डीग

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डीग का जलमहल
डीग का किला

डीग राजस्थान प्रांत के भरतपुर जिले का एक प्राचीन ऐतिहासिक शहर है। इसका प्राचीन नाम दीर्घापुर था। स्कंद पुराण में दीर्घ या दीर्घापुर के रूप में इसका उल्लेख है। भरतपुर शहर से 32 किमी की दूरी पर स्थित है। डीग को भरतपुर राज्य की पहली राजधानी राजा ठाकुर बदन सिंह ने बनाया था । कभी भरतपुर के शासकों का ग्रीष्मकालीन आवास रहे , डीग ने क्षेत्र की भरतपुर राज्य की दूसरी राजधानी बनने की भूमिका निभाई है। यह रोचक छोटा सा नगर अपनी बेजोड किलेबंदी, अत्यधिक सुंदर बगीचों और कुछ भव्य महलों से भरा हुआ है। यह नगर लगभग सौ वर्षो से उपेक्षित अवस्था में है, किंतु आज भी यहाँ भरतपुर के जाट-नरेशों के पुराने महल तथा अन्य भवन अपने भव्य सौंदर्य के लिए विख्यात हैं। नगर के चतुर्दिक मिट्टी की चहारदिवारी है और उसके चारों ओर गहरी खाई है। मुख्य द्वार शाहबुर्ज कहलाता था। यह स्वयं ही एक गढ़ी के रूप में निर्मित था। इसकी लंबाई-चौड़ाई 50 गज़ है। प्रारंभ में यहाँ सैनिकों के रहने के लिए स्थान था। मुख्य दुर्ग यहाँ से एक मील है जिसके चारों ओर एक सृदृढ़ दीवार है। बाहर क़िले के चतुर्दिक मार्गों की सुरक्षा के लिए छोटी-छोटी गढ़ियां बनाई गई थीं जिनमें गोपालगढ़ जो मिट्टी का बना हुआ क़िला है सबसे अधिक प्रसिद्ध था। यह शाहबुर्ज से कुछ ही दूर पर है। इन क़िलों की मोर्चाबंदी के अंदर डीग का सुंदर सुसज्जित नगर था जो अपने वैभवकाल में (18वीं शती में) मुग़लों की तत्कालीन अस्तोन्मुख राजधानियों दिल्ली तथा आगरा के मुक़ाबले में कहीं अधिक शानदार दिखाई देता था।

डीग का किला[संपादित करें]

डीग किला और जलमहल सूरजमल के महत्वपूर्ण निर्माण हैं| । राजा सूरजमल ने इस किले का निर्माण १७० ई।(?????????) में करवाया था।[1][2] किले का मुख्य आकर्षण है यहां का निगरानी बुर्ज('वॉच टावर'), जहां से न केवल पूरे महल को देखा जा सकता है, बल्कि शहर का नजारा भी लिया जा सकता है। आगरा किले से लूट कर यहां लाई गई तोप के अलावा गहरी खाई, ऊंची दीवारों और मज़बूत द्वारों के घिरे अब इस किले के अवशेष मात्र ही देखे जा सकते हैं।

डीग के किले का इतिहास अत्यंत रोचक है। थून, जाटौली तथा अन्य कई गढ़ियों की राख से बदन सिंह के भरतपुर राज्य का उदय हुआ था। २३ नवम्बर, १७२२ के दिन थून और जाटौली के पतन के पश्चात् औपचारिक रूप से बदन सिंह ने स्वयं को जयपुर दरबार का निष्ठावान सामंत बना लिया था। बदले में सवाई जयसिंह ने बदन सिंह को 'ब्रजराज' की उपाधि से सम्मानित किया। उन्हें नगाड़ा, निशान तथा पचरंगी झंडे के प्रयोग की अनुमति प्रदान की।[3] अपने इरादे को मूर्त रूप देने के लिए, सबसे पहले उसने डीग के समीप स्थायी निवास और राज्य का सदर दफ्तर बनाया उसके बाद ब्रज के कई जमींदारों और सरदारों से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित किये। [4]

