शेर शाह सूरी

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शेर शाह सूरी
उत्तर भारत का सम्राट
Shershah.jpg
शासन 1540–1545
राज तिलक 1540
जन्म 1472
जन्म स्थान सासाराम, रोहतास ज़िला, भारत
मृत्यु २२ मई, १५४५
मृत्यु स्थान कलिंजर, बुन्देलखण्ड
समाधी शेर शाह का मक़बरा
पूर्वाधिकारी हुमायूँ
उत्तराधिकारी इस्लाम शाह सूरी
जीवन संगी रानी
संतान इस्लाम शाह सूरी
राज घराना सूरी साम्राज्य
पिता मियन हसन खान सूर
धर्म इस्लाम

शेरशाह सूरी का वास्तविक नाम फरीद खाँ था। वह वैजवाड़ा (होशियारपुर १४७२ ई. में) में अपने पिता हसन की अफगान पत्‍नी से उत्पन्न पुत्र था। उसका पिता हसन बिहार के सासाराम का जमींदार था। दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी ने उसे एक शेर मारने के उपलक्ष्य में शेर खाँ की उपाधि से सुशोभित किया और अपने पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक नियुक्‍त किया। बहार खाँ लोहानी की मृत्यु के बाद शेर खाँ ने उसकी बेगम दूदू बेगम से विवाह कर लिया और वह दक्षिण बिहार का शासक बन गया। इस अवधि में उसने योग्य और विश्‍वासपात्र अफगानों की भर्ती की। १५२९ ई. में बंगाल शासक नुसरतशाह को पराजित करने के बाद शेर खाँ ने हजरत आली की उपाधि ग्रहण की। १५३० ई. में उसने चुनार के किलेदार ताज खाँ की विधवा लाडमलिका से विवाह करके चुनार के किले पर अधिकार कर लिया।

१५३४ ई. में शेर खाँ ने सुरजमठ के युद्ध में बंगाल शासक महमूद शाह को पराजित कर १३ लाख दीनार देने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार शेरशाह ने अपने प्रारम्भिक अभियान में दिल्ली, आगरा, बंगाल, बिहार तथा पंजाब पर अधिकार कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। १५३९ ई. में चौसा के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर शेर खाँ ने शेरशाह की अवधारणा की। १५४० ई. में शेरशाह ने हुमायूँ को पुनः हराकर राजसिंहासन प्राप्त किया। उत्तर बिहार में पहले से ही हाकिम मखदूग आलम शासन कर रहा था। नुसरतशाह ने दक्षिण बिहार पर प्रभाव स्थापित करने के लालच में कुत्य खाँ के साथ एक सेना भेजी, परन्तु शेर खाँ ने उसे पराजित कर दिया। शेर खाँ धीरे-धीरे सर्वाधिक शक्‍तिशाली अफगान नेता बन गया।

शेरशाह का राज्याभिषेक[संपादित करें]

शेरशाह कन्‍नौज युद्ध की विजय के बाद वह कन्नौज में ही रहा और शुजात खाँ को ग्वालियर विजय के लिए भेजा । वर्यजीद गुर को हुमायूँ को बन्दी बनाकर लाने के लिए भेजा । नसीर खाँ नुहानी को दिल्ली तथा सम्बलपुर का भार सौंप दिया ।

अन्ततः शेरशाह का १० जून, १५४० को आगरा में विधिवत्‌राज्याभिषेक हुआ । उसके बाद १५४० ई. में लाहौर पर अधिकार कर लिया । बाद में ख्वास खाँ और हैबत खाँ ने पूरे पंजाब पर अधिकार कर लिया । फलतः शेरशाह ने भारत में पुनः द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की । इतिहास में इसे सूरवंश के नाम से जाना जाता है । सिंहासन पर बैठते समय शेरशाह ६८ वर्ष का हो चुका था और ५ वर्ष तक शासन सम्भालने के बाद मई १५४५ ई. में उसकी मृत्यु हो गई ।


नूहानी सरदारों ने उनकी हत्या के लिए असफल कोशिश की और जब शेर खाँ ने उनको नुसरतशाह के विरुद्ध युद्ध कर दिया और पराजित कर दिया। इस विजय ने बंगाल के सुल्तान की महत्वाकांक्षी योजना को विफल कर दिया। बाबर के समय शेर खाँ हमेशा अधीनता का प्रदर्शन करता रहा था परन्तु हुमायूँ के समय में अपना रुख बदलकर चुनार गढ़ को लेकर प्रथम बार चुनार लेने की चेष्टा की तब उसे महमूद लोदी के प्रत्याक्रमण के कारण वहाँ से जाना पड़ा। उसने हिन्दूबेग को सेना भेजकर शेर खाँ ने दुर्ग देने से साफ इनकार कर दिया। फलतः एक युद्ध हुआ।

द्वितीय अफगान साम्राज्य[संपादित करें]

शेरशाह ने उत्तरी भारत (बिहार) में सूर वंश तथा द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की थी । इस स्थापना में उसने अनेकों प्रतिशोध एवं युद्धों को लड़ा ।

पश्‍चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा- शेरशाह ने सर्वप्रथम पश्‍चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। उसने मुगलों के प्रभाव को पूर्णतः समाप्त कर दिया । मुगलों पर विशेष नजर रखने के लिए एक गढ़ बनवया जिसका निर्माण टोडरमल और हैबत खाँ नियाजी की अध्यक्षता में करवाया गया और इस्लामशाह के काल में पूरा हुआ । हुमायूँ का पीछा करते हुए शेरशाह मुल्तान तक गया वहाँ बलूची सरदारों ने भी उसको सम्राट मानकर अधीनता स्वीकार की । मुल्तान के लिए पृथक्‌हाकिम नियुक्‍त किया गया । निपुण सेनानायकों मसलन हैबत खाँ नियाजी, ख्वास खाँ, राय हुसैन जलवानी आदि की नियुक्‍ति की । उसे ३० हजार सेना रखने की अनुमति दे दी ।

मालवा पर अधिकार- मारवाड़ में मालदेव शासन कर रहा था । शेरशाह के भय से हुमायूँ मालदेव की शरण में गया । शेरशाह ने हुमायूँ को बन्दी बनाकर सौंप देने का सम्वाद भेजा लेकिन मालदेव ने ऐसा नहीं किया ।

फलतः शेरशाह ने अप्रसन्‍न होकर १५४२ ई. में मालवा पर आक्रमण कर दिया । राजपूत सामन्तों ने शेरशाह का पूरी बहादुरी के साथ मुकाबला किया लेकिन शेरशाह की सेना के सामने टिक नहीं सके फलतः १५४३ ई. तक विजय प्राप्त की । इस दौरान पूरनमल ने भी अधीनता स्वीकार कर ली ।

इस युद्ध में राजपूतों की वीरता देखकर शेरशाह ने अपने उद्‍गार प्रकट किए थे- मैंने मुट्ठी भर बाजरे के लिए (इस प्रदेश की मुख्य फसल थी) लगभग अपना साम्राज्य ही खो दिया था । बाद में सारंगपुर में कादिरशाह ने अधीनता स्वीकार कर ली । इस प्रकार मांडू और सतवास पर शेरशाह का अधिकार हो गया ।

शेरशाह ने शुजात खाँ को रूपवास में, दरिया खाँ को उज्जैन में, आलम खाँ को सारंगपुर में, पूरनमल को रायसीन में तथा मिलसा को चन्देरी में नियुक्‍त किया । शेरशाह ने बाद में शुजात खाँ को सम्पूर्ण मालवा का हाकिम नियुक्‍त किया और १२ हजार सैनिक रखने की अनुमति दे दी ।

रणथम्भौर पर अधिकार[संपादित करें]

शेरशाह १५४३ ई. में रणथम्भौर होता हुआ आया, फलतः वहाँ के हाकिम ने अपनागढ़ पर उनकी अधीनता स्वीकार की । शेरशाह ने अपने बड़े पुत्र आदित्य को वहाँ का हाकिम नियुक्‍त किया ।

रायसीन पर अधिकार- पूरनमल के विरुद्ध शेरशाह ने कट्टरपंथियों व उलेमाओं की बात में आकर कार्यवाही की । उसने अपने किये वायदे को तोड़ा । स्वयं जाँच करने पर सही पाया फलतः पूरनमल अपने सम्मान को बचाते हुए स्वयं लड़ते हुए मारा गया ।

शेरशाह ने सम्राट बनने से पूर्व विभिन्‍न स्थानों पर अपनी सुविधा और फायदे को ध्यान में रखकर विश्‍वासघात किया था । पूरनमल को एक सम्राट की हैसियत से आश्‍वासन देकर खुले मैदान में हराने में सक्षम होते हुए भी उलेमा की राय का बहाना बनाकर जो विश्‍वासघात किया वह उसके यश को सदा के लिए कलंकित करता रहेगा । फलतः बिना किसी हानि के राजपूतों का नाश हुआ और मिलसा, रायसीन तथा चंदेरी पर शेरशाह का अधिकार हो गया ।

कालिंजर युद्ध[संपादित करें]

यह शेरशाह का अन्तिम युद्ध था । यह युद्ध चंदेल राजपूतों के साथ हुआ । भाटा के राजा वीरभानु ने हुमायूँ की सहायता की थी, जिससे शेरशाह ने एक दूत वीरभानु के पास भेज दिया । वीरभानु डरकर कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की शरण में चला गया । शेरशाह ने कीर्तिसिंह से वीरभानु की माँग की जिसे उसने अस्वीकार कर दिया । फलतः शेरशाह ८०,००० घुड़सवार, २,००० हाथी और अनेक तोपों के साथ कालिंजर पर आक्रमण कर दिया । उसने अपने बेटे आदित्य खाँ को आदेश दिया कि वह रणथम्भौर, अजमेर, बयाना और निकटवर्ती प्रदेश पर कड़ी नजर रखे । पटना स्थित जलाल खाँ को आज्ञा भेजी कि वह पूरब की ओर से बघेल चन्देल राज्य को घेर ले । यह व्यवस्था करके उसने कालिंजर का घेरा डाला । कीर्तिसिंह और शेरशाह के साथ छः माह तक युद्ध चलता रहा । बड़ी तोपों के लिए सबाते और सरकोव (ऊँचे खम्भे) बनाये गये और उसके ऊपर से किले की दीवार पर गोलीबारी प्रारम्भ की गई । एक दिन शेरशाह अपने सैनिकों का निरीक्षण कर रहा था, उसने देखा कि जलाल खाँ जलवानी हुक्‍के (हुक्‍के-एक प्रकार के अग्निबाण, जो हाथ से फेंके जाते थे) तैयार कराये हैं और उसका प्रयोग करके दुर्ग के भीतर संकट उपस्थित करने की योजना बनाई है । शेरशाह ने स्वयं हुक्‍कों को फेंकना शुरू कर दिया । एक हुक्‍का किले की बाहरी दीवार से टकराकर उस ढेर पर आ गिरा जहाँ शेरशाह खड़ा था, तुरन्त एक भीषण ज्वाला प्रज्वलित हो उठी और शेरशाह बुरी तरह जल गया । शेरशाह की हालत बिगड़ने लगी और उनके सैनिक और सेनापति पास आकर दुःख प्रकट करने लगे ।

शेरशाह ने कहा कि यदि वे उसके जीवित रहते गढ़ पर अधिकार कर लें तो वह शान्ति से प्राण छोड़ सकेगा । फलतः भीषणता से आक्रमण कर दुर्ग पर शेरशाह का अधिकार हो गया । जीत की सूचना पाकर वह मई १५४५ ई. में मर गया ।

शेरशाह ने अपने अल्पकालीन शासनकाल में अनेक सार्वजनिक कार्य किये जो निम्न हैं-

शासन सुधार[संपादित करें]

शेरशाह ने एक जनहितकारी शासन प्रणाली की स्थापना की । शासन को सुविधाजनक प्रबन्ध के लिए सारा साम्राज्य को ४७ भागों में बाँट दिया, जिसे प्रान्त कहा जाता है । प्रत्येक प्रान्त में एक फौजदार था जो सूबेदार होता था । प्रत्येक प्रान्त सरकार, परगनों तथा गाँव परगने में बँटे थे । सरकार में प्रमुख अधिकारी होते थे-शिकदार-ए-शिकदारा तथा मुन्सिफ-ए-मुन्सिफा । प्रथम सैन्य अधिकारी होता था, जबकि दूसरा दीवानी मुकदमों का फैसला देता था ।

शेरशाह के प्रशासनिक सुधार में महत्वपूर्ण स्थानों पर मजबूत किलों का निर्माण शामिल था । बिहार में रोहतास का किला निर्माण कर सुरेमान करारानी को बिहार का सुल्तान नियुक्‍त किया ।

ऐसा माना जाता है कि शेरशाह बंगाल पर अधिकार करने के बाद वह बिहार में पटना आया । एक दिन वह गंगा किनारे पर खड़ा था तो उसे यह जगह सामरिक महत्व की ओर ध्यान गया, उसने एक किले का निर्माण कराया । मौर्यों के पतन के बाद पटना पुनः प्रान्तीय राजधानी बनी, अतः आधुनिक पटना को शेरशाह द्वारा बसाया माना जाता है ।

भूमि व्यवस्था[संपादित करें]

शेरशाह द्वारा भूमि व्यवस्था अत्यन्त ही उत्कृष्ट था । उसके शासनकाल के भू-विशेषज्ञ टोडरमल खत्री था ।

शेरशाह ने भूमि सुधार के लिए अनेक कार्य किए । भूमि की नाप कराई, भूमि को बीघों में बाँटा, उपज का १/३ भाग भूमिकर के लिए निर्धारित किया, अनाज एवं नकद दोनों रू में लेने की प्रणाली विकसित कराई । पट्टे पर मालगुजारी लिखने की व्यवस्था की गई । किसानों की सुविधा दी गई कि वह भूमिकर स्वयं राजकोष में जमा कर सकता था ।

सैन्य व्यवस्था[संपादित करें]

शेरशाह ने एक सशक्‍त एवं अनुशासित सैन्य व्यवस्था का गठन किया । सेना में लड़ाकू एवं निपुण अफगानों एवं राजपूतों को भर्ती किया, लेकिन ज्यादा से ज्यादा अफगान ही थे । सेना का प्रत्येक भाग एक फौजदार के अधीन कर दिया गया । शेरशाह ने घोड़ा दागने की प्रथा शुरू थी । उसके पास डेढ़ लाख घुड़सवार, २५ हजार पैदल सेना थी । वह सैनिकों के प्रति नम्र लेकिन अनुशासन भंग करने वाले को कठोर दण्ड दिया करता था ।

न्याय व्यवस्था[संपादित करें]

शेरशाह की न्यासी व्यवस्था अत्यन्त सुव्यवस्थित थी । शेरशाह के शासनकाल में माल और दीवानी के स्थानीय मामले की सुनवाई के लिए दौरा करने वाले मुंसिफ नियुक्‍त किये गये । प्रधान नगरों के काजियों के अलावा सरकार में एक प्रधान मुंसिफ भी रहता था जिसे अपील सुनने तथा मुंसिफों के कार्यों के निरीक्षण करने का अधिकार था ।

शेरशाह ने पुलिस एवं खुफिया विभाग की स्थापना की । शान्ति व्यवस्था के लिए शिकों में प्रधान शिकदार, परगनों में शिकदार तथा गाँवों में पटवारी थे । षड्‍यन्त्रों का पता लगाने के लिए खूफिया विभाग था ।

साहित्य, कला, एवं सांस्कृतिक भवन- शेरशाह के शासन काल में साहित्य, कला एवं सांस्कृतिक भवनों का संरक्षण एवं निर्माण हुआ । इसी के शासनकाल में मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्‍मावत की रचना की । इसके शासनकाल में महदवी नेता शेख अलाई का शिक्षा विचार उल्लेखनीय है । इसके दरबार में अनेक प्रसिद्ध विद्वान मीर सैयद, मंझन, खान मोहम्मद, फरयूली और मुसान थे । इनके शासन में फारसी तथा हिन्दी का पूर्ण विकास हुआ ।

उसने अनेकों भवनों जिसमें रोहतासगढ़, सहरसा का दुर्ग प्रसिद्ध दुर्ग हैं । इस प्रकार शेरशाह ने अल्प अवधि में बंगाल से सिंह तक जाने वाली ५०० कोस लम्बी ग्रांड ट्रंक सड़क का निर्माण किया । आगरा से बुहारनपुर तक, आगरा से बयाना, मारवाड़, चित्तौड़ तक एवं लाहौर से मुल्तान तक ये उपर्युक्‍त चार सड़कों का निर्माण किया । शेरशाह ने अनेक सरायों (लगभग १,७००) का निर्माण किया । सरायों की देखभाल शिकदार करता था ।

शेरशाह के उत्तराधिकारी[संपादित करें]

शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका योग्य एवं चरित्रवान पुत्र जलाल खाँ गद्दी पर बैठा, लेकिन अपने बड़े भाई आदिल खाँ के रहते सम्राट बनना स्वीकार नहीं किया था । उसने अमीरों व सरदारों के विशेष आग्रह पर राजपद ग्रहण किया । गद्दी पर बैठते ही अपना नाम इस्लामशाह धारण किया और उसने आठ वर्षों तक शासन किया । इस्लामशाह के समय विद्रोह और षड्‍यन्त्र का दौर चला । उनकी हत्या के लिए अनेक बार प्रयास किया गया, लेकिन इस्लामशाह ने धीरे-धीरे लगभग सभी पुराने विश्‍वासी सेनापतियों, हाकिमों व अधिकारियों आदि जो सन्देह के घेरे में आते गये उनकी हत्या करवा दी । सुल्तान के षड्‍यन्त्र में एकमात्र रिश्तेदार शाला को छोड़ा गया ।

मुगलों के आक्रमण के भय से (१५५२-५३ ई.) वह रोगशय्या से उठकर तीन हजार सैनिकों के साथ लड़ाई के लिए चल पड़ा । यह खबर पाकर मुगल सेना भाग खड़ी हुई । हुमायूँ के लौट जाने पर इस्लामशाह ग्वालियर (उपराजधानी) में लौट आया । अन्ततः १५५३ ई. में उसकी मृत्यु हो गई ।

इस्लामशाह के बाद उसका पुत्र फिरोजशाह गद्दी पर आसीन हुआ । उसके अभिषेक के दो दिन बाद ही उसके मामा मुवारिज खाँ ने उसकी हत्या कर दी और वह स्वयं मुहम्मद शाह आदिल नाम से गद्दी पर बैठ गया लेकिन आदिल के चचेरे भाई इब्राहिम खाँ सूर ने विद्रोह कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा । इसके बाद उसका भाई सिकन्दर सूर दिल्ली का शासक बना । सूरवंशीय शासक के रूप में सिकन्दर सूर दिल्ली के शासक बनने के बाद उसे मुगलों (हुमायूँ) के आक्रमण का भय था ।

१५४५ ई. हुमायूँ ने ईरान शाह की सहायता से काबुल तथा कन्धार पर अधिकार कर लिया । १५५५ ई. में लाहौर को जीता । १५ मई, १५५५ में मच्छीवाड़ा युद्ध में सम्पूर्ण पंजाब पर अधिकार कर लिया । २२ जून, १५५५ के सरहिन्द युद्ध में अफगानों (सिकन्दर सूर) पर निर्णायक विजय प्राप्त कर हुमायूँ ने भारत के राजसिंहासन को प्राप्त किया तथा २३ जुलाई, १५५५ को भारत का सम्राट बना लेकिन १५५६ ई. में उसकी मृत्यु हो गई । इससे पहले उसने १५ वर्षीय सूर वंश को समाप्त कर दिया ।

राजनीतिक जीवन[संपादित करें]

विस्तार एवं फतहें[संपादित करें]

The mausoleum of Sher Shah Suri in Sasaram, Bihar

शेर ख़ान बंगाल, मालवा, रायसेन, सिंध और मुल्तान को हराकर एवं अपने अधीन कर अपनी रियासत का विस्तार करता रहा। रायसेन के युद्ध शेर ख़ान ने राजपूत राजा पूरनमल के किले पर आक्रमण किया। पूरनमल को जब यह लगा कि अपने किले को बचाना काफी मुश्किल होगा तो उसने शेर ख़ान के सामने एक शर्त पर आत्मसमर्पण किया कि उसे, उसकी सेना एवं उनके परिवार को नहीं छेड़ा जायेगा। शेर ख़ान ने इस शर्त को मान लिया पर जब पूरनमल एवं उसका परिवार किला छोड़ाकर जा रहे थे, तब उन पर शेर ख़ान के पश्तून सेना ने आक्रमण किय़ा।

सरकार एवं प्रशासन[संपादित करें]

मुख्य तिथियाँ[संपादित करें]

  • 1472, शेर शाह सूरी का जन्म
  • 1522, Sher Khan took the service of Bahar Khan
  • 1527 - 1528, शेर ख़ान ने बाबर की सेना में काम किया
  • 1534, शेर ख़ान ने बंगाल के राजा को किऊल नदी पर हराया
  • अक्टूबर 1537, शेर ख़ान ने बंगाल पर आक्रमण किया और गौर शहर को नेस्तनाबूद किया
  • 1539, शेर ख़ान ने हुमायूँ को चौसा में परास्त किया
  • 1540, शेर ख़ान ने हुमायूँ को कन्नौज में परास्त किया
  • मई 1545, शेर शाह सूरी का निधन

मुग़ल सम्राटों का कालक्रम[संपादित करें]

बहादुर शाह द्वितीय अकबर शाह द्वितीय अली गौहर मुही-उल-मिल्लत अज़ीज़ुद्दीन अहमद शाह बहादुर रोशन अख्तर बहादुर रफी उद-दौलत रफी उल-दर्जत फर्रुख्शियार जहांदार शाह बहादुर शाह प्रथम औरंगज़ेब शाहजहाँ जहांगीर अकबर हुमायूँ इस्लाम शाह सूरी हुमायूँ बाबर


संदर्भ[संपादित करें]

संदर्भग्रंथ सूची[संपादित करें]

  • डा जाकिर ख़ान, शेर शाह सूरी-1539-1545 फ़िरोज़सन्स, लाहौर, पाकिस्तान द्वारा प्रकाशित.
  • The Mertiyo Rathors of Merto, Rajasthan (2 vols.)
Select Translations Bearing on the History of a Rajput Family, 1462-1660 Translator Saran, Richard D. Annotations by Saran, Richard D. Hardcover Edition: Series#:51; Michigan Papers on South and Southeast Asia (Hardcover) 772 pages Publisher: University of Michigan Press ISBN / EAN: 0891480854
"Later, ancient Bactria, in northern Afghanistan, was joined to India by a 4,200-kilometer road built by Indian’s Maurya dynasty, and was linked to Central Asia and the Middle East by the imperial highways of the Persians."
  • Clive Ponting: World History, A New Perspective, Published by Pimlico 2001, ISBN 0-7126-6572-2, Printed and Bound in Great Britain by Mackays of Chatham PLC.
"When Chang Ch'ien arrived in Ferghana he was surprised to find that a vast array of Chinese goods were on sale, especially silk which was only manufactured in China. These goods had travelled by the route opened in 4th century BCE from China via Schezwan and Yunnan to Burma and eastern India. From there they had been traded along the India Grand Road (built under the Mauryan Empire) up the Ganges valley to the grand trading city of Taxila and then into central Asia." [Page 250]
"Humayun escaped and went to Lahore while Sher Khan went back to Gaur to destroy the remnant of the Mughal army and imprison a rebelling governor. Sher Khan became Sher Shah and organized his empire while Humayun, unable to get help from his brothers, fled all the way to the Safavid court in Iran. After subjugating Malwa in 1542, Sher Shah invaded central India. While capturing a fort in Kalinjar, Sher Shah was killed by a gunpowder explosion in 1545."

बाह्य सूत्र[संपादित करें]

पूर्वाधिकारी
संस्थपक
दिल्ली के शाह
1539-1545
उत्तराधिकारी
इस्लाम शाह सूरी