यहूदी धर्म

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यहूदी धर्म इस्राइल और हिब्रूभाषियों का राजधर्म है और इसका पवित्र ग्रंथ तनख़ बाईबल का प्राचीन भाग माना जाता है। धार्मिक पैग़म्बरी मान्यता मानने वाले धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म का आधार इसी परम्परा और विचारधारा को माना जाता है। इस धर्म में एकेश्वरवाद और ईश्वर के दूत यानि पैग़म्बर की मान्यता प्रधान है। अपने लिखित इतिहास की वजह से ये कम से कम ३००० साल पुराना माना जाता है।

परिचय[संपादित करें]

जानिए हजरत इब्राहिम का अल्लाह के प्रति एहतराम और ऐतमाद के बारे में...

बाबिल (बेबीलोन) के निर्वासन से लौटकर इज़रायली जाति मुख्य रूप से येरूसलेम तथा उसके आसपास के 'यूदा' (Judah) नामक प्रदेश में बस गई था, इस कारण इज़रायलियों के इस समय के धार्मिक एवं सामाजिक संगठन को यूदावाद (यूदाइज़्म/Judaism) कहते हैं।

उस समय येरूसलेम का मंदिर यहूदी धर्म का केंद्र बना और यहूदियों को मसीह के आगमन की आशा बनी रहती थी। निर्वासन के पूर्व से ही तथा निर्वासन के समय में भी यशयाह, जेरैमिया, यहेजकेल और दानिएल नामक नबी इस यूदावाद की नींव डाल रहे थे। वे यहूदियों को याहवे के विशुद्ध एकेश्वरवादी धर्म का उपदेश दिया करते थे और सिखलाते थे कि निर्वासन के बाद जो यहूदी फिलिस्तीन लौटेंगे वे नए जोश से ईश्वर के नियमों पर चलेंगे और मसीह का राज्य तैयार करेंगे।

निर्वासन के बाद एज्रा, नैहेमिया, आगे, जाकारिया और मलाकिया इस धार्मिक नवजागरण के नेता बने। 537 ई0पू0 में बाबिल से जा पहला काफ़िला येरूसलेम लौटा, उसमें यूदावंश के 40,000 लोग थे, उन्होंने मंदिर तथा प्राचीर का जीर्णोंद्धार किया। बाद में और काफिले लौटै। यूदा के वे इजरायली अपने को ईश्वर की प्रजा समझने लगे। बहुत से यहूदी, जो बाबिल में धनी बन गए थे, वहीं रह गए किंतु बाबिल तथा अन्य देशों के प्रवासी यहूदियों का वास्तविक केंद्र येरूसलेम ही बना और यदा के यहूदी अपनी जाति के नेता माने जाने लगे।

किसी भी प्रकार की मूर्तिपूजा का तीव्र विरोध तथा अन्य धर्मों के साथ समन्वय से घृणा यूदावाद की मुख्य विशेषता है। उस समय यहूदियों का कोई राजा नहीं था और प्रधान याजक धार्मिक समुदाय पर शासन करते थे। वास्तव में याह्वे (ईश्वर) यहूदियों का राजा था और बाइबिल में संगृहीत मूसा संहिता समस्त जाति के धार्मिक एवं नागरिक जीवन का संविधान बन गई। गैर यहूदी इस शर्त पर इस समुदाय के सदस्य बन सकते थे। कि वे याह्वे का धर्म तथा मूसा की संहिता स्वीकार करें। ऐसा माना जाता था कि मसीह के आने पर समस्त मानव जाति उनके राज्य में संमिलित हो जायगी, किंतु यूदावाद स्वयं संकीर्ण ही रहा।

यूदावाद अंतियोकुस चतुर्थ (175-164 ई0पू0) तक शांतिपूर्वक बना रहा किंतु इस राजा ने उसपर यूनानी संस्कृति लादने का प्रयत्न किया जिसके फलस्वरूप मक्काबियों के नेतृत्व में यहूदियों ने उनका विरोध किया था।