बदन सिंह ने अपने राज्य का विस्तार युद्ध की अपेक्षा शांति और राजनैतिक कौशल से अधिक किया। उनका स्वभाव रक्त बहाना नहीं, अपने राज्य का निर्माण करना था। डीग और भरतपुर के अजेय किलों के निर्माण और उनमें सुन्दर महलों की रचना उनका शौक था। अपने अंतिम दिनों में भरतपुर की बजाय वह डीग में ही रहते थे। डीग के भवन में एक लम्बा-चौडा तख्तनुमा पलंग आज भी मौजूद है, जिस पर ठाकुर बदन सिंह, परिवार के समस्त बालकों के साथ शयन करते थे। बदन सिंह ने आगरा के उन शिल्पियों को रोजगार दिया था, जो मुग़ल-साम्राज्य के कमजोर होने से भूखों मरने की स्थिति में थे। इसी तरह उन्होंने तालाब बनाने, ईंटे पकाने, घास के सुन्दर मैदान विकसित करने एवं फव्वारे बनाने वालों को काम दिया। [5]

ठाकुर बदन सिंह और महाराजा सूरजमल की सामाजिक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए के. नटवरसिंह लिखते हैं -

"पूरी तरह निरक्षर होने पर भी, बदन सिंह में आश्चर्यजनक सौन्दर्यबोध था। डीग के उद्यानों-प्रसादों की भव्य रूपरेखा उसी ने, और केवल अकेले उसी ने रची थी। दिल्ली और आगरा के श्रेष्ठ मिस्त्री, झुंड बना कर बदन सिंह और सूरजमल के दरबारों में रोजगार ढूँढने आते थे।" [6]

डीग के महल[संपादित करें]

डीग के महलों में चतुष्कोण बनाते हुए बीच में ४७५-३५० फीट का एक बगीचा है। इसमें फव्वारे लगे हुए हैं। पूर्व व पश्चिम में विशाल जलाशय है तथा उत्तर की और नन्द भवन है, पश्चिम में मुख्य इमारत गोपाल भवन है, जो सभी महलों में सर्वाधिक विशाल है। यह तीन और से दुमंजिला है और बीच में विशाल सभा भवन है। गोपाल भवन से थोडी दूर दो छोटी इमारतें हैं जो सावन-भादों भवन के नाम से जानी जाती हैं। चतुष्कोण के दक्षिण की और उत्तर की तरफ मुंह किये दो महल हैं; (१) पश्चिम में मकराना के संगमरमर से बना सूरज भवन और (२) पूर्व में भूरे बलुआ पत्थर से बना किशन भवन है। इन दोनों महलों के बीच इस मजबूत इमारत की छत पर एक टंकी है जो इन सभी महलों व बगीचों में जल प्रवाह करती है। ब्रोक्मेन के अनुसार भंडार की विशाल क्षमता को आवश्यक मजबूती प्रदान करने में यह टंकी हिंदुस्तान में बेजोड़ है। [5][7]

गोपाल भवन[संपादित करें]

गोपाल भवन का निर्माण १७८० में किया गया था। खूबसूरत बगीचों से सजे इस भवन से गोपाल सागर का अद्भुत नजारा देखा जा सकता है। भवन के दोनों ओर दो छोटी इमारतें हैं जिन्हें 'सावन भवन' और 'भादों भवन' के नाम से पुकारा जाता है।

सूरज भवन[संपादित करें]

