नाटक

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जो रचना श्रवण द्वारा ही नहीं अपितु दृष्टि द्वारा भी दर्शकों के हृदय में रसानुभूति कराती है उसे नाटक या दृश्य-काव्य कहते हैं। नाटक में श्रव्य काव्य से अधिक रमणीयता होती है। श्रव्य काव्य होने के कारण यह लोक चेतना से अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठ रूप से संबद्ध है। नाट्यशास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है।

अनुक्रम

[संपादित करें] नाटक के प्रमुख तत्व

  • कथावस्तु
नाटक की कथावस्तु पौराणिक, ऐतिहासिक, काल्पनिक या सामाजिक हो सकती है।
  • पात्र
पात्रों का सजीव और प्रभावशाली चरित्र ही नाटक की जान होता है। कथावस्तु के अनुरूप नायक धीरोदात्त, धीर ललित, धीर शांत या धीरोद्धत हो सकता है।
  • रस
नाटक में नवरसों में से आठ का ही परिपाक होता है। शांत रस नाटक के लिए निषिद्ध माना गया है। वीर या शृंगार में से कोई एक नाटक का प्रधान रस होता है।
  • अभिनय
अभिनय भी नाटक का प्रमुख तत्व है। इसकी श्रेष्ठता पात्रों के वाक्चातुर्य और अभिनय कला पर निर्भर है। मुख्य प्रकार से अभिनय ४ प्रकार का होता हॅ।
  • १ - आंगिक अभिनय( शरीर से किया जाने वाला अभिनय ),
  • २ - वाचिक अभिनय ( संवाद का अभिनय [रेडियो नाटक ],
  • ३ - आहार्य अभिनय ( वेषभूषा, मेकअप, स्टेज विन्यास्, प्रकाश व्यवस्था आदि ),
  • ४ - सात्विक अभिनय (अंतरात्मा से किया गया अभिनय [ रस आदि ]।

[संपादित करें] नाटक का इतिहास

Searchtool.svg मुख्य लेख: संस्कृत नाटकों का उद्भव एवं विकास

हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। उस काल के भारतेन्दु तथा उनके समकालीन नाटककारों ने लोक चेतना के विकास के लिए नाटकों की रचना की इसलिए उस समय की सामाजिक समस्याओं को नाटकों में अभिव्यक्त होने का अच्छा अवसर मिला।

भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरुआत बंगला के विद्यासुंदर (१८६७) नाटक के अनुवाद से होती है। यद्यपि नाटक उनके पहले भी लिखे जाते रहे किंतु नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेन्दु ने ही हिंदी नाटक की नींव को सुदृढ़ बनाया। भारतेन्दु के पूर्ववर्ती नाटककारों में रींवा नरेश विश्वनाथ सिंह (१८४६-१९११) के बृजभाषा में लिखे गए नाटक 'आनंद रघुनंदन' और गोपालचंद्र के 'नहुष' (१८४१) को अनेक विद्वान हिंदी का प्रथम नाटक मानते हैं। यहाँ यह जानना रोचक हो सकता है कि गोपालचंद्र, भारतेन्दु हरिश्चंद्र के पिता थे।

[संपादित करें] लोक नाटक

संस्कृत नाटकों का युग ढलने लगा तब चौदहवीं शताब्दी से उन्नीसवी शताब्दी तक उनका स्थान विभिन्न भारतीय भाषाओं में लोक नाटकों (folk theatre) ने लिया। आज अलग-अलग प्रदेशों मे लोक नाटक भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है।

  • जात्रा - बंगाल, उडीसा, पूर्वी बिहार
  • तमाशा - महाराष्ट्र
  • नौटंकी - उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब
  • भवई - गुजरात
  • यक्षगान - कर्णाटक
  • थेरुबुट्टू - तमिलनाडु
  • नाचा - छत्तीसगढ

[संपादित करें] इन्हें भी देखें

[संपादित करें] वाह्य सूत्र