राजस्थान

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राजस्थान

भारत के मानचित्र पर राजस्थान

भारत के प्रान्त
राजधानी जयपुर
सबसे बड़ा शहर जयपुर
जनसंख्या 68,621,012
 - घनत्व 201 /किमी²
क्षेत्रफल ३४२,२३६ किमी² 
 - जिले
राजभाषा(एँ) हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती
प्रतिष्ठा १ नवम्बर १९५६
 - राज्यपाल मार्गरेट अल्वा
 - मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया
 - विधानसभा एक सभा
आइएसओ संक्षेप IN-RJ
www.rajasthan.gov.in

राजस्थान भारत का एक प्रान्त है । यहाँ की राजधानी जयपुर है।

राजस्थान भारत गणराज्य का क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में गुजरात, दक्षिण-पूर्व में मध्यप्रदेश, उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में उत्तरप्रदेश और हरियाणा है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है।जीडीपी के दर से यह नवे(9) नंबर पे आता है उत्तर प्रदेश और बिहार भी जीडीपी दर में इससे कही आगे है शिक्षा दर में भी यह राज्य अपने पडोसी राज्यों जैसे पंजाब गुजरात से बहुत पिछड़ा है

जयपुर राज्य की राजधानी है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरूस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एक मात्र पर्वत श्रेणी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, माउंट आबू और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, रणथम्भौर एवं सरिस्का हैं और भरतपुर के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान है, जो सुदूर साइबेरिया से आने वाले सारसों और बड़ी संख्या में स्थानीय प्रजाति के अनेकानेक पक्षियों के संरक्षित-आवास के रूप में विकसित किया गया है।

इतिहास[संपादित करें]

पर्यावरण प्रेमी राणाराम बिश्नोई जिन्होने पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रागाँधी के राजनीति मे आने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था I जिसके लिए सोना भी पत्थर है आपको यह बात सुनने मे अजीब और आश्चर्य लग रही हो लेकिन यह सत्य है धन दोलत शान-शोहरत को छोड़कर बस एक ही जुनून है पेड़-पोधो व वन्य जिवो की सेवा जो भगवान मे भी विश्वास नही रखते है जिन्होने कभी जिंदगी मे किसी मंदिर मे प्रसाद तक नही चड़ाई जो जिन्होने कभी देवी देवताओ के सामने हाथ नही जोड़े Iजो कभी किस्मत को नही मानते Iबस गुरु जंभेस्वर (बिश्नोई संप्रदाय के सस्थापक)को ही अपना गुरु माना उन्ही की शिक्षाओ पर चले I रेगिस्तान मे रेत के टीले जहा पत्थर भी नही टिकते वहा पर लाखो पेड़ लगा चुके है I बस ज़रूरत है इनको इनके निस्वार्थ भाव से किए गये कार्य के लिए सम्मानित करवाने की इनके कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर लाने की ताकि दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सके I राष्ट्रीय मीडिया के वक्ततियो आपकी एक कोशिश् राणाराम को पूरी जिंदगी की मेहत का फल दिला सकती है और भारत रत्न भी दिला सकती है I

प्राचीन काल में राजस्थान[संपादित करें]

मीणा राजा एम्बर (जयपुर) सहित राजस्थान के प्रमुख भागों के प्रारंभिक शासक थे।प्राचीन समय में राजस्थान मे मीना वंश के राजाओ का शासन था। संस्कृत में मत्स्य राज्य का ऋग्वेद में उल्लेख किया गया था. बाद में भील और मीना, (विदेशी लोगों) जो स्य्न्थिअन्, हेप्थलिते या अन्य मध्य एशियाई गुटों के साथ आये थे,मिश्रित हुए।मीणा राजा एम्बर (जयपुर) सहित राजस्थान के प्रमुख भागों के प्रारंभिक शासक थे।१२वीं सदी तक राजस्थान के कुछ भाग पर गुर्जरों का राज्य रहा है । गुजरात तथा राजस्थान का अधिकांश भाग गुर्जरत्रा (गुर्जरों से रक्षित देश) के नाम से जाना जाता था।[1][2][3] गुर्जर प्रतिहारों ने ३०० साल तक पूरे उत्तरी-भारत को अरब आक्रान्ताओं से बचाया था।[4] बाद में जब राजपूत जाति के वीरों ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो उन भागों का नामकरण अपने-अपने वंश,क्षेत्र की प्रमुख बोली अथवा स्थान के अनुरूप कर दिया। ये राज्य थे- उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़,( जालोर ) सिरोही, कोटा, बूंदी, जयपुर, अलवर, भरतपुर, करौली, झालावाड़, और टोंक. [5] ब्रिटिशकाल में राजस्थान 'राजपूताना' नाम से जाना जाता था। राजपूत राजा महाराणा प्रताप अपनी असधारण राज्यभक्ति और शौर्य के लिये जाने जाते हैं । इन राज्यों के नामों के साथ-साथ इनके कुछ भू-भागों को स्थानीय एवं भौगोलिक विशेषताओं के परिचायक नामों से भी पुकारा जाता रहा है। पर तथ्य यह है कि राजस्थान के अधिकांश तत्कालीन क्षेत्रों के नाम वहां बोली जाने वाली प्रमुखतम बोलियों पर ही रखे गए थे. उदाहरणार्थ ढ़ूंढ़ाडी-बोली के इलाकों को ढ़ूंढ़ाड़ (जयपुर) कहते हैं। 'मेवाती' बोली वाले निकटवर्ती भू-भाग अलवर को 'मेवात', उदयपुर क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली'मेवाड़ी' के कारण उदयपुर को मेवाड़,ब्रजभाषा-बाहुल्य क्षेत्र को 'ब्रज', 'मारवाड़ी' बोली के कारण बीकानेर-जोधपुर इलाके को 'मारवाड़' और 'वागडी' बोली पर ही डूंगरपुर-बांसवाडा अदि को 'वागड' कहा जाता रहा है। डूंगरपुर तथा उदयपुर के दक्षिणी भाग में प्राचीन ५६ गांवों के समूह को ""छप्पन"" नाम से जानते हैं। माही नदी के तटीय भू-भाग को 'कोयल' तथा अजमेर के पास वाले कुछ पठारी भाग को 'उपरमाल' की संज्ञा दी गई है। [6][7] आमेर रोड पर परसराम द्वारा के पिछवाड़े की डूंगरी पर विराजमान वरदराज विष्णु की एेतिहासिक मूर्ति को साहसी सैनिक हीदा मीणा दक्षिण के कांचीपुरम से लाया था। मूर्ति लाने पर मीणा सरदार हीदा के सम्‌मान में सवाई जयसिंह ने रामगंज चौपड़ से सूरजपोल बाजार के परकोटे में एक छोटी मोरी का नाम हीदा की मोरी रखा। उस मोरी को तोड़ अब चौड़ा मार्ग बना दिया लेकिन लोगों के बीच यह जगह हीदा की मोरी के नाम से मशहूर है। देवर्षि श्री कृष्णभट्ट ने ईश्वर विलास महाकाव्य में लिखा है, कि कलयुग के अंतिम अश्वमेध यज्ञ केलिए जयपुर आए वेदज्ञाता रामचन्द्र द्रविड़, सोमयज्ञ प्रमुख व्यास शर्मा, मैसूर के हरिकृष्ण शर्मा, यज्ञकर व गुणकर आदि विद्वानों ने महाराजा को सलाह दी थी कि कांचीपुरम में आदिकालीन विरदराज विष्णु की मूर्ति के बिना यज्ञ नहीं हो सकता हैं। यह भी कहा गया कि द्वापर में धर्मराज युधिष्ठर इन्हीं विरदराज की पूजा करते थे। जयसिंह ने कांचीपुरम के राजा से इस मूर्ति को मांगा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तब जयसिंह ने साहसी हीदा को कांचीपुरम से मूर्ति जयपुर लाने का काम सौंपा। हीदा ने कांचीपुरम में मंदिर के सेवक माधवन को विश्वास में लेकर मूर्ति लाने की योजना बना ली। कांचीपुरम में विरद विष्णु की रथयात्रा निकली तब हीदा ने सैनिकों के साथ यात्रा पर हमला बोला और विष्णु की मूर्ति जयपुर ले आया। इसके साथ आया माधवन बाद में माधवदास के नाम से मंदिर का महंत बना। अष्टधातु की बनी सवा फीट ऊंची विष्णु की मूर्ति के बाहर गण्शोजी व शिव पार्वती विराजमान हैं। सार संभाल के बिना खंडहर में बदल रहे मंदिर में महाराजा को दर्शन का अधिकार था। अन्य लोगों को महाराजा की इजाजत से ही दर्शन होते थे। महंत माधवदास को भोग पेटे सालाना 299 रुपये व डूंगरी से जुड़ी 47 बीघा 3 बिस्वा भूमि का पट्टा दिया गया । महंत पं॰ जयश्रीकृष्ण शर्मा के मुताबिक उनके पुरखों को 341 बीघा भूमि मुरलीपुरा में दी थी जहां आज विधाधर नगर बसा है। अन्त्याा की ढाणी में 191 बीघा 14 बिस्वा भूमि पर इंडियन आयल के गोदाम बन गए।

राजस्थान का एकीकरण[संपादित करें]

राजस्थान भारत का एक महत्वपूर्ण प्रांत है। यह 30 मार्च 1949 को भारत का एक ऐसा प्रांत बना, जिसमें तत्कालीन राजपूताना की ताकतवर रियासतें विलीन हुईं । भरतपुर के जाट शासक ने भी अपनी रियासत के विलय राजस्थान में किया था। राजस्थान शब्द का अर्थ है: 'राजाओं का स्थान' क्योंकि यहां गुर्जर, राजपूत, मौर्य, जाट आदि ने पहले राज किया था। भारत के संवैधानिक-इतिहास में राजस्थान का निर्माण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी । ब्रिटिश शासकों द्वारा भारत को आजाद करने की घोषणा करने के बाद जब सत्ता-हस्तांतरण की कार्यवाही शुरू की, तभी लग गया था कि आजाद भारत का राजस्थान प्रांत बनना और राजपूताना के तत्कालीन हिस्से का भारत में विलय एक दूभर कार्य साबित हो सकता है। आजादी की घोषणा के साथ ही राजपूताना के देशी रियासतों के मुखियाओं में स्वतंत्र राज्य में भी अपनी सत्ता बरकरार रखने की होड़ सी मच गयी थी, उस समय वर्तमान राजस्थान की भौगालिक स्थिति के नजरिये से देखें तो राजपूताना के इस भूभाग में कुल बाईस देशी रियासतें थी। इनमें एक रियासत अजमेर मेरवाडा प्रांत को छोड़ कर शेष देशी रियासतों पर देशी राजा महाराजाओं का ही राज था। अजमेर-मेरवाडा प्रांत पर ब्रिटिश शासकों का कब्जा था; इस कारण यह तो सीघे ही स्वतंत्र भारत में आ जाती, मगर शेष इक्कीस रियासतों का विलय होना यानि एकीकरण कर 'राजस्थान' नामक प्रांत बनाया जाना था। सत्ता की होड़ के चलते यह बडा ही दूभर लग रहा था क्योंकि इन देशी रियासतों के शासक अपनी रियासतों के स्वतंत्र भारत में विलय को दूसरी प्राथमिकता के रूप में देख रहे थे। उनकी मांग थी कि वे सालों से खुद अपने राज्यों का शासन चलाते आ रहे हैं, उन्हें इसका दीर्घकालीन अनुभव है, इस कारण उनकी रियासत को 'स्वतंत्र राज्य' का दर्जा दे दिया जाए । करीब एक दशक की ऊहापोह के बीच 18 मार्च 1948 को शुरू हुई राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया कुल सात चरणों में एक नवंबर 1956 को पूरी हुई । इसमें भारत सरकार के तत्कालीन देशी रियासत और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और उनके सचिव वी॰ पी॰ मेनन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी । इनकी सूझबूझ से ही राजस्थान के वर्तमान स्वरुप का निर्माण हो सका। राजस्थान मे कुल 21 राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरते हैं।

भूगोल एवं राजस्थान का क्लिक करने योग्य मानचित्र[संपादित करें]

