रणथंभोर दुर्ग

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

रणथंभोर दुर्ग दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग के सवाई माधोपुर रेल्वे स्टेशन से १३ कि.मी. दूर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच समुद्रतल से ४८१ मीटर ऊंचाई पर १२ कि.मी. की परिधि में बना है। दुर्ग के तीनो और पहाडों में प्राकृतिक खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है।

परिचय[संपादित करें]

किले से संबंधित प्रमुख ऐतिहासिक स्थानों में नौलखा दरवाजा, हाथीपोल, गणेशपोल, सुरजपोल और त्रिपोलिया प्रमुख प्रवेश द्वार है। त्रिपोलिया अंधेरी दरवाजा भी कहलाता है। इसके पास से एक सुरंग महलों तक गई है। किले तक पहुँचने के लिए कई उतार-चढाव, संकरे व फिसलन वाले रास्ते तय करने के साथ नौलखा, हाथीपोल, गणेशपोल और त्रिपोलिया द्वार पार करना पड़ता है। इस किले में हम्मीर महल, सुपारी महल, हम्मीर कचहरी, बादल महल, जबरा-भंवरा, ३२ खम्बों की छतरी, रनिहाड़ तालाब, महादेव की छतरी, गणेश मंदिर, चामुंडा मंदिर, ब्रह्मा मंदिर, शिव मंदिर, जैन मंदिर, पीर सहरुद्दीन की दरगाह, सामंतो की हवेलियाँ तत्कालीन स्थापत्य कला के अनूठे प्रतीक है। राणा सांगा की रानी कर्मवती द्वारा शुरू की गई अधूरी छतरी भी दर्शनीय है। दुर्ग का मुख्य आकर्षण हम्मीर महल है जो देश के सबसे प्राचीन राजप्रसादों में से एक है स्थापत्य के नाम पर यह दुर्ग भी भग्न-समृधि की भग्न-स्थली है।

निर्माण काल[संपादित करें]

इस किले का निर्माण कब हुआ कहा नहीं जा सकता लेकिन ज्यादातर इतिहासकार इस दुर्ग का निर्माण चौहान राजा रणथंबन देव द्वारा ९४४ में निर्मित मानते है, इस किले का अधिकांश निर्माण कार्य चौहान राजाओं के शासन काल में ही हुआ है। दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समय भी यह किला मौजूद था और चौहानों के ही नियंत्रण में था।

शासक[संपादित करें]

११९२ में तहराइन के युद्ध में मुहम्मद गौरी से हारने के बाद दिल्ली की सत्ता पर पृथ्वीराज चौहान का अंत हो गया और उनके पुत्र गोविन्द राज ने रणथंभोर को अपनी राजधानी बनाया। गोविन्द राज के अलावा वाल्हण देव, प्रहलादन, वीरनारायण, वाग्भट्ट, नाहर देव, जैमेत्र सिंह, हम्मीरदेव, महाराणा कुम्भा, राणा सांगा, शेरशाह सुरी, अल्लाऊदीन खिलजी, राव सुरजन हाड़ा और मुगलों के अलावा आमेर के राजाओं आदि का समय-समय पर नियंत्रण रहा लेकिन इस दुर्ग की सबसे ज्यादा ख्याति हम्मीर देव(1282-1301) के शासन काल मे रही | हम्मीरदेव का 19 वर्षो का शासन इस दुर्ग का स्वर्णिम युग था। हम्मीरदेव ने 17 युद्ध किए जिनमे13 युद्धो मे उसे विजय श्री मिली। करीब एक शताब्दी तक ये दुर्ग चितौड़ के महराणाओ के अधिकार मे भी रहा। खानवा युद्ध मे घायल राणा सांगा को इलाज के लिए इसी दुर्ग मे लाया गया था।

आक्रमण[संपादित करें]

अकबर राय सुरजन हाडा के खिलाफ रणथम्भौर किले पर हमले का निर्देशन

रणथंभोर दुर्ग पर आक्रमणों की भी लम्बी दास्तान रही है जिसकी शुरुआत दिल्ली के कुतुबुद्दीन ऐबक से हुई और मुगल बादशाह अकबर तक चलती रही | मुहम्मद गौरी व चौहानो के मध्य इस दुर्ग की प्रभुसत्ता के लिये 1209 मे युद्ध हुआ | इसके बाद 1226 मे इल्तुतमीश ने, 1236 मे रजिया सुल्तान ने, 1248-58 मे बलबन ने, 1290-1292 मे जलालुद्दीन खिल्जी ने, 1301 मे अलाऊद्दीन खिलजी ने, 1325 मे फ़िरोजशाह तुगलक ने, 1489 मे मालवा के मुहम्म्द खिलजी ने, 1429 मे महाराणा कुम्भा ने, 1530 मे गुजरात के बहादुर शाह ने, 1543 मे शेरशाह सुरी ने आक्रमण किये | 1569 मे इस दुर्ग पर दिल्ली के बादशाह अकबर ने आक्रमण कर आमेर के राजाओ के माध्यम से तत्कालीन शासक राव सुरजन हाड़ा से सन्धि कर ली |

वर्तमान[संपादित करें]

कई ऐतिहासिक घटनाओं व हम्मीरदेव चौहान के हठ और शौर्य के प्रतीक इस दुर्ग का जीर्णोद्दार जयपुर के राजा प्रथ्वी सिंह और सवाई जगत सिंह ने कराया और महाराजा मान सिंह ने इस दुर्ग को शिकारगाह के रुप मे परिवर्तित कराया | आजादी के बाद यह दुर्ग सरकार के अधीन हो गया जो 1964 के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियंत्रण मे है |