सवाई जयसिंह

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सवाई जयसिंह या द्वितीय जयसिंह (०३ नवम्बर, १६८८ - २१ सितम्बर, १७४३) अमेर या अंबेर के शासक थे। अम्बेर का नाम ही बाद में जयपुर पड़ा। अपने पिता महाराजा बिशन सिंह के देहान्त के बाद ११ वर्ष की अवस्था में वे गद्दी बैठे। औरंगजेब ने उन्हें 'सवाई' की उपाधि दी थी जिसका अर्थ है कि वे अपने समकालीन राजाओं से सवा-गुना अधिक शक्तिशाली थे।

परिचय[संपादित करें]

दिल्ली का दरबार लगा था, बादशाह औरंगजेब के दरबार में सम्मन देने के लिये सवाई जयसिंह हाजिर हुए थे, दरबार हाल में बडे बडे उमराव अमीर और सरदार अपनी अपनी हाजिरी दर्ज करवा रहे थे, राजा जयसिंह बादशाह से भेंट करने के लिये उठे, उन्होने अपना हाथ आगे बढाया, सहसा औरंगजेब को उनके पूर्वजों की शत्रुता याद आ गई, औरंगजेब क्रोध के मारे लाल हो चला, अपने सिंहासन से उठा, और हुंकारते हुए बोला, "आपके पूर्वजों ने हमारे पूर्वजों को काफ़ी सताया, और बहुत पुराने घाव दिये हैं, जो रह रह कर याद आते हैं, वे हमारे वफ़ादार नही रहे, "अब फ़रमाइये, हमारे से क्या उम्मीद लेकर आये हैं?", अचानक घटने वाली इस घटना से सभी अचम्भे मे पद गये, राजा जय सिंह भी विमूढ हो गये, तमाम दरबारी राजा जय सिह और औरंगजेब की तरफ़ किसी बडी आशंका से देख रहे थे, राजा जय सिंह बहुत ही चतुर खिलाडी थे, उन्होने दरबारियों की तरफ़ देखा और और औरंगजेब की तरफ़ देखा, अपनी हिमत बटोर कर खुद को जबाब देने के लिये तैयार किया, इसी बीच औरंगजेब ने गरजते हुए पूंछा "आपके इन बाजुओं का क्या किया जाये?ये अब हमारा क्या बिगाड सकते हैं?, "फ़ौरन जबाब दीजिये !, चतुर और विद्वान राजा जयसिंह के होथों पर मुस्कान दौड गई, निहायत शांत स्वर से बोले, " आलमपनाह !, हमारे यहां शादी पर एक रिवाज है, दूल्हा और दुल्हन, आपस में एक दूसरे का हाथ लेकर, प्रतिज्ञा करते हैं, कि दूल्हा दुल्हन का हाथ जिन्दगी भर नही छोडेगा, "और उम्र भर रक्षा करेगा, और आज बादशाह सलामत खुद मेरा हाथ अपने हाथ मे ले चुके हैं, फ़िर मुझे किस बात का डर है ?, "आपके ये हाथ जीवन भर मेरी रक्षा करेंगे", फ़िर मुझे दूसरे हाथों की क्या जरूरत है?" औरंगजेब को इस चतुराई भरे जबाब की कतई उम्मीद नही थी, लेकिन जबाब सुन कर वह बहुत प्रभावित हुआ, और खुश होकर बोला, "आप अपने पुरखों से ज्यादा चतुर, योग्य और हाजिर जबाब हैं, हम आपको "सवाई" की पदवी से विभूषित करते हैं, और उसी दिन से राजा जय सिंह सवाई अर्थात आम आदमी की काबिलियत से चौथाई अधिक काबिलियत वाले कहलाये। सवाई जय सिह एक कुशल राजनेता थे, उनका संस्कॄत, मराठी, तुर्की, फ़ारसी, अरबी, आदि कई भाषाओं पर अच्छी पकड थी। गणित, और ज्योतिष में उन्होने विदेशी पद्धति को अपनाया था। जर्मनी से ज्योतिषी पादरी बुलाया, वे इंजीनियरिंग को भी प्रोत्साहन दिया करते थे। कहना न होगा कि इसी राजा ने पिंक सिटी को बसाया, ईसवी सन ७२७ में में इसकी नींव रखी गई, यह नगर भारत का पहला योजनाबद्ध शहर है। इस योजना को मूलरूप दिया सवाई जय सिह के अभिन्न सहयोगी वास्तुविद विद्यासागर चक्रवर्ती ने. जयपुर के चारों ओर बीस फ़ुट ऊंची और नौ फ़ीट चौडी चार दीवार हुआ करती थी, कालन्तर में शहर के विकास को ध्यान में रख कर इसे जगह जगह से तोडा गया, वैसे इस विलक्षण गुलाबी नगरी के विकास में कई राजाओं का योगदान रहा, लेकिन इसी सन्दर्भ में सवाई रामसिंह, सवाई प्रताप सिंह, और सवाई मानसिंह द्वितीय, के अलावा दीवान मिर्जाइस्माइल का नाम भी उल्लेखनीय है। कलाप्रिय राजा सवाई रामसिंह ने इस नगर विषिष्टता और सुन्दरता प्रदान करने के लिहाज से सभी मकानोम, बाजारों, को गुलाबी रंग से पुतवा दिया, तभी से इसे भारत का पेरिस और पिंक सिटी के नाम से कहा जाने लगा।

जयपुर की पॄष्ठभूमि[संपादित करें]

दक्षिण के अलावा जयपुर तीनो तरफ़ से पहाडियों से घिरा हुआ है, हम देख सकते हैं, जयपुर के उत्तर पश्चिम मे एक पहाडी है, जिस पर एक सुन्दर किला है, यह नाहर गढ का किला कहलाता है, इसे सवाई जयसिंह ने १७३४ ईसवी में मराठों के आक्रमण से बचाया था, इस किले की नक्कासी उच्च कोटि की है, मन्दिर कक्ष है, कलात्मक खम्भे देखते ही बनते है। इसी में भयानक तहखाने हैं, बाद में तहखाने बन्दी गॄह के रूप मे प्रयोग होने लगे। इनके बारे में ढेरों किम्बदन्तियां प्रचलित हैं, जयपुर की नूरजहाँ रस कपूर को इसी किले के तहखाने में बन्द करके खत्म कर दिया गया था। किले की तलहटी में कुछ राजाओं की छतरियां भी बनी हुई हैं, हालांकि अब इनकी दुर्दशा होने लगी है, और कोई भी शासक इन पर ध्यान नही दे रहा है,

रामनिवास बाग[संपादित करें]

रामनिवास बाग की हरियाली मन को मोह लेती है, इस बाग में चिडियाघर और प्राचीन संग्रहालय भी है, पुरानी राजशाही के सिक्के, मूर्तियां पोशाकें इस संग्रहालय मे देखने को रखी गई हैं, बाग से सवाई मानसिंह हाईवे से सीधी सडक त्रिपोलिया जाती है, जहां राजमहल है, ऊंची सरगासूली है, राजमहल के कई स्थानो मे दीवाने आम का अपना महत्व है, इसका मुख्य पूर्वी द्वार सिरेह की ड्योढी कहलाती है, जलेब चौक के पास जहां पहले महाराजा के निजी दफ़्तर थे, मुबारक महल है, जिसे महाराजा माधो सिंह ने बनवाया था, इसकी संगमरमर की कला देखते ही बनती है, दीवने खास और दीवाने आम अपनी नयनाभिराम संगमरमरी कला के लिये मशहूर हैं, वहां हमे पत्थर की जाली दिखाई पडेगी, जिसे कलात्मक रूप से काट कर बनाया गया है, जो राजघराने की रानियों के लिये बाहर देखने के काम में लाई जाती थी, इसके चित्राकर्षक खम्भे जयपुर चित्रकला की परंपरा को दर्शाते हैं। यहां पत्थर प सोने चांदी का काम अपनी सजावट के रूप को और बिखेरता है, यहां से आगे दीवाने खास और चन्द्रमहल है।

जयपुर के ज्योतिषीय यंत्रागार[संपादित करें]

चन्द्रमहल के उत्तर में गोविन्ददेवजी का मन्दिर है, दुनिया में जंतर मंतर के नाम से मशहूर विशाल वेधशाला भी यहीं मौजूद है, जिसे ज्योतिष के विद्वान सवाई जयसिह ने बनवाया था, पत्थर के विशाल यंत्र और समरकंद के राजा उलूमबेग, पुर्तगाल के ज्योतिषी मेन्युल, और तुर्की ज्योतिषी के बनाये गये यंत्रों से इस ज्योतिष शास्त्र के नये प्रतिमानों की खोज की गई, सवाई जयसिह का योगदान कभी नही भुलाया जा सकता है, यंत्र के ऊपर चढकर आप देखेंगे, तो एक सवाल मन में पैदा होगा, पता चलेगा कि आदमी चन्द्रमा की ओर पहुंचने का कितने सालों से प्रयत्न कर रह अथा, ग्रह और उपग्रह के इतिहास में महाराजा जयसिह की बनाई इन वेधशाला का नाम स्वर्णाक्षरों से लिखा रहेगा। न कोई पंखा, और न कोई ए। सी। , और न ही कोई कूलर, फ़िर भी गर्मी के अन्दर वातावण को बदल कर तापमान को नियन्त्रित करने का एक वास्तु कला का अनौखा यंत्र हवामहल जिसकी ६०० खिडकियों के द्वारा गुलाबी छटा का मनमोहक सौन्दर्य देखने का सौभाग्य महाराजा सवाई जय्सिह ने दिया था, इस हवामहल का निर्माण ईसवी सन १७९९ में किया गया था।

आमेर[संपादित करें]

जयपुर की बसावट का वर्णन करें और आमेर की चर्चा न करें तो जयपुर के बारे में बात अधूरी ही मानी जायेगी, पुराना नाम "आम्बेर" जयपुर नगर से छ: मील दूर है। कछवाहा वंश की पुरानी राजधानी है, अरावली की एक सुन्दर सी टुकडी पर इसे राजा सवाई मानसिंह ने बनवाया था, और पूरा निर्माण नही होने के कारण इसे सवाई जयसिह ने पूरा किया था। इसका मुख्य द्वार गणेशपोल है। इस पोल की नक्कासी और अदभुत कला को देखकर यहां की कारीगरी से जहांगीर इस कदर जल गया था, कि इन पर प्लास्टर करवा दिया था, दीवान मिर्जा इस्माइल की महत्वाकांक्षी परियोजना में खास थी, मिर्जा इस्माइल रोड, जहां गुलाबी नगरी की धडकने बसतीं हैं।