भास

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भास संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार थे जिनके जीवनकाल के बारे में अधिक पता नहीं है। स्वप्नवासवदत्ता उनके द्वारा लिखित सबसे चर्चित नाटक है जिसमें एक राजा के अपने रानी के प्रति अविरहनीय प्रेम और पुनर्मिलन की कहानी है। कालिदास जो गुप्तकालीन समझे जाते हैं, ने भास का नाम अपने नाटक में लिया है, जिससे लगता है कि वो गुप्तकाल से पहले रहे होंगे पर इससे भी उनके जीवनकाल का अधिक ठोस प्रमाण नहीं मिलता। आज कई नाटकों में उनका नाम लेखक के रूप में उल्लिखित है पर १९१२ में त्रिवेंद्रम में गणपति शास्त्री ने नाटकों के लेखन शैली में समानता देखकर उन्हें भास-लिखित बताया। इससे पहले भास का नाम संस्कृत नाटककार के रूप में विस्मृत हो गया था।

उल्लेख[संपादित करें]

संस्कृत नाटककारों में भास का नाम बड़े सम्मान का विषय रहा है। कालिदास ने अपने पूर्ववर्ती और लोकप्रिय नाटककारों की चर्चा करते हुए सबसे पहले भास और बाद में सोमिल (सौमिल्ल) एवं कविपुत्र के नाम लिए हैं और उन्हें यशस्वी नाटककार कहा है। बाणभट्ट, वाक्यतिराज और जयदेव ने भी उनकी प्रशंसा की है। वामन की "काव्यालंकार सूत्रवृति" और अभिनवगुप्त की "अभिनवभारती", राजशेखर की "काव्यमीमांसा" से भास के नाटकों का अस्तित्व सूचित है। "अवंतिसुंदरी कथा" में भी उनका नाम आया है। अत: निश्चित है कि संभवत: अश्वघोष के परवर्ती और कालिदास से पूर्ववर्ती नाटककार के रूप में भास अत्यंत लोकविश्रुत कलाकार थे।

रचनाएं[संपादित करें]

भास संस्कृत साहित्य के बड़े नाटककार के रूप में मान्य थे परंतु उनके नाटक अप्राप्त थे। सन् 1907 ई0 में म0 म0 टी0 गणपति शास्त्री को मलयालम लिपि में लिखित संस्कृत के दस नाटक प्राप्त हुए। खोज करने पर तीन और नाटक मिले। 1912 ई0 में गणपति शास्त्री द्वारा अनंतशयन संस्कृत ग्रंथावली में भास के नाम से वे प्रकाशित किए गए। इन नाटकों की अनेक प्रतियाँ अन्य स्थानों से प्राप्त हुई।

उक्त 13 नाटकों को पूर्णत: या अंशत: भासकृत मानने / न मानने वालों के पक्ष तर्कसमर्पित होकर भी आजतक निर्णायक नहीं हो सके। इस विवाद के उठने के अनेक कारण हैं। नाटकों की स्थापना (प्रस्तावना) और पुष्पिका में कहीं भी नाटककार भास का नाम नहीं मिलता। संस्कृत ग्रंथों में भास के जो अंश उदधृत हैं उनमें अधिकांश अक्षरश: इन नाटकों में अनुपलब्ध हैं। इसी प्रकार अनेक कारण है जो उन तेरह नाटकों की भासरचना विषयक प्रामाणिकता को संदिग्ध बनाते हैं।

इस प्रसंग के प्रमुख मतपक्षों को चार वर्गो में रखा जा सकता है

  • (क) कुछ विद्वान् इन नाटकों को भासकृत मानते हैं - जैसे डॉ॰ कीथ, पुसलकर, अय्यर आदि;
  • (ख) कुछ लोग प्रचलित नाटकों को केरल के चाक्यार नटों की कृति मानते हैं या परवर्ती किसी सामान्य नाटककार की रचना समझते हैं;
  • (ग) दूसरे पंडितों का कथन है कि "प्रतिज्ञायौगंधरायणम्" "स्वप्नवासवदत्तम्" आदि नाटक भासकृत हैं क्योकि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में उनका संकेत है तथा अन्य भासकृत नहीं है;
  • (घ) अन्य कुछ विद्वानों के मत से मूलत: वे नाटक भासकृत थे; पर उनका वर्त्तमान रूप नटों या अन्य द्वारा नाट्यप्रयोगानुकूल परिवर्तित या संक्षिप्त होकर सामने आया है।

यह भी कभी कभी कहा जाता है कि भास के उपलब्ध नाटक अधूरे थे जिसे अन्य या अन्यजनों ने पूरा करके उन्हें वर्तमान रूप दिया। जो हो, यह निश्चित है क ये नाटक जाली नहीं हैं। केरल के चाकार परंपरा ने समान रूप से सुरक्षित रखा है। परंपरागत प्रसिद्धि के अनुसार उनकी संख्या 23 या 30 कही गई है। त्रिवेंद्रम् संस्करण के 13 नाटकों में कुछ ऐसी समानताएँ और विशेषताएँ हैं जिनके कारण वर्तमान संस्करण की नाट्यलेखन और नाट्यशिल्प के कलाकार की एकता सूचित होती है। "नांद्यंते तत: प्रविशति सूत्रधार:" से इनका आरंभ, प्रस्तावना के स्थान पर स्थापना शब्द का प्रयोग, नाटककार के नाम का अभाव, भरतवाक्य में प्राय: साम्य, भरत के नाट्यशास्त्रीय कुछ विधानों का अपालन, संस्कृत में कतिपय अपाणिनीय रूप का प्रयोग, अनेक नाटकों में कुछ पात्रों के नाम का साम्य, विचार और आदर्श की समानता, प्राकृत भाषा की कुछ विलक्षणता आदि ऐसी बातें हैं जिनके कारण इन सब के एककर्तृत्व का संकेत भी मिलता है। पर वह भास थे या चाक्यार नटों के नाट्यरूपंतकार, यह नहीं कहा जा सकता।

