आत्मा
आत्मा या आत्मन् पद भारतीय दर्शन के महत्त्वपूर्ण प्रत्ययों (विचार) में से एक है। यह उपनिषदों के मूलभूत विषय-वस्तु के रूप में आता है। जहाँ इससे अभिप्राय व्यक्ति में अन्तर्निहित उस मूलभूत सत् से किया गया है जो कि शाश्वत तत्त्व है तथा मृत्यु के पश्चात् भी जिसका विनाश नहीं होता।
आत्मा का निरूपण श्रीमद्भगवदगीता या गीता में किया गया है। आत्मा को शस्त्र से काटा नहीं जा सकता, अग्नि उसे जला नहीं सकती, जल उसे गला नहीं सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती।[1] जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नवीन शरीर धारण करता है।[2]
प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन की मान्यता है कि यदि आत्मा अविनाशी है तो उसका किसी को कर्ता स्वीकार नहीं किया जा सकता. प्रोफ़ेसर जैन का अभिमत है कि " जीवात्मा को अविनाशी, नित्य, अज और अव्यय समझना चाहिए। जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों का त्याग करके नवीन वस्त्रों को धारण कर लेता है, वैसे ही यह जीवात्मा पुराने शरीरों को छोड़कर नवीन शरीरों को ग्रहण करता है। इसे न तो शस्त्र काट सकते है, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है और न वायु सुखा सकती है। यह अच्छेदय्, अदाह्य एवं अशोष्य होने के कारण नित्य, सर्वगत, स्थिर, अचल एवं सनातन है। इस दृष्टि से किसी को आत्मा का कर्ता स्वीकार नहीं कर सकते। यदि आत्मा अविनाशी है तो उसके निर्माण या उत्पत्ति की कल्पना नहीं की जा सकती। यह सम्भव नहीं कि कोई वस्तु उत्पन्न तो हो किन्तु उसका विनाश न हो। इस कारण जीव ही कर्ता तथा भोक्ता है।
सूत्रकाल में ईश्वरवाद अत्यन्त क्षीण प्रायः था। भाष्यकारों ने ही ईश्वर वाद की स्थापना पर विशेष बल दिया। आत्मा को ही दो भागों में विभाजित कर दिया गया- जीवात्मा एवं परमात्मा।
‘ज्ञानाधिकरणमात्मा । सः द्विविधः जीवात्मा परमात्मा चेति।'1
इस दृष्टि से आत्मा ही केन्द्र बिन्दु है जिस पर आगे चलकर परमात्मा का भव्य प्रासाद निर्मित किया गया।
आत्मा को ही बह्म रूप में स्वीकार करने की विचारधारा वैदिक एवं उपनिषद् युग में मिलती है। ‘प्रज्ञाने ब्रह्म', ‘अहं ब्रह्मास्मि', ‘तत्वमसि', ‘अयमात्मा ब्रह्म' जैसे सूत्र वाक्य इसके प्रमाण है। ब्रह्म प्रकृष्ट ज्ञान स्वरूप है। यही लक्षण आत्मा का है। ‘मैं ब्रह्म हूँ', ‘तू ब्रह्म ही है; ‘मेरी आत्मा ही ब्रह्म है' आदि वाक्यों में आत्मा एवं ब्रह्म पर्याय रूप में प्रयुक्त हैं।
आत्मा एवं परमात्मा का भेद तात्विक नहीं है; भाषिक है।"
आत्मा और परमात्मा दोनो अलग-अलग है आत्मा रचना है और परमात्मा उसके रचीयता है इस आधार से दोनो मे पिता-पुत्र क नाता हो जाता है दोनो क स्वरूप भी एक जैसा ही है. आत्मा और परमत्मा दोनो के गुन भी समान ही है आत्म के गुन है घ्यान स्वरूप,प्रेम स्वरूप, पवित्रता स्वरूप,शान्त स्वरूप,सुख स्वरूप,आन्नद स्वरूप, एव शक्ति स्वरूप, परमत्मा के गुन है ग्यान के सागर, प्रेम के सागर, पवित्रता के सागर,शान्ति के सागर,सुख के सागर,आन्नद के सागर,एव सर्व शाक्तिमान है आत्मा जन्म-मरन मै आती है परमात्मा जन्म- मरन मे नहि आते , आत्मा पूरे कल्प मे ८४ जन्मो क पार्ट बजाना होता है कल्प चार युगो का होता है सतयुग.त्रेता,द्वापुर एव कलयुग
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आत्मा को ८४ जन्म उसके कर्मो के अनुसार मिलते है|अगर किसी आत्मा ने पिछले जन्मो मे श्रेष्ठ कर्म किये है तो उसको सत्युग मे ८ जन्म उसके बाद त्रेता मे १२ द्वापुर मे २१ एवं कलयुग मे ४२ जन्म लेगी। आत्मा एक सच्चाइ है सबके पास आत्मा है आत्मा के प्र्मुख गुनौ मे से एक " साक्छि होना है।