पुराना महल डीग

दक्षिण दिशा में संगमरमर का सूरज भवन स्थित है। यह एक हवादार महल है , जिसकी अलंकृत दीवारें व फर्श मन मोह लेते हैं। इसके पश्चिम ब्ररामदे के स्तम्भ व उत्तर के कुछ छज्जों को छोड़ कर सम्पूर्ण भवन संगमरमर का बना है। कुछ स्तम्भ व छज्जे बलुआ पत्थर के बने हैं। इन पर चूना कड़ा करके एकरूपता लाई गई है। सूरज भवन के बारे में कहा जाता है कि इसके निर्माण में ताज महल की नक़ल की गई है। सूरज भवन को देख कर स्पष्ट होता है कि यह पूर्णतया मौलिक एवं हिन्दू स्थापत्य कला का बेजोड़ निर्माण है। नुकीले किनारे वाले महराब, वक्र, पत्तियों वाले अलंकृत स्तम्भ आदि सभी हिन्दू रूपक इस भवन में मौजूद हैं, जो कि उदयपुर और आमेर के महलों से साम्य रखते हैं। कई कमरों में छतों में हिन्दू रूपक उलटे कमल बने हुए हैं। थार्टन के अनुसार डीग के महल में दक्षिण बरांडे के कुछ छज्जे, पश्चिम के कुछ स्तम्भ, उत्तर दिशा के बरांडे का फर्श, इन सभी में रूपवास परगने में स्थित बाँसी पहाडपुर का पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जो शैली की रमणीयता और शिल्प की पूर्णता की दृष्टि से इतने श्रेष्ठ हैं कि उनसे बढ कर केवल आगरा का ताजमहल है। [8] जबकि सम्पूर्ण भवन संगमरमर का है। यहाँ तक कि छत की पत्तियां भी संगमरमर की हैं। इसकी वजह यह है कि भवन सूरजमल के समय में बनना शुरू हुआ और उनकी मृत्यु के उपरांत जवाहर सिंह के समय में पूर्ण हुआ। तत्कालीन राजनीतिक उथल-पुथल के उस दौर में संभवतः जवाहर सिंह के समय निर्माणकला पर उतना ध्यान नहीं दिया गया।

सूरज भवन के साथ ही किशन भवन है। इसके सामने उत्तरी दिशा में नन्द भवन है। इस भवन में सभा भवन की भांति एक बड़ा हाल है। जो सात भागों वाले महराबदार स्तंभों की पंक्तियों से घिरा है। इसके दोनों सिरों पर संगमरमर के झरोखे बने हैं। मध्यस्थ स्तंभों पर आधारित महराबें आयताकार रूप में नियोजित की गई हैं। भवन में लाल पत्थर के साथ संगमरमर का प्रयोग भी किया गया है। इसमें लगे तोड़े (Brackets) व छज्जों की लम्बाई १२ फ़ुट तक है।

डीग के महलों की वास्तुकला[संपादित करें]

मुग़ल काल में अकबर के समय तक बंगाल शैली की छत राजपूत शैली का हिस्सा बन चुकी थी। बाबर द्वारा भारत में प्रचलित की गयी भवन, उद्यान व फव्वारों की ईरानी-चार-बाग़ पद्धति की व्यवस्था ने हिन्दू रियासतों के भवनों को एक नया रूप प्रदान किया। [9]

मध्य काल में खासतौर पर हिन्दू वास्तुकला में दो प्रवृतियाँ समानान्तर रूप से मौजूद थी। एक परंपरा के अर्न्तगत पूर्णतया प्राचीन परम्पराओं के अनुसार निर्माण होते थे। दूसरी ओर मिश्रित शैली को भी अपनाया गया। यद्यपि विक्टोरिया युग में वास्तुकला का विकास हुआ, परन्तु मध्य काल के ताज महल, हुमायूं का मकबरा , बीजापुर की गोल गुम्बद, डीग के जल महल और भरतपुर के दुर्ग का कोई सानी नहीं है। [9]

