आदिवासी (भारतीय)

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उडी़सा के जनजातीय कुटिया कोंध समूह की एक महिला

आदिवासी शब्द दो शब्दों आदि और वासी से मिल कर बना है और इसका अर्थ मूल निवासी होता है। भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है। पुरातन लेखों मे आदिवासियों को अत्विका और वनवासी भी कहा गया है (संस्कृत ग्रंथों में)। संविधान में आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति पद का उपयोग किया गया है। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में संथाल, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, बोडो, भील, खासी, सहरिया, गरासिया, मीणा, उरांव, बिरहोर आदि हैं।

महात्मा गांधी ने आदिवासियों को गिरिजन (पहाड़ पर रहने वाले लोग) कह कर पुकारा है। जिस पर वामपंथी मानविज्ञानियों ने सवाल उठाया है कि क्‍या मैदान में रहने वालों को मैदानी कहा जाता है? आदिवासी को दक्षिणपंथी लोग वनवासी या जंगली कहकर पुकारते हैं। इस तरह के नामों के पीछे बुनियादी रूप से यह धारणा काम कर रही होती है कि आदिवासी देश के मूल निवासी हैं या नहीं तथा आर्य यहीं के मूल निवासी हैं या बाहर से आए हैं? जबकि निश्चित रूप से आदिवासी ही भारत के मूलनिवासी हैं।

आमतौर पर आदिवासियों को भारत मे जनजातीय लोगों के रूप मे जाना जाता है। आदिवासी मुख्य रूप से भारतीय राज्यों उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल मे अल्पसंख्यक है जबकि भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों में यह बहुसंख्यक हैं, जैसे मिजोरम। भारत सरकार ने इन्हें भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में " अनुसूचित जनजातियों " के रूप में मान्यता दी है। अक्सर इन्हें अनुसूचित जातियों के साथ एक ही श्रेणी " अनुसूचित जातियों और जनजातियों " मे रखा जाता है जो कुछ सकारात्मक कार्रवाई के उपायों के लिए पात्र है।

[[संविघान में अनुसुचित जनजाति आदिवासी है इसका कोइ उल्लेख नहि है, However that is not my understanding of the word adivasi. As per my understanding, „adivasi‟ connotes aboriginal people and not people falling in the definition of scheduled castes and scheduled tribes in Articles 341 and 342 of the Constitution of India. However, to verify which of the aforesaid understandings is correct, I have checked the meaning of „adivasis and find the same described as „ people living in India before the arrival of the Aryans in the second millennium BC and descendents thereof‟. Adivasi, translated in English means the earliest inhabitants of the earth. संदर्भ: दिल्ही हाइकोर्ट,

    जस्टीस राजिव सहाय
    16 September 2015]]
आदिवासी नृत्य

आदिवासियों का अपना धर्म है। ये प्रकृति पूजक हैं और जंगल, पहाड़, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं। आधुनिक काल में जबरन बाह्य संपर्क में आने के फलस्वरूप इन्होंने हिंदू, ईसाई एवं इस्लाम धर्म को भी अपनाया है। अंग्रेजी राज के दौरान बड़ी संख्या में ये ईसाई बने तो आजादी के बाद इनके हिूंदकरण का प्रयास तेजी से हुआ है। परंतु आज ये स्वयं की धार्मिक पहचान के लिए संगठित हो रहे हैं और भारत सरकार से जनगणना में अपने लिए अलग से धार्मिक कोड की मांग कर रहे हैं।

माना जाता है कि हिंदुओं के देव भगवान शिव भी मूल रूप से एक आदिवासी देवता थे लेकिन आर्यों ने भी उन्हें देवता के रूप मे स्वीकार कर लिया।

रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि भी एक कोली आदिवासी थे।[तथ्य वांछित]

भारत में आदिवासियों को दो वर्गों में अधिसूचित किया गया है। अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित आदिम जनजाति।

