चक्रवाल विधि

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चक्रवाल विधि माध्यमिक द्विघात समीकरणों (indeterminate quadratic equations) को हल करने की चक्रीय विधि है। इसके द्वारा पेल के समीकरण का भी हल निकल जाता है। इसके आविष्कार का श्रेय प्राय भास्कर द्वितीय को दिया जाता है किन्तु कुछ लोग इसका श्रेय जयदेव (950 ~ 1000 ई) को भी देते हैं।

अपने बीजगणित नामक ग्रन्थ में भास्कराचार्य ने चक्रवाल विधि का वर्णन इस प्रकार किया है-

ह्रस्वज्येष्ठपदक्षेपान् भाज्यप्रक्षेपभाजकान् ।
कृत्वा कल्प्यो गुणस्तत्र तथा प्रकृतितश्च्युते॥
गुणलब्धिः पदं ह्रस्वं ततो ज्येष्ठतमोऽसकृत्।
त्यक्त्वा पूर्वपदक्षेपांश्चक्रवालमिदं जगुः॥
चतुर्द्वेकयुतावेवमभिन्ने भवतः पदे।
चतुर्द्विक्षेपमूलाभ्यां रूपक्षेपार्थभावना॥[1]
(Considering the lesser root, greater root and interpolator (क्षेप) as the dividend, addend and divisor respectively of (pulversier) the indeterminate multiplier of it should be so taken as will make the residue of the प्रकृति diminished by the square of that multiplier or the latter minus the प्रकृति (as the case may be) to be the least. That residue divided by the (original) interpolator is the (new) interpolator; it should be reversed in sign in case of the subtraction from the प्रकृति. The quotient corresponding to that value of the multiplier is the (new) lesser root, like wise is obtained the greater root. The same process should be followed putting aside (each time) the previous roots and the interpolator. This processiscalled चक्रवाल (or the cyclic method). By this method, there will appear two integral roots corresponding to an equation with ±1, ±2 or ±4 as interpolator. In order to derive integral roots corresponding to an equation with additive unity from those of the equation with the interpolator ±2 or ±4, भावना (should be applied).

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