भरतपुर के शासक कुशल शासक ही नहीं थे, वरन अच्छे कला-प्रेमी एवं कला संरक्षक थे। उनके समय में हुए निर्माण वास्तुकला के अद्भुत नमूने हैं। बदन सिंह को सौन्दर्य कला, स्थापत्य कला और वास्तु का अच्छा ज्ञान था । डीग के भवनों एवं उद्यानों के विन्यास से यह स्पष्ट हो जाता है। [10] उन्होंने डीग के किले में सुन्दर भवन बनाये जिनको पुराना महल नाम से जाना जाता है। १८ वीं सदी में जबकि मुग़ल शैली या मिश्रित शैली में काम हुआ, तब हिन्दू शैली का स्थान बनाये रखने का सार्थक प्रयास बदन सिंह एवं सूरजमल ने किया। मुग़ल शासकों की स्थिति उस समय अच्छी नहीं थी। मुग़ल सल्तनत भारी उथल पुथल का शिकार था। मुग़ल दरबारों से कारीगर काम छोड़-छोड़ कर जा रहे थे। उन दिनों ठाकुर बदन सिंह कुम्हेर की गढ़ी में रहते थे। वहीं रहते हुए उन्होंने सन १७२५ में प्रथम जाट राजधानी 'डीग' की स्थापना की। उसके बाद १७३३ में भरतपुर राजधानी की स्थापना सूरजमल ने की।

जैसे-जैसे भरतपुर राज्य की राजनैतिक व आर्थिक स्थिति मजबूत हुई वैसे-वैसे भरतपुर अंचल में वास्तुकला का विकास हुआ। कुम्हेर की गढ़ी, डीग के जल महल फिर भरतपुर दुर्ग का निर्माण उसी विकास के सोपान हैं। महाराजा बदन सिंह ने डीग के भवनों की योजना तैयार की और उस योजना को साकार रूप दिया महाराजा सूरजमल ने। यही योजनायें महाराजा बदनसिंह के सौन्दर्य बोध की परिचायक हैं।[9]

कला के क्षेत्र में महाराजा सूरजमल की अभिरुचि दुर्ग, महल एवं मंदिर निर्माण में थी. यद्यपि उनके शासन काल में सभी जाट किलों की मरम्मत एवं पुनर्निमाण का कार्य जारी रहा, परन्तु स्वयं उनका योगदान विशेष रूप से भरतपुर और डीग के आधुनिकतम महलों के निर्माण में रहा। डीग में अपने पिता के समय के बने महलों, जो पुराने महलों के नाम से जाने जाते हैं, से पृथक सूरजमल ने सुन्दर जलाशय एवं फव्वारों के साथ आधुनिक सुविधा युक्त महलों का निर्माण करवाया, जो आज भी भव्य एवं दर्शनीय हैं। कवि सोमनाथ ने 'सुजन विलास' और अखैराम ने 'सिंहासन बत्तीसी' में डीग के इन सुन्दर महलों, वाटिका, जलाशय, आदि का श्रेष्ठ एवं सुन्दर वर्णन किया है। [8]

सुन्दर भवनों एवं सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण सुव्यवस्था एवं कुशल योजना विन्यास के माध्यम से ही संभव हुआ। यह निर्माण कार्य महाराजा बदन सिंह एवं सूरजमल को कुशल वास्तुशिल्पी ही नहीं, अपितु कुशल व्यवस्थापक, प्रारूपकार एवं, कलामर्मज्ञ का प्रमाण देता है।

इन महलों के निर्माण में महाराजा सूरज मल ने अपार धन खर्च किया। [11] कहा जाता है कि लखनऊ के नवाब गाजीउद्दीन जो महाराजा सूरजमल के मित्र थे, जब १७५९ में डीग आये तो उन्होंने भी उपहारस्वरुप भवनों के निर्माण के लिए धन दिया था ।

इन भवनों को देखने पर उस वक्त के मजदूरों व कारीगरों की कुशलता और सौन्दर्यबोध का परिचय मिलाता है। साथ ही यह भी संकेत मिलाता है की उन्हें प्रोत्साहन मिलता था, उचित पारिश्रमिक भी मिलता था। मुग़ल दरबारों से काम छोड़ कर आ रहे कारीगरों को महाराजा सूरजमल द्वारा काम दिया गया। इस योजना को कार्यान्वित करते समय