नाटक[संपादित करें]

1912 में त्रिवेंद्रम् से गणपति शास्त्री द्वारा प्रकाशित कराए गए 13 नाटक भासकृत माने जाते हैं।

  • (1) स्वप्नवासवदत्ता,
  • (2) प्रतिज्ञा यौगंधरायण,
  • (3) दरिद्र चारु दत्त,
  • (4) अविमारक
  • (5) प्रतिमा
  • (6) अभिषेक,
  • (7) बालचरित
  • (8) पंचरात्र
  • (9) मध्यमाव्यायोग,
  • (10) दूतवाक्य
  • (11) दूतघटोत्कच
  • (12) कर्णभार
  • (13) उरुभंग।

इनमें प्रथम आठ नाटक अनेकांकी (तीन से सात अंक वाले) हैं और अंतिम पाँच एकांकी हैं। प्रथम दो नाटक उदयनकथाश्रित हैं, 3, 4 संख्यक नाटक कल्पित कथाश्रित हैं (तृतीय की लगभग वही कथा है जो शूद्रक के "मृच्छकटिकम्" में है), 5, 6 संख्यक रामकथाश्रित हैं, सप्तम नाटक कृष्णकथाश्रित है तथा अष्टम से तेरहवें तक के नाटकों का आधार महाभारत है। इनकी कथावस्तुओं में नाटककार ने कल्पनाजन्य घटनाओं, पात्रों आदि का भी नाटकीयता के लिये पर्याप्त उपयोग किया है।

प्रतिमा[संपादित करें]

यह सात अंकों का नाटक है, जिसमें भास ने राम वनगमन से लेकर रावणवध तथा राम राज्याभिषेक तक की घटनाओं को स्थान दिया है। महाराज दशरथ की मृत्यु के उपरान्त ननिहाल से लौट रहे भरत अयोध्या के पास मार्ग में स्थित देवकुल में पूर्वजों की प्रतिमायें देखते हैं , वहाँ दशरथ की प्रतिमा देखकर वे उनकी मृत्यु का अनुमान कर लेते हैं। प्रतिमा दर्शन की घटना प्रधान होने से इसका नाम प्रतिमा नाटक रखा गया है।

प्रतिमा निर्माण की कथा भास की अपनी मौलिकता है। भास ने इस नाटक में मौलिकता लाने में प्रचलित रामचरित से पर्याप्त पार्थक्य ला दिया है। यद्यपि ये सारी घटनायें प्रचलित कथा से भिन्न हैं , पर नाटकीय दृष्टि से इनका महत्व सुतरां ऊँचा है और पाठक अथवा दर्शक की कुत हू ल वृद्धि में ये घटनायें सहायक हुई हैं । इस नाटक में रामायणीय कथा से भिन्नतायें इस प्रकार हैं - प्रथम अंक में सीता द्वारा परिहास में वल्कल पहनना भास की मौलिकता है। तृतीय अंक में प्रतिमा का सम्पूर्ण प्रकरण ही कवि कल्पित है और यह कल्पना ही नाटक की आधारभूमि बनायी गयी है। पाँचवें अंक में सीता का हरण भी यहाँ नवीन ढंग से बताया गया है।

यहाँ राम के उटज में वर्तमान रहने पर ही रावण वहाँ आता है और दशरथ के श्राद्ध क लिए उन्हें काञ्चनपार्श्व मृग लाने को कहता है तथा उन्हें काञ्चन मृग दिखाकर दूर हटाता है। यह सम्पूर्ण प्रस ग नाटककार द्वारा गढ़ा गया है। पांचवें अंक में सुम त्र का वन में जाना तथा लौटकर भरत से सीताहरण बताना कवि कल्पना का प्रसाद है। कैकयी द्वारा यह कहना भी कि उसने ऋषिवचन सत्य करने के लिए राम को वन भेजा भास की प्रसि त है। अन्ततः सप्तम अंक में राम का वन में ही राज्याभिषेक इस नाटक में मौलिक ही है।

प्रतिमा नाटक भास के सर्वोत्तम नाटकों में से एक है। सात अंकों के इस नाटक में भास की कला पर्याप्त ऊँचाईं को प्राप्त कर चुकी है। इस नाटक में भास ने पात्रों का चारित्रिक उत्कर्ष दिखाने का भरसक प्रयास किया है। इतिवृत्त तथा चरित्र चित्रण दोनों दृष्टियों से यह नाटक सफल हुआ है। भावों के अनुकूल भाषा तथा लघु विस्तारी वाक्य भास के नाटकों की अपनी विशेषताएँ हैं । यह करुणरस प्रधान नाटक है तथा अन्य रस इसी में सहायक बनकर आये हैं ।

अभिषेक[संपादित करें]