बहुत से छोटे आदिवासी समूह आधुनिकीकरण के कारण हो रहे पारिस्थितिकी पतन के प्रति काफी संवेदनशील हैं। व्यवसायिक वानिकी और गहन कृषि दोनों ही उन जंगलों के लिए विनाशकारी साबित हुए हैं जो कई शताब्दियों से आदिवासियों के जीवन यापन का स्रोत रहे थे।

आदिवासी भाषाएं[संपादित करें]

भारत में सभी आदिवासी समुदायों की अपनी विशिष्ट भाषा है। भाषाविज्ञानियों ने भारत के सभी आदिवासी भाषाओं को मुख्यतः तीन भाषा परिवारों में रखा है। द्रविड़, आस्ट्रिक और चीनी-तिब्बती। लेकिन कुछ आदिवासी भाषाएं भारोपीय भाषा परिवार के अंतर्गत भी आती हैं। आदिवासी भाषाओं में ‘भीली’ बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है जबकि दूसरे नंबर पर ‘गोंडी’ भाषा और तीसरे नंबर पर ‘संताली’ भाषा है।

भारत की 114 मुख्य भाषाओं में से 22 को ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। इनमें हाल-फिलहाल शामिल की गयी संताली और बोड़ो ही मात्र आदिवासी भाषाएं हैं। अनुसूची में शामिल संताली (0.62), सिंधी, नेपाली, बोड़ो (सभी 0.25), मिताइ (0.15), डोगरी और संस्कृत भाषाएं एक प्रतिशत से भी कम लोगों द्वारा बोली जाती हैं। जबकि भीली (0.67), गोंडी (0.25), टुलु (0.19) और कुड़ुख 0.17 प्रतिशत लोगों द्वारा व्यवहार में लाए जाने के बाद भी आठवीं अनुसूची में दर्ज नहीं की गयी हैं। (जनगणना 2001)

भारतीय राज्यों में एकमात्र झारखण्ड में ही 5 आदिवासी भाषाओं - संताली, मुण्डारी, हो, कुड़ुख और खड़िया - को 2011 में द्वितीय राज्यभाषा का दर्जा प्रदान किया गया है।

आदिवासी साहित्य[संपादित करें]

आदिवासियों का मौखिक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। पुरखा (लोक) कथाओं, गीतों, कहावतों और मुहावरों की वाचिक परंपरा आदिवासी समुदायों में भरी-पूरी है। अपनी इस वाचिक परंपरा को आदिवासी ‘पुरखा साहित्य’ (वंदना टेटे, 2012) कहते हैं जबकि हिंदी में इन्हें ‘लोक साहित्य’ एवं अंग्रेजी में ‘फोक लिटरेचर’ कहा जाता है।

भारत के आदिवासी भाषाओं में कम से कम 1500 से अधिक लेखक हैं जो नियमित रूप से साहित्य रच रहे हैं। अकेले संताली में ही लेखकों की संख्या 1000 से ऊपर है। फिर भी कहा जाता है कि आदिवासी साहित्य नहीं है। हर साल झारखण्ड और देश के दूसरे आदिवासी क्षेत्रों में लगभग 100 पुस्तकों का प्रकाशन और लोकार्पण होता है। राष्ट्रीय स्तर पर देशज और आदिवासी लेखकों के कई बड़े संगठन हैं जिनमें झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा, ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन, कुड़ुख लिटरेरी सोसायटी, आदिवासी साहित्य सम्मेलन महाराष्ट्र आदि प्रमुख हैं। जो मूलनिवासियों और आदिवासियों के नेतृत्व में संचालित हैं। समुदाय स्तर पर भी हर समुदाय का अपना साहित्यिक संगठन है। जैसे, मुण्डा साहित्य सभा, बोड़ो साहित्य सभा आदि। स्रोतः * आदिवासी साहित्य

भारत की प्रमुख जनजातियाँ[संपादित करें]

