वशिष्ठ नारायण सिंह

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वशिष्ठ नारायण सिंह (२ अप्रैल १९४२ -- १४ नवम्बर २०१९) एक भारतीय गणितज्ञ थे। <ref name="भास्कर">"देश का एक नामी गणितज्ञ जो खो गया गुमनामियों में, साथ में खो गए कई रहस्य!". दैनिक भास्कर. ७ मार्च २०१३. अभिगमन तिथि १३ मार्च २०१३. वशिष्ठ नारायण सिंह की योग्यता का डंका देश ही नहीं दुनिया में भी बजा; किन्तु वे युवावस्था में ही मनोविदलता (Schizophrenia) नामक मानसिक रोग से ग्रसित हो गए थे और उनके जीवन का अधिकांश भाग उन्होने पागल की तरह अपने गाँव बसन्तपुर में ही बिताए।

आरम्भिक जीवन[संपादित करें]

वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्म बिहार के भोजपुर जिला में बसन्तपुर नामक गाँव में हुआ था। इनका परिवार आर्थिक रूप से गरीब था। इनके पिताजी पुलिस विभाग में कार्यरत थे। बचपन से वशिष्ठ नारायण सिंह में विलक्षण प्रतिभा थी। सन १९६२ ई• में उन्होने नेतरहाट विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की और उस समय के 'संयुक्त बिहार' में सर्वाधिक अंक प्राप्त किया।

वशिष्ठ नारायण के लिए विशेष रूप से पटना यूनिवर्सिटी को अपने नियम में परिवर्तन लाना पड़ा था। जब वे पटना साइंस कॉलेज में पढ़ते थे, तब कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नजर उन पर पड़ी। कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ को अपने साथ अमेरिका ले गए। 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से गणित में पीएचडी की और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बने। "चक्रीय सदिश समष्टि सिद्धान्त" पर किये गए उनके शोधकार्य ने उन्हे भारत और विश्व में प्रसिद्ध कर दिया। इसी दौरान उन्होंने नासा में भी काम किया, लेकिन मन नहीं लगा और 1971 में अपने वतन भारत लौट आए। उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई और भारतीय सांख्यकीय संस्थान, कोलकाता में काम किया।

1973 में उनका [विवाह]] वन्दना रानी सिंह से हुआ। उनके अध्ययन को लेकर एक रोमांचक घटना यह भी है कि जिस दिन उनका विवाह था उस दिन भी पढाई के कारण उनकी बरात लेट हो गई थी। विवाह के बाद धीरे-धीरे उनके असामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चला। छोटी-छोटी बातों पर बहुत क्रोधित हो जाना, कमरा बन्द कर दिनभर पढ़ते रहना, रातभर जागना, उनके व्यवहार में शामिल था। उनकी असामान्य दिनचर्या व व्यवहार के चलते उनकी पत्नी ने जल्द ही उनसे तलाक ले लिया। बस थोड़े ही समय पश्चात् सन् 1974 में उन्हें पहला दिल का दौरा पड़ा था। राँची में उनकी चिकित्सा हुई। इसके बाद से इनकी जिंदगी बहुत ही दर्दनाक स्थिति में आती चली गई। सन् 1987 में वशिष्ठ नारायण जी अपने गांव लौट गए और अपनी माता व भाई के साथ बसर करने लगे थे। इस दौरान तत्कालीन बिहार सरकार व केंद्र सरकार से उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिली।

उनको पुनः अगस्त 1989 को रांची में इलाज कराकर उनके भाई उन्हें बंगलुरू ले जा रहे थे कि रास्ते में ही खंडवा स्टेशन पर वशिष्ठ जी उतर गए और भीड़ में कहीं खो गए। एक लंबे अवधि तक कोई भी सरकार इनकी सुध नहीं ली। करीब 5 साल तक गुमनाम रहने के बाद उनके गाँव के लोगों को वे छपरा में मिले। इसके बाद राज्य सरकार ने उनकी सुध ली। उन्हें राष्ट्रीय मानसिक जाँच एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान बंगलुरू इलाज के लिए भेजा गया। जहां मार्च 1993 से जून 1997 तक इलाज चला। इसके बाद से वे गाँव में ही रह रहे थे।

इसके बाद तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा ने इस बीच उनकी सुध ली थी। स्थिति ठीक नहीं होने पर उन्हे 4 सितम्बर 2002 को मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। करीब एक साल दो महीने उनका इलाज चला। स्वास्थ्य में लाभ देखते हुए उन्हें यहां से छुट्टी दे दी गई थी।

वे अपने गाँव बसंतपुर में उपेक्षित जीवन व्यतीत कर रहे थे। पिछले दिनों आरा में उनकी आंखों में मोतियाबिन्द का सफल ऑपरेशन हुआ था। कई संस्थाओं ने डॉ वशिष्ठ को गोद लेने की पेशकश की थी। लेकिन उनकी माता को ये स्वीकार नहीं था। 14 नवम्बर 2019 को उन्हें तबीयत खराब होने के चलते पटना ले जाया गया जहाँ डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस तरह एक महान गणितज्ञ का बड़ा ही दर्दनाक अंत हो गया। इनके शोध पर अभी भी कई वैज्ञानिक कार्य कर रहे हैं।

महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की मौत की खबर मिलते ही बिहार सहित पूरे देश मे शोक छा गया। इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कई बड़े नेताओं ने भी दुख जताया। वही पटना के जिस हॉस्पिटल PMCH में उनकी मृत्यु हुआ था, उस अंतिम समय में उनके छोटे भाई अयोध्या सिंह उनके साथ थे।

वशिष्ट नारायण सिंह एक गणितज्ञ ही नही बल्कि एक समाज शास्त्री भी थे और इसी कारण समाज की विकृत दशा को देखकर समाज सुधार में मन लगाने लगे जिससे उन्हें अपेक्षाकृत परिणाम न मिलने से वह मानसिक रूप से विकृत होने लगे।और अंततोगत्वा वह पूर्ण रूप से मानसिक रूप से विकृत हो गए। प्रकाशन[संपादित करें]

  • Singh, Vashishtha N. (1974). Reproducing kernels and operators with a cyclic vector. I. Pacific J. Math. 52 (1974), no. 2, 567–584.
  • Singh, V.N. (1957) "Certain generalized hypergeometric identities of the Rogers-Ramanujan type",Pac. J. Math. 7, 1011-1014 [1]
  • Singh, V.N. (1957) "Certain generalized hypergeometric identities of the Rogers-Ramanujan type (II)",Pac. J. Math. 7, 1691-1699 [2]
  • Singh, V.N. (1959) "A note on the computation of Alder's polynomials," Pac. J. Math., 9, 271-275 [3]
  • George E. Andrews (1974) "An analytic generalization of the Rogers-Ramanujan Identities for odd moduli", Proc. Natl. Acad. Sci. USA, Vol 71, No.10, 4082-4085 [4]

सन्दर्भ[संपादित करें]