ईश्वर[संपादित करें]

यहूदी मान्यताओं के अनुसार ईश्वर एक है और उसके अवतार या स्वरूप नहीं है, लेकिन वो दूत से अपने संदेश भेजता है। ईसाई और इस्लाम धर्म भी इन्हीं मान्यताओं पर आधारित है पर इस्लाम में ईश्वर के निराकार होने पर अधिक ज़ोर डाला गया है। यहूदियों के अनुसार मूसा को ईश्वर का संदेश दुनिया में फैलाने के लिए मिला था जो लिखित (तनाख) तथा मौखिक रूपों में था। ईश्वर ने इसरायल के लोगों को एक ईश्वर की अर्चना करने के

धर्मग्रंथ[संपादित करें]

यहूदी धर्मग्रंथ इब्रानी भाषा में लिखा गया तनख़ है, जो असल में ईसाइयों की बाइबल का पूर्वार्ध है। इसे पुराना नियम (ओल्ड टेस्टामेण्ट) कहते हैं।

सन्देशवाहक (नबी)[संपादित करें]

मूसा[संपादित करें]

मूसा को ईश्वर द्वारा दस आदेश मिले थे।

इब्राहिम[संपादित करें]

इब्राहिम यहूदी, मुसल्मानी और ईसाई--तीनों धर्मों के पितामह माने जाते हैं।

हजरत इब्राहिम न एक यहूदी था और न ही एक ईसाई लेकिन वह एक सच्चा विश्वासी था और वह सिर्फ अल्लाह के सामने झुका और उसने अल्लाह के साथ किसी को शरीख नहीं किया।"

(सूरा अल इमरान, 67)


हजरत इब्राहिम अपने में एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जो ईसाई, यहूदी और इस्लाम धर्म में एक प्रकाश स्तंभ के रूप में खड़े है। इन तीनो मजहबों की दीनी किताबों में आप हजरत इब्राहिम को कहीं न कहीं हमेशा पाएंगे। हिब्रू बाईबल में हजरत इब्राहिम को "हजरत इब्राहिम इब्न अजार" कहा है जिसका अर्थ है "नबियों के पिता", वहीं दूसरी और इस्लाम में हजरत इब्राहिम को रसूल कहा है और इनको नबी माना है। अल्लाह में हजरत इब्राहिम की आस्था अटूट थी। यदि सही से देखा जाए तो हजरत इब्राहिम अपने जीवन में एक ऐसे व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं जो की सार्वभौमिक होने के साथ साथ आत्मसमर्पण में भी बहुत ही मौलिक है। इस्लाम की मान्यता के अनुसार "काबा" का निर्माण हजरत इब्राहिम ने किया था और वर्तमान में भी "ईद अल अजहा" का त्यौहार भी हजरत इब्राहिम के खुदाई विश्वास की याद में ही मनाया जाता है, जो हमे भी ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा और विश्वास को हजरत इब्राहिम की तरह ही मजबूत करने का सन्देश देता है। हजरत इब्राहिम का जन्म 2510 BC को इराक के बेबीलॉन शहर में हुआ। हजरत इब्राहिम के परिवार में इनकी तीन पत्निया थी, जिनके नाम सारा, हाजरा और खितौरा हैं और हजरत इब्राहिम के दो बच्चे थे जिनके नाम "इस्माईल और इसहाक" हैं। हजरत इब्राहिम के जीवन में उनकी अल्लाह के प्रति श्रद्धा और विश्वास ही उनको जनसामान्य से कहीं ऊँचा बनाता है। आज हम आपके सामने हजरत इब्राहिम के जीवन की दो ऐसी घटनाओं की जानकारी दे रहें हैं, जिनसे कोई भी यह सबक सहज ही ले सकता है की अल्लाह के प्रति किस प्रकार का विश्वास और किस प्रकार का समर्पण होना चाहिए, हजरत इब्राहिम के जीवन की यह दो घटनाएं प्रत्येक व्यक्ति के लिए इस बात की कसौटी हैं की उसका अल्लाह के प्रति किस प्रकार का समर्पण और किस प्रकार का विश्वास है। आइये जानते हैं हजरत इब्राहिम के जीवन की उन दो घटनाओं के बारे में, जो हमारे जीवन का उत्थान करने की क़ाबलियत रखती हैं। 1- आग का समंदर और हजरत इब्राहिम -

