विष्णु

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विष्णु
Bhagavan Vishnu.jpg
सृष्टि के पालनकर्ता ,(त्रिमूर्ति में से एक)
देवनागरी विष्णु
कन्नड़ ವಿಷ್ಣು
तमिल விஷ்ணு
संबंधित हिन्दू धर्म , वैष्णव
आवास क्षीरसागर , वैकुंठ
अस्त्र-शस्त्र शंख(पाञ्चजन्य),चक्र(सुदर्शन), गदा(कौमोदकी) और पद्म
जीवनसाथी लक्ष्मी
वाहन गरूड़

हिन्दू धर्म के अनुसार विष्णु परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। त्रिमूर्ति के अन्य दो भगवान शिव और ब्रह्मा को माना जाता है। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है वहीं शिव को संहारक माना गया है।

विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हैं। विष्णु का निवास क्षीर सागर है। उनका शयन सांप के ऊपर है। उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा जी स्थित है।

वह अपने नीचे वाले बाएं हाथ में पद्म (कमल) , अपने नीचे वाले दाहिने हाथ में गदा (कौमोदकी) ,ऊपर वाले बाएं हाथ में शंख (पांच्यजन्य), और अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ में चक्र(सुदर्शन) धारण करते हैं।


शेष शय्या पर आसीन विष्णु, लक्ष्मी व ब्रह्मा के साथ, छंब पहाड़ी शैली के एक लघुचित्र में।


शब्द व्युत्पत्ति[संपादित करें]

विष्णु शब्द विस् धातु( जो लैटिन में - vicus और सालविक में vas -ves का सजातीय है।)से आया है जिसका अर्थ है बैठना , उपस्थित होना। अर्थात जो सभी स्थानों पर हो(सर्वव्याप्त) वही विष्णु है। वेदों के एक पुराने समालोचक यास्क ने अपनी रचना निरुक्त में विष्णु को " सब स्थानों पर आने वाला बताया है।" उन्होंने ये भी लिखा है कि -" जो सभी बंधनों और दासत्व से मुक्त है वही विष्णु है।"

आदि शंकर ने "सहस्रनाम:" पर अपनी टीका में विष्णु शब्द की उत्पत्ति "विस्" धातु से ही बताई है। जिसका अर्थ है अंदर प्रिविष्ठ होना। आदि शंकर (विष्णु पुराण 3.4.45) से - " परम जीवों की शक्ति ने ब्रह्माण में प्रवेश कर लिया है।" यहाँ विस् का अर्थ है प्रवेश करना।

स्वामी चिन्मयानन्द ने "विष्णु सह्स्रनाम:" के अपने अनुवाद में इसे और भली प्रकार समझाया है: धातु विस् का अर्थ अंदर आना है, संसार की सभी वस्तुएं और जीव इन्ही से व्याप्त हैं । उपनिषद भी इस बात का अपने मन्त्र में स्पष्ट रूप से आग्रह करते हैं: इस परिवर्तनशील संसार में जो कुछ भी है। अर्थात वह अंतरिक्ष , समय और जड़ से बंधे हुए नहीं है। चिन्मयानन्द आगे कहते हैं : जिससे सभी वस्तुएं व्याप्त हैं वही विष्णु है।

[1]

अवतार[संपादित करें]

विष्णु के दस मुख्य अवतार मान्यता प्राप्त हैं। यह निम्न हैं:

