जरासन्ध

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A painting from the Mahabharata Balabhadra fighting Jarasandha

जरासंध महाभारत कालीन मगध राज्य का नरेश थे। सम्राट जरासंध ने बहुत से क्रूर राजाओं को अपने कारागार में बंदी बनाकर रखा था। पर उन्होंने किसी को भी मारा नहीं था, मगध सम्राट जरासंध जी महाराज महादेव का बहुत बड़ा भक्त थे ,वो ब्राह्मणों की बहुत आदर करता थे,काफी दान पूर्ण करता था,वचन के भी काफी पक्के थे सम्राट जरासंध

वह मथुरा के यदुवँशी नरेश कंस का ससुर एवं परम मित्र थे उसकी दोनो पुत्रियो आसित एव्म प्रापित का विवाह कंस से हुआ था। श्रीकृष्ण से कंस वध का प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने १७ बार मथुरा पर चढ़ाई की लेकिन जिसके कारण भगवान श्रीकृष्ण को मथुरा छोड़ कर भागना पड़ा फिर वो द्वारिका जा बसे, तभी उनका नाम रणछोड़ कहलाया। जरासंध जी महाराज श्री कृष्ण के परम शत्रु और चन्द्रवँशी क्षत्रिय समाज के सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे। तत्कालीन भारतवर्ष के चन्द्रवँशी क्षत्रिय वँश के मगध सम्राट जरासन्ध जी महाराज ऐसे इकलौते सम्राट थे जिन्होंने पूरे विश्व पर मगध का शासन स्थापित किया था, उनके वंशजों ने उनकी हत्या के बाद भी लगभग 1000 वर्षों तक कुशलतापूर्वक शासन किया।

जन्म[संपादित करें]

जरासंध के पिता थे मगधनरेश महाराज बृहद्रथ और उनकी दो पटरानियां थी। वह दोनो ही को एकसमान चाहते थे। बहुत समय व्यतीत हो गया और वे बूढ़े़ हो चले थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। तब एक बार उन्होंने सुना की उनके राज्य में ऋषि चंडकौशिक पधारे हुए हैं और वे एक आम के वृक्ष के नीचे विराजमान हैं। यह सुनते ही राजन आशापूर्ण होकर ऋषि से मिलने चल दिए। ऋषि के पास पहुँच कर उन्होंने ऋषि को अपना दुख कह सुनाया। राजा का वृतांत सुनकर ऋषि को दया आ गई और उन्होंने नरेश को एक आम दिया और कहा की इसे अपनी रानी को खिला देना। लेकिन चूंकि उनकी दो पत्नीयां थी और वे दोनो ही से एक समान प्रेम करते थे, इसलिए उन्होंए उस आम के बराबर टुकड़े करके अपनी दोनो रानियों को खिला दिया। इससे दोनो रानियों को आधे-आधे पुत्र हुए। भय के मारे उन्होंने उन दोनो टुकड़ो को वन में फिकवा दिया। तभी वहाँ से जरा माता जिन्हें बन्नी माता भी कहते है,जो माता पार्वती का ही रूप थी जरा माता ने माँस के उन दोनों लोथड़ों को देखा और उसने दायां लोथड़ा दाएं हाथ में और बायां लोथड़ा बाएं हाथ में लिया जिससे वह दोनो टुकडे जुड़ गए। और फिर जरा माता ने उससे राजा बिरदर्थ को सौप दिए और राजभवन में दोनों रानियों की छाती से दुध उतर आया। इसीलिए उसका नाम जरासंध हुआ।जरासंध का जन्म महादेव के ही वरदान से हुआ था ,और सम्राट जरासंध भी महादेव का बहुत बड़ा भक्त था ।[1]

मृत्यु[संपादित करें]

