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कुट्टक

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कुट्टक रैखिक डायोफैंटीय समीकरणों के पूर्णांक हल निकालने की विधि (algorithm) है जो भारतीय गणित में बहुत प्रसिद्ध है। 'कुट्टक' क शाब्दिक अर्थ है-

  • (१) 'काटने या विभक्त करनेवाला' ,
  • (२) 'कूटने पीसने का काम करनेवाला' (व्यक्ति या यन्त्र)।[1]

आर्यभट ने रैखिक डायोफैंटीय समीकरण का हल निकालने का अल्गोरिद्म, आर्यभटीय के गणितपाद के श्लोक ३२-३३ में दिया है जो निम्नलिखित है-

अधिकाग्रभागहारं छिन्द्यातूनाग्रभागहारेण।
शेषपरस्परभक्तं मतिगुणं अग्रान्तरे क्षिप्तम् ॥ २.३२ ॥
अधसुपरिगुणितं अन्त्ययुजूनाग्रछेदभाजिते शेषम्।
अधिकाग्रछेदगुणं द्विछेदाग्रं अधिकाग्रयुतम् ॥ २.३३ ॥

भास्कर प्रथम द्वारा उपरोक्त श्लोकों की व्याख्या को ध्यान में रखते हुए विभूतिभूषण दत्त ने इन श्लोकों का निम्नलिखित अर्थ दिया है-

"Divide the divisor corresponding to the greater remainder by the divisor corresponding to the smaller remainder. The residue (and the divisor corresponding to the smaller remainder) being mutually divided (until the remainder becomes zero), the last quotient should be multiplied by an optional integer and then added (in case the number of quotients of the mutual division is even) or subtracted (in case the number of quotients is odd) by the difference of the remainders. (Place the other quotients of the mutual division successively one below the other in a column; below them the result just obtained and underneath it the optional integer.) Any number below (that is, the penultimate) is multiplied by the one just above it and added by that just below it. Divide the last number (obtained so doing repeatedly) by the divisor corresponding to the smaller remainder; then multiply the residue by the divisor corresponding to the grater remainder and add the greater remainder. (The result will be) the number corresponding to the two divisors."

वरदराज के पुत्र देवराज ने कुट्टाकारशिरोमणि नामक एक ग्रन्थ की रचना की जिसमें एकमात्र कुट्टक की चर्चा है।

सन्दर्भ

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इन्हें भी देखें

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