  1. मत्स्य अवतार : मत्स्य (मछ्ली) के अवतार में भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जन्तु एकत्रित करने के लिये कहा एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर सागर में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुनः स्थापित किया।
  2. कूर्म अवतार : कूर्म के अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्रमंथन के समय मंदर पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदर पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एंव असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नोंकी प्राप्ती की। (इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था।)
  3. वराहावतार : वराह के अवतार में भगवान विष्णु ने महासागर में जाकर भूमि देवी कि रक्षा की थी, जो महासागर की तह में पँहुच गयीं थीं। एक मान्यता के अनुसार इस रूप में भगवान ने हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध भी किया था।
  4. नरसिंहावतार : नरसिंह रूप में भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी और उसकेपिता हिरण्यकश्यप का वध किया था। इस अवतार से भगवान के निर्गुण होने की विद्या प्राप्त होती है।
  5. वामन् अवतार : इसमें विष्णु जी वामन् (बौने) के रूप में प्रकट हुए। भक्त प्रह्लादके पौत्र, असुरराज राज बलि से देवतओं की रक्षा के लिए भगवान ने वामन अवतार धारण किया।
  6. परशुराम अवतार: इसमें विष्णु जी ने परशुराम के रूप में असुरों का संहार किया।
  7. राम अवतार: राम ने रावण का वध किया जो रामायण में वर्णित है।
  8. कृष्णावतार : श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के घर जन्म लिया था। उनका लालन पालन यशोदा और नंद ने किया था। इस अवतार का विस्तृत वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण में मिलता है। इस अवतार में विष्णु ने अपना विराट स्वरूप/विश्वरूप धारण किया था।
  9. बुद्ध अवतार: इसमें विष्णुजी बुद्ध के रूप में लोगों को मोक्ष मार्ग (जन्म मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग) चार आर्य सत्य के रूप में धर्म चक्र की देशना की। इसी के साथ बौद्ध धर्म का उदय हुआ।
  10. कल्कि अवतार: इसमें विष्णुजी भविष्य में कलियुग के अंत में आयेंगे।

अन्य अवतार[संपादित करें]

1. हंसावतार

2.मोहिनी अवतार

3. जलंधर

4. धन्वंतरि

5. हयग्रीव अवतार

6.गजेन्द्रोधारावतार

जन्म अवतार का अर्थ[संपादित करें]

जिस अवतार में स्वयं भगवन विष्णु नहीं पर उनका अंश था वे जन्म अवतार कहलाये।

जन्म अवतार[संपादित करें]

1. सनकादि अवतार 2. नर-नारायण

आकृति[संपादित करें]

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघ वर्णं शुभाङगम्।।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

भावार्थ - जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।[2]

चतुर्भुज स्वरूप[संपादित करें]

भगवान विष्णु शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण करते हैं। शंख शब्द का प्रतीक है, शब्द का तात्पर्य ज्ञान से है जो सृष्टि का मूल तत्त्व है। चक्र का अभिप्राय माया चक्र से है जो जड़ चेतन सभी को मोहित कर रही है। गदा ईश्वर की अनंत शक्ति का प्रतीक है और पद्म से तात्पर्य नाभि कमल से है जो सृष्टि का कारण है। इन चार शक्तियों से संपन्न होने के कारण हरि को चतुर्भुज कहा है।[3]

भगवान विष्णु के अन्य नाम[संपादित करें]

उग्र

शर्व

भगवत्

नारायण

कृष्ण

वैकुण्ठ

विष्टरश्रवस्

जिन

ह्रषिकेश

केशव

माधव

स्वभू

दैत्यारि

पुण्डरीकाक्ष

गोविन्द

गरुड़ध्वज

पीताम्बर

अच्युत

शार्गिं

विष्वक्सेन

जनार्दन

दामोदर

इन्द्रावरज

चक्रपाणि

चतुर्भुज

पद्मानाभ

मधुरिपु

वासुदेव

त्रिविक्रम

देवकीनन्दन

शौरि

श्रीपति

पुरुषोत्तम

वनमालिन्

बलिध्वंसिन्

कंसाराति

अधोक्षज

विश्वम्भर

कैटभजित्

विधु

श्रीवत्सलाञ्छन

पुराणपुरुष

यज्ञपुरुष

नरकान्तक

जलशायिन्

विश्वरूप

उपेन्द्र

मुरमर्दन आदि।

पुत्र[संपादित करें]

लक्ष्मी से उत्पन्न पुत्र[संपादित करें]

देवसखा

चिक्लीत

आनन्द

कर्दम

श्रीप्रद

जातवेद

अनुराग

सम्वाद

विजय

वल्लभ

मद

हर्ष

बल

तेज

दमक

सलिल

गुग्गुल

कुरुण्टक [4]

इनके अतिरिक्त अप्सराओं से भी उन्हें अनेक पुत्र प्राप्त हुए।

वैष्णव सिद्धांत[संपादित करें]

