संत रविदास
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| रविदासी शिक्षाएं एवं विश्वास | |
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| शिर्षक | |
| संत रविदास · | |
| संत रविदास जयन्ती | |
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| प्रवेशद्वारःहिन्दुत्व |
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संत कुलभूषण कवि रैदास उन महान् सन्तों में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है।
मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है।
[संपादित करें] दोहे
- जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात ।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात ।।
- मन चंगा तो कठौती में गंगा ||
[संपादित करें] भक्ति दोहे
अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी |
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानि |
प्रभुजी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चन्द चकोरा |
प्रभुजी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती |
प्रभुजी तुम मोती हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा |
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा |
[संपादित करें] अन्य प्रचलित नाम
| भक्तिकाल के कवि |
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| ज्ञानाश्रयी शाखा- नानक । संत रविदास । दादूदयाल । सुंदरदास । मलूकदास । संत कबीर प्रेमाश्रयी शाखा- मलिक मोहम्मद जायसी । मंझन । कुतुबन । उसमान |

