गुरु नानक

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१९वीं शताबदी में निर्मित तंजौर शैली का चित्र जिसमें गुरु नानक जी के साथ सभी सिख गुरु दिखाई दे रहे हैं।

गुरू नानक (पंजाबी: ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ) सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) हैं। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे।

परिचय[संपादित करें]

गुरुद्वारा ननकाना साहिब

इनका जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तिलौंडा तलवंडी नामक गाँव में (आधुनिक रायपुर) संवत् १५२७ में कार्तिकी पूर्णिमा (१५ अप्रैल, १४६९) को एक खत्रीकुल में हुआ था । इनके पिता का नाम कल्यानचंद या कालू था । तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया।

बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे । पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा। ७-८ साल की उम्र में स्कूल छूट गया और सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। इनका विवाह सोलह वर्ष की अवस्था में गुरुदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्ष्मी से हुआ था । ३२ वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र हरीचंद्र का जन्म हुआ । चार वर्ष पीछे दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ । दोनों लड़कों के जन्म के उपरांत १५०७ में नानक अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पडे़ । ये चारों ओर घूमकर उपदेश करने लगे । १५२१ तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। 1539 में इनकी मृत्यु हुई।

दर्शन[संपादित करें]

मक्का में गुरु नानक देव जी

नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्हांने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। संत साहित्य में नानक अकेले हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।

इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये है । मुर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे । हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था । लोगों ने तत्कालीन इब्राहीम लोदी से इनकी शिकायत की और ये बहुत दिनों तक कैद रहे । अंत में पानीपत की लड़ाई में जब इब्राहीम हारा और बाबर के हाथ में राज्य गया तब इनका छुटकारा हुआ ।

पिछले दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई और इनके विचारों में भी परिवर्तन हुआ । स्वयं विरक्त होकर ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और दान पुण्य, भंडारा आदि करने लगे । जलंधर जिले में इन्होंने कर्तारपुर नामक एक नगर बसाया और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई । इसी स्थान पर आश्वन कृष्ण १०, संवत् १५९७ को इनका परलोकवास हुआ । यह सिखों का एक पवित्र स्थान है । Birth : On Saturday 15 April 1469 at Rai Bhoeki Talwandi, Pakistan (Nankana Sahib) Guruship : 1469 to 1539 Joti Jot : On Monday 22 September, 1539 at Kartarpur Family Parents : Mehta Kalu and Mata Tripta Devi Brother/Sisters : Sister Bebe Nanki Spouse : Mata Sulakhani Children : Sri chand and Lakhmi Das Other Details Bani in GGS: 974 Shabads in 19 Ragas, Gurbani Includes Japji, Sidh Gohst, Sohilaa, Dakhni Onkar, Asa di Var, Patti, Bara Mah

कवित्व[संपादित करें]

नानक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा "बहता नीर" थी जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत, और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।

इन्हें भी देखिये[संपादित करें]

बाह्य लिंक[संपादित करें]

आडियो[संपादित करें]

--210.212.157.162 ०३:३८, ३१ अक्टूबर २००८ (UTC)