यह भी रामकथा पर आश्रित है। इसमें छः अंक हैं। इसमें रामायण के किष्किंधाकाण्ड से युद्धकाण्ड की समाप्ति तक की कथा अर्थात् बालिवध से राम राज्याभिषेक तक की कथा वर्णित है। रामराज्याभिषेक के आधार पर ही इसका नामकरण किया गया है। कथानक को सजान संवारने में नाटककार ने पर्याप्त मौलिकता का परिचय दिया है। बालिवध को न्या ̧य रूप देने का भी नाटककार ने पर्याप्त प्रयास किया है।

इस नाटक के नायक मर्यादापुरूषोत्तम श्री रामचन्द्र हैं । लोकोपदेश उनके चरित्र का प्रधान भाग है। लक्ष्मण का चरित्र इस नाटक में विशेष प्रस्फुटित नहीं हो सका है। वे श्रीराम क एक आज्ञाकारी सेवक तथा विनीत भक्त के रूप में सामने आते हैं । सुग्रीव का चरित्र इस नाटक में प्रारंभ से लेकर अन्त तक किसी न किसी रूप में वर्तमान रहता है। विभीषण न्यायप्रिय भगवद् भक्त के रूप में अंकित किया गया है। रावण क्रूर, दुराचारी तथा परस्त्री लम्पट के रूप में चित्रित किया गया है।

अभिषेक नाटक के प्रणयन में भास ने पर्याप्त सफलता प्राप्त की है। यद्यपि काव्य तथा नाटकीयता की दृष्टि से यह नाटक प्रतिमा नाटक की अपेक्षा अवर कोटि का है तथापि इस नाटक की अपनी विशेषतायें हैं । राम-रावण युद्ध अपनी विशिष्टताओं में बेजोड़ है। पात्रों का कथोपकथन आकर्षक है। छोट - छोटे तथा सरल वाक्यों का विन्यास भास की अपनी विशेषता है तथा उस विशेषता का दर्शन इस नाटक में होता है।

इस नाटक का प्रधान रस वीर है जो समग्र नाटक में व्याप्त है, पर करूण रस भी यत्र तत्र अनुस्यूत है। इसकी सत्ता बालिवध के अनन्तर, सीता के सन्ताप आदि में देखी जा सकती हैं । श्रृंगार का इसमें अभाव है तथा उसके लिए कहीं अवसर भी नहीं आया है।

मध्यम व्यायोग[संपादित करें]

यह एक अंक का व्यायोग है। व्यायोग रुपक का एक भेद होता है। इसकी कथावस्तु का आधार महाभारत है। इसमें पाण्डवों के वनवास काल में भीम द्वारा घटोत्कच के पंजे से एक ब्राह्मण बालक की मुक्ति की कथा है। मध्यम शब्द मध्यम पाण्डव भीम और ब्राह्मण क मध्यम पुत्र दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसलिए इस नाटक का नाम ‘‘मध्यम व्यायोग’’ है।

नाटकीय दृष्टि से यह नाटक उत्तम कोटि का है, क्यों क इस परिपाक तथा भावोन्मेष में नाटककार को पूरी सफलता प्राप्त हुई है। कथोपकथनों में कहीं वैरस्य नहीं आता तथा दर्शक का कुतुहल प्रतिक्षण बढ़ता हुआ दिखाई देता है। इन कथोपकथनों में भाषा भी बड़ी सहायक सिद्ध हुई है। लम्बे समासान्त पदों का यहाँ अभाव है। भाषा सरलता में बेजोड़ है। घटनाक्रम में सत्वरता प्रभावोत्पादन में चार-चाँद लगा देती है। भास का काव्य कर्म भी इस रुपक में सफल रहा है।

कर्णभार[संपादित करें]

यह भी एक अंक के कथानक वाला महाभारत की कथावस्तु से सम्बद्ध व्यायोग है। द्रोणाचार्य के परलोक सिधारे जाने पर कर्ण को सेनापति बनाया जाता है तथा युद्ध का भार उस पर आ पड़ता है, इसलिए नाटक का नाम ‘‘कर्णभार’’ है।

‘‘कर्णभार’’ शीर्षक की व्याख्या विद्वानों ने अनेक प्रकार से की है। प्रोफेसर ए डी पुसालकर की सम्मति में कानों के भारभूत कुण्डलों का दानकर यहाँ कर्ण की अद्भुत दानशीलता वर्णित की गई है। अतः कानों के आधारभूत कुण्डलों के दान को केन्द्र मानकर इस नाटक की रचना करन से इस नाटक का नाम ‘‘कर्णभार’’ है। डॉ विन्टरनित्स ने कर्णभार की व्याख्या कर्ण के कठिन कार्य से की है। डॉ. भट्ट की धारणा है कि कर्ण की चिन्ता ही भारस्वरूप हो गई है। इसी बात को ध्यान में रखकर इस नाटक का नाम कर्णभार रखा गया है। कुछ लोगों के मत में कर्ण द्वारा प्राप्त युद्ध कौशल उनके लिए भारभूत हो गया था, अतः इस नाटक का नाम कर्णभार पड़ा।

