धर्मशास्त्र

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धर्मशास्त्र संस्कृत ग्रन्थों का एक वर्ग है, जो कि शास्त्र का ही एक प्रकार है। इसमें सभी स्मृतियाँ सम्मिलित हैं। यह वह शास्त्र है जो हिन्दुओं के धर्म का ज्ञान सम्मिलित किये हुए है, धर्म शब्द में यहाँ पारंपरिक अर्थ में धर्म तथा साथ ही कानूनी कर्तव्य भी सम्मिलित हैं। धर्मशास्त्रों का बृहद् पाठ भारत की ब्राह्मण परंपरा का अंग है, तथा यह विद्वत्परंपरा की देन एवं एक विशद तंत्र है। [1] इसके गहन न्यायशास्त्रीय विवेचन के कारण प्रारंभिक ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासकों द्वारा यह हिंदुओं के लिए कानून के रूप में माना गया था [2] तब से लेकर आज भी धर्मशास्त्र को हिन्दू विधिसंहिता के रूप में देखा जाता है। धर्मशास्त्र में उपस्थित रिलीजन व कानून के बीच जो अंतर किया जाता है, दरअसल वह कृत्रिम है, और बार-बार उसपर प्रश्न उठाये गये हैं।[3] जबकि कुछ लोग, धर्मशास्त्र में धार्मिक व धर्मनिरपेक्ष कानूनों के बीच अंतर रखा गया है ऐसा पक्ष लेते हैं।[4] धर्मशास्त्र हिन्दू परंपरा में महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि- एक, यह एक आदर्श गृहस्थ के लिए धार्मिक नियमों का स्रोत है, तथा दूसरे, यह धर्म, विधि, आचारशास्त्र आदि से संबंधित हिंदू ज्ञान का सुसंहत रूप है।

"पांडुरंग वामन काणे, सामाजिक सुधार को समर्पित एक महान् विद्वान्, ने इस पुरानी परंपरा को जारी रखा है। उनका धर्मशास्त्र का इतिहास, पाँच भागों में प्रकाशित है, प्राचीन भारत के सामाजिक विधियों तथा प्रथाओं का विश्वकोश है। इससे हमें प्राचीन भारत में सामाजिक प्रक्रिया को समझने में मदद मिलती है।"[5]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Patrick Olivelle, Manu's Code of Law: A Critical Edition and Translation of the Mānava-Dharmaśāstra (New York: Oxford UP, 2005), 64.
  2. For a good overview of the British attitudes toward and administration of Hindu law, see J. Duncan M. Derrett, "The Administration of Hindu Law by the British," Comparative Studies in Society and History 4:1 (1961), pp.10-52.
  3. See, for example, Ludo Rocher, "Hindu Law and Religion: Where to draw the line?" in Malik Ram Felicitation Volume, ed. S.A.J. Zaidi. (New Delhi, 1972), pp.167-194 and Richard W. Lariviere, "Law and Religion in India" in Law, Morality, and Religion: Global Perspectives, ed. Alan Watson (Berkeley: University of California Press), pp.75-94.
  4. On this distinction in relation to punishment, see Timothy Lubin, "Punishment and Expiation: Overlapping Domains in Brahmanical Law," Indologica Taurinensia 33 (2007): 93-122.
  5. Sharma, R.S. (2005). India's Ancient Past. Oxford University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0195687859.