रामकृष्ण गोपाल भांडारकर

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रामकृष्ण गोपाल भांडारकर (6 जुलाई, 1837 – 24 अगस्त, 1925) भारत के विद्वान, पूर्वात्य इतिहासकार एवं समाजसुधारक थे।

जीवन वृत्त [संपादित करें]

डा. भांडारकर साधारण क्लर्क के पुत्र थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा रत्नगिरि के साधारण विद्यालय में हुई थी। उच्च शिक्षा के लिए ये एलफिंस्टन कालेज में आए। वहाँ पर बी. ए. तथा एम. ए. की परीक्षाओं में आपने सर्वोत्तम अंक प्राप्त किए। कुछ दिनों तक हैदराबाद में प्रधानयार्य का काम उत्तम रीति से करने के बाद आप स्थायी रूप से डेकन कालेज, पूना में आचार्य पद पर नियुक्त हुए और सेवा निवृत्त होने तक यहीं पर अध्यापन करते रहे। 1901 मे आप बंबई विश्वविद्यालय के उपकुलपति नियुक्त हुए।

आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व पुरातत्व विषयों में भारतीयों को आर्कषण नहीं था। पाली, मागधी आदि प्राकृत भाषाओं का अध्यापन करनेवाले दुर्लभ थे और इन भाषाओं में ग्रंथरचयिता प्राय: थे ही नहीं। इसी समय डा. भांडारकर ने प्राकृत भाषाओं, ब्राह्मी, खरोष्टी आदि लिपियों का सम्यक् ज्ञान प्राप्त कर इतिहास संबंधी गवेषणाएँ कीं, और लुप्तप्राय इतिहास के तत्वों को प्रकाश में लाए। इस प्रकार इतिहास के प्रामाणिक ज्ञान की ओर भारतीयों की रुचि बढ़ी। क्रमश: सरकार की दृष्टि भारत के हस्तलिखित ग्रंथों की खोज और प्रकाशन की दिशा में जाने लगी। अत: यह कार्य डा. भांडारकर को सौंपा गया और उन्होंने पाँच विशाल ग्रंथों में अपना कार्य पूर्ण किया। पुरातत्व के इतिहासकारों के लिए ये ग्रंथ मार्गदर्शक हैं। 1883 में इन्हें विएना में प्राच्य भाषा विद्वानों के सम्मेलन में आमंत्रित किया गया, और वहाँ पर इनके अध्ययन की गंभीरता एवं अन्वेषण शैली से सरकार तथा विदेशी स्तंभित हुए। सरकार ने इन्हें सी. आई. ई. की पदवी से विभूषित किया।

इनके अन्य उल्लेखनीय ग्रंथ निम्नलिखित हैं। बाँबे गजेटियर के लिए "दक्षिण भारत का इतिहास" प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। प्राच्य पवित्र ग्रंथमाला के लिए वायु पुराण का अंग्रेजी में अनुवाद अपूर्ण ही रह गया। इसके अतिरिक्त इनकी कीर्ति को चिरकाल तक अमर बनानेवाले अनेकों निबंध, तथा 1876 में भवभूति के "मालती माधव" पर टीका, तथा अंग्रेजी पढ़नेवालों को दृष्टि में रखते हुए प्रणीत संस्कृत व्याकरण का प्रथम और द्वितीय भाग, जो अत्यंत उपादेय सिद्ध हुआ है, आदि पुस्तकें हैं।

आपके संस्मरण में पूना में भांडारकर आरियंटल रिसर्च इंटिट्यूट की स्थापना की गई है। अपनी विधवा कन्या का पुनर्विवाह कर इन्होंने अपने साहस का परिचय दिया। अत्यधिक आदर और सम्मान पाने पर भी इनमें अहंमन्यता का भाव नहीं था। स्वाध्याय और संयम इनके जीवन का मूलमंत्र था।

इन्हें भी देखें [संपादित करें]

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