गौतम बुद्ध
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| गौतम बुद्ध | |
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द्वितीय शताब्दी मे (गांधार शैली मे) वज्र मुद्रा मे बनी बुद्ध की प्रतिमा। वर्तमान में टोक्यो के राष्ट्रीय संग्रहालय मे है।
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| जन्म | ४८३ ई० पू० लुम्बिनी, नेपाल |
| मृत्यु | ५६३ ई० पू० कुशीनगर, भारत |
| व्यवसाय | राजकुमार, धार्मिक गुरु |
| गृह स्थान | कपिलवस्तु |
| प्रसिद्धि कारण | बौद्ध धर्म के प्रवर्तक |
| पूर्वाधिकारी | कस्सपा बुद्ध |
| उत्तराधिकारी | मैत्रेय |
गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे। राजकुमार सिद्धार्थ के रूप में उनका जन्म ४८३ ईस्वी पूर्व तथा मृत्यु ५६३ ईस्वी पूर्व मे हुई थी।[1] उनको इस विश्व के सबसे महान व्यक्तियों में से एक माना जाता है।
अनुक्रम |
[संपादित करें] जीवनी
[संपादित करें] जन्म
गौतम गोत्र में जन्मे बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ गौतम था । उनका जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी में हुआ था। दक्षिण मध्य नेपाल में स्थित लुंबिनी में उस स्थल पर महाराज अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व बुद्ध के जन्म की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। बुद्ध का जन्म दिन व्यापक रूप से थएरावदा देशों में मनाया जाता है [1] उनकी माता का उनके जन्म के सात दिन बाद निधन हो गया था। उनका पालन पोषण शुद्दोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती ने किया। शिशु का नाम सिद्धार्थ दिया गया, जिसका अर्थ है "वह जो सिद्धी प्राप्ति के लिए जन्मा हो"। जन्म समारोह के दौरान, साधु द्रष्टा आसित अपने पहाड़ के निवास से घोषणा की, कि बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र आदमी बनेगा । [2] सुधोधना ने पांचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया, और आठ ब्राह्मण विद्वानों को भविष्य पढ़ने के लिए आमंत्रित किया। सभी ने एकसी दोहरी भविष्यवाणी की, कि बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र आदमी बनेगा. [3]
[संपादित करें] बाल्यकाल
शाक्यों के राजा शुद्धोधन' सिद्धार्थ के पिता थे। परंपरागत कथा के अनुसार, सिद्धार्थ की माता मायादेवी जो कोली वन्श की थी] का निधन उनके जन्म के कुछ समय बाद हो गया था। कहा जाता है कि फिर एक ऋषि ने शुद्धोधन से कहा कि, वे या तो एक महान राजा बनेंगे, या एक महान साधु । इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की। फिर भी, २९ वर्ष की उम्र में, उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी (संस्कृत - चतुर्निमित्त, पालि- चत्तारि निमित्तानि) - एक वृद्ध विकलांग व्यक्ति, एक रोगी, एक मुरझाती हुई पर्थिव शरिर्, और एक साधु। इन चार दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ समझ गये कि सब का जन्म होता है, सब को बुढ़ापा आता है, सब को बीमारी होती है, और एक दिन, सब की मृत्यु होती है। उन्होने अपना धनवान जीवन, अपनी पत्नी, अपना पुत्र एवं राजपाठ सब को छोड़कर एक साधु का जीवन अपना लिया ताकि वे जन्म, बुढ़ापे, दर्द, बीमारी, और मृतयु के बारे में कोई उत्तर खोज पाएं। वो नेपाल के लुम्बिनि मे जन्मा था लेकिन भारत ने आज पिपरहवा मे नक्कलि लुम्बिनि खदा कर रहे हे। इसको लेकर सभि बोद्ध धर्माबलम्बि मे निरासा उत्पन्न हुवा हे।
मोटे अक्षर'janma 563,BD
mrithu 483...BD=== सत्य की खोज ===
सिद्धार्थ ने दो ब्राह्मणों के साथ अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढने शुरू किये। समुचित ध्यान लगा पाने के बाद भी उन्हें इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले। फ़िर उन्होने तपस्या की परंतु उन्हे अपने प्रश्नों के उत्तर फ़िर भी नहीं मिले। फ़िर उन्होने कुछ साथी इकठ्ठे किये और चल दिये अधिक कठोर तपस्या करने। ऐसे करते करते छः वर्ष बाद, भूख के कारण मरने के करीब-करीब से गुज़रकर, बिना अपने प्रश्नों के उत्तर पाएं, वे फ़िर कुछ और करने के बारे में सोचने लगे। इस समय, उन्हे अपने बचपन का एक पल याद आया जब उनके पिता खेत तैयार करना शुरू कर रहे थे। उस समय वे एक आनंद भरे ध्यान में पड़ गये थे और उन्हे ऐसा महसूस हुआ कि समय स्थित हो गया है।
किस्का कथन स्त्य और किस्का झूट, कैसे पता च्लेगा? unke prashno ka uttar unko kya mila?
[संपादित करें] ज्ञान प्राप्ति
कठोर तपस्या छोड़कर उन्होने आर्य अष्टांग मार्ग ढूंढ निकाला, जो मध्यम मार्ग भी कहलाता जाता है क्योंकि यह मार्ग दोनो तपस्या और असंयम की पाराकाष्टाओं के बीच में है। अपने बदन में कुछ शक्ति डालने के लिये, उन्होने एक बरह्मनि से कुछ खीर ली थी। वे एक पीपल के पेड़ (जो अब बोधि वृक्ष कहलाता है) के नीचे बैठ गये प्रतिज्ञा करके कि वे सत्य जाने बिना उठेंगे नहीं। वे सारी रात बैठे और सुबह उन्हे पूरा ज्ञान प्राप्त हो गया। उनकी अविजया नष्ट हो गई और उन्हे निर्वन यानि बोधि प्राप्त हुई और वे ३५ की उम्र तक बुद्ध बन गये। उनका पहला धर्मोपदेश वाराणसी के पास सारनाथ मे था जो उन्होने अपने पहले मित्रो को दिया। उन्होने भी थोडे दिनो मे ही बोधि प्राप्त कर ली। फिर गौतम बुद्ध ने उन्हे प्रचार करने के लिये भेज दिया।
[संपादित करें] हिन्दू धर्म में बुद्ध
हिन्दू धर्म ने बाद में बुद्ध को विष्णु का एक अवतार माना है। लेकिन इसे इस तरीके से पेश किया गया है जिसे ज़्यादातर बौद्ध अस्वीकार्य और बेहद अप्रिय मानते हैं। कुछ पुराणों में ऐसा कहा गया है कि भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार इसलिये लिया था जिससे कि वो "झूठे उपदेश" फैलाकर "असुरों" को सच्चे वैदिक धर्म से दूर कर सकें, जिससे देवता उनपर जीत हासिल कर सकें। इसका मतलब है कि बुद्ध तो "देवता" हैं, लेकिन उनके उपदेश झूठे और ढोंग हैं। ये बौद्धों के विश्वास से एकदम उल्टा है: बौद्ध लोग गौतम बुद्ध को कोई अवतार या देवता नहीं मानते, लेकिन उनके उपदेशों को सत्य मानते हैं। कुछ हिन्दू लेखकों (जैसे जयदेव) ने बाद में यह भी कहा है कि बुद्ध विष्णु के अवतार तो हैं, लेकिन विष्णु ने ये अवतार झूठ का प्रचार करने के लिये नहीं बल्कि अन्धाधुन्ध कर्मकाण्ड और वैदिक पशुबलि रोकने के लिये किया था। गौतम बुद्ध चाहे विष्णु जी के अवतार हों या नहीं लेकिन वे पूजने के योग्य तो हैं
[संपादित करें] शिक्षा
बुद्ध के उपदेशों का सार इस प्रकार है -
- सम्यक ज्ञान
बुद्ध के अनुसार धम्म यह है:
- जीवन की पवित्रता बनाए रखना
- जीवन में पूर्णता प्राप्त करना
- निर्वाण प्राप्त करना
- तृष्णा का त्याग
- यह मानना कि सभी संस्कार अनित्य हैं
- कर्म को मानव के नैतिक संस्थान का आधार मानना
बुद्ध के अनुसार क्या अ-धम्म है--
- परा-प्रकृति में विश्वास करना
- आत्मा में विश्वास करना
- कल्पना-आधारित विश्वास मानना
- धर्म की पुस्तकों का वाचन मात्र
बुद्ध के अनुसार सद्धम्म क्या है-- 1. जो धम्म प्रज्ञा की वृद्धि करे--
