नदी

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स्रोत :- नंद मौर्य राजवंश

नदी भूतल पर प्रवाहित एक जलधारा है, जिसका स्रोत प्रायः कोई झील, हिमनद, झरना या बारिश का पानी होता है तथा किसी सागर अथवा झील में गिरती है। नदी शब्द संस्कृत के नद्यः से आया है। संस्कृत में ही इसे सरिता भी कहते हैं।

नदी दो प्रकार की होती है- सदानीरा या बरसाती। सदानीरा नदियों का स्रोत झील, झरना अथवा हिमनद होता है और वर्ष भर जलपूर्ण रहती हैं, जबकि बरसाती नदियाँ बरसात के पानी पर निर्भर करती हैं। गंगा, यमुना, कावेरी, ब्रह्मपुत्र, अमेज़न, नील आदि सदानीरा नदियाँ हैं। नदी के साथ मनुष्य का गहरा सम्बंध है। नदियों से केवल फसल ही नहीं उपजाई जाती है बल्कि वे सभ्यता को जन्म देती हैं अपितु उसका लालन-पालन भी करती हैं। इसलिए मनुष्य हमेशा नदी को देवी के रूप में देखता आया है।

हमारे अतीत में ऋषि, मुनियों ने इन नदियों के किनारे ज्ञान को प्राप्त किया। अभी भी बड़े बड़े विकसित महानगर नदियों के किनारे बसे हैं। मानव सभ्यता और सस्कृति नदियों के किनारे ही फली फुली है।

संदर्भ[संपादित करें]

नदी के 3 भूवैज्ञानिक कार्य भी हैं,जो इस प्रकार हैं:- 1. अपरदन 2. परिवहन 3. निक्षेपण

1) अपरदन :-नदी का अपरदन कार्य निम्न क्रियाओ के संयुक्त प्रयास से होता हैं,- १. संक्षारण , २.द्रवचालित क्रिया, ३. अपघर्षण, ४. सन्निघर्षण


2) नदी परिवहन:- नदी में विद्यमान अपरदित पदार्थ जल के साथ एक स्थान से दूसरे तक प्रवाह के साथ परिवहन को कहते है।


3) नदी निक्षेपण:- नदी द्वारा अपरदित पदार्थो का वेग में कमी तथा अपरदित पदार्थों का निक्षेप ही नदी निक्षेपण

4) भूगर्भ :- जो पानी बरसात या बाढ के द्वारा गांव मे स्थित तलाब कुआ छोटी नदियो मे एकत्रित होकर धीरे धीरे रिस कर धरती के अन्दर समा जाता है |