हजरत इब्राहिम ने लोगों को बुतपरस्ती से निकाल कर सही राह पर लाने के लिए एक अनोखा रास्ता चुना, उन्होंने एक रात अपने शहर के सबसे बड़े उपासना घर में जाकर वहां रखी सभी मुर्तिया तोड़ डाली, सुबह जब लोगों को पता लगा तो उन्होंने हजरत इब्राहिम से भी पूछताछ की, इस पर हजरत इब्राहिम ने उनसे कहा की "तुम लोग मुझे क्यों पूछते हो उन मूर्तियों से ही पूछो जिसको तुम दिन रात अपनी परेशानियां सुनाते हो, यदि वह तुम्हारी परेशानियां सुनती हैं तो आपके ये प्रश्न क्यों न सुनकर बता सकेंगी की इन छोटी मूर्तियों को किसने तोडा है, मेरे ख्याल से तो इनको उस मुख्य और बड़ी मूर्ति ने ही रात में तोडा है क्युकी वही महफूज़ है।" यह जबाब सुनकर मंदिर के लोगों का गुस्सा हजरत इब्राहिम पर और भी ज्यादा बढ़ गया और उन्होंने इसकी शिकायत उस समय के राजा नमरूद से की। नमरूद ने इस घटना में हजरत इब्राहिम को गुनाहगार ठहरा कर उन्हें जिन्दा ही आग में फैंक देने की सजा सुना दी। नमरूद बहुत ही क्रूर शासक था, उसके द्वारा सुनाई यह सजा आग की तरह सारे शहर में फ़ैल गई। हजरत इब्राहिम को आग में फैंकने के लिए सबसे पहले एक बड़ा गढ्ढा खोद गया और लकड़ियों का एक बड़ा ढेर जमा किया गया। समय आने पर हजरत इब्राहिम को लाया गया और लकड़ियों में आग लगा दी गई। आग की लपटे आकाश को छू रही थी, वह इतनी ऊँची थी की आकाश में उड़ते पक्षी भी उसमें जल कर गिर रहें थे। हजरत इब्राहिम के हाथ-पैर जंजीरों में जकड़े हुए थे और उस अंतिम समय में हजरत इब्राहिम को उस आग में फैंकने के लिए तैयार की गई एक बड़ी गुलेल के पास ले जाया गया और उसमें हजरत इब्राहिम को डाल दिया अब उस भीषण और धधकती हुई आग में हजरत इब्राहिम को फैंक दिया जाना था, ठीक उस समय ही हजरत इब्राहिम के पास फरिश्ता जिब्राईल आया और उसने हजरत इब्राहिम से कहा की "हजरत इब्राहिम , जो कुछ भी इस समय तुम्हारी इच्छा है, वो कहो" , हजरत इब्राहिम यदि चाहते तो उस समय अपने को आग से दूर ले जाने या आग से बचाने को कह सकते थे पर हजरत इब्राहिम ने कहा "अल्लाह मेरे लिए पर्याप्त है, वह मेरे मामलों का सबसे अच्छा निपटारा करने वाला है।" गुलेल को जारी कर दिया गया और हजरत इब्राहिम को आग के बीच में फेंक दिया गया और उस समय ही अल्लाह की और से हुक्म जारी हुआ "आग ठंडी हो जा और हजरत इब्राहिम के लिए सुरक्षा कवच बन जा", और एक चमत्कार हुआ हजरत इब्राहिम उस जलती हुई आग से सुरक्षित बाहर आये, उनके चेहरे पर उस समय शांति और सुरक्षा के भाव थे। लोगों ने जब उन्हें (हजरत इब्राहिम) को देखा तो देखने वाली भीड़ के लोगो ने हजरत इब्राहिम) को देखा और बड़ा आश्चर्य किया और कहा की "हजरत इब्राहिम के खुदा ने उसे बचा लिया " ।

