वितत भिन्न

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अनन्त वितत भिन्न के रूप में विस्तार का एक उदाहरण

गणित में निम्नलिखित प्रकार के व्यंजक (expression) को वितत भिन्न (continued fraction) कहते हैं।

यहाँ, a0 एक पूर्णांक है तथान्य सभी संख्याएँ ai (i ≠ 0) धनात्मक पूर्णांक हैं। यदि उपरोक्त वितत भिन्न में अंश एवं हर का मान कुछ भी होने की स्वतंत्रता दे दी जाय (जैसे फलन होने की छूट) तो इसे 'सामान्यीकृत वितत भिन्न' कह सकते हैं।

उपयोग[स्रोत सम्पादित करें]

  • कैलेण्डर सिद्धान्त - ग्रेगरी कैलेण्डर के किस वर्ष में ३६५ दिन और किस वर्ष में ३६६ दिन होंगे,। इसको निर्धारित करने का आधार वितत भिन्न है।
  • अपरिमेयता (irrationality) का प्रमाण
  • पेल के समीकरण का हल
  • आर्थोगोनल बहुपदों के वैशीष्टीकरण में

कुछ उपयोगी प्रमेय[स्रोत सम्पादित करें]

इतिहास[स्रोत सम्पादित करें]

प्राचीन काल से ही वितत भिन्नों का उपयोग किया जा रहा है।

आर्यभट ने प्रथम डिग्री तथा द्वितीय डिग्री वाले कुछ अनिर्धार्य समीकरणों के हल वितत भिन्न के रूप में ही दिये हैं। उसके बाद नारायण पण्डित (१३५० ई) ने अपने गणित ग्रन्थ गणितकौमुदी में N x2 + K2 = y2 प्रकार के अनिर्धार्य समीकरणों का हल आवर्ती वितत भिन्न की सहायता से निकाला है। उनकी कलनविधि (अल्गोरिद्म) नीचे के श्लोक में दिया गया है-[1]

hrasvajyesthaksepan kramasastesamadho nyaset tanstu
anyanyesam nyasa stasya bhaved bhavana-nama || 2 ||
vajrabhyasau hrasva jyesthakayoh samyutirbhaved hrasvam
laghughatah prakrtihato jyesthavadhenanvito jyestham || 3 ||
ksiptorghatah ksepah syad vajrabhyasayorviseso va
hrasvam lavdhorghatah prakrtighno jyesthyosca vadhah || 4 ||
tadvivaram jyesthapadam ksepah ksiptyoh prajayate ghatah 412

सोलहवीं शताब्दी में राफेल बम्बेली ने वितत भिन्न के रूप में वर्गमूल निकाला। किन्तु १७वीं शताब्दी के अन्तिम तथा १८वीं शताब्दी के आरम्भिक काल में जाकर ही सतत भिन्न का आधार तैयार हुआ। १८वीं शताब्दी के आरम्भ में सतत भिन्न अपने आप में अध्यय्न का एक क्षेत्र बन गया था।

इन्हें भी देखें[स्रोत सम्पादित करें]

सन्दर्भ[स्रोत सम्पादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[स्रोत सम्पादित करें]