चुआड़ विद्रोह

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बंगाल के जंगल महल (अब कुछ भाग पश्चिम बंगाल और झारखण्ड में) के आदिवासी जमीनदारों और किसानों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ जल, जंगल, जमीन के बचाव तथा नाना प्रकार के शोषण से मुक्ति के लिए 1766 में जो आन्दोलन आरम्भ किया, उसे 'चुआड़ विद्रोह' कहते हैं।[1] यह आन्दोलन 1834 तक चला,[2][3][4] और इसका नेतृत्व जगन्‍नाथ पातर, दुर्जन सिंह, गंगा नारायण सिंह, रघुनाथ सिंह, सुबल सिंह, रघुनाथ महतो, श्याम गंजम सिंह, रानी शिरोमणि, लक्ष्मण सिंह, बैजनाथ सिंह एवं अन्य जमींदारों ने अलग-अलग समय काल में किया। इस विद्रोह को 'जंगल महल आंदोलन' भी कहा जाता है।[5][6]

1832-33 में गंगा नारायण सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा गया भूमिज विद्रोह को चुआड़ विद्रोह की ही हिस्सा मानी जाती है। जिसे अंग्रेजों ने 'गंगा नारायण का हंगामा' कहा है, जबकि कई इतिहासकारों ने इसे चुआड़ विद्रोह के नाम से दर्ज किया है।

चुआड़ लोग[संपादित करें]

चुआड़ अथवा चुहाड़ का शाब्दिक अर्थ लुटेरा अथवा उत्पाती होता है। ब्रिटिश शासन काल में जंगल महल क्षेत्र के भूमिजों को चुआड़ (नीची जाति के लोग) कहा जाता था, उनका मुख्य पेशा पशु-पक्षियों का शिकार और जंगलों में खेती था लेकिन बाद में कुछ भूमिज जमींदार बन गए और कुछ घटवाल और पाईक (सिपाही) के रूप में काम करने लगे।[7][8] जब 1765 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा तत्कालीन बंगाल के छोटानागपुर के जंगलमहल जिला में सर्वप्रथम मालगुजारी वसूलना शुरू किया गया, तब अंग्रेजों के इस षडयंत्रकारी तरीके से जल, जंगल, जमीन हड़पने की गतिविधियों का सन् 1766 ई. में भूमिज जनजाति के लोगों द्वारा सबसे पहला विरोध किया गया और ब्रिटिश शासकों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका गया। जब अंग्रेजों ने पूछा, ये लोग कौन हैं, तो उनके पिट्ठू जमींदारों ने घृणा और अवमानना की दृष्टि से उन्हें 'चुआड़' (बंगाली में अर्थ - असभ्य या दुष्ट) कहकर संबोधित किया, तत्पश्चात उस विद्रोह का नाम 'चुआड़ विद्रोह' पड़ा।[9] भूमिजों के साथ-साथ इस विद्रोह में जंगल महल के बाउरी, कुड़मि महतो[10][11][12][13] और मुंडा समुदायों ने भी अपना योगदान दिया था।

कई इतिहासकारों और मानव वैज्ञानिकों जैसे एडवर्ड टुइट डाल्टन, विलियम विलसन हन्टर, हर्बट होप रिस्ली, जे.सी. प्राइस, जगदीश चन्द्र झा, शरत चन्द्र राय, बिमला शरण, सुरजीत सिन्हा आदि ने भूमिज को ही चुआड़ कहा है।

विद्रोह की पृष्ठभूमि[संपादित करें]

इलाहाबाद की संधि (1765) में दिल्ली के मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सौंप दी।[14] जंगल महाल के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र मराठा आक्रमण के बाद से ही काफ़ी ढीले-ढाले तरीके से शासित था और स्थानीय जमींदार, जिन्हें राजा कहा जाता था, कर वसूल कर वर्ष में एक बार केन्द्रीय सत्ता को भेजते थे।[15][16] कम्पनी द्वारा दीवानी अधिकार प्राप्त करने के बाद से ही इसकी नीति अधिकतम संभव कर वसूली की रही। इस उद्देश्य में स्थानीय व्यवस्था को बाधक मानकर नयी प्रणालियाँ और नियामक (रेगुलेशन) लगाये जाने शुरू हुए और 1765 के बाद एक बिलकुल नए किस्म के कर युग का आरंभ हुआ जिससे स्थानीय व्यवस्था, स्थानीय लोग और जमींदार भी बर्बाद होने लगे।[17]