राजस्थान की आकृति लगभग पतङ्गाकार है। राज्य २३ ३ से ३० १२ अक्षांश और ६९ ३० से ७८ १७ देशान्तर के बीच स्थित है। इसके उत्तर में पाकिस्तान, पंजाब और हरियाणा, दक्षिण में मध्यप्रदेश और गुजरात, पूर्व में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश एवं पश्चिम में पाकिस्तान हैं ।

सिरोही से अलवर की ओर जाती हुई ४८० कि.मी. लम्बी अरावली पर्वत श्रृंखला प्राकृतिक दृष्टि से राज्य को दो भागों में विभाजित करती है। राजस्थान का पूर्वी सम्भाग शुरु से ही उपजाऊ रहा है। इस भाग में वर्षा का औसत ५० से.मी. से ९० से.मी. तक है। राजस्थान के निर्माण के पश्चात् चम्बल और माही नदी पर बड़े-बड़े बांध और विद्युत गृह बने हैं, जिनसे राजस्थान को सिंचाई और बिजली की सुविधाएं उपलब्ध हुई है। अन्य नदियों पर भी मध्यम श्रेणी के बांध बने हैं, जिनसे हजारों हैक्टर सिंचाई होती है। इस भाग में ताम्बा, जस्ता, अभ्रक, पन्ना, घीया पत्थर और अन्य खनिज पदार्थों के विशाल भण्डार पाये जाते हैं।

राज्य का पश्चिमी भाग देश के सबसे बड़े रेगिस्तान " थार" या 'थारपाकर' का भाग है। इस भाग में वर्षा का औसत १२ से.मी. से ३० से.मी. तक है। इस भाग में लूनी, बांड़ी आदि नदियां हैं, जो वर्षा के कुछ दिनों को छोड़कर प्राय: सूखी रहती हैं। देश की स्वतंत्रता से पूर्व बीकानेर राज्य गंगानहर द्वारा पंजाब की नदियों से पानी प्राप्त करता था। स्वतंत्रता के बाद राजस्थान इण्डस बेसिन से रावी और व्यास नदियों से ५२.६ प्रतिशत पानी का भागीदार बन गया। उक्त नदियों का पानी राजस्थान में लाने के लिए सन् १९५८ में 'राजस्थान नहर' (अब इंदिरा गांधी नहर) की विशाल परियोजना शुरु की गई। जोधपुर, बीकानेर, चूरू एवं बाड़मेर जिलों के नगर और कई गांवों को नहर से विभिन्न "लिफ्ट परियोजनाओं" से पहुंचाये गये पीने का पानी उपलब्ध होगा। इस प्रकार राजस्थान के रेFDगिस्तान का एक बड़ा भाग अन्तत: शस्य श्यामला भूमि में बदल जायेगा। सूरतगढ़ जैसे कई इलाको में यह नजारा देखा जा सकता है।

गंगा बेसिन की नदियों पर बनाई जाने वाली जल-विद्युत योजनाओं में भी राजस्थान भी भागीदार है। इसे इस समय भाखरा-नांगल और अन्य योजनाओं के कृषि एवं औद्योगिक विकास में भरपूर सहायता मिलती है। राजस्थान नहर परियोजना के अलावा इस भाग में जवाई नदी पर निर्मित एक बांध है, जिससे न केवल विस्तृत क्षेत्र में सिंचाई होती है, वरन् जोधपुर नगर को पेयजल भी प्राप्त होता है। यह सम्भाग अभी तक औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। पर उम्मीद है, इस क्षेत्र में ज्यो-ज्यों बिजली और पानी की सुविधाएं बढ़ती जायेंगी औद्योगिक विकास भी गति पकड़ लेगा। इस बाग में लिग्नाइट, फुलर्सअर्थ, टंगस्टन, बैण्टोनाइट, जिप्सम, संगमरमर आदि खनिज प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। जैसलमेर क्षेत्र में कच्चा तेल मिलने की अच्छी सम्भावनाएं हैं। हाल ही की खुदाई से पता चला है कि इस क्षेत्र में उच्च किस्म की प्राकृतिक गैस भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अब वह दिन दूर नहीं, जबकि राजस्थान का यह भाग भी समृद्धिशाली बन जाएगा।

