शिव

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शिव
शिव प्रतिमा - गंगा झील, मॉरिशस
शिव प्रतिमा - गंगा झील, मॉरिशस
सृष्टि के संहारकर्ता
संबंधित हिन्दू देवता
आवास कैलाशपर्वत
मंत्र ॐ नमः शिवाय
अस्त्र-शस्त्र त्रिशूल, डमरु
जीवनसाथी पार्वती
वाहन नंदी बैल

शिव को देवों के देव कहते हैं, इन्हें महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धाङ्गिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं, तथा पुत्री अशोक सुंदरी हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है।[1]

शिव के जन्म का कोई बड़ा प्रमाण नही है, वह स्वयंभू हैं तथा सारे संसार के रचयिता हैं। उन्हें संहारकर्ता भी कहा जाता है। उनके सिर में चंद्रमा तथा जटाओं में गंगा का वास है। विश्व की रक्षा के लिये उन्होंने विष पान किया था इसलिये उन्हें नीलकंठ कहा जाता है। गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है।

भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है।भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।

लोग गलत कहते है की विन्दु स्वरूप ने संकर मानव के सरीर में प्रवेस किया यह नहीं है वो एक ही है अन्तरयामी है वो किसी का नास नहीं करते।

शिव स्वरूप[संपादित करें]

शिव नाम का अर्थ कल्याणकारी से ही प्रतीत होता है। शिव उसी को बताया जा सकता है जिसमें सृष्टि के संपूर्ण ज्ञान को समाया जा सकता है।

संकर ज्योति विन्दु स्वरूप परमात्मा एक ही है यह गलत धारदा है वो एक ही है और विश्व के लिए कल्याणकारी है (वीटू कुमार)=== ज्योतिबिंदू स्वरूप परमात्मा शिव === परमात्मा का वास्तविक स्वरूप ज्योति बिंदू का ही है। इस स्वरूप द्वारा परमात्मा शिव मानव के शरीर में प्रवेश करते हैं और अपने कल्याणकारी ज्ञान द्वारा सृष्टि परिवर्तन का कार्य करते हैं। समय अनुसार परमात्मा शिव ने इसी स्वरूप द्वारा पृथ्वी के मानव को ज्ञान के सागर में नहलाया है जिस ज्ञान को मानव ने धर्म के रूप में आपस में बांटा है और सतयुग से कलयुग तक पृथ्वी पर मानव ने अनेका अनेक धर्मों की स्थापना भी कर ली है।

शिव स्वरूप सूर्य[संपादित करें]

परमात्मा शिव अपने इस स्वरूप द्वारा पूर्ण सृष्टि का भरण-पोषण करते हैं। इसी स्वरूप द्वारा परमात्मा ने अपने ओज व उष्णता की शक्ति से सभी ग्रहों को एकत्रित कर रखा है। परमात्मा का यह स्वरूप अत्यंत ही कल्याणकारी माना जाता है क्योंकि पूर्ण सृष्टि का आधार इसी स्वरूप पर टिका हुआ है।

शिव स्वरूप शंकर जी[संपादित करें]

पृथ्वी पर बीते हुए इतिहास में सतयुग से कलयुग तक, एक ही मानव शरीर एैसा है जिसके ललाट पर ज्योति है। इसी स्वरूप द्वारा जीवन व्यतीत कर परमात्मा ने मानव को वेदों का ज्ञान प्रदान किया है जो मानव के लिए अत्यंत ही कल्याणकारी साबित हुआ है। वेदो शिवम शिवो वेदम।। परमात्मा शिव के इसी स्वरूप द्वारा मानव शरीर को रुद्र से शिव बनने का ज्ञान प्राप्त होता है।

शिवलिंग क्या है?[संपादित करें]

राम चरित्र मानस में शिव की स्तुति की ये लाइन देखिये-

अखंडम अजं भानु कोटि प्रकाशम्।। (रा° च° मा° उत्तरकाण्ड दोहा 107 से 108) अर्थात जो अजन्मा है, अखंड है और कोटि कोटि सूर्यो के प्रकाश के सामान है।जिस का जन्म ही नही हुआ उस का फिर उस के लिंग से क्या तात्पर्य है? शिवलिङ्ग ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। पूजा से हमें शक्ति मिलती है।शिवलिंग की पूजा शिव -शक्ति के मिलन का प्रतीक है जो हमें सांसारिक बन्धनों से मुक्त करती है। इन रहस्यों को जो जानता है वो शिव भक्ति से सराबोर हो जाता है फिर वो किसी भी मजहब का हो ..शिव जी के अनेक मुस्लिम भक्त भी है।[2][3]

मानव शरीर और शिव वैदिक मंत्र[संपादित करें]

वेदों को सबसे बड़ा विज्ञान माना जाता है। पूर्ण मानव शरीर के गहरे अध्ययन से भी हमारे सामने यही आता है कि ध्वनि के उच्चारण का असर मूलधारा चक्र से संहसर धारा चक्र तक सीधा होता है अतः वैदिक मंत्र ही एक मात्र साधना है मानव शरीर के लिए निरोग्यता को हासिल करने हेतु और जीव आत्मा सहित परमात्मा शिव कि इस विशाल सृष्टि चक्र से मोक्ष की प्राप्ति हेतु। जब मानव शरीर शिव संकलपमस्तु। के वेद मंत्रों का उच्चारण करता है तो ही मानव के मन में अनेक तत्वों (उहशाळलरश्री) का मिश्रण होता है और मानव का मन निर्बल से प्रबल हो जाता है। विनाशकारी कर्मों से कल्याणकारी कर्मों को करने वाला हो जाता है। मानव शरीर में सबसे बड़ा उर्जा का केंद्र मन ही होता है। समय की धारा में सतयुग से कलयुग तक के समय में मानव शरीर इन्हीं वेद मंत्रों के उच्चारण से दूर होकर दुःखी हो गया| मानव शरीर का मन इन्हीं ‘‘शिव संकल्पमस्तु’’ के वेद मंत्रों से प्रबल होता है और कल्याणकारी कर्म ही संपन्न करता है। जिनका फल सुख के रूप में शरीर भोगता है। इन्हीं मंत्रों के उच्चारण द्वारा मानव के मन को अपने संकल्प का ज्ञान प्राप्त होता है जिसे पूर्ण कर जीव आत्मा परमात्मा शिव कि इस विशाल सृष्टि चक्र से मोक्ष को प्राप्त करती।[4]

शिव और शक्ति[संपादित करें]

शिव तत्व से तात्पर्य विध्वंस या क्रोध से है। दुर्गा शप्तशती के पाठ से पहले पढ़े जाने वाले मंत्रो में एक मन्त्र है। ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामी नमः स्वाहा। दुर्गा शप्तशती में आत्म तत्व, विद्या तत्व के साथ साथ शिव तत्व का शोधन परम आवश्यक माना गया है इस के बिना ज्ञान प्राप्ति आसंभव है।जरा सोचिये अगर हम किसी बच्चे को क्रोध करने से बिलकुल ही रोक दे तो क्या उस का सर्वांगीर्ण विकास संभव है। बच्चे का जिज्ञासु स्वभाव मर जायेगा और वो दब्बू हो जायेगा। शिव तत्व विध्वंस का का प्रतीक है। सृजन और विध्वंस अनंत श्रंखला की कड़ियाँ है जो बारी बारी से घटित होती हैं .ज्ञान, विज्ञानं, अद्यात्मिक, भौतिक, जीवन के किसी भी छेत्र में यह सत्य है। ब्रह्मांड की बिग बैंग थेओरी इस बात को प्रमाणित करती है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक महा विस्फोट के बाद हुई .. विस्फोट से स्रजन हुआ न की विनाश। ऋषि मुनियों ने अनेक चमत्कारिक खोजे की है पर शिव तत्व की खोज अदभुद थी जो ब्रह्माण्ड के सारे रहस्य खोलते हुए जीवन मरण के चक्र से मुक्त करती थी। शिव का महत्त्व इतना है की वे सब से ज्यादा पूज्य है।इसी लिए कहा गया है कि... सत्यं शिवं सुन्दरम्। अर्थात्, शिव ही सत्य है, सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है,

शिव और शक्ति मिल कर ब्रम्हांड का निर्माण करते है। इस श्रसटी में कुछ भी एकल नही है अच्छाई है तो बुराई है, प्रेम है तो घ्राण भी है।यदि एक सिरा है तो दूसरा शिरा भी होगा। एक बिंदु के भी दो सिरे होते है। जिस वक्त सिर्फ १ होगा उसी वक्त मुक्ति हो जाएगी क्यों की कोइ भी वास्तु अकेले नही होती है अर्थात दोनों एक साथ मिलने पर ही मुक्ति संभव है। एक परमाणु पर कोइ आवेश नही होता है पर जब उस से एक इलेक्ट्रान निकल जाता है तो उस पर उतना ही धन आवेश आ जाता है जितना की इलेक्ट्रान पर ऋण आवेश . इस प्रकार आयन (इलेक्ट्रान निकलने के बाद परमाणु आयन कहलाता है ) और इलेक्ट्रान दोनों ही तब तक क्रियाशील रहते है जब तक वे फिर से न मिल जाये। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है, ऊर्जा और प्रदार्थ हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। बिना एक के दूसरा अपनी अभिवयक्ति नही कर सकता। दया, छमा, प्रेम आदि सारे गुण तो आत्मा रुपी दर्पण में ही प्रतिबिंबित होते है। शिव प्रदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक है। दुर्गा जी 9 रूप है जो किसी न किसी भाव का प्रतिनिधित्व करते है। अब जरा आईसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर आटोहान ने परमाणु बम बना कर परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी सब जानते है।

  • "सूत्र e / c = m c" इस के अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है अर्थात दो नही एक ही है पर वो दो हो कर स्रसटी का निर्माण करता है।

ऋषियो ने ये रहस्य हजारो साल पहले ही ख़ोज लिया था। भगवान अर्ध नारीश्वर इस का प्रमाण है।[5]

व्यक्तित्व[संपादित करें]

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।

पूजन[संपादित करें]

शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प, प्रसाद मे भान्ग अति प्रिय हैं। एवम इनकी पूजा के लिये दूध,दही,घी,शकर,शहद इन पांच अमृत जिसे पन्चामृत कहा जाता है! पूजन में इनका उपयोग करें। एवम पन्चामृत से स्नान करायें इसके बाद इत्र चढ़ा कर जनेऊ पहनायें! अन्त मे भांग का प्रसाद चढाए ! शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबद्ध हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है।

द्वादश ज्योतिर्लिंग[संपादित करें]

सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन श्री शैलम देवस्थानम उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर परली में वैद्यनाथ मन्दिर, देवघर डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमाशंकर सेतुबंध पर श्री रामेश्वर दारुकावन में श्रीनागेश्वर मंदिर, द्वारका वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर हिमालय पर केदारखंड(उत्तराखण्ड) में श्रीकेदारनाथ

और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर

जो मनुष्य पवित्र ह्रदय से इन ज्योतिर्लिंगों का ध्यान करता है उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है |[6]