इस प्रकार स्थानीय चुआड़ (या पाइक) लोगों की जमीनों पर से उनके प्राकृतिक अधिकार समाप्त किये जाने से उनमें असंतोष व्याप्त था और जब उन्होंने विद्रोह किया तो उन्हें बेदखल किये गए जमींदारों का नेतृत्व भी प्राप्त हो गया।[18]

विद्रोह[संपादित करें]

साल 1766 में जंगल महल के धालभूम, मानभूम, मिदनापुर और बांकुड़ा जिलों में इस आदिवासी विद्रोह का आरंभ हुआ।[19] 1768 में धालभूम में दामपाड़ा के जगन्‍नाथ सिंह पातर ने सर्वप्रथम भूमिजों के साथ विद्रोह किया। दिसंबर 1769 में 5000 भूमिजों ने सुबल सिंह, श्याम गुंजम सिंह और जगन्नाथ पातर के नेतृत्व में धलभूम और बड़ाभूम में एक बड़ा विद्रोह किया।[20] 1770 में फिर सुबल सिंह, श्याम गुंजम सिंह और बाराभूम के युवराज लक्ष्मण सिंह ने विद्रोह किया, लेकिन 1778 में इस विद्रोह को दबा दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने सुबल सिंह को पकड़कर फांसी देने का विशेष रूप से आदेश दिया और जनवरी 1770 को सुबल सिंह को पकड़कर फांसी दिया गया। चुआड़ लोगों ने मानभूम, रायपुर और पंचेत के आस-पास के क्षेत्रों में इस विद्रोह को तेज़ कर दिया था। 1782-84 में मंगल सिंह ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इस विद्रोह का नेतृत्व किया। 1798-99 में दुर्जन सिंह, लाल सिंह और मोहन सिंह के नेतृत्व में चुआड़ विद्रोह अपने चरम पर था, लेकिन ब्रिटिश कंपनी की सेना ने उसे कुचल दिया। जगन्नाथ सिंह के पुत्र बैजनाथ सिंह ने 1798-1810 में इस विद्रोह का नेतृत्व किया। 1810 में, बैजनाथ सिंह के हिंसक विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश सेना को बुलाया गया था।[21]

साल 1799 के आरंभ में मिदनापुर के आसपास के तीन स्थानों पर चुआड़ लोग संगठित हुए: बहादुरपुर, सालबनी और कर्णगढ़।[22] यहाँ से उन्होंने गोरिल्ला हमले शुरू किये। इनमे से कर्णगढ़ में रानी शिरोमणि[23] का आवास था, जिन्होंने इनका सक्रिय रूप से नेतृत्व किया। तत्कालीन कलेक्टर के लिखे पत्र के अनुसार, चुआड़ विद्रोह बढ़ता गया और फ़रवरी 1799 तक मिदनापुर के आसपास के कई गाँवो के सतत् विस्तृत इलाके पर इनका कब्ज़ा हो गया। मार्च में, रानी ने तकरीबन 300 विद्रोहियों के साथ हमला किया और कर्णगढ़ के गढ़ (स्थानीय किले) में कंपनी के सिपाहियों के सारे हथियार लूट लिए।[24] हमलों और लूट का यह क्रम दिसम्बर 1799 तक चलता रहा। बाद में, जगन्नाथ सिंह के पोते रघुनाथ सिंह ने 1833 तक विद्रोह का नेतृत्व किया।[25] जमींदारों, घाटवालों, पाईकों और किसानों का यह विद्रोह पूरे जंगल महल और आसपास के क्षेत्रों में 1834 तक चला।

बाद में 1832-33 में, गंगा नारायण सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध भूमिज विद्रोह का नेतृत्व किया, जिसे अंग्रेजों ने 'गंगा नारायण का हंगामा' कहा है जबकि कई इतिहासकारों ने इसे चुआड़ विद्रोह के नाम से लिखा है।

चुआड़ विद्रोह के नायक[संपादित करें]

जगन्‍नाथ सिंह पातर, दुर्जन सिंह, गंगा नारायण सिंह[26], सुबल सिंह, श्याम गुंजम सिंह, लक्ष्मण सिंह (बड़ाभूम), रानी शिरोमणि, बैद्यनाथ सिंह, रघुनाथ सिंह, रघुनाथ महतो, मंगल सिंह, लाल सिंह, राजा मोहन सिंह, राजा मधु सिंह, लक्ष्मण सिंह (दलमा), सुंदर नारायण सिंह, फतेह सिंह, मनोहर सिंह और अन्य जमींदारों ने भूमिज, मुंडा, कोल आदिवासी किसानों के साथ अलग-अलग समय काल में इस विद्रोह का नेतृत्व किया।

मूल्यांकन[संपादित करें]

