पंचामृत

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दूध, दही, मधु, घृत और गन्ने के रस से बने द्रव्य को ही 'पंचामृत कहा जाता है। भारत के कई घरों में पूजा-पाठ के समय इसे भगवान को अर्पित कर पीया जाता है। दीपावली आदि प्रमुख त्योहारों के दिन इसका विशेष महत्त्व है, उस दिन मंदिरों मे यह भगवान को अर्पित कर प्रशाद के रुप में सबको वितरित किया जाता है।

महात्म्य[संपादित करें]

पंचामृत देते समय देवपूजक अर्थात पुजारी जिस मंत्र का उच्चारण करता है, उसका अर्थ है- अकाल मृत्यु का हरण करने वाले और समस्त रोगों के विनाशक, श्रीविष्णु का चरणोदक पीकर पुनर्जन्म नहीं होता। दूसरे शब्दों में, श्रद्धापूर्वक पंचामृत का पान करने वाला मनुष्य संसार में समस्त ऐश्वर्यों को प्राप्त करता हुआ शरीरपात के बाद जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।' यह पंचामृत का माहात्म्य है। गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, शर्करा और मधु के सम्मिश्रण में रोग निवारण गुण विद्यमान होते हैं, यह पुष्टिकारक है, चिकित्सा शास्त्र की मान्यता है यह। लेकिन जब यह देवमूर्ति का स्पर्श करता है तो मुक्ति प्रदाता हो जाता है-यह आध्यात्मिक सत्य है।

बनाने की विधि[संपादित करें]

सामग्री[संपादित करें]

1/2 कप दूध, 1/2 कप दही, 1 टेबल स्पून शहद 1/2 टी स्पून शुद्ध घी, 2 टेबल स्पून चीनी का बूरा, 8-10 तुलसी के पत्ते, 1/4 कप बारीक कटे हुए मखाने, 1 टी स्पून भुनी हुई चिरौंजी।

कितने लोगों के लिए : 6

दही को अच्छी तरह फेंटकर उसमें दूध मिलाएं। फिर चीनी की बूरा, चिरौंजी, मखाने, शहद और घी अच्छी तरह मिलाएं। तुलसी के पत्ते डालकर भोग लगाएं।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

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