इस नाटक में दो पात्रों का चरित्र मुख्य रूप से चित्रित है। एक है इस नाटक के नायक कर्ण और दूसरे हैं , छः ब्राह्मण वेषधारी देवराज इन्द्र। कर्ण के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता जो यहाँ उभर कर सामने आयी है, वह है उसकी अपूर्व ब्राह्मण निष्ठा तथा महती दानशीलता। वह ब्राह्मणों के लिए सर्वस्व दान करने के लिए तत्पर दिखाई पड़ता है। जब इन्द्र गौ, सुवर्ण आदि लेना अस्वीकार करते हैं , तब वह अपना सिर देने की बात कहता है। उसका विश्वास है कि मरने पर भी यश ही स्थिर रहता है - ’’हतेषु देहेषु गुणा धरन्ते’’। कर्ण के चरित्र की दूसरी बड़ी विशेषता है कि वह दान से किसी प्रतिफल की आशा नहीं रखता।

इन्द्र के चरित्र में स्वार्थी रुप के अतिरिक्त अन्य कोई विशेषता लक्षित नहीं होती। शल्य का चरित्र कोई विशेष उभरकर सामने नहीं आया है।

अपने लघु विस्तार में यह नाटक पूर्ण है। काव्यरस के परिपाक तथा नाटकीय तत्वों क निर्वाह दोनों दृष्टियों से यह नाटक उच्च कोटि का है। यद्यपि नाटक का विषय वीर रस और युद्ध भूमि से ही सम्बन्ध रखता है, पर नाटक में करुण रस की ही विशष प्रभा दिखाई पड़ती है।

पंचरात्र[संपादित करें]

यह तीन अंकों का ‘‘समवकार’’ हे। इसकी कथा महाभारत के विराट पर्व पर आधारित है। इसका नामकरण स्पष्ट रूप से पॉच रात्रियों में पाण्डवों को ढूँढनें की बात से हुआ है। द्रोणाचार्य के सत्प्र यास से पाण्डव मिल जाते हैं तथा दुर्योधन द्वारा उन्हे आधा राज्य दे दिया जाता है।

इस नाटक में सबसे प्रधान चरित्र दुर्योधन का चित्रित है। आरंभ से अन्त तक वह नाटक में वर्तमान है। नाटक में सर्वप्रथम एक धार्मिक राजा के रूप में उसका चरित्र सामने आया है। पाण्डवों को राज्य भ्रष्ट कर वह महान् यज्ञ का प्रवर्तन करता है। यज्ञ में सभी देश देशान्तर क राजा उसको कर देने उपस्थित होते हैं । यह उनके महान् शौर्यं पराक्रम को घोषित करता है। अवभृथ स्नान के समय दुर्योधन की अटूट गुरूभक्ति भी सामने आती है।

काव्योत्कर्ष की दृष्टि से यह रुपक उत्तम कोटि का कहा जायेगा। सरल शब्दावली में भावोन्मेष भास की अपनी विशेषता है। शब्दों के आश्रय से भास ऐसा चित्र खड़ा कर देते हैं कि पूरा दृष्य ही सामने आ जाता है। अलंकारों की संघटना भी नितान्त आकर्षक है। स्थान-स्थान पर सूक्तियाँ इस बारीकी के साथ दी गई हैं कि प्रभावोत्पादन में वे दूनी वृद्धि कर देती हैं ।

इस रूपक का प्रधान रस वीर है। श्रृगांर का इसमें पूर्णरूपेण अभाव है, जो नाटक में स्त्रीपात्रों के न आने से हुआ है। संक्षेप में इसे भासे की नाट्यचातुरी का अनुपम उदाहरण कहा जा सकता है।

उरुभंग[संपादित करें]

यह भी महाभारत की कथा पर आश्रित एक एकांकी है, इसमें व्यायोग के लक्षण घटित होते हैं । द्रा पे दी के अपमान का प्रतिशोध लेने हेतु भीम व दुर्योधन का गदायुद्ध इसमें वर्णित हुआ है। इसमें एक ही अंक है तथा समय व स्थान की अन्विति का पूर्ण रूप से पालन किया गया है। नाटक की विशिष्टता इसके दुःखान्त होने के कारण है।

इस रुपक का नायक दुर्योधन है। उसके चरित्र विन्यास में नाटककार ने पर्याप्त कौशल प्रदर्शित किया है। इस एंकाकी में नाटककार ने उसके चरित्र को नितान्त उदात्त तथा प्राञ्जल रूप में प्रदर्शित किया है। वह शौर्य पराक्रम का जीवन्त प्रतीक है। दुर्योधन के अतिरिक्त अश्वत्थामा तथा बलराम का व्यक्तित्व भी अपने में महत्वपूर्ण है।

संस्कृत नाट्य-साहित्य में उरुभंग अपना विशिष्ट स्थान रखता है। नाटकीय कौशल की दृष्टि से यह नाटकप्रशंसनीय है। कथोपकथनों में स्वाभाविकता सर्वत्र परिलक्षित होती है। समय और पात्र के अनुकूल ही वार्तालापों की संघटना की गई है। दुर्योधन के उरुभंग हो जाने पर बलराम जी की चेश्टाओं तथा कथनों में पर्याप्त स्वाभाविकता है।

रस की दृष्टि से भी नाटककार को पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई है। नाटक में करुण तथा वीर रस परस्पर अनुस्यूत हैं । इन दोनों रसों के चित्रण में लेखक को पर्याप्त सफलता मिली है।

बाल चरित[संपादित करें]

इसमें पाँच अंक हैं , यह नाटक भगवान् श्री कृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित है। पुराणों मे य ह प्रस ग बहुचर्चित है। विशेषतः श्रीमद्भागत महापुराण का तो यही सार है। इसमें श्रीकृष्ण के जन्म से कंस वध तक की कथा वर्णित है।

