आदिवासी साहित्य

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आदिवासी साहित्य से तात्पर्य उस साहित्य से है जिसमें आदिवासियों का जीवन और समाज उनके दर्शन के अनुरूप अभिव्यक्त हुआ है। आदिवासी साहित्य को विभिन्न नामों से पूरी दुनिया में जाना जाता है। यूरोप और अमेरिका में इसे नेटिव अमेरिकन लिटरेचर, कलर्ड लिटरेचर, स्लेव लिटरेचर और अफ्रीकन-अमेरिकन लिटरेचर, अफ्रीकन देशों में ब्लैक लिटरेचर और ऑस्ट्रेलिया मेें एबोरिजिनल लिटरेचर, तो अंग्रेजी में इंडीजिनस लिटरेचर, फर्स्टपीपुल लिटरेचर और ट्राइबल लिटरेचर कहते हैं। भारत में इसे हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में सामान्यतः ‘आदिवासी साहित्य’ ही कहा जाता है।

आदिवासी साहित्य की उपलब्धता[संपादित करें]

गैर-आदिवासी साहित्य की अध्ययन परंपरा आदिवासी साहित्य को दो श्रेणी में विभाजित करती हैै -

वाचिक परंपरा का आदिवासी (लोक) साहित्य[संपादित करें]

लिखित (शिष्ट अथवा आधुनिक) आदिवासी साहित्य[संपादित करें]

ऑरेचर[संपादित करें]

लेकिन आदिवासी साहित्यकार इस विभाजन को स्वीकार नहीं करते। वे मानते हैं कि चूंकि उनका जीवनदर्शन किसी भी विभाजन के पक्ष में नहीं है, उनके समाज में समरूपता और समानता है, इसलिए उनका साहित्य भी विभाजित नहीं है। वह एक ही है। वे अपने साहित्य को 'ऑरेचर'[1] कहते हैं। ऑरेचर अर्थात् ऑरल + लिटरेचर। उनकी स्थापना है कि उनके आज का लिखित साहित्य भी उनकी वाचिक यानी पुरखा साहित्य की परंपरा का ही साहित्य है। ऑरेचर की अवधारणा सबसे पहले युगांडा के आदिवासी लेखक पियो जिरिमू ने प्रस्तुत की थी जिसे दुनिया के अधिकांश आदिवासी लेखकों और साहित्यकारों ने स्वीकार किया। इनमें अफ्रीका के न्गूगी वा थ्योंगो और भारत की वंदना टेटे प्रमुख हैं। हालांकि गैर-आदिवासी साहित्यिक और अकादमिक जगत में अभी भी वाचिक साहित्य की स्वीकार्यता ज्यादा है।

आदिवासी साहित्य की अवधारणा[संपादित करें]

आदिवासी साहित्य की अवधारणा को लेकर तीन तरह के मत हैं।

आदिवासी विषय पर लिखा गया साहित्य आदिवासी साहित्य है।[संपादित करें]

आदिवासियों द्वारा लिखा गया साहित्य आदिवासी साहित्य है।[संपादित करें]

‘आदिवासियत’ (आदिवासी दर्शन) के तत्वों वाला साहित्य ही आदिवासी साहित्य है।[संपादित करें]

पहली अवधारणा गैर-आदिवासी लेखकों की है। परंतु समर्थन में कुछ आदिवासी लेखक भी हैं। जैसे, रमणिका गुप्ता, संजीव, राकेश कुमार सिंह, महुआ माजी, बजरंग तिवारी, गणेश देवी आदि गैर-आदिवासी लेखक, और हरिराम मीणा, महादेव टोप्पो, आईवी हांसदा आदि आदिवासी लेखक।

दूसरी अवधारणा उन आदिवासी लेखकों और साहित्यकारों की है जो जन्मना और स्वानुभूति के आधार पर आदिवासियों द्वारा लिखे गए साहित्य को ही आदिवासी साहित्य मानते हैं।

अंतिम और तीसरी अवधारणा उन आदिवासी लेखकों की है, जो ‘आदिवासियत’ के तत्वों का निर्वाह करने वाले साहित्य को ही आदिवासी साहित्य के रूप में स्वीकार करते हैं। ऐसे लेखकों और साहित्यकारों के भारतीय आदिवासी समूह ने 14-15 जून 2014 को रांची (झारखंड) में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में इस अवधारणा को ठोस रूप में प्रस्तुत किया, जिसे ‘आदिवासी साहित्य का रांची घोषणा-पत्र’ के तौर पर जाना जा रहा है और अब जो आदिवासी साहित्य विमर्श का केन्द्रीय बिंदु बन गया है।

