मत्स्य अवतार

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मत्स्य अवतार

ब्रम्हांड की आवधिक विघटन के प्रलय के ठीक पहले जब प्रजापति ब्रह्मा के मुँह से वेदों का ज्ञान निकल गया, तब असुर हयग्रीव (घोड़ो की अध्यक्षता के साथ भ्रमित नहीं करना) ने उस ज्ञान को चुराकर निगल लिया। तब भगवान विष्णु अपने प्राथमिक अवतार मत्स्य के रूप में अवतीर्ण हुए, और अपने को रजा सत्यव्रत (बाद में मनु के नाम से) के सामने एक छोटी,लाचार मछली जैसे बने | दया और धर्म के अनुसार इस रजा ने मछली को अपने कमंडल में लेकर अपने घर के एक बड़े पाते में डाला |धीरे-धीरे वह मछली इतना बड़ा हुआ कि उसे अन्त में एक महान समुद्र में डाला गया | तब वह सुनहरी-रंग मछली ने अपने दिव्य पहचान उजागर की, और अपने भक्त को यह सूचित की कि एक बाढ़ दुसरे कल्प के पहले , सारी दुनिया को विसर्जन करेगी, जिसके द्वारा एक नया सृजन होगा | फिर वे सत्यव्रत को सभी जड़ी-भूति, बीज और पशुओं, सप्त ऋषि और वह नाव जो उच्च पानी पर उनके लिए भेज दिया जायेगी- उन सभी को इक्कठा करने का निर्देश दिया | फिर यह अति-विशाल मछली हयग्रीव को मारकर वेदो को गुमनामी होने से बचा दी और उसे ब्रम्हा को दे देते हैं | जब वे अपने नींद से उठे जो परलय के अन्त में था - इसे ब्रम्ह कि रात पुकारा जाता हैं, और गणना के आधार पर 4 320 000 000 सालो के होने पर थे | जब ज्वार ब्रम्हांड को भस्म करना शुरू किया- नाव आया, जिस पर सभी चढ़े | मत्स्य ने तब अपने लिए सिर पर एक सींग के साथ पानी में से बाहर आये, और नाव को अपने सींग के साथ सर्पो के रजा वासुकि के सहारे से बाँधा गया | फिर सभी मेरु पर्वत की ओर निकल पढे | सारी रात जब वे रवाना हुए, भगवान मत्स्य ने उन्हें 'मत्स्य पुराण' - सत्य का उत्तम रूप- को स्वेछावर किया | इस प्रकार भगवान ने मत्स्य के रूप में ब्रम्हांड की पवित्र ज्ञान को अगले युग तक ले जाने का सक्षम किया|