"मेरे अल्लाह !मुझे उनमें से एक बना जो नियमित प्रार्थना करते हैं, और मेरे वंशजो को भी, हे प्रभु ! और तू मेरी प्रार्थना स्वीकार कर।" 

(सूरा हजरत इब्राहिम 40)

यहां हजरत इब्राहिम के उस विश्वास को देखना चाहिए की मौत के अंतिम पल में भी हजरत इब्राहिम न तो अपने यकीन को ज़रा भी कम करते हैं और न ही अपने विश्वास को। वे उस क्षण में भी कहते हैं "अल्लाह मेरे लिए पर्याप्त है" । ये जो हजरत इब्राहिम का विश्वास है, इससे ही वह हमें यह सिखाते हैं की अगर हम इबादत करते है तो हमारा विश्वास किस कदर ऊंचा और पक्का होना चाहिए ताकि हम उसकी मेहर को अपने जीवन में महसूस कर सकें। قُلْ صَدَقَ اللَّهُ ۗ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ "कहो, अल्लाह सच बोलता है और अब्राहिम की शिक्षाओं का पालन करें, जिस पर विश्वास करना समझदारी है, वह बुतपरस्त नहीं था" (सूरा अल इमरान, 95) मोटे अक्षर

नूह[संपादित करें]

नूह ने ईश्वर के आदेश पर महाप्रलय के समय बहुत बड़ी क़िश्ती बनायी थी -- और उसमें सृष्टि को बचाया, जैसा कि राजा मनु ने किया था (हिन्दू मान्यतानुसार)।


मत[संपादित करें]

यहूदी मृतु के बाद की दुनिया में उतना ध्यान नहीं देते। जो भी हो, उनके हिसाब से सभी मनुष्यों को यहूदी होना ज़रूरी नहीं है, बाकी धर्मावलम्बी भी क़यामत के बाद स्वर्ग जायेंगे।

प्रमुख सिद्धान्त[संपादित करें]

बाइबिल के पूर्वार्ध में जिस धर्म ओर दर्शन का प्रतिपादन किया गया है वह निम्नलिखित मौलिक सिद्धांतों पर आधारित है -

