शारदा देवी
| शारदा देवी সারদা দেবী |
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शारदा देवी |
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| जन्म | सारदामणि मुखोपाध्धाय 22 दिसम्बर 1853 जयरामबाटी,बंगाल |
| मृत्यु | 20 जुलाई 1920 (उम्र 66) कोलकाता |
| गुरु/शिक्षक | रामकृष्ण परमहंस |
शारदा देवी (बांग्ला : সারদা দেবী ) भारत के सुप्रसिद्ध संत स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की आध्यात्मिक सहधर्मिणी थीं। रामकृष्ण संघ में वे 'श्रीमाँ' के नाम से परिचित है ।
अनुक्रम |
जीवनी [संपादित करें]
जन्म और परिवार [संपादित करें]
शारदा देवी का जन्म 22 ड़िसम्वर 1853 को बंगाल प्रान्त स्थित जयरामबाटी नामक ग्राम के एक गरीव ब्राह्मण परिवार मेँ हूआ। उनके पिता रामचन्द्र मुखोपाध्याय और माता श्यामासुन्दरी देवी कठोर परिश्रमी थे।
विवाह [संपादित करें]
केवल 6 वर्ष की उम्र मेँ इनका विवाह श्री रामकृष्ण से कर दिया गया था।
दक्षिणेश्वर मेँ [संपादित करें]
अठारह वर्ष की उम्र मेँ वह अपने पति रामकृष्ण से मिलने दक्षिणेश्वर पहुचीँ। रामकृष्ण इस समय कठिन आध्यात्मिक साधना मेँ बारह बर्ष से ज्यादा समय व्यतीत कर चुके थे और आत्मसाक्षातकार के सर्बोच्च स्तर को प्राप्त कर लिए थे। वे बड़े प्यार से शारदा को ग्रहण किये और गृहस्थी के साथ साथ आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने की शिक्षा भी दिये। शारदा पवित्र जीवन व्यतीत करते हुए, रामकृष्ण की शिष्या बन गई। रामकृष्ण शारदा को जगन्माता के रुप मेँ देखते थे।1872 ई. के फलाहारीणी काली पूजा की रात को वे शारदा को जगन्माता के रुप मेँ पूजा किये। दक्षिणेश्वर मेँ आनेबाले भक्तोँ को शारदा देवी बच्चोँ के रुप मेँ देखती थी और उनकी सेवा करती थी।
संघ माता के रुप मेँ [संपादित करें]
1886 ई. मेँ रामकृष्ण के देहान्त के वाद शारदा देवी तीर्थ दर्शन करने चली गयी। वहाँ से लौटने के बाद वे अत्यन्त संकट की स्थिति में कामारपुकुर मेँ रहने लगी। उनकी यह दशा को देखते हुए रामकृष्ण के भक्त उन्हेँ कलकत्ता लेकर आ गये। कलकत्ता आने के बाद उनके जीवन मेँ परिवर्तन आया और वे दीक्षा देकर शिष्य बनाने लगी। प्रारंभिक वर्षोँ मेँ स्वामी योगानन्द ने उनकी सेवा का दायित्व लिये थे।बाद मेँ स्वामी सारदानन्द ने उनके रहने के लिए कलकत्ता मेँ उद्वोधन भवन का निर्माण करबाया था।
सवकी माँ [संपादित करें]
voh sabki maa jaisi thin. kiski baat nahi talti thi. kisi ka bura na dekh, na sun, na bol sakti thin. kisi ko bhi koi bhi mushkil me padhte dekh kar use bachati thin. voh sabko apne dil ke pas rakha karti thin. sab unse bahut pyar karte thein.
आदर्श नारी [संपादित करें]
अन्तिम जीवन [संपादित करें]
कठिन परिश्रम की दवाब और बारबार मलेरिया के संक्रमण के कारण उनका तवीयत बिगड़ता गया। 21 जुलाई 1920 को शारदा देवी ने नश्वर शरीर त्याग किया। बेलुड़ मठ मेँ उनके समाधि स्थल पर एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया है ।
उपदेश और वाणी [संपादित करें]
Unke updesh tatha vaniyan kafi achche, labhdayak aur sahi then.
आगे अध्ययन के लिए [संपादित करें]
- स्वामी गंभीरानन्द, श्रीमाँ सारदा देवी ,अद्वैत आश्रम . ISBN 81-85301-96-4 ।
- माँ की बाते,रामकृष्ण मठ,नागपुर ।
बाह्य सुत्र [संपादित करें]
- शारदा देवी:संक्षिप्त जीवनी- बेलूड़ मठ
- शारदा मठ की वेवसाइट
- माँ की बातेँ
- स्वामी अभेदानन्द रचित श्रीशारदा देवी स्र्तोँतम
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