वशिष्ठ सिद्धान्त

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वसिष्ठसिद्धान्त भारत में प्रयुक्त प्राचीनतम खगोलीय प्रणालियों में से एक है। इस सिद्धान्त का सार वराहमिहिर ने अपनी पञ्चसिद्धान्तिका (६ठी शताब्दी में रचित) में दिया है। ऐसा माना जाता है कि यह सिद्धान्त ऋषि वसिष्ठ द्वारा प्रतिपादित है। इसमें इसकी रचना १,२९९,१०१ ईसापूर्व होना कहा गया है जो अविश्वसनीय लगता है। मूल ग्रन्थ सम्भवतः ४थी शताब्दी में रचित था जो अब अप्राप्त है। इसके बारे में जो कुछ ज्ञात है वह वराहमिहिर के पञ्चसिद्धान्तिका से ही पता चला है। 'वशिष्ठसिद्धान्तिका' नामक एक अन्य ग्रन्थ भी है जो अपेक्षाकृत नया ग्रन्थ है।

वसिष्ठ सिद्धान्त में सूर्य और चन्द्रमा की गति का विवरण दिया गया है। इसमें मंगल, बुध, गुरु, शनि की गतियों को वर्णय किया गया है। यह शास्त्र यह बताने में भी समर्थ है कि इससे पूर्व व्यतीत हो चुके वर्षों में ग्रहों की गतियां क्या रही थी तथा इन ग्रहों ने पिछले युगों में किस प्रकार भ्रमण किया है। इस सिद्वान्त शास्त्र में ग्रहों की गति के अलावा राशियों का उल्लेख भी किया गया है। यह सिद्वान्त पितामह सिद्धान्त के समान होने पर भी उससे कई स्तर में शुद्ध सिद्धान्त शास्त्र है। पितामह सिद्वान्त की तरह विशिष्ठ सिद्वान्त में भी माना गया है, कि जब दिन बढता है, तो प्रतिदिन बराबर वृ्द्धि होती है.।

इसके अलावा वसिष्ठ सिद्धान्त लग्न का भी वर्णन करता है जिससे पता चलता है, कि सूर्य का कौन सा भाग पूर्वी क्षितिज में उदित हुआ है। लेकिन उस समय के शास्त्रियों को सूर्य व चन्द्र की मध्य व स्पष्ट गतियों का अन्तर का ज्ञान नहीं था।

सन्दर्भ[संपादित करें]