चंद बरदाई

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चंद बरदाई (1149 – 1200) भारतीय राजा पृथ्वीराज चौहान, जिन्होंने अजमेर और दिल्ली पर 1165 से 1192 तक राज्य किया, के राजकवि थे। लाहौर में जन्मे, चंद बरदाई भाट जाति के जगात नामक गोत्र के ब्राह्मण थे। चन्द पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर के समय में राजपूताने आए थे। सोमेश्वर ने चंदबरदाई के पिता को अपना दरबारी कवि बनाया। यहीं से चंद के दरबारी जीवन की प्रारंभ हुआ। पृथ्वीराज के समय में उनके पिता नागौर में बस गए। यहाँ आज भी उनके वंशज रहते हैं।

चंद बरदाई को जालंधरी देवी का इष्ट था जिनकी कृपा से ये अदृष्ट-काव्य भी कर सकते थे। वर प्राप्त करने के कारण ही इनका नाम बरदाई पड़ा। वे षड्भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंदशास्र, ज्योतिष, पुराण, नाटक आदि अनेक विद्याओं में पारंगत थे। इनके पूर्वजों की भूमि पंजाब थी। उनकी एक मात्र रचना पृथ्वीराज रासो महाकाव्य है। इस महाकाव्य के नायक उनके मित्र और आश्रयदाता राजा पृथ्वीराज चौहान हैं। चंद बरदाई वीर रस के अद्वितीय कवि समझे जाते हैं।

गोरी के वध में सहायता[संपादित करें]

इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिला हुआ था कि अलग नहीं किया जा सकता। युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में, सदा महाराज के साथ रहते थे और जहाँ जो बातें होती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे। यहां तक कि मुहम्मद गोरी के द्वारा जब पृथ्वीराज चौहान को परास्त करके एवं उन्हे बंदी बना करके गजनी ले जाया गया तो ये भी स्वयं को वश मे नही कर सके एवं गजनी चले गये। ऐसा माना जाता है कि कैद मे बंद पृथ्वीराज को जब अन्धा कर दिया गया तो उन्हें इस अवस्था में देख कर इनका हृदय द्रवित हो गया एवं इन्होंने गोरी के वध की योजना बनायी। उक्त योजना के अंतर्गत इन्होंने पहले तो गोरी का हृदय जीता एवं फिर गोरी को यह बताया कि पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण चला सकता है। इससे प्रभावित होकर मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज की इस कला को देखने की इच्छा प्रकट की। प्रदर्शन के दिन चंद बरदायी गोरी के साथ ही मंच पर बैठे। अंधे पृथ्वीराज को मैदान में लाया गया एवं उनसे अपनी कला का प्रदर्शन करने को कहा गया। पृथ्वीराज के द्वारा जैसे ही एक घण्टे के ऊपर बाण चलाया गया गोरी के मुँह से अकस्मात ही "वाह! वाह!!" शब्द निकल पड़ा बस फिर क्या था चंदबरदायी ने तत्काल एक दोहे में पृथ्वीराज को यह बता दिया कि गोरी कहाँ पर एवं कितनी ऊँचाई पर बैठा हुआ है। वह दोहा इस प्रकार था:

चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान! ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान!!

इस प्रकार चंद बरदाई की सहायता से पृथ्वीराज के द्वारा गोरी का वध कर दिया गया। इनके द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो हिंदी भाषा का पहला प्रामाणिक काव्य माना जाता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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