राज्य का क्षेत्रफल ३.४२ लाख वर्ग कि.मी है जो भारत के कुल क्षेत्रफल का १०.४० प्रतिशत है। यह भारत का सबसे बड़ा राज्य है। वर्ष १९९६-९७ में राज्य में गांवों की संख्या ३७८८९ और नगरों तथा कस्बों की संख्या २२२ थी। राज्य में ३३ जिला परिषदें, २३५ पंचायत समितियां और ९१२५ ग्राम पंचायतें हैं। नगर निगम ४ और सभी श्रेणी की नगरपालिकाएं १८० हैं।

सन् १९९१ की जनगणना के अनुसार राज्य की जनसंख्या ४.३९ करोड़ थी। जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग कि.मी. १२६ है। इसमें पुरुषों की संख्या २.३० करोड़ और महिलाओं की संख्या २.०९ करोड़ थी। राज्य में दशक वृद्धि दर २८.४४ प्रतिशत थी, जबकि भारत में यह औसत दर २३.५६ प्रतिशत थी। राज्य में साक्षरता ३८.८१ प्रतिशत थी. जबकि भारत की साक्षरता तो केवल २०.८ प्रतिशत थी जो देश के अन्य राज्यों में सबसे कम थी (?????)। राज्य में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति राज्य की कुल जनसंख्या का क्रमश: १७.२९ प्रतिशत और १२.४४ प्रतिशत है।

जिले[संपादित करें]

राजस्थान में ३३ जिले हैं -अजमेर जिला, अलवर जिला, बांसवाड़ा जिला, बाराँ जिला, बाड़मेर जिला, भीलवाड़ा जिला, बीकानेर जिला, भरतपुर जिला, बूंदी जिला, चित्तौड़गढ़ जिला, चूरू जिला, दौसा जिला, धौलपुर जिला, डूंगरपुर जिला, गंगानगर जिला, हनुमानगढ़ जिला, जयपुर जिला, जैसलमेर जिला, जालौर जिला, झालावाड़ जिला, झुंझुनु जिला, जोधपुर जिला, करौली जिला, कोटा जिला, नागौर जिला, पाली जिला, प्रतापगढ़ जिला, राजस्थान, राजसमंद जिला, सवाई माधोपुर जिला, सीकर जिला, सिरोही जिला, टोंक जिला, उदयपुर जिला

राजस्थान की जलवायु[संपादित करें]

राजस्थान की जलवायु शुष्क से उप-आर्द्र मानसूनी जलवायु है। अरावली के पश्चिम में न्यून वर्षा,उच्च दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर,निम्न आर्द्रता तथा तीव्र हवाओं युक्त शुष्क जलवायु है। दूसरी ओर अरावली के पूर्व में अर्धशुष्क एवं उप-आर्द्र जलवायु है। अक्षांशीय स्थिति,समुद्र से दुरी,समुन्द्रतल से ऊंचाई,अरावली पर्वत श्रेणियों की स्थिति एवं दिशा,वनस्पति आवरण आदि यहाँ की जलवायु को प्रभवित करते है।

राजस्थान के प्रसिद्ध स्थल[संपादित करें]

  1. गुलाबी नगरी के रूप में प्रसिद्ध जयपुर राजस्थान राज्य की राजधानी है।
  2. जयपुर इसके भव्य किलों, महलों और सुंदर झीलों के लिए प्रसिद्ध है, जो विश्वभर से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
  3. सिटी पैलेस महाराजा जयसिंह (द्वितीय) द्वारा बनवाया गया था और मुगल औऱ राजस्थानी स्थापत्य का एक संयोजन है।
  4. महराजा सवाई प्रताप सिंह ने हवामहल 1799 ईसा में बनवाया और वास्तुकार लाल चन्द उस्ता थे ।
  5. आमेर दुर्ग में महलों, विशाल कक्षों, स्तंभदार दर्शक-दीर्घाओं, बगीचों और मंदिरों सहित कई भवन-समूह हैं।
  6. आमेर महल मुगल औऱ हिन्दू स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
  7. गवर्नमेण्ट सेन्ट्रल म्यूजियम 1876 में, जब प्रिंस ऑफ वेल्स ने भारत भ्रमण किया,सवाई रामसिंह द्वारा बनवाया गया था और 1886 में जनता के लिए खोला गया ।
  8. गवर्नमेण्ट सेन्ट्रल म्यूजियम में हाथीदांत कृतियों, वस्त्रों, आभूषणों, नक्काशीदार काष्ठ कृतियों, सूक्ष्म चित्रों संगमरमर प्रतिमाओं, शस्त्रों औऱ हथियारों का समृद्ध संग्रह है।
  9. सवाई जयसिंह (द्वितीय) ने अपनी सिसोदिया रानी के निवास के लिए 'सिसोदिया रानी का बाग' बनवाया।
  10. जलमहल, शाही बत्तख शिकार-गोष्ठियों के लिए बनाया गया, झील के बीच स्थित एक सुंदर महल है।
  11. 'कनक वृंदावन' जयपुर में एक लोकप्रिय विहार स्थल है।
  12. जयपुर के बाजार जीवंत हैं और दुकाने रंग बिरंगे सामानों से भरी है, जिसमें हथकरघा उत्पाद, बहुमूल्य पत्थर, वस्त्र, मीनाकारी सामान, आभूषण, राजस्थानी चित्र आदि शामिल हैं।
  13. जयपुर संगमरमर की प्रतिमाओं, ब्लू पॉटरी औऱ राजस्थानी जूतियों के लिए भी प्रसिद्ध है।
  14. जयपुर के प्रमुख बाजार, जहां से आप कुछ उपयोगी सामान खरीद सकते हैं, जौहरी बाजार, बापू बाजार, नेहरू बाजार, चौड़ा रास्ता, त्रिपोलिया बाजार और एम.आई. रोड़ के साथ साथ हैं।
  15. जयपुर शहर के भ्रमण का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च है।
  16. राजस्थान राज्य परिवहन निगम (RSRTC) की उत्तर भारत के सभी प्रसुख गंतव्यों के लिए बस सेवाएं हैं।
  17. वज्रांग मंदिर : जयपुर के निकट विराट नगर (पुराना नाम बैराठ ) नामक एक है. यह वही स्थान है जहाँ पांडवों ने अज्ञातवास किया था. यहीं पञ्चखंड पर्वत पर भारत का सबसे अनोखा और एकमात्र हनुमान मंदिर है जहाँ हनुमान जी की बिना बन्दर की मुखाकृति और बिना पूंछ वाली मूर्ति स्थापित है. इसका नाम वज्रांग मंदिर है और इसकी स्थापना अमर स्वतंत्रता सेनानी, यशश्वी लेखक महात्मा रामचन्द्र वीर ने की थी.

भरतपुर[संपादित करें]

  1. ‘पूर्वी राजस्थान का द्वार’ भरतपुर, भारत के पर्यटन मानचित्र में अपना महत्व रखता है।
  2. भारत के वर्तमान मानचित्र में एक प्रमुख पर्यटक गंतव्य, भरतपुर पांचवी सदी ईसा पूर्व से कई अवस्थाओं से गुजर चुका है।
  3. 18 वीं सदी का भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य, जो केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान के रूप में भी जाना जाता है।
  4. 18 वीं सदी का भरतपुर पक्षी अभयारण्य, जो केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान के रूप में भी जाना जाता है,संसार के सबसे महत्पूर्ण पक्षी प्रजनन और निवास के रूप में प्रसिद्ध है।
  5. लोहागढ़ आयरन फोर्ट के रूप में भी जाना जाता है, लोहागढ़ भरतपुर के प्रमुख ऐतिहासिक आकर्षणों में से एक है।
  6. भरतपुर संग्रहालय राजस्थान के विगत शाही वैभव के साथ शौर्यपूर्ण अतीत के साक्षात्कार का एक प्रमुख स्रोत है।
  7. एक सुंदर बगीचा, नेहरू पार्क, जो भरतपुर संग्रहालय के पास है।
  8. नेहरू पार्क- रंग बिरंगे फूलों और हरी घास के मैदान से भरा हुआ है, इसकी उत्कृष्ट सुंदरता पर्यटकों को आकर्षित करती है।
  9. डीग पैलेस एक मजबूत औऱ बहुत बड़ा राजमहल है, जो भरतपुर के शासकों के लिए ग्रीष्मकालीन आवास के रूप में कार्य करता था ।

जोधपुर[संपादित करें]

  1. राजस्थान राज्य के पश्चिमी भाग में केन्द्र में स्थित, जोधपुर शहर राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और दर्शनीय महलों, दुर्गों औऱ मंदिरों को प्रस्तुत करते हुए एक लोकप्रिय पर्यटक गंतव्य है।
  2. राजस्थान राज्य के पश्चिमी भाग केन्द्र में स्थित, जोधपुर शहर राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और दर्शनीय महलों, दुर्गों औऱ मंदिरों को प्रस्तुत करते हुए एक लोकप्रिय पर्यटक गंतव्य है।
  3. शहर की अर्थव्यस्था हथकरघा, वस्त्रों और कुछ धातु आधारित उद्योगों को शामिल करते हुए कई उद्योगों पर निर्भर करती है।
  4. रेगिस्तान के हृदय में स्थित, राजस्थान का यह शहर राजस्थान के अनन्त मुकुट का एक भव्य रत्न है।
  5. राठौंड़ों के रूप में प्रसिद्ध एक वंश के प्रमुख, राव जोधा ने मृतकों की भूमि कहलाये गये, जोधपुर की 1459 में स्थापना की।
  6. [मेहरानगढ़ दुर्ग], 125 मीटर की पर्वत चोटी पर स्थित औऱ 5 किमी के क्षेत्रफल में फैला हुआ, भारत के सबसे बड़े दुर्गों में से एक है।
  7. मेहरानगढ़ दुर्ग के अन्दर कई सुसज्जित महल जैसे [मोती महल], [फूल महल], [शीश महल] स्थित हैं।
  8. मेहरानगढ़ दुर्ग के अन्दर संग्रहालय में भी सूक्ष्म चित्रों, संगीत वाद्य यंत्रों, पोशाकों, शस्त्रागार आदि का एक समृद्ध संग्रह है। 36. मेहरानगढ़ दुर्ग के सात विक्रम जाजङा

शिक्षण संस्थान[संपादित करें]

  1. राजस्थान विश्वविद्यालय
  2. राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय
  3. राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय
  4. मोदी प्रौद्योगिकी तथा विज्ञान संस्थान,लक्ष्मणगढ़,सीकर जिला (मानद विश्‍वविद्यालय)
  5. वनस्थली विद्यापीठ (मानद विश्‍वविद्यालय),
  6. बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, पिलानी (मानद विश्‍वविद्यालय),
  7. आई. आई. एस. विश्‍वविद्यालय (मानद विश्‍वविद्यालय),
  8. जैन विश्‍व भारती विश्‍वविद्यालय (मानद विश्‍वविद्यालय),
  9. एलएनएम सूचना प्रौद्योगिकी संस्‍थान (मानद विश्‍वविद्यालय),
  10. मालवीय राष्‍ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान (मानद विश्‍वविद्यालय),
  11. मोहन लाल सुखाडिया विश्‍वविद्यालय,
  12. राष्‍ट्रीय विधि विश्‍वविद्यालय,
  13. राजस्‍थान कृषि विश्वविद्यालय,
  14. राजस्‍थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय,
  15. राजस्‍थान संस्‍कृत विश्वविद्यालय,
  16. बीकानेर विश्वविद्यालय,
  17. कोटा विश्वविद्यालय,

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Ramesh Chandra Majumdar (1977). "The History and Culture of the Indian People: The classical age". Bharatiya Vidya Bhavan. प॰ 153. 
  2. Mulatanasi?ha Verma (1984). "Desa, videsa me? Gurjara kya hai? tatha kya thhe?": Gurjara itihasa. Akhila Bharatiya Gurjara Samaja Sudharan Sabha. 
  3. Surjan Singh Shekhavat (1989). "Sekhavati pradesh ka pracheena itihaas". Sri Shardula Education ?ras?a. प॰ 94. 
  4. John Keay (2001). India: a history. Grove Press. प॰ 95. ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5. http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&pg=PA195&dq. 
  5. इम्पीरियल गजैटियर
  6. गोपीनाथ शर्मा / 'Social Life in Medivial Rajasthan' / पृष्ठ ३
  7. http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/rj185.htm राजस्थान : एक परिचय, डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

यह भी देखे[संपादित करें]