चुआड़ विद्रोह का प्रथम इतिहास जे॰ सी॰ प्राइस ने लिखा, "दि चुआड़ रेबेलियन ऑफ़ 1799" के नाम से।[27] परवर्ती इतिहासकारों ने भी ब्रिटिश दस्तावेजों के आधार पर इस विद्रोह का वर्णन किया है।

परवर्ती इतिहासकारों में ए॰ गुहा[28] और उनके हवाले से एडवर्ड सईद[29] जैसे लेखकों ने इसे गैर-तटस्थ लेखन के रूप में भी देखा है। झारखण्ड स्टूडेंट फेडरेशन द्वारा प्रकाशित एक पैम्फलेट में चुआड़ शब्द को नकारात्मक माना गया और इस विद्रोह को "जंगल महाल स्वतंत्रता आन्दोलन" के नाम से पुकारे जाने का प्रस्ताव भी किया गया।[28]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Bhattacherje, S. B. (2009-05-01). Encyclopaedia of Indian Events & Dates (अंग्रेज़ी में). Sterling Publishers Pvt. Ltd. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-207-4074-7.
  2. Ray, Nisith Ranjan; Palit, Chittabrata (1986). Agrarian Bengal Under the Raj (अंग्रेज़ी में). Saraswat Library.
  3. Indian Book Chronicle (अंग्रेज़ी में). Vivek Trust. 1997.
  4. "BHASA ANDOLON | Purulia District, Government of West Bengal | India" (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2023-01-03.
  5. Chittaranjan Kumar Paty 2007, पृ॰ 4fcccvg1.
  6. Gouripada Chatterjee 1986, पृ॰प॰ 13-.
  7. "Chuar Vidroh 1769-1805 (चुआर विद्रोह-1769-1805)". अभिगमन तिथि 2022-05-28.
  8. "चुआर या चुआड़ विद्रोह Chuar rebellion". अभिगमन तिथि 2022-05-28.
  9. "चुआर या चुआड़ विद्रोह Chuar rebellion". अभिगमन तिथि 2022-05-28.
  10. Burman, B. K. Roy (1994). Tribes in Perspective (अंग्रेज़ी में). Mittal Publications. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7099-535-7.
  11. Mishra, Asha; Paty, Chittaranjan Kumar (2010). Tribal Movements in Jharkhand, 1857-2007 (अंग्रेज़ी में). Concept Publishing Company. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8069-686-2.
  12. 1.Bayley, H.V. Memoranda of Midnapore, Calcutta, 1902, pp. 10-12.(In English).
  13. "History of Midnapore. Vol-1. Narendranath Das. Midnapore. 1956. Page: 20-21."
  14. Peter James Marshall 2005, पृ॰ 155.
  15. Nitish Sengupta 2011.
  16. Gouripada Chatterjee 1986, पृ॰ 8-12.
  17. Gouripada Chatterjee 1986, पृ॰ 13.
  18. Gouripada Chatterjee 1987, पृ॰ 70.
  19. Bhattacherje, S. B. (2009-05-01). Encyclopaedia of Indian Events & Dates (अंग्रेज़ी में). Sterling Publishers Pvt. Ltd. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-207-4074-7.
  20. Bengal (India), West (1985). West Bengal District Gazetteers: Puruliya (अंग्रेज़ी में). State editor, West Bengal District Gazetteers.
  21. India's Struggle for Freedom: Role of Associated Movements (अंग्रेज़ी में). Agam Prakashan. 1985.
  22. Gouripada Chatterjee 1986, पृ॰ 29.
  23. Gouripada Chatterjee 1986, पृ॰ 30.
  24. Gouripada Chatterjee 1986, पृ॰ 32.
  25. Society, Bihar Research (1960). The Journal of the Bihar Research Society (अंग्रेज़ी में).
  26. Orans, Martin (1969-05). "The Bhumij Revolt (1832–33): (Ganga Narain's Hangama or Turmoil). By Jagdish Chandra Jha. Delhi: Munshiram Manoharlal, 1967. xii, 146 pp. Map, Glossary, Bibliography, Index, Errata". The Journal of Asian Studies. 28 (03): 630–631. आइ॰एस॰एस॰एन॰ 0021-9118. डीओआइ:10.1017/s0021911800093141. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  27. Nicholas B. Dirks; Geoff Eley; Sherry B. Ortner (1994). Culture/power/history: A Reader in Contemporary Social Theory. Princeton University Press. पपृ॰ 368–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-691-02102-3. मूल से 28 अप्रैल 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 27 अप्रैल 2017.
  28. Sangeeta Dasgupta 2011, पृ॰ 214.
  29. Edward W. Said 2013.

स्रोत ग्रन्थ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]