नास्तिक दर्शन

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नास्तिक दर्शन भारतीय दर्शन परम्परा में उन दर्शनों को कहा जाता है जो वेदों को नहीं मानते थे।

भारत में भी कुछ ऐसे व्यक्तियों ने जन्म लिया जो वैदिक परम्परा के बन्धन को नहीं मानते थे वे नास्तिक कहलाये तथा दूसरे जो वेद को प्रमाण मानकर उसी के आधार पर अपने विचार आगे बढ़ाते थे वे आस्तिक कहे गये।

भारत में नास्तिक कहे जाने वाले विचारकों की चार धारायें मानी गयी हैं - आजीविक, जैन दर्शन, चार्वाक, तथा बौद्ध दर्शन

चार्वाक दर्शन[संपादित करें]

चर्वाक या लोकायत दर्शन स्पष्ट तौर पर 'ईश्वर' के अस्तित्व को नकारते हुए कहता है कि यह काल्पनिक ज्ञान है। तत्व भी पांच नहीं चार ही हैं। आकाश के होने का सिर्फ अनुमान है और अनुमान ज्ञान नहीं होता। जो प्रत्यक्ष हो रहा है वही ज्ञान है अर्थात दिखाई देने वाले जगत से परे कोई और दूसरा जगत नहीं है। आत्मा अजर-अमर नहीं है। वेदों का ज्ञान प्रामाणिक नहीं है।

चर्चाव अनुसार यथार्थ और वर्तमान में जीयो। ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नरक, नैतिकता, अनैतिकता और तमाम तरह की तार्किक और दार्शनिक बातें व्यक्ति को जीवन से दूर करती हैं। इसीलिए खाओ, पियो और मौज करो। उधार लेकर भी यह काम करना पड़े तो करो। इस जीवन का भरपूर मजा लो यही चर्वाक सत्य है।

जैन दर्शन[संपादित करें]

जैन दर्शन अनुसार अस्तित्व या सत्ता के सात तत्वों में से दो तत्व प्रमुख हैं- जीव और अजीव। जीव है चेतना या जिसमें चेतना है और अजीव है जड़ अर्थात जिसमें चेतना या गति का अभाव है। जीव दो तरह के होते हैं एक वे जो मुक्त हो गए और दूसरे वे जो बंधन में हैं। इस बंधन से मुक्ति का मार्ग ही कैवल्य का मार्ग है। स्वयं की इंद्रियों को जीतने वाले को जिनेंद्र या जितेंद्रिय कहते हैं। यही अरिहंतों का मार्ग है। जितेंद्रिय बनकर जीओ और जीने दो यही जिन सत्य है।

बौद्ध दर्शन[संपादित करें]

बौद्ध दर्शन को संसार का सबसे घोर नास्तिक दर्शन या धर्म माना जाता है। बुद्ध के कारण ही दुनिया में ईश्वरवादी धर्मों का प्रचलन बढ़ा और उन्होंने सबसे ज्यादा बौद्ध धर्म को ही नुकसान पहुंचाया। बुतपरस्ती शब्द भगवान बुद्ध की वजह से ही प्रचलन में आया।


बौद्ध धर्म ईश्वर के होने या नहीं होने पर चर्चा नहीं करता, क्योंकि यह बुद्धिजाल से ज्यादा कुछ नहीं है। यह अव्याकृत प्रश्न है। उनका मानना है कि इस प्रश्न को आप तर्क या अन्य किसी भी तरह से हल नहीं कर सकते। ईश्वर के होने या नहीं होने की बहस का कोई अंत नहीं। ठीक उसी तरह कि स्वर्ग-नरक है या नहीं? मूल प्रश्न यह है कि व्यक्ति है और वह दुःख तथा बंधन में है। उसके दुःख व बंधन का मूल कारण खोजो और मुक्त हो जाओ। आष्टांगिक मार्ग पर चलकर दुःख व बंधन से मुक्त हुआ जा सकता है। यही आर्य सत्य है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]