पुरुषपरीक्षा

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पुरुषपरीक्षा, विद्यापति द्वारा रचित कथाग्रन्थ है। उन्होने इसकी रचना महाराजा शिवसिंह के निर्देशन पर किया था। इसमें पंचतन्त्र की परम्परा में शिक्षाप्रद कथाएँ प्रस्तुत की गयी हैं। यह ग्रन्थ समाजशास्रियों, इतिहासकारों, मानववैज्ञानिको, राजनीतिशास्त्रियों के साथ-साथ दर्शन एवं साहित्य के लोगों के लिए भी एक अपूर्व कृति है।

वीरकथा, सुबुद्धिकथा, सुविद्यकथा और पुरुषार्थकथा- इन चार वर्गों में पुरुषपरीक्षा की कथा दी गयी है।

‘पुरुष-परीक्षा’ में सच्चे पुरुष की परख कैसे की जाये- यह बताने के लिए वासुकि नामक मुनि पारावार नामक राजा को अनेक कथाएँ सुनाते हैं। पुरुष की परीक्षा कैसे होनी चाहिए, इस सम्बन्ध में कवि ने पुरुष-परीक्षा की भूमिका में लिखा है कि-

“चंद्रातपा नाम के नगर में पारावार नाम का एक राजा था। उसकी पद्मावती नाम की एक अत्यंत सुंदरी कन्या थी। कन्या को विवाह योग्य देखकर राजा ने सुबुद्धि नाम के ऋषि से कहा कि महाराज! इष्ट कार्यों में अकेले निर्णय नहीं करना चाहिए। संभव है मोहवश कोई अनुचित कार्य न कर बैठें, क्योंकि मोहवश बड़े-बड़े विद्वान भी अनर्थ कर बैठते हैं जिससे सुख की हानि होती है। इसलिए हे ऋषि, किस प्रकार का वर अपनी कन्या के लिए खोजूं, यह आप बतावें। तब ऋषि ने कहा- राजन! पुरुष वर करिए। राजा ने आश्चर्य से पूछा कि ‘क्यों अपुरुष भी कन्या के लिए वर हो सकते हैं? ऋषि ने कहा ‘राजन! इस संसार में बहुत से से पुरुष कहलाने वाले पुरुष के आकर के लोग दिख पड़ते हैं किन्तु वे सब पुरुष नहीं हैं। इसलिए आप पुरुष को पहचान कर कन्या के लिए वर का निश्चय कीजिये। पुरुष को पहचानने के लिए निम्नलिखित चिह्न हैं- जो पुरुष वीर हो, सुधि हो, विद्वान हो तथा पुरुषार्थ करने वाला हो, वही यथार्थ में पुरुष है। इसके अतिरिक्त पुच्छ-विषाण-हीन पशु है।” [1]
वीरः सुधीः सुविद्यश्च पुरुषः पुरुषार्थवान्।
तदन्ये पुरुषाकाराः पशवः पुच्छवर्जिताः ॥
वीर, सुबुद्धिमान, विद्यावान और पुरुषार्थ करनेवाला हो, वही (सच्चा) पुरुष है। उसके अलावा अन्य, पुरुष के आकार में बिना पूंछ के पशु हैं।

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