भारतीय महाकाव्य

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भारत में संस्कृत तथा अन्य भाषाओं में अनेक महाकाव्यों की रचना हुई है। भारत के महाकाव्यों में वाल्मीकि रामायण, व्यास द्वैपायन रचित महाभारत, तुलसीदासरचित रामचरितमानस, आदि ग्रन्थ परमुख हैं।

संस्कृत के महाकाव्य[संपादित करें]

हिन्दी के महाकाव्य[संपादित करें]

हिंदी में पृथ्वीराज रासो, पद्मावत (जायसी), रामचरित मानस (गो. तुलसीदास), रामचंद्रिका (केशवदास), साकेत (मैथिलीशरण गुप्त), साकेत संत (डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र), कामायनी (जयशंकर प्रसाद), गांधी पारायण (अंबिका प्रसाद 'दिव्य'), दैत्यवंश (हरदयाल सिंह), हल्दीघाटी (श्याम नारायण पांडेय), कुरूक्षेत्र (रामधारी सिंह दिनकर), आर्यावर्त (मोहनलाल महतो), नूरजहां (गुरूभक्त सिंह), सुभाषचंद्र बोस, विवेक श्री, भगतसिंह आदि 12 महाकाव्य (श्रीकृष्ण सरल), कुणाल (सोहनलाल द्विवेदी), वर्धमान (महाकवि अनूप) ने उदात्त परंपरा को गतिमयता प्रदान की है।

समय, रूचि तथा क्रियाशीलता के अभाव के बाद भी हिंदी साहित्य में महाकाव्य लेखन की परंपरा गति तथा विस्तार पा रही है। इस दशक के महाकाव्यों में डॉ. काबरा की 3 कृतियों के अतिरिक्त पुरूषोत्तम श्रीराम चरित व श्रीकृष्ण चरित (जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक'), स्वयं धरित्री ही थी (रमाकांत श्रीवास्तव), वैज्ञानिक आध्यात्म व प्रकृति और पुरूष (जसपाल सिंह 'संप्राण'), देवयानी (वासुदेव प्रसाद खरे), सूतपुत्र व महामात्य (दयाराम गुप्त 'पथिक'), रत्नजा व भूमिजा (डॉ. सुशीला कपूर), वीरवर तात्या टोपे (वीरेंद्र अंशुमाली), वीरांगना दुर्गावती (गोविंद प्रसाद तिवारी), क्षत्राणी दुर्गावती (विमल), दधीचि (आचार्य भगवत दूबे), मानव (डॉ. गार्गीशरण 'मराल'), खजुराहो (डॉ. पूनम चंद्र तिवारी) आदि ने महाकाव्य प्रासाद को जीवंतता प्रदान की है।

हिंदी महाकाव्य सृजन की परंपरा में महाकाव्य के 3 तत्व कथावस्तु, नायक तथा रस मान्य हैं। कथावस्तु के 3 अंग विस्तार, विशालता व छंद वैविध्य, नायक के 3 अंग गुण धीरोदात्तता, शालीनता, प्रासंगिकता तथा रस के 3 गुण भाषा-शैली, अलंकार तथा भावानुभाव हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]