संख्या

संख्याएँ वे गणितीय वस्तुएँ हैं जिन का उपयोग मापने, गणना करने और नामकरण करने के लिए किया जाता है। १, २, ३, ४ आदि प्राकृतिक संख्याएँ इस की सबसे मूलभूत उदाहरण हैं। इस के अलावा वास्तविक संख्याएँ (जैसे १२.४५, ९९.७५ आदि) और अन्य प्रकार की संख्याएँ भी आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में प्रयुक्त होतीं हैं। संख्याएँ हमारे जीवन के ढर्रे को निर्धारित करती हैं। केल्विन का संख्याओं के बारे में विचार है कि आप किसी परिघटना के बारे में कुछ नहीं जानते यदि आप उसे संख्याओं के द्वारा अभिव्यक्त नहीं कर सकते।
जीवन के कुछ ऐसे क्षेत्रों में भी संख्याओं का महत्व है जो इतने आम नहीं माने जाते। किसी धावक के समय में ०.००१ सैकंड का अंतर भी उसे स्वर्ण दिला सकता है या उसे इस से वंचित कर सकता है। किसी पहिए के व्यास में एक सेंटीमीटर के १०००वें हिस्से जितना अंतर होता है उसे किसी घड़ी के लिए बेकार कर सकता है। किसी व्यक्ति की पहचान के लिए उस का टैलीफोन नंबर, राशन कार्ड पर पड़ा नंबर, बैंक खाते का नंबर या परीक्षा का रोल नंबर सहायक होते हैं। अंकों के समूह को संख्या कहते हैं। ० से लेकर के ९ तक कुल दस अंक होते हैं जिन का निर्माण कर के बहुत सारी संख्या बनाई जा सकती है जैसे कि १२३४, आदि।
संख्याओं का उद्भव
[संपादित करें]संख्याएं मानव सभ्यता जितनी ही पुरानी हैं। शुक्ल यजुर्वेद के अध्याय १७ में बहुत बड़ी बड़ी संख्याओं का उल्लेख है। [1]
- इमा मे ऽ अग्न ऽ इष्टका धेनवः सन्त्व् एका च दश च दश च शतं च शतं च सहस्रं च सहस्रं चायुतं चायुतं च नियुतं च नियुतं च प्रयुतं चार्बुदं च न्यर्बुदꣳ समुद्रश् च मध्यं चान्तश् च परार्धश् चैता मे ऽ अग्न इष्टका धेनवः सन्त्व् अमुत्रामुष्मिंल् लोके ॥ (वाजसनेयि यजुर्वेद १७/२)
इस में प्रयुत के बाद कोटि, १० कोटि लुप्त हैं। न्यर्बुद के बाद खर्व, १० खर्व, शङ्कु नहीं हैं। इतने अवयवों (इष्टका = ईंट) से विश्व बना है। उत्पादन का साधन यज्ञ को गो कहा गया है जिसमें ३ तत्त्व हों-गति या क्रिया, स्थान, मिश्रण तथा रूपान्तर (उत्पादन)। अतः इन इष्टकों को धेनु (गो के अवयव) कहा है।
आक्सफोर्ड स्थित एशमोलियन अजायबघर में राजाधिकार का प्रतीक एक मिस्री शाही दंड (रायल मेस) रखा है, जिस पर १२०००० कैदियों, ४००००० बैलों और १४२२००० बकरियों का रिकार्ड दर्ज है। इस रिकार्ड से जो ३४०० ईसा पूर्व से पहले का है, पता चलता है कि प्राचीन काल में लोग बड़ी संख्याओं को लिखना जानते थे। निस्संदेह संख्याओं की शुरुआत मिस्रवासियों से भी बहुत पहले हुवी होगी।