  1. एक ही सर्वशक्तिमान् ईश्वर को छोड़कर और कोई देवता नहीं है। ईश्वर इजरायल तथा अन्य देशें पर शासन करता हे और वह इतिहास तथा पृथ्वी की एव घटनाओं का सूत्रधार है। वह पवित्र है और अपने भक्तों से यह माँग करता है कि पाप से बचकर पवित्र जीवन बिताएँ। ईश्वर एक न्यायी एवं निष्पक्ष न्यायकर्ता है जो कूकर्मियों को दंड और भले लोगों को इनाम देता है। वह दयालु भी हे और पश्चाताप करने पर पापियों को क्षमा प्रदान करता है, इस कारण उसे पिता की संज्ञा भी दी जा सकती है। ईश्वर उस जाति की रक्षा करता है जो उसकी सहायता माँगती है। यहूदियों ने उस एक ही ईश्वर के अनेक नाम रखे थे, अर्थात् एलोहीम, याहवे और अदोनाई। बाइबिल के पूर्वार्ध से यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि ईश्वर इस जीवन में ही अथवा परलोक में भी पापियों को दंड और अच्छे लोगों को इनाम देता है।
  2. इतिहास में ईश्वर ने अपने को अब्राहम तथा उसके महान वंशजों पर प्रकट किया है। उसने उनको सिखलाया है कि वह स्वर्ग, पृथ्वी तथा सभी चीजों का सृष्टिकर्ता है। सृष्टि ईश्वर का कोई रूपांतर नहीं है क्योंकि ईश्वर की सत्ता सृष्टि से सर्वथा भिन्न है, इस लोकोत्तर ईश्वर ने अपनी इच्छाशक्ति द्वारा सभी चीजों की सृष्टि की है। यहूदी लोग सृष्टिकर्ता और सृष्टि इन दोनों को सर्वथा भिन्न समझते थे।
  3. समस्त मानव जाति की मुक्ति हेतु अपना विधान प्रकट करने के लिये ईश्वर ने यहूदी जाति को चुन लिया है। यह जाति अब्राहम से प्रारंभ हुई थी (दे0 अब्राहम) और मूसा के समय ईश्वर तथा यहूदी जाति के बीच का व्यवस्थान संपन्न हुआ था।
  4. मसीह का भावी आगमन यहूदी जाति के ऐतिहासिक विकास की पराकाष्ठा होगी। मसीह समस्त पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित करेंगे और मसीह के द्वारा ईश्वर यहूदी जाति के प्रति उपनी प्रतिज्ञाएं पूरी करेगा। किंतु बाइबिल के पूर्वार्ध में इसका कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि मसीह कब और कहाँ प्रकट होने वाले हैं।
  5. मूसा संहिता यहूदियों के आचरण तथा उनके कर्मकांड का मापदंड था किंतु उनके इतिहास में ऐसा समय भी आया जब वे मूसासंहिता के नियमों की उपेक्षा करने लगे। ईश्वर तथा उसके नियमों के प्रति यहूदियों के इस विश्वासघात के कारण उनको बाबिल के निर्वासन का दंड भोगना पड़ा। उस समय भी बहुत से यहूदी प्रार्थना, उपवास तथा परोपकार द्वारा अपनी सच्ची ईश्वरभक्ति प्रमाणित करते थे।
  6. यहूदी धर्म की उपासना येरूसलेम के महामंदिर में केंद्रीभूत थी। उस मंदिर की सेवा तथा प्रशासन के लिये याजकों का श्रेणीबद्ध संगठन किया गया था। येरूसलेम के मंदिर में ईश्वर विशेष रूप से विद्यमान है, यह यहूदियों का द्दढ़ विश्वास था और वे सब के सब उस मंदिर की तीर्थयात्रा करना चाहते थे ताकि वे ईश्वर के सामने उपस्थित होकर उसके प्रति अपना हृदय प्रकट कर सकें। मंदिर के धार्मिक अनुष्ठान तथा त्योहारों के अवसर पर उसमें आयोजित समारोह भक्त यहूदियों को आनंदित किया करते थे। छठी शताब्दी ई0 पू0 के निर्वासन के बाद विभिन्न स्थानीय सभाघरों में भी ईश्वर की उपासना की जाने लगी।
  7. प्रारंभ से ही कुछ यहूदियों (और बाद में मुसलमानों ने) बाइबिल के पूर्वार्ध में प्रतिपादित धर्म तथा दर्शन की व्याख्या अपने ढंग से की है। ईसाइयों का विश्वास है कि ईसा ही बाइबिल में प्रतिज्ञात मसीह है किंतु ईसा के समय में बहुत से यहूदियों ने ईसा को अस्वीकार कर दिया। आजकल भी यहूदी धर्मावलंबी सच्चे मसीह की राह देख रहे हैं। संत पॉल के अनुसार यहूदी जाति किसी समय ईसा को मसीह के रूप में स्वीकार करेगी।

यहूदी त्यौहार[संपादित करें]

संदर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • आई0 एपस्टाइन: जूदाइज्म, पेंग्विन, 1959। (कामिल बुल्के)

इन्हें भी देखें[संपादित करें]