इसमें बाल रुपधारी भगवान् श्री कृष्ण की लीलायें व चरित्र प्रदर्शित है। अतः इस नाटक का नाम बालचरित रखा गया है।

इस नाटक में नायक के रूप में भगवान् श्री कृष्ण का चरित्र वर्णित है। नाटककार इन्हें साक्षात् परात्पर ब्रह्म के रूप में चित्रित करता है। पृथ्वी के भार को दूर करने तथा गो-ब्राह्मण की रक्षा एवं असुरों के संहार के लिये उन्होंने नर रूप धारण किया है। इसमें कृष्ण का अलौकिक एवं मानवीय दोनों रूप स्पष्टतः देखेन को मिलते हैं ।

कृष्ण के अलावा बलराम, वसुद वे जी एवं कंस का चरित्र भी इस नाटक में चित्रित किया गया है। वासुद वे जी का चरित्र शालीनता से ओतप्रा ते है। कंस का चरित्र अत्यधिक कठोर प्रदर्शित किया गया है।

नाटकीय दृष्टि से इसे एक सफल नाटक कहा जा सकता है। इसका नायक प्रख्यात तथा धीरोदात्त है। वह नायक के सभी गुणों से सम्पन्न है। इस की दृष्टि से इसमें वीर रस प्रधान है तथा करूण, रौद्र आदि रस अंग रूप में आये हैं । भाषा कथोपकथनों के अनुरूप है। सरल भाषा दर्शक के हृदय पर अपना अपूर्व प्रभाव डालती है।

काव्य परिपाक की दृष्टि से यह नाटक अत्यन्तप्रशंसनीय है। अलंकारों का सुन्दर व समुचित प्रयोग किया गया है। बालचरित का निम्न श्लोक अनेक अलंकार ग्रन्थों में उल्लिखित हुआ है -

लिम्पतीव तमोऽगांनि वर्षतीवान्जनं नभः।
असत्पुरूष सेव वे दृष्टिर्निष्फलतां गता॥ (1/15)

रात्रि के वर्णन में नाटककार को विशेष सफलता प्राप्त हुई है। शब्दों के द्वारा भावदशा के चित्रण में भास ने महान् सफलता प्राप्त की है। शब्दों के आश्रय से सम्पूर्ण भावदशा सारी परिस्थितियाँ साक्षात् दृष्टिगत होने लगती हैं ।

दूतवाक्य[संपादित करें]

यह भी एकांकी नाटक है। रुपक के भेदानुसार यह ‘‘व्यायोग’’ है। इसमें श्रीकृष्ण का दूत के रूप में वर्णन हुआ है। श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास संधि का प्रस्ताव लेकर आते हैं किन्तु उनका वहाँ अपमान किया जाता है तथा वे असफल होकर लौटते हैं । वे कुद्ध होकर सुदर्शन चक्र का आह्वान करते हैं तथा उसे दुर्योधन का वध करने का आदेश देते हैं । परन्तु वह वैसा करन से रोकता है। इसकी कथावस्तु महाभारत से ली गई है।

इसका नामकरण बहुत ही सटीक है। सम्पूर्ण नाटक दूतवेशधारी श्रीकृष्ण के वचनों स अनुप्रमाणित है। अतः ‘‘दूतवाक्य’’ नाम पूर्णतया सार्थक है। सम्पूर्ण नाटक वीररस से ओतप्रा ते है। श्रीकृष्ण के अस्त्रों की सहसा उद्भावना तथा विराट रूप प्रदर्शन में अद्भुत रस का चमत्कार है। प्रधान रूप से आरभटी वृत्ति की योजना है।

राजनीतिक सिद्धान्तों की यह नाटक खान है। ‘‘द़ायाद्य’’ को लेकर दुर्योधन एवं श्रीकृष्ण के मध्य हुआ वार्तालाप अत्यन्त रोचक एवं सटीक है। राज्यशासन के संदर्भ में दुर्योधन का कथन अत्यन्त सारगर्भित एवं महत्वपूर्ण है। वह कहता है कि ‘‘राज्य शासन असक्तों का काम नहीं वह तो महान् बलशालियों से सिद्ध होता है -

राज्यं नाम नृपात्मजैः सहृदयैर्जित्वा रिपून् भुज्यते।
तल्लोके न तु याच्यते न तु पुनर्दीनाय वा दीयते॥

भास की भाषा सरल, पात्रानुकूल व रसानुरूप है।

दूत घटोत्कच[संपादित करें]

यह एकांकी भी महाभारत की कथा पर आधारित है। इसमें अभिमन्यु की मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण घटोत्कच को दूत रूप में धृतराष्टं के पास भेजते हैं । दुर्योधन क्रुद्ध होकर घटोत्कच का तिरस्कार करता है। दोनों में परस्पर वाद विवाद होता है। घटोत्कच दुर्योधन का युद्ध के लिये ललकारता है। धृतराष्टं उसे शान्त करते हैं । अन्त में घटोत्कच अर्जुन द्वारा अभिमन्यु का बदला लेने की बात कहकर धमकी देते हुये निकल जाता है। घटोत्कच के दूत बनकर जाने के कारण ही इसका नाम ‘‘दूत घटोत्कच’’ रखा गया है।

इस नाटक का प्रधान पात्र घटोत्कच है। वह वीर रस से ओतप्रा ते है। वीरता क साथ-साथ उसमें शालीनता तथा शिष्टता भी समभावेन दृष्टिगत होती है। वह वाक्पटु भी है। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि नाटककार ने घटोत्कच का चरित्र बहुत ही उन्नत रूप में प्रस्तुत किया है।