वैष्णव सिद्धांत में विष्णु को सर्वशक्तिमान प्रदर्शित किया गया है बल्कि सूर्य जिनका एक और नाम "सूर्यनारायण" भी है को केवल विष्णु का ही एक स्वरुप माना जाता है।

पवित्र ग्रंथों- श्रुति, स्मृति और वेदों में[संपादित करें]

श्रुति[संपादित करें]

श्रुति को पूर्ण रूप से दैवीय माना जाता है। इसको पद्य की कड़ियों के रूप में संरक्षित न रखकर सम्पूर्ण रूप में संरक्षित रखा जाता है। इसके अन्तर्गत चारों वेद (ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद) ब्राह्मण ,अरण्यक और टीका युक्त उपनिषद आते हैं।

स्मृति[संपादित करें]

स्मृति का सम्बन्ध उस ज्ञान से है जो श्रुति को ग्रहण करने के पश्चात प्राप्त हुआ। स्मृति को मूल रूप से दैवीय नहीं माना जाता । जैसा की नाम से प्रतीत होता है ये वे यादें है जो ऋषियों के द्वारा याद कर ली गयीं और अपनी आने वाली पीढ़ियों को उसी प्रकार आगे बढ़ा दी गयीं। इसके अन्तर्गत भगवत पुराण और विष्णु पुराण आते है जो की सत्त्व पुराण हैं।

ये दोनों पुराण भगवान विष्णु की सर्वशक्तिमान ईश्वर के रूप में व्याख्या करते है जिन्होंने ये अनंत ब्रह्माण्ड बनाया और जो सभी के अंदर इस संसार के स्वामी रूप में निवास करते हैं।

वेद[संपादित करें]

वेद में विष्णु को संसार का रक्षक होने के कारण "गोप" कहा गया है। संस्कृत में गो का अर्थ तारे, आकाश, पृथ्वी, प्रकाश की किरण, स्वर्ग, मवेशी, वाणी, सूर्य, चन्द्रमा, गाय आदि होता है । इन सबका पालनकर्ता होने के कारण परमेश्वर को गोप, गोपाल, गोपेन्द्र आदि कहा जाता है। [5]

वृन्दा का सतीत्व और विष्णु[संपादित करें]

विष्णु द्वारा असुरेन्द्र जालन्धर की स्त्री वृन्दा का सतीत्व अपहरण। जालन्धर को वरदान था जब तक उसकी स्त्री का सतीत्व अक्षुण बना रहेगा, तब तक उसे कोई भी मार नहीं सकेगा। पर वह इतना अत्याचारी निकला कि उसके लिए विष्णु को परस्त्रीगमन जैसे उपाय का आश्रय लेना पड़ा। रूद्र संहिता युद्ध खंड, अध्याय 24 में लिखा है -

विष्णुर्जलन्धरं गत्वा दैत्यस्य पुटभेदनम्।

अर्थात : विष्णु ने जलन्धर दैत्य की राजधानी जाकर उसकी स्त्री वृन्दा सतीव्रत्य (पतिव्रत्य) नष्ट करने का विचार किया।

इधर शिव जी जलन्धर के साथ युद्ध कर रहे थे और उधर विष्णु ने जलन्धर का वेष धारण कर उसकी स्त्री का सतीत्व नष्ट कर दिया, जिस से वह दैत्य मारा गया। जब वृन्दा को विष्णु का यह छल मालूम हुआ तो उसने विष्णु से कहा-

धिक् तदेवं हरे शीलं परदाराभिगामिनः। ज्ञातोऽसि त्वं मयासम्यङ्मायी प्रत्यक्ष तपसः।।

अर्थात् : हे विष्णु! पराई स्त्री के साथ व्यभिचार करने वाले, तुम्हारे ऐसे आचरण पर धिक्कार है। अब तुमको मैं भलीभांति जान गई। तुम देखने में तो महासाधु जान पड़ते हो, पर हो तुम मायावी, अर्थात महाछली।

पौराणिक संदर्भ[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. en.m.wikipedia.org/wiki/Vishnu
  2. भगवद्गीता
  3. बसंतेश्वरी भगवद्गीता
  4. hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-history/क्या-आप-जानते-हैं-भगवान-विष्णु-के-कितने-पुत्र-थे-114052800016_4.html
  5. faq.vishwahindusamaj.com/hindi/labels/4KS14KWH4KSm.html