जरासंध वध करते भीमसेन

अंग प्रदेश का राजा बनने के पश्चात , कर्ण अंग की प्रजा को मगध नरेश के अन्याय से मुक्त करने के लिए जरासंध से युद्ध करता है । यह युद्ध लागातार 500 साल तक चला था । इसी युद्व के अन्तिम मैं तब कर्ण जरासंध को बताता है कि उसे उसकी कमजोरी का ज्ञान है। उसे बीच से खा कर मारा जा सकता है। तब जरासंध अपनी पराजय स्वीकार कर लेताहैं और यही से उसकी म्रत्यु का रहस्य सबके सामने आजाता है।

इंद्रप्रस्थ नगरी का निर्माण पूरा होने के पश्चात एक दिन नारद मुनि ने महाराज युधिष्ठिर को उनके पिता का यह संदेश सुनाया की अब वे राजसूय यज्ञ करें। इस विषय पर महाराज ने श्रीकृष्ण से बात की तो उन्होंने भी युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ करने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन महाराज युधिष्ठिर के चक्रवर्ती सम्राट बनने के मार्ग में केवल एक रोड़ा था, मगध नरेश जरासंध, जिसे परास्त किए बिना वह सम्राट नहीं बन सकते थे और ना ही उसे रणभूमि मे परास्त किया जा सकता था। इस समस्या का समाधान करने के लिए श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन के साथ ब्राह्मणों का भेष बनाकर मगध की ओर चल दिए। वहाँ पहुँच कर जरासंध ने उन्हें ब्राह्मण समझकर कुछ माँग लेने के लिए कहा लकिन उस समय ब्राह्मण भेषधारी श्रीकृष्ण ने कहा की अभी उनके दोनो मित्रों का मौन व्रत है जो अर्ध रात्रि में समाप्त होगा। तब जरासंध ने अर्ध रात्रि तब ही आने का वचन दिया और उन्हें ब्राह्मण कक्ष मे ठहराया।

तब अर्धरात्रि में वह आया लेकिन उसे उन तीनों पर कुछ संदेह हुआ की वे ब्राह्मण नहीं है कयोकि वे शरीर से क्षत्रिय जैसे लग रहे थे उस्ने अपने संदेह को प्रकट किया और उन्हे उनके वास्तविक रूप में आने को कहा एव्म उन्हे पहचान लिया। तब श्रीकृष्ण की खरी-खोटी सुनने के बाद उसे क्रोध आ गया और उस्ने कहा की उन्हें जो भी चाहिए वे माँग ले और यहाँ से चले जाएं। तब उन्होंने ब्राह्मण भेष में ही जरासंध को मल्लयुद्ध करने के लिए कहा और फिर अपना वास्तविक परिचय दिया। जरासम्घ एक वीर योधा था इसलिए उसने मल्ल युद्ध के लिए भीम को ही चुना।

तब अगले उसने भीम के साथ मल्लभूमि में मल्ल युद्ध किया। यह युद्ध लगभग २८ दिनो तक चलता रहा लेकिन जितनी बार भीमसेन उसके दो टुकड़े करते वह फिर से जुड़ जाता। इस पर श्रीकृष्ण ने घास की एक डंडी की सहायता से भीम को संकेत किया की इस बार वह उसके टुकड़े कर के दोनों टुकड़े अलग-अलग दिशा में फेंके। तब भीम ने वैसा ही किया और इस प्रकार जरासंध का वध हुआ।

तब उसका वध करके उन तीनों ने उसके बंदीगृह में बंद सभी ८६ राजाओं को मुक्त किया और श्रीकृष्ण ने जरासंध के पुत्र सहदेव को राजा बनाया। सहदेव ने आगे चलकर के महाभारत के युध मे पान्डवो का साथ दिया।[1][2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "टुकड़ों में पैदा हुआ था ये क्रूर इंसान, 14 दिनों तक दी भीम को टक्कर". राजस्थान पत्रिका. १२ जून २०१५. अभिगमन तिथि १२ जून २०१५.
  2. "कुछ इस तरह बनी थी जरासंध की मृत्यु की योजना". नई दुनिया. २२ सितम्बर २०१४. अभिगमन तिथि १२ जून २०१५.