घटोत्कच के अलावा दुर्योधन, शकुनि तथा दुःशासन के चरित्र भी इस नाटक में उभरकर समाने आये हैं । ये सभी अत्यन्त अभिमानी तथा क्रूर प्रकृति के हैं । निहत्थे बालक अभिमन्यु का मारकर वे प्रसन्न होते हैं ।

नाटक वीर तथा करुण रस का सम्मिलन है। एक और अभिमन्यु की मृत्यु से करुण रस का वातावरण प्रस्तुत है तो दूसरी और घटोत्कच तथा दुर्योधनादि के विवाद में वीररस अपना अस्तित्व व्यक्त करता है। यह नाटक वास्तविकता के निकट प्रतीत होता है मानव हृदय की आकांक्षाओं एवं कमजोरियों के चित्रण में नाटककार अत्यन्त सफल है।

इस नाटक में भरतवाक्य का अभाव है, अतः कुछ लोग इसे अपूर्ण बतलाते हैं , संभव है आगे इसमें कुछ अंश रहा हो। परन्तु यह नाटक अपने प्रयोजन में पूर्ण है।

प्रतिज्ञायौगन्धरायण[संपादित करें]

यह लोककथाश्रित नाटक है। इसमें कौशाम्बी के राजा वत्सराज उदयन द्वारा उज्जयिनी के राजा प्रद्योत की पुत्री वासवदत्ता के हरण की कथा है। इसमें चार अंक हैं । इस नाटक का नामकरण अमात्य यौगन्धरायण की प्रतिज्ञाओं पर आश्रित है। इस नाटक में अमात्य यौगन्धरायण अपने स्वामी को शत्रु के बन्दीगृह से छुड़ा लाने की प्रतिज्ञा करता है तथा अनेक विध्नों के उपस्थित होने पर भी उसे पूर्ण कर बताता है।

इस नाटक का नायक वत्स देश का राजा उदयन कलाकारों का सिरमौर है। वह भरतवंशी राजा है। वह अत्यन्त रूपवान है तथा उसके रूप पर महासेन प्रद्योत की स्त्री भी मुग्ध है। वीणावादन में वह आचार्य है। उसके वीणावादन की प्रसिद्धि देश देशान्तर में व्याप्त है तथा बन्दी अवस्था में ही उसे प्रद्योतपुत्री वासवदत्ता को वीणा सिखाने का दायित्व मिलता है। अतुलित कला प्र मे होने के साथ-साथ वह शौर्य तथा पराक्रम से भी ओतप्रा ते है। कृत्रिम गज को पकड़ने का प्रयास करते समय जब प्रद्योत की सेना उस पर टूट पड़ती है, वह किंचित् मात्र भी विचलित नहीं होता तथा अनेकों को मृत्यु के घाट भेज देता है। यहाँ उसके धैर्य तथा पराक्रम की परीक्षा होती है जिसमें वह सफल होता है।

जब उसे बन्दी बना लिया जाता है तो वह अपने आपको मन से बन्दी नहीं मानता तथा यौगन्धरायण द्वारा मुक्ति का पूरा प्रबन्ध कर लेने पर भी वासवदत्ता को लेकर चलने का निश्चय करता है। इस काम में वह अपने कौशल तथा यौगन्धरायण के बुद्धि कौशल से सफल होता है।

उदयन के अलावा अमात्य यौगन्धरायण की भी इस नाटक में महती भूमिका है। वह बुद्धिमत्ता तथा नीतिकौशल का चूडान्त निदर्शन है। अन्य पात्रों में उज्जयिनी के राजा महासेन प्रद्योत प्रतापी राजा हैं । सर्वत्र उनके आधिपत्य का सम्मान है। वह गुणग्राहक है। मन ही मन वह वत्सराज उदयन के गुणों काप्रशंसक है। रुमण्वान तथा विदूषक दोनों स्वामिभक्त हैं । ‘प्रतिज्ञायौगन्धरायण’ भास के सफल नाटकों में अपना स्थान रखता है। कथानक का विन्यास, पात्रों का चरित्र-चित्रण, संवाद योजना एवं रसयोजना सभी का इस नाटक में सुन्दर समन्वय है। काव्यकला के परिपाक की दृष्टि से भी यह नाटक उच्चस्तरीय है। इसमें राजनीति एवं कूटनीति का साम्राज्य है। स्वामीभक्ति का महत्त्व इस नाटक में सर्वत्र लक्षित होता है। सूक्तियों का इसमें प्राचुर्य है।

स्वप्नवासवदत्तम्[संपादित करें]

भास विरचित रूपकों में यह सर्वश्रेष्ठ है। वस्तुतः यह भास की नाट्यकला का चूडान्त निदर्शन है। यह छः अंकों का नाटक है। इसमें प्रतिज्ञायौगन्धरायण से आगे की कथा का वर्णन है। इस नाटक का नामकरण राजा उदयन के द्वारा स्वप्न में वासवदत्ता के दर्शन पर आधारित है। स्वप्न वाला दृष्य संस्कृत नाट्य साहित्य में अपना विशेष स्थान रखता है।

यह नाटक नाट्यकला की सर्वोत्तम परिणिति है। वस्तु, नेता एवं रस-तीनों ही दृष्टि स यह उत्तम कोटि का है। नाटकीय संविधान, कथोपकथन, चरित्र-चित्रण, प्राकृतिक वर्णन तथा रसों का सुन्दर सामन्जस्य इस नाटक में पूर्ण परिपाक को प्राप्त हुये हैं । मानव हृदय की सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाव दशाओं का चित्रण इस नाटक में सर्वत्र देखा जा सकता है। नाटक का प्रधान रस शृंगार है तथा हास्य की भी सुन्दर उद्भावना हुई है।

अविमारक[संपादित करें]

यह लोककथा सम्बन्धी छः अंकों का रूपक है। इसमें राजा कुन्तिभोज की पुत्री कुरंगी का राजकुमार अविमारक से प्रणय एवं विवाह का वर्णन है। नायक के आधार पर इसका नामकरण अविमारक रखा गया है। अविमारक का यथार्थ नाम विष्णुसेन था तथा अवि रूपधारी असुर को मारने से उसकी संज्ञा अविमारक है।

नाटक का नायक अविमारक है। वह अतुलित पराक्रमशाली है। सहज पराक्रमशीलता तथा पर दुःखकातरता उसके स्वभाव के अंग हैं । इसी कारण वह राजकुमारी कुरंगी पर हाथी के आक्रमण करने पर उसे मुक्त करता है। अविमारक एक धीरललित नायक के रूप में इस नाटक में प्रस्तुत किये गये हैं । नाटक की नायिका कुरंगी है। वह रूपयौवन सम्पन्ना है। अन्य पात्र सौवीरराज तथा कुन्तिभोज हैं।

नाटकीयता की दृष्टि से भास के अन्य नाटकों की तरह यह नाटक भी सफल है। सरल भाषा का प्रयोग नाटक की अभिनेयता में चार-चाँद लगा देता है, कथोपकथनों में स्वाभाविकता तथा भावांकन भास की अपनी विशेषता है। छोट - छोटे वाक्य, सरल भाषा, रसानुकूल एव पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग इस नाटक को उच्चकोटि में ला खड़ा करता है। इस नाटक का प्रधान रस श्रृ गार है तथा अन्य रस उसके सहायक बनकर आये हैं ।

काव्यकला की दृष्टि से भी यह नाटक नितान्त उदात्त है। परिस्थितियों , अवस्थाओं एव भावों का सटीक शब्दों एवं आलंकारिक भाषा में वणर्न सर्वत्र विद्यमान है। प्रकृति चित्रण में नाटककार पूर्णतया सफल रहे हैं । नाटक में सूक्तियाँ यत्र-तत्र बिखरी हुई हैं । प्रसिद्ध सूक्ति ‘‘कन्यापितृत्वं खलु नाम कष्टम्’’ का भास ने यहाँ उत्तर उपस्थित किया है - ‘‘कन्या पितृत्व बहुवन्दनीयम्।’’

इस प्रकार सभी दृष्टियों से यह रूपक प्रषस्त कहा जा सकता है।

चारुदत्त[संपादित करें]

महाकवि भास की नाट्य श्रृंखला में चारुदत्त अन्तिम कड़ी माना जाता है। इसकी कथावस्तु चार अंकों में विभाजित है। शूद्रक के प्रसिद्ध प्रकरण ‘‘मृच्छकटिक’’ का आधार यही माना जाता है। इसमें कवि ने दरिद्र चारूदत्त एवं वेश्या वसन्तसेना की प्रणय-कथा का वर्णन किया है। एक अन्य पात्र शकार है जो प्रतिनायक के रूप में है। प्र मे के आदर्श की सामाजिक प्रस्तुति इसमें दृष्टव्य है।

इस नाटक का नायक वणिक्पुत्र आर्य चारूदत्त है। उसी के नाम पर इस नाटक का नामकरण हुआ है। नाटक की सम्पूर्ण घटनाएँ उसी के सुकृत्यों पर केन्द्रित हैं । चारुदत्त की दरिद्रता का बड़ा ही मार्मिक चित्रण इसमें किया गया है। चारुदत्त अत्यन्त दानी, गुणवान् एव रूपवान है। दानशीलता के कारण ही वह दरिद्र हो गया है। चारुदत्त धीर प्रकृति का मानव है। वह कला मर्मज्ञ है। वह महान् धार्मिक है तथा निर्धनावस्था में भी पूजा एवं बलिकर्म सम्पन्न करता है।

नाटक की नायिका वसन्तसेना है। वह उज्जयिनी की एक प्रसिद्ध गणिका है। वह अत्यन्त रूपवती है। शकार तथा विट उसके रुप-जल के पिपासु हैं । गणिका होते हुये भी उसका चारित्रिक स्तर ऊँचा है। वह चारुदत्त के गुणों पर अनुरक्त है। उसके एक-एक गुण वसन्तसेना के प्र मे को दृढ़ करते जाते हैं । शकार से रात्रि में रक्षा और विदूषक के साथ वसन्तसेना का सकुशल घर पहुँचाना, चेट को प्रवारक देना, वसन्तसेना के न्यास की चोरी हो जाने पर उस अपने स्त्री का अत्यन्त मूल्यवान हार देना - ये सभी गुण वसन्तसेना के हृदय में स्थायी प्रभा डालते हैं तथा वह स्वयं अभिसार के लिये उसके पास चल देती है। वसन्तसेना गणिका होने पर भी धन लोभिनी नहीं है। वह अत्यन्त उदार मनवाली नायिका है।

नाटक के अन्य पात्रों में चारुदत्त का मित्र मैत्र य विदूषक है। वह जन्म का ब्राह्मण है। वह अपने मित्र का विपत्ति-सम्पत्ति दोनों समयों में साथ देने वाला है। मैत्र य संस्कृत नाट्कों में अन्य विदूषकों के समान केवल भोजनभट्ट मूर्ख ब्राह्मण नहीं है। वह समयानुसार उसके हित सम्पादन के लिए कठिन कार्यों को भी सम्पन्न करता है।

शकार इस नाटक में खलनायक है। वह मूर्ख है। सामान्य से सामान्य बात का भी उस ज्ञान नहीं है। गुणवानों के प्रति उसका कोई आकर्षण नहीं है। वह वसन्तसेना के रूप पर मुग्ध है तथा बलात् उससे प्र मे करना चाहता है।

यह नाटक दैव-दुर्विपाकवश अकस्मात् समाप्त हो जाता है तथा यह सहज में अनुमित हो जाता है कि अपने वर्तमान रूप में यह पूर्ण नहीं है। यह भी संभावना है कि इस नाटक की रचना करते समय भास की मृत्यु हो गई हो तथा इस प्रकार यह अधूरा रह गया हो। यह नाटक सरल व सुबोध है। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से बेजोड़ है। नाना प्रकार क सज्जन से सज्जन तथा दुर्जन से दुर्जन यहाँ वर्तमान हैं । एक ओर चारुदत्त सज्जनता की सीमा है तो दूसरी ओर शकार दुर्जनता का चूडान्त प्रतीक है, कथोपकथन की दृष्टि से भी यह नाटक उच्च कोटि का है।

इस नाटक में भास का कविहृदय भी पूर्णरूप से अभिव्यक्ति को प्राप्त हुआ है। प्रकृति का चित्रण भी स्वाभाविक एवं हृदयाकर्षक है। नाटक का प्रधान रस श्रृंगार है तथा अन्य रसों का भी समयानुसार सुन्दर प्रयोग किया गया है।

इस नाटक में देशकाल का चित्रण बड़ा ही स्वाभाविक है। द्यूत का वर्णन दृष्टव्य है। दास-प्रथा का संकेत सज्जलक द्वारा वसन्तसेना की चोरी को मुक्त कराने के उद्योग से लगता है। चोरी का दृष्टान्त सज्जलक का कृत्य है।

नाटक की भाषा सरल, सरस एवं पात्रानुकूल है।

नाटकों का रचनाकाल[संपादित करें]

भास और उनके नाटकों का अविर्भाव निश्चय ही कालिदास से पूर्व और संभवत: अश्वघोष के बाद हुआ था। उनसे पूर्ववर्ती नाटककारों के रूप में केवल अश्वघोष का नाम, कदाचित्, लिया जा सकता है। गणपति शास्त्री, पुसलकर आदि ने उपर्युक्त नाटकों का रचनाकाल कौटिल्य अर्थशास्त्र से पूर्व पंचम चतुर्थ शताब्दी ई0 पू0 माना है। डॉ॰ कीथ, स्टेन कोनो आदि ने द्वितीय तृतीय शताब्दी ई0 (कालिदास से पूर्व) माना है। बार्नेट, रामावतार शर्मा, सुकथंकर विंटरनित्स आदि शोधकों ने 7वीं शती ई0 से 11वीं शती तक के काल को इन नाटको का रचना काल माना है। इसी प्रकार 16 शताब्दियों की लंबी कालावधि में विभिन्न कालों में नाना पंडितों के मत से रचना हुई। अधिकांश विद्वान इनका समय द्वितीय-तृतीय शती ई0 मानते हैं।

साहित्यिक मूल्यांकन[संपादित करें]

इन नाटकों के कथासूत्रों का आकलन और संयोजन विविध स्त्रोतों और कलात्मक शिल्प के साथ हुआ है।

यद्यपि "अभिषेक" और "प्रतिमा" आदि में वस्तुयोजना कुछ शिथिल है, तथापि अन्यत्र उसमें नाटकीय गतिमत्ता भी पर्याप्त है "उदयन" नाटकों की वस्तुयोजना गतिशील, नाटकीय कलात्मक और शक्तिशाली है। महाभारताश्रित नाटकों की कथा वस्तु भी पर्याप्त शक्तिशाली है। कभी कभी शिथिल वस्तु की कमी को ओजस्वी संवादों ने ऊर्जस्वित कर दिया है। उदयन नाटकों में नाट्यकौशल और नाटकीय शिल्प के संयोजन ने उनको उत्तम कोटि के नाटक स्तर पर पहुँचा दिया है। स्वप्न वासवदत्तं में कथावस्तु की शिथिलता के बावजूद कार्यसंकलन की कुशलता ने उसमें अपूर्व गतिमत्ता प्रस्फुटित की है। वण्र्य कथा को नाटकीय रूप देकर संयोजना में इन नाटकों को अच्छी सफलता मिली है। उनमें नाटकीय व्यंग्य है, गतिशीलता है, अप्रत्याशित एवं मौलिक परिस्थितियों के उद्भावन की दक्षता है और अलौकिक, आधिदैविक, अतिक्रमित प्राकृतिक पात्रों-घटनाओं का प्रयोग होने पर भी चरित्रों और परोक्ष चित्रण द्वारा यथार्थता या वास्तविकता का आभास देने में इन नाटकों को सफल कहा जा सकता है।