 "आदिवासियों के आदिवासियत को न तो आप वर्गीकृत कर सकते हैं न ही किसी मानक से नाप सकते हैं. क्योंकि यह तो
   विरासत में मिला हुआ वह गुण है जिसे कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता और न ही इसे कोई खारिज कर सकता है। 
   किसी व्यक्ति की आदिवासियत को आप इस बात से भी नहीं तय कर सकते हैं कि उसमें आदिवासी खून कितना है."
   - अनिता हेइस (सिडनी), रीड-गिल्बर्ट, केरी संपादित पुस्तक ‘‘व्हाइ डज ए ब्लैक वूमेन राइट?’ (2000) में 
   शामिल ‘द स्ट्रेंथ ऑफ अस ऐज वूमेन: ब्लैक वूमेन स्पीक’ लेख (पृ. 51) में

आदिवासी साहित्य का रांची घोषणा-पत्र[संपादित करें]

आदिवासी साहित्य की बुनियादी शर्त उसमें आदिवासी दर्शन का होना है जिसके मूल तत्व हैं -

  1. प्रकृति की लय-ताल और संगीत का जो अनुसरण करता हो।
  2. जो प्रकृति और प्रेम के आत्मीय संबंध और गरिमा का सम्मान करता हो।
  3. जिसमें पुरखा-पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल और इंसानी बेहतरी के अनुभवों के प्रति आभार हो।
  4. जो समूचे जीव जगत की अवहेलना नहीं करें।
  5. जो धनलोलुप और बाजारवादी हिंसा और लालसा का नकार करता हो।
  6. जिसमें जीवन के प्रति आनंदमयी अदम्य जिजीविषा हो।
  7. जिसमें सृष्टि और समष्टि के प्रति कृतज्ञता का भाव हो।
  8. जो धरती को संसाधन की बजाय मां मानकर उसके बचाव और रचाव के लिए खुद को उसका संरक्षक मानता हो।
  9. जिसमें रंग, नस्ल, लिंग, धर्म आदि का विशेष आग्रह न हो।
  10. जो हर तरह की गैर-बराबरी के खिलाफ हो।
  11. जो भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और आत्मनिर्णय के अधिकार पक्ष में हो।
  12. जो सामंती, ब्राह्मणवादी, धनलोलुप और बाजारवादी शब्दावलियों, प्रतीकों, मिथकों और व्यक्तिगत महिमामंडन से असहमत हो।
  13. जो सहअस्तित्व, समता, सामूहिकता, सहजीविता, सहभागिता और सामंजस्य को अपना दार्शनिक आधार मानते हुए रचाव-बचाव में यकीन करता हो।
  14. सहानुभूति, स्वानुभूति की बजाय सामूहिक अनुभूति जिसका प्रबल स्वर-संगीत हो।
  15. मूल आदिवासी भाषाओं में अपने विश्वदृष्टिकोण के साथ जो प्रमुखतः अभिव्यक्त हुआ हो।

आदिवासी साहित्य का भाषाई मानचित्र[संपादित करें]

Languages Map

आदिवासी साहित्य वाचिक तौर पर अपनी मूल आदिवासी भाषाओं में बहुत समृद्ध और विपुल है। भारत में लिखित आदिवासी साहित्य की शुरुआत बीसवीं सदी के आरंभिक दौर में होती है जब औपनिवेशिक दिनों में आदिवासी समुदाय आधुनिक शिक्षा के संपर्क में आते हैं। विशेषकर, झारखंड और उत्तर-पूर्व के आदिवासी इलाकों में। तब से लेकर आज तक अंग्रेजी और हिंदी, बांग्ला, ओड़िया, असमी, मराठी आदि अन्य भारतीय भाषाओं में आदिवासी साहित्य लेखन निरंतर प्रगति पर है और हर वर्ष सौ से अधिक आदिवासी रचित पुस्तकें विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हो रहा है।

भारत में आदिवासी साहित्य पांच भाषा परिवार के भाषाओं में वाचिक और लिखित रूप में उपलब्ध है -

  • आस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार
  • चीनी-तिब्बती भाषा परिवार
  • द्रविड़ भाषा परिवार
  • अंडमानी भाषा परिवार
  • भारोपीय आर्य भाषा परिवार

आस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार[संपादित करें]

यह आदिवासी भाषा परिवार मुख्य रूप से भारत में झारखंड, छत्तीसगढ, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के ज्यादातर हिस्सों में बोली जाती है। संख्या की दृष्टि से इस परिवार की सबसे बड़ी भाषा संथाली या संताली है। इस परिवार की अन्य प्रमुख भाषाओं में हो, मुंडारी, खड़िया, सावरा इत्यादी प्रमुख भाषाएं हैं।

चीनी-तिब्बती भाषा परिवार[संपादित करें]

इस परिवार की ज्यादातर भाषाएं भारत के सात उत्तर-पूर्वी राज्यों में बोली जाती है। जिनमें नगा, मिज़ो, म्हार, मणिपुरी, तांगखुल, खासी, दफ़ला, आओ आदि भाषाएं प्रमुख हैं।

द्रविड़ भाषा परिवार[संपादित करें]

यह भाषा परिवार भारत का दूसरा सबसे बड़ा भाषायी परिवार है। इस परिवार की सदस्य गैर-आदिवासी भाषाएं ज्यादातर दक्षिण भारत में बोली जाती हैं। जिसमें तमिल, कन्नड़, मलयालम और तेलुगू भाषाएं हैं। परंतु द्रविड़ परिवार की आदिवासी भाषाएं पूर्वी, मध्य और दक्षिण तक के राज्यों में बोली जाती हैं। गोंडों की गोंडी, उरांव, किसान और धांगर समुदायों की कुड़ुख और पहाड़िया की मल्तो या मालतो द्रविड़ परिवार की प्रमुख आदिवासी भाषाएं हैं।

अंडमानी भाषा परिवार[संपादित करें]

जनसंख्या की दृष्टि से यह भारत का सबसे छोटा आदिवासी भाषाई परिवार है। इसके अंतर्गत अंडबार-निकाबोर द्वीप समूह की भाषाएं आती हैं, जिनमें अंडमानी, ग्रेड अंडमानी, ओंगे, जारवा आदि प्रमुख हैं।

भारोपीय आर्य भाषा परिवार[संपादित करें]

भारत की दो तिहाई से अधिक गैर-आदिवासी आबादी हिन्द आर्य भाषा परिवार की कोई न कोई भाषा विभिन्न स्तरों पर प्रयोग करती है। जैसे, संस्कृत, हिन्दी, बांग्ला, गुजराती, कश्मीरी, डोगरी, पंजाबी, उड़िया, असमिया, मैथिली, भोजपुरी, मारवाड़ी, गढ़वाली, कोंकणी आदि भाषाएं। परंतु राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के भीलों की वर्तमान भीली, भिलाला और वागड़ी, इसी भारोपीय भाषा परिवार के अंतर्गत आती है।

भारत के प्रमुख आदिवासी साहित्यकार[संपादित करें]

  1. मेन्नस ओड़ेअ
  2. सुशीला सामद
  3. रघुनाथ मुर्मू
  4. प्यारा केरकेट्टा
  5. एलिस एक्का
  6. आयता उरांव
  7. तेमसुला आओ
  8. ममांग दई
  9. राम दयाल मुंडा
  10. बलदेव मुंडा
  11. रोज केरकेट्टा
  12. दुलाय चंद्र मुंडा
  13. पीटर पॉल एक्का
  14. वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’
  15. हरिराम मीणा
  16. महादेव टोप्पो
  17. वाहरू सोनवणे
  18. ग्रेस कुजूर
  19. उज्ज्वला ज्योति तिग्गा
  20. निर्मला पुतुल
  21. वंदना टेटे
  22. सुनील मिंज
  23. ग्लैडसन डुंगडुंग
  24. अनुज लुगुन
  25. रूपलाल बेदिया
  26. गंगा सहाय मीणा
  27. ज्योति लकड़ा

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. ऑरेचर The Ugandan scholar Pio Zirimu introduced the term orature in an attempt to avoid an oxymoron, but oral literature remains more common both in academic and popular writing.साँचा:The Anthem Dictionary of Literary Terms and Theory By Peter Auger Anthem Press, 2010 at Page 210 and Uhuru's Fire: African Literature East to South By Adrian Roscoe CUP Archive 1977 at page 9 In the book Encyclopaedia of African Literature edited by Simon Gikandi Routledge 2003 edition defines it as, 'Orature means something passed on through the spoken word, and because it is based on the spoken language it comes to life only in a living community. Where community life fades away, orality loses its function and dies. It needs people in a living social setting: it needs life itself.'In the book Songs and Politics in Eastern Africa by Kimani Njogu, ‎Hervé Maupeu 2007 edition states at Page 204 as Pio Zirimu (that Ugandan theorist who coined the word 'orature'), defines it as 'the use of utterance as an aesthetic means of expression' (as quoted by Ngũgĩ wa Thiong'o 1988). In the book Defining New Idioms and Alternative Forms of Expression edited by Eckhard Breitinger Rodopi 1996 at page 78 'This means that any "oral society" had to develop means to make the spoken word last, at least for a while. We tend to regard all the genres of orature as belonging to the homogeneous complex of folklore.'