिसमें सभी न्यायबीजों का भी निबंधन है। इससे पता चलता है कि "पतंजलि" के पूर्व "संग्रह" नामक ग्रंथ में व्याकरण संबद्ध विवेचन अत्यंत विस्तृत था। "संग्रह" नामक ग्रंथ में एक लाख श्लोक होने का उल्लेख महाभाष्य तथा प्रदीप की टीका ‘उद्योत’ में नागेश भट्ट ने किया है।

महाभाष्य की टीकाएँ

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महाभाष्य की अनेक टीकाएं हुई हैं। अनेक टीकाएं हस्तलेख के रूप में हैं। उपलब्ध टीकाओं में भर्तृहरि की टीका सर्वाधिक प्राचीन है। इसका नाम है "महाभाष्यदीपिका"। ज्येष्ठकलंक व मैत्रेयरक्षित की टीकाएं अनुपलब्ध हैं। कैयट, पुरुषोत्तम देव, शेषनारायण, नीलकंठ वाजपेयी, यज्वा व नारायण, विष्णु कृत महाभाष्यप्रकाशिका, नागेश भट्ट कृत महाभाष्यप्रत्याख्यानसंग्रह, कैयट कृत महाभाष्यप्रदीप की टीकाएं उपलब्ध हैं।

महाभाष्यदीपिका

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यह महाभाष्य पर भर्तृहरि की विस्तृत तथा प्रौढ़ व्याख्या है। अनेक ग्रंथों में इसे उद्धृत किया गया है। उन अनेक उद्धरणों से अनुमान होता है कि उन्होंने सम्पूर्ण महाभाष्य पर दीपिका रची थी। कालान्तर से वह तीन पादों तक शेष रहने से बाद के वैयाकरणों ने केवल तीन पादों की भाष्यरचना का निर्देश किया है। वर्तमान में समूचे एक पाद की भी दीपिका उपलब्ध नहीं है। सर्वप्रथम डा० कीलहार्न ने केवल ५७०० श्लोक तथा ४३४ पृष्ठों का एक हस्तलेख बर्लिन में उपलब्ध होने की सूचना दी। अभी तक अन्य प्रति अप्राप्त हैं। ईत्सिंग के समय दीपिका में २५००० श्लोक थे, संभवतः मूल दीपिका इस से बहुत अधिक थी।

महाभाष्यप्रकाशिका

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बीकानेर के अनूप संस्कृत पुस्तकालय में उपलब्ध पाण्डुलिपि में प्रारंभ के २ आह्निकों की टीका उपलब्ध है।

महाभाष्यप्रत्याख्यानसंग्रह

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यह पातंजल महाभाष्य की टीका है। वाराणसी की सारस्वती सुषमा में क्रमशः प्रकाशित।

महाभाष्यप्रदीप

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यह भर्तृहरिकृत वाक्यपदीय तथा प्रकीर्ण काण्ड पर आधारित पातञ्जल महाभाष्य की प्रौढ तथा पाण्डित्यपूर्ण टीका है। महाभाष्य को समझने के लिये यह एकमात्र सहारा है। यह पाणिनीय संप्रदाय का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। प्रस्तुत प्रदीप पर १५ टीकाकारों ने टीकाओं की रचना की है। मल्लयज्वा के महाभाष्यप्रदीपटिप्पणी की पाण्डुलिपि उपलब्ध है। इन के पुत्र तिरुमल की प्रदीप व्याख्या अप्राप्त है।

महाभाष्यप्रदीप प्रकाशिका (प्रकाश) : टीकाकार - प्रवर्तकोपाध्याय। मद्रास, अड्यार, मैसूर और त्रिवेन्द्रम में इसकी पाण्डुलिपि विद्यमान है।

महाभाष्यप्रदीप विवरणम् : टीकाकार - नारायण। मद्रास और कलकत्ता में अनेक पाण्डुलिपियां उपलब्ध हैं।

महाभाष्यकैयप्रकाश : टीकाकार - चिन्तामणि । महाभाष्यप्रदीपव्याख्या ले. हरिराम (आफ्रैट बृहत्सूची में निर्दिष्ट)।

महाभाष्यप्रदीपस्फूर्ति : टीकाकार - सर्वेश्वर सोमयाजी। अड्यार - ग्रंथालय में पाण्डुलिपि उपलब्ध।

महाभाष्यरत्नाकर : टीकाकार - शिवरामेन्द्र सरस्वती। (एक पाण्डुलिपि सरस्वतीभवन काशी में है)।

महाभाष्यलघुवृत्ति : टीकाकार - पुरुषोत्तम देव। ई. १२ - १३वीं शती ।

महाभाष्यविवरणम् : टीकाकार - नारायण ।

महाभाष्यस्फूर्ति : टीकाकार - सर्वेश्वर दीक्षित।

महाभाष्यप्रदीपोद्योत : टीकाकार - नागोजी भट्ट । ई. १८वीं शती। पिता - शिवभट्ट। माता - सती । पातंजल महाभाष्य पर कैयटकृत प्रदीप नामक टीका की यह व्याख्या है।

महाभाष्यप्रदीपोद्योतनम् : टीकाकार - अनंभट्टकैयटकृत महाभाष्य प्रदीप की यह व्याख्या है। इस पर वैद्यनाथ पायगुडे (नागोजि भट्ट के शिष्य) ने छाया नामक टीका लिखी।

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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सन्दर्भ

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  1. Kahrs 1998, p. 13.
  2. K. Kunjunni Raja. "Philosophical elements in Patañjali's Mahābhāṣya". In Harold G. Coward, K. Kunjunni Raja (eds.). Encyclopedia of Indian philosophies. 5 (The Philosophy of the Grammarians). Motilal Banarsidass Publ. p. 115. ISBN 81-208-0426-0.

अन्य पठनीय सामग्री

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  • The Mahābhāṣya of Patañjali with annotation (Ahnikas I – IV), Translated by Surendranath Dasgupta, Published by Indian Council of Philosophical Research
  • Mahābhāṣya of Patañjali (Śrīmadbhagavat-patañjali-muni-viracitaṃ Pātañjalaṃ Mahābhāṣyam) by Patañjali (in Sanskrit), Publisher: Vārāṇasī : Vāṇīvilāsa Prakāśana, 1987-1988., OCLC: 20995237
  • Bronkhorst, Johannes, 1992. Panini's View of Meaning and its Western Counterpart. In, Maxim Stamenov (ed.) Current Advances in Semantic Theory. Amsterdam: J. Benjamins. (455-64)
  • Scharfe, Helmut, 1977. Grammatical Literature. Vol. V, Fasc. 2, History of Indian Literature, (ed.) Jan Gonda. Wiesbaden: Otto Harrassowitz.
  • Staal, J.F. (ed.), 1985. A Reader on Sanskrit Grammarians. Delhi: Motilal Banarasidass.