आदिमानव का गिनती से इतना वास्ता नहीं पड़ता था। रहने के लिए उस के पास गुफा थी, भोजन पेड़ पौधों द्वारा या फिर हथियारों से शिकार करके उसे मिल जाता था। परंतु लगभग १०००० साल पहले जब आदिमानवों ने गाँवों में बस कर खेती का काम और पशुपालन आरंभ किया तो उन का जीवन पहले से कहीं अधिक जटिल हो गया। उन्हें अपने रोजमर्रा के कार्यक्रम के साथ अपने सार्वजनिक एवं पारिवारिक जीवन में भी नियमितता लाने की आवश्यकता महसूस हुवी। उन्हें पशुओं की गिनती करने, कृषि उपज का हिसाब रखने, भूमि को मापने तथा समय की जानकारी के लिए संख्याओं की आवश्यकता पड़ी। दुनिया के विभिन्न भागों में जैसे भारत, मिस्र, चीन तथा कई और स्थानों पर विभिन्न सभ्यताओं का निवास था। इन सभी सभ्यताओं ने संभवतया एक ही समय के दौरान अपनी अपनी संख्या पद्धतियों का विकास किया होगा। बेबीलोन निवासियों की प्राचीन मिट्टी की प्रतिमाओं में संख्याएं खुदी मिलती हैं।
तेज धार वाली पतली डंडियों से वे गीली मिट्टी पर शंकु आकार के प्रतीक चिह्नों की खुदाई करते, बाद में इन्हें ईंटों की शक्ल दे देते। एक (१), दस (१०), सौ (१००) आदि के लिए विशेष प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता था। इन प्रतीकों की पुनरावृत्ति द्वारा ही वे किसी संख्या को प्रदर्शित करते जैसे कि १००० को लिखने के लिए वे प्रतीक चिह्न का सहारा लेते या फिर १०० की संख्या को दस बार लिखते थे। वे काफी बड़ी संख्याओं की गिनती ६० की संख्या के माध्यम से ही करते, जैसा कि आजकल हम संख्या १० के माध्यम से अपनी गिनती करते हैं। मिस्र के प्राचीन निवासी भी बड़ी संख्याओं की गिनती करना जानते थे तथा साल में ३६५ दिन होने की जानकारी उन के पास थी।
संख्याओं का वर्गीकरण
[संपादित करें]मूलतः संख्या का अर्थ 'प्राकृतिक संख्याओं' से लिया गया था। आगे चलकर धीरे-धीरे 'संख्याओं' का क्षेत्र विस्तृत होता गया तथा पूर्णांक, परिमेय संख्या, वास्तविक संख्या होते हुए समिश्र संख्या तक पहुँच चुका है।
संख्याओं के समुच्चय में यह सम्बन्ध है:
संख्याओं का महत्व
[संपादित करें]संख्याएँ आधुनिक सभ्यता का आधार हैं। संख्याओं के बिना आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। केल्विन ने कहा था कि यदि आप कुछ जानते हैं और उसे संख्याओं में अभिव्यक्त नहीं कर सकते तो आप कुछ नहीं जानते।
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]- अंक (डिजिट)
- स्थानीय मान
- भूतसंख्या पद्धति
- कटपयादि संख्या पद्धति
- आर्यभट की संख्यापद्धति
- संख्या सिद्धान्त
- अभाज्य संख्या या रूूढ़ संख्या (प्राइम नम्बर)
- गणितीय नियतांक
- भौतिक नियतांक
- परिमाण की कोटि (ऑर्डर ऑफ मैग्निट्यूड)
बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]पूर्ण संख्या और पूर्णांक संख्या Archived 2019-11-19 at the वेबैक मशीन
- https://web.archive.org/web/20091004230123/http://eom.springer.de/a/a013260.htm
- Mesopotamian and Germanic numbers
- BBC Radio 4, In Our Time: Negative Numbers
- '4000 Years of Numbers', lecture by Robin Wilson, 07/11/07, Gresham College (available for download as MP3 or MP4, and as a text file)।
- https://web.archive.org/web/20121003185207/http://planetmath.org/encyclopedia/MayanMath2.html
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Emergence of Mathematics in Ancient India : A Reassessment (जयदेव दासगुप्त)