चंदा समिति ने सन् 1960 में अनुसूचति जातियों के अंर्तगत किसी भी जाति को शामिल करने के लिये 5 मानक निर्धारित किया:

  • 1. भौगोलिक एकाकीपन
  • 2. विशिष्ट संस्कृति
  • 3. पिछड़ापन
  • 4. संकुचित स्वभाव
  • 5. आदिम जाति के लक्षण

भारत में 461 जनजातियां हैं, जिसमें से 424 जनजातियों भारत के सात क्षेत्रों में बंटी हुई हैं:

उत्तरी क्षेत्र[संपादित करें]

(जम्मू-कश्मीर, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश)

जतियाँ: लेपचा, भूटिया, थारू, बुक्सा, जॉन सारी, खाम्पटी, कनोटा।

इन सब में मंगोल जाति के लक्षण मिलते हैं। जैसे:- तिरछी छोटी आंखे (चाइनीज, तिब्बती), पीला रंग, सीधे बाल, चेहरा चौड़ा, चपटा नाक।

पूर्वोत्तर क्षेत्र[संपादित करें]

ये सभी जातियां मंगोलाइड हैं।

  • दार्जिलिंग व सिक्किम में लेपचा,
  • अरूणाचल प्रदेश : भारी, मिसमी, डफला,
  • असम, मणिपुर : हमर
  • मणिपुर व त्रिपुरा में वुकी,
  • मिजोरम : लुसाई,
  • अरूणाचल प्रदेश : मोनपास, शेरदुक पेस।

पूर्वी क्षेत्र[संपादित करें]

  • उड़ीसा में:- जुआंग, खोड़, भूमिज, खरिया।
  • झारखण्ड में:- मुंडा, संथाल, बिरहोर हो।
  • संथाल:- भारत की सबसे बड़ी जनजाति। संथालिय भाषा को संविधान में मान्यता प्राप्त हैं।
  • पश्चिम बंगाल में:- उंराव, संथाल, मुंडा

पहचान : रंग काला, चॉकलेटी कलर, लंबा सिर, चौड़ी छोटी व चपटी नाक, हल्के घुंघराले बाल। यह सभी प्रोटो ऑस्टेलाइड प्रजाति से संबधित हैं।

मध्य क्षेत्र[संपादित करें]

गौड, बैगा, मारिया, अबूझ मारिया।

ये सभी प्रजातियां छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, पूर्वी आंध्र-प्रदेश में निवास करते हैं। ये सभी प्रोटो ऑस्टेलाइड प्रजाति से संबधित हैं।

पश्चिमी भारत में[संपादित करें]

  • गुजरात, राजस्थान, पश्चिमी मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र : भील, मीणा, गरासिया, डामोर, सहरिया, कंजर, सांसी
  • गुजरात की जनजातियाँ : महादेव, काली, बाली, डबला

दक्षिण भारत में[संपादित करें]

  • केरल:- कोटा, बगादा, टोडा। (टोडा में बहुपति प्रथा प्रचलित है।)
  • कुरूंबा, कादर, चेंचु, पूलियान, नायक, चेट्टी ये सभी जनजातियां नीग्रिये से संबधित हैं।
  • विशेषतायें:- काला रंग, बड़े होठ

द्विपीय क्षेत्र[संपादित करें]

  • अंडमान-निकोबार- जाखा, आन्गे, सेन्टलिस, सेम्पियन (शोम्पेन)

यह जातियां नीग्रिये प्रजाति से संबधित हैं। ये लुप्त होने के कगार पर हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

आदिवासी पत्र-पत्रिकाएं[संपादित करें]

  • जोहार सहिया (आदिवासियों की लोकप्रिय मासिक पत्रिका नागपुरी-सादरी भाषा में)
  • जोहार दिसुम खबर (12 आदिवासी भाषाओं में प्रकाशित भारत का एकमात्र पाक्षिक अखबार)
  • अखड़ा (11 आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका)