भागवत पुराण
| श्रीमद्भागवत | |
|---|---|
![]() गीताप्रेस गोरखपुर का आवरण पृष्ठ |
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| लेखक | वेदव्यास |
| देश | भारत |
| भाषा | संस्कृत |
| शृंखला | पुराण |
| विषय | श्रीकृष्ण भक्ति |
| प्रकार | प्रमुख वैष्णव ग्रन्थ |
| पृष्ठ | १८,००० श्लोक |
भागवत पुराण हिन्दुओं के अट्ठारह पुराणों में से एक है। इसे श्रीमद्भागवतम् या केवल भागवतम् भी कहते हैं। इसका मुख्य वर्ण्य विषय भक्ति योग है, जिसमे कृष्ण को सभी देवों का देव या स्वयं भगवान के रूप में चित्रित किया गया है। इसके अतिरिक्त इस पुराण में रस भाव की भक्ति का निरुपण भी किया गया है। परंपरागत तौर पर इस पुराण का रचयिता वेद व्यास को माना जाता हैं।
श्रीमदभागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परीक्षित को सुनाया गया भक्तिमार्ग का तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेमकी सुगन्धि है। इसमें साधन-ज्ञान, सिद्धज्ञान, साधन-भक्ति,सिद्धा-भक्ति, मर्यादा-मार्ग, अनुग्रह-मार्ग, द्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है। [1]
भागवत पुराण में महर्षि सूत गोस्वामी उनके समक्ष प्रस्तुत साधुओं को एक कथा सुनाते हैं। साधु लोग उनसे विष्णु के विभिन्न अवतारों के बारे में प्रश्न पूछते हैं। सुत गोस्वामी कहते हैं कि यह कथा उन्होने एक दूसरे ऋषि शुकदेव से सुनी थी। इसमें कुल बारह सकन्ध हैं। प्रथम काण्ड में सभी अवतारों को सारांश रूप में वर्णन किया गया है।
अनुक्रम |
परिचय [संपादित करें]
अष्टादश पुराणों में भागवत नितांत महत्वपूर्ण तथा प्रख्यात पुराण है। पुराणों की गणना में भागवत अष्टम पुराण के रूप में परिगृहीत किया जाता है (भागवत 12.7.23)। आजकल 'भागवत' आख्या धारण करनेवाले दो पुराण उपलब्ध होते हैं :
- (क) देवीभागवत तथा
- (ख) श्रीमद्भागवत्
अत: इन दोनों में पुराण कोटि मे किसकी गणना अपेक्षित है ? इस प्रश्न का समाधान आवश्यक है।
विविध प्रकार से समीक्षा करने पर अंतत: यही प्रतीत होता है कि श्रीमद्भागवत को ही पुराण मानना चाहिए तथा देवीभागवत को उपपुराण की कोटि में रखना उचित है। श्रीमद्भागवत देवीभागवत के स्वरूपनिर्देश के विषय में मौन है। परंतु देवीभागवत 'भागवत' की गणना उपपुराणों के अंतर्गत करता है (1.3.16) तथा अपने आपको पुराणों के अंतर्गत। देवीभागपंचम स्कंध में वर्णित भुवनकोश श्रीमद्भागवत के पंचम स्कंध में प्रस्तुत इस विषय का अक्षरश: अनुकरण करता है। श्रीभागवत में भारतवर्ष की महिमा के प्रतिपादक आठो श्लोक (5.9.21-28) देवी भागवत में अक्षराश: उसी क्रम में उद्धृत हैं (8.11.22-29)। दोनों के वर्णनों में अंतर इतना ही है कि श्रीमद्भागवत जहाँ वैज्ञानिक विषय के विवरण के निमित्त गद्य का नैसर्गिक माध्यम पकड़ता है, वहाँ विशिष्टता के प्रदर्शनार्थ देवीभागवत पद्य के कृत्रिम माध्यम का प्रयोग करता है।
श्रीमद्भागवत भक्तिरस तथा अध्यात्मज्ञान का समन्वय उपस्थित करता है। भागवत निगमकल्पतरु का स्वयंफल माना जाता है जिसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मज्ञानी महर्षि शुक ने अपनी मधुर वाणी से संयुक्त कर अमृतमय बना डाला है।
भागवत में 18 हजार श्लोक, 335 अध्याय तथा 12 स्कंध हैं। इसके विभिन्न स्कंधों में विष्णु के लीलावतारों का वर्णन बड़ी सुकुमार भाषा में किया गया है। परंतु भगवान् कृष्ण की ललित लीलाओं का विशद विवरण प्रस्तुत करनेवाला दशम स्कंध भागवत का हृदय है। अन्य पुराणों में, जैसे विष्णुपुराण (पंचम अंश), ब्रह्मवैवर्तं (कृष्णजन्म खंड) आदि में भी कृष्ण का चरित् निबद्ध है, परंतु दशम स्कंध में लीलापुरुषोत्तम का चरित् जितनी मधुर भाषा, कोमल पदविन्यास तथा भक्तिरस से आप्लुत होकर वर्णित है वह अद्वितीय है। रासपंचाध्यायी (10.29-33) अध्यात्म तथा साहित्य उभय दृष्टियों से काव्यजगत् में एक अनूठी वस्तु है। वेणुगीत (10.21), गोपीगीत, (10.30), युगलगीत (10.35), भम्ररगीत (10.47) ने भागवत को काव्य के उदात्त स्तर पर पहुँचा दिया है।
भागवत की टीकाएँ [संपादित करें]
'विद्यावतां भागवते परीक्षा' : भागवत विद्वत्ता की कसौटी है और इसी कारण टीकासंपत्ति की दृष्टि से भी यह अतुलनीय है। विभिन्न वैष्णव संप्रदाय के विद्वानों ने अपने विशिष्ट मत की उपपत्ति तथा परिपुष्टि के निमित्त भागवत के ऊपर स्वसिद्धांतानुयायी व्याख्याओं का प्रणयन किया है जिनमें कुछ टीकाकारों का यहाँ संक्षिप्त संकेत किया जा रहा है:
- श्रीधर स्वामी (भावार्थ दीपिका; 13वीं शती, भागवत के सबसे प्रख्यात व्याखाकार),
- सुदर्शन सूरि (14वीं शती की शुकपक्षीया व्याख्या विशिष्टाद्वैतमतानुसारिणी है);
- सन्त एकनाथ (एकनाथी भागवत; १६ वी शती मे मराथी भाषा की उत्तम रचना),
- विजय ध्वज (पदरत्नावली 16वीं शती; माध्वमतानुयायी),
- वल्लभाचार्य (सुबोधिनी 16वीं श., शुद्धाद्वैतवादी),
- शुदेवाचार्य (सिद्धांतप्रदीप, निबार्कमतानुयायी),
- सनातन गोस्वामी (बृहदैवैष्णवताषिणी),
- जीव गोस्वामी (क्रमसंदर्भ)
देशकाल का प्रश्न [संपादित करें]
भागवत के देशकाल का यथार्थ निर्णय अभी तक नहीं हो पाया है। एकादश स्कंध में 5.38-40) कावेरी, ताम्रपर्णी, कृतमाला आदि द्रविड़देशीय नदियों के जल पीनेवाले व्यक्तियों को भगवान् वासुदेव का अमलाशय भक्त बतलाया गया है। इसे विद्वान् लोग तमिल देश के आलवारों (वैष्णवभक्तों) का स्पष्ट संकेत मानते हैं। भागवत में दक्षिण देश के वैष्णव तीर्थो; नदियों तथा पर्वतों के विशिष्ट संकेत होने से कतिपय विद्वान् तमिलदेश को इसके उदय का स्थान मानते हैं। काल के विषय में भी पर्याप्त मतभेद है। इतना निश्चित है कि बोपदेव (13वीं श. का उत्तरार्ध) जिन्होंने भागवत से संबद्ध 'हरिलीलामृत', 'मुक्ताफल' तथा 'परमहंसप्रिया' का प्रणयन किया तथा जिनके आश्रयदाता, देवगिरि के यादव राजा महादेव (सन् 1260-71) तथा राजा रामचंद्र (सन् 1271-1309) के करणाधिपति तथा मंत्री, प्रख्यात धर्मशास्त्री हेमाद्रि ने अपने 'चतुर्वर्गं चिंतामणि' में भागवत के अनेक वचन उधृत किए हैं भागवत के रचयिता नहीं माने जा सकते। शंकराचार्य के दादा गुरु गौडपादाचार्य ने अपने 'पंचीकरणव्याख्या' में 'जगृहे पौरुषं रूपम्' (भा. 1.3.1) तथा 'उत्तरगीता टीका' में 'श्रेय: स्रुतिं भक्ति मुदस्य ते विभो' (भा. 10.14.4) भागवत के दो श्लोकों को उद्धृत किया है। इससे भागवत की रचना सप्तम शती से अर्वाचीन नहीं मानी जा सकती।
प्रभाव [संपादित करें]
भागवत का प्रभाव मध्ययुगीय वैष्णव संप्रदायों के उदय में नितांत क्रियाशील था तथा भारत की प्रांतीय भाषाओं के कृष्ण काव्यों के उत्थान में विशेष महत्वशाली था। भागवत से ही स्फूर्ति तथा प्रेरणा ग्रहण कर ब्रजभाषा के अष्टछापी (सूरदास, नंददास आदि) निबार्की (श्रीभट्ट तथा हरिव्यास) राधावल्लभीय (हित हरिवंश तथा हरिदास स्वामी) कवियों ने व्रजभाषा में राधाकृष्ण की लीलाओं का गायन किया। मिथिला के विद्यापति, बंगाल के चंडीदास, ज्ञानदास तथा गोविंददास, असम के शंकरदेव तथा माधवदेव, उत्कल के उपेंद्रभंज तथा दीनकृष्णदास, महाराष्ट्र के नामदेव तथा माधव पंडित, गुजरात के नरसी मेहता तथा राजस्थान की मीराँबाई:इन सभी संतों तथा कवियों ने भागवत के रसमय वर्णन से प्रेरणा प्राप्त कर राधाकृष्ण की कमनीय केलि का गायन अपने विभिन्न काव्यों में किया है। तमिल, आंध्र, कन्नड तथा मलयालम के वैष्णव कवियों के ऊपर भी भागवत का प्रभाव कम नहीं है।
भागवत का आध्यात्मिक दृष्टिकोण अद्वैतवाद का है तथा साधनादृष्टि भक्ति की है। इस प्रकार अद्वैत के साथ भक्ति का सामरस्य भागवत की अपनी विशिष्टता है। इन्हीं कारणों से भागवत वाल्मीकीय रामायण तथा महाभारत के साथ संस्कृत की 'उपजीव्य' काव्यत्रयी के अंतर्भूत माना जाता है।
स्कन्ध [संपादित करें]
| स्कन्ध संख्या | विवरण |
|---|---|
| प्रथम स्कन्ध | इसमें भक्तियोग और उससे उत्पन्न एवं उसे स्थिर रखने वाला वैराग्य का वर्णन किया गया है। |
| द्वितीय स्कन्ध | ब्रह्माण्ड की उत्त्पत्ति एवं उसमें विराट् पुरुष की स्थिति का स्वरूप। |
| तृतीय स्कन्ध | उद्धव द्वारा भगवान का बाल चरित्र का वर्णन। |
| चतुर्थ स्कन्ध | राजर्षि ध्रुव एवं पृथु आदि का चरित्र। |
| पंचम स्कन्ध | समुद्र, पर्वत, नदी, पाताल, नरक आदि की स्थिति। |
| षष्ठ स्कन्ध | देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के जन्म की कथा। |
| सप्तम स्कन्ध | हिरण्यकश्यिपु, हिरण्याक्ष के साथ प्रहलाद का चरित्र। |
| अष्टम स्कन्ध | गज़ मोक्श्, मनवन्तर कथा, वामन अवतार |
| नवम स्कन्ध | राजवंशों का विवरण। श्रीराम की कथा। |
| दशम स्कन्ध | भगवान श्रीकृष्ण की अनन्त लीलाएं। |
| एकादश स्कन्ध | यदु वंश का संहार। |
| द्वादश स्कन्ध | विभिन्न युगों तथा प्रलयों और भगवान के उपांगों आदि का स्वरूप। |
चित्रावली [संपादित करें]
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The artist employed a clever device to illustrate the siege with an economy of means, floating the crenellated square of the city walls in space so we can see that it is surrounded on all sides. At either end we see multistoried urban buildings populated by demons (in the upper left unit) and regular people, including a family at the upper right and a woman worshipping a small image of a goddess at the lower left.
संदर्भ [संपादित करें]
सन्दर्भ ग्रन्थ [संपादित करें]
- स्वामी अखंडानंद सरस्वती : श्रीमद्भगवतरहस्य, बंबई, 1963
- बलदेव उपाध्याय : भागवत संप्रदाय, नागरीप्रचारिणी सभा, काशी सं. 2010;
- डॉ. सिद्धेश्वर भट्टाचार्य : फिलॉसफी ऑव श्रीमद्भागवत्, दो खंडों में विश्वभारती से प्रकाशित, 1960 तथा 1962
बाहरी कडियाँ [संपादित करें]
- http://santeknath.org/eknathi%20bhagwat.html
- भागवत पुराण गुजराती પ્રથમ અધ્યાય- દ્વિતીય અધ્યાય - તૃતીય અધ્યાય - ચતુર્થ અધ્યાય - પંચમ અધ્યાય
- वेद-पुराण - यहाँ चारों वेद एवं दस से अधिक पुराण हिन्दी अर्थ सहित उपलब्ध हैं। पुराणों को यहाँ सुना भी जा सकता है।
- महर्षि प्रबंधन विश्वविद्यालय-यहाँ सम्पूर्ण वैदिक साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है।
- ज्ञानामृतम् - वेद, अरण्यक, उपनिषद् आदि पर सम्यक जानकारी
- वेद एवं वेदांग - आर्य समाज, जामनगर के जालघर पर सभी वेद एवं उनके भाष्य दिये हुए हैं।
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