- जो धम्म सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दे
- जो धम्म यह बताए कि केवल विद्वान होना पर्याप्त नहीं है
- जो धम्म यह बताए कि आवश्यकता प्रज्ञा प्राप्त करने की है
2. जो धम्म मैत्री की वृद्धि करे--
- जो धम्म यह बताए कि प्रज्ञा भी पर्याप्त नहीं है, इसके साथ शील भी अनिवार्य है
- जो धम्म यह बताए कि प्रज्ञा और शील के साथ-साथ करुणा का होना भी अनिवार्य है
- जो धम्म यह बताए कि करुणा से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है.
3. जब वह सभी प्रकार के सामाजिक भेदभावों को मिटा दे
- जब वह आदमी और आदमी के बीच की सभी दीवारों को गिरा दे
- जब वह बताए कि आदमी का मूल्यांकन जन्म से नहीं कर्म से किया जाए
- जब वह आदमी-आदमी के बीच समानता के भाव की वृद्धि करे
क्या पता इस्को किस्ने लिखा! किस्का कथन स्त्य और किस्का झूट, कैसे पता च्लेगा?
[संपादित करें] म्रत्यु
पाली सिद्धांत के महापरीनिर्वाना सुत्त के अनुसार, 80 वर्ष की आयु में, बुद्ध ने घोषणा की कि वे जल्द ही परिनिर्वाना लिए रवाना हो॔गे और उन्होने अपने पार्थिव शरीर का त्याग किया। इसके बाद, बुद्ध अपने आखिरी भोजन, जिसमें उन्होंने कुन्डा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था, खा लिया जिसके कारण वे भयण्कर रुप से बीमार पड़ गये, बुद्ध अपने परिचर आनंद को नर्देश दिया कि वह कुन्डा को समझाए कि उसमे उसकी कोइ गलती नही॑ है। उन्होने यह कहा कि यह भोजन अतुल्य है।[2]
[संपादित करें] गौतम बुद्ध - अन्य धर्मों की दृष्टि में
गौतम बुद्ध अन्य धर्मों में नबी या ईश्वरदूत के रूप में वर्णित है। कुछ हिंदू ग्रंथों का कहना है कि बुद्ध भगवान विष्णु है, जो पृथ्वी पर आये । मिर्ज़ा ताहिर अहमद ने अपने किताब "एन एलीमेंट्री स्टडी आफ इस्लाम" मे कहा है कि कुरान की धुल - काइफल नामक हस्ती बुद्ध हो सकता है। अहमदियास ([English] :Ahmadiyyas) के द्वारा बुद्ध एक नबी के रूप में माना गया है। [3] [4]
[संपादित करें] संदर्भ
- ↑ The Dating of the Historical Buddha: A Review Article
- ↑ http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/dn/dn.16.1-6.vaji.html
- ↑ http://www.alislam.org/introduction/index.html
- ↑ http://books.google.co.uk/books?id=Q78O1mjX2tMC&pg=PA26&dq=ahmadiyya+buddha&hl=en&ei=wbZHTbfyBcWYhQeO-eS9BQ&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CDIQ6AEwAA#v=onepage&q=ahmadiyya%20buddha&f=false
[संपादित करें] वाह्य सूत्र
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