ज्योतिर्लिंग स्थान
पशुपतिनाथ नेपाल की राजधानी काठमांडू ब्रहामेश्वर नाथ ब्रहामेश्वर नाथ, ब्रहमपुर, बक्सर (बिहार)
सोमनाथ सोमनाथ मंदिर, सौराष्ट्र क्षेत्र, गुजरात
महाकालेश्वर श्रीमहाकाल, महाकालेश्वर, उज्जयिनी (उज्जैन)
ॐकारेश्वर ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, ॐकारेश्वर,
केदारनाथ केदारनाथ मन्दिर,रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड
भीमाशंकर भीमाशंकर मंदिर, निकट पुणे, महाराष्ट्र
विश्वनाथ काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग मन्दिर, नासिक, महाराष्ट्र
रामेश्वरम रामेश्वरम मंदिर, रामनाथपुरम, तमिल नाडु
घृष्णेश्वर घृष्णेश्वर मन्दिर, दौलताबाद औरंगाबाद, महाराष्ट्र
बैद्यनाथ देवघर, झारखंड
नागेश्वर नागेश्वर मन्दिर, द्वारका, गुजरात
श्रीशैल श्रीमल्लिकार्जुन, श्रीशैलम (श्री सैलम), आंध्र प्रदेश

अनेक नाम[संपादित करें]

हिन्दू धर्म में भगवान शिव को अनेक नामों से पुकारा जाता है

  • रूद्र - रूद्र से अभिप्राय जो दुखों का निर्माण व नाश करता है।
  • पशुपतिनाथ - भगवान शिव को पशुपति इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह पशु पक्षियों व जीवआत्माओं के स्वामी हैं
  • अर्धनारीश्वर - शिव और शक्ति के मिलन से अर्धनारीश्वर नाम प्रचलित हुआ।
  • महादेव - महादेव का अर्थ है महान ईश्वरीय शक्ति।
  • भोला - भोले का अर्थ है कोमल हृदय, दयालु व आसानी से माफ करने वाला। यह विश्वास किया जाता है कि भगवान शंकर आसानी से किसी पर भी प्रसन्न हो जाते हैं।
  • लिंगम - पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक है।
  • नटराज - नटराज को नृत्य का देवता मानते है क्योंकि भगवान शिव तांडव नृत्य के प्रेमी हैं।शान्ति नगर स्थित शिवशक्ति दुर्गा मंदिर के पं॰ सोहनानंद जी महाराज ने बताया कि शिवरात्रि को रात्रि में चार बार हर तीन घंटे बाद रुद्राभिषेक किया जाता है। इससे जातक का कालसर्प दोष व सभी गृहदोष दूर हो जाते हैं।

शिवरात्रि[संपादित करें]

प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे।

माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। ॥ शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ॥

भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है। इस बार 6 मार्च को शिवरात्रि प्रदोष व अर्धरात्रि दोनों में विद्यमान रहेगी।

ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं। मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है। बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिगों की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती है।

यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।

महाशिवरात्रि[संपादित करें]

शिव की मूर्ति

महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। भगवान शिव का यह प्रमुख पर्व फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं।

महाशिवरात्रि भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। शिव और पार्वती का विवाह, मनाया जाता है। महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-

ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। सः जूं ह्रौं ॐ ॥

इन्हें भी देखें: शिव की आरती

शिव पुराण[संपादित करें]

शिव पुराण मे शिव जी के बारे मे विस्तार से लिखा है। इसमे शिव जी के अवतार आदि विस्तार से लिखित है।

कैलाश मानसरोवर[संपादित करें]

कुछ कथाओं के अनुसार कैलाश सरोवर को शिव का निवास स्थान माना जाता है।

स्रोत[संपादित करें]

  1. http://mudraastro.blogspot.in/p/blog-page_5456.html?m=1
  2. http://jayatuhindurastra.blogspot.in/2010/09/blog-post_11.html
  3. http://www.shivagyan.com/hindi/vedicarticle1-2.html
  4. http://www.shivagyan.com/hindi/vedicarticle1-2.html
  5. http://jayatuhindurastra.blogspot.in/2010/09/blog-post_11.html
  6. जागरण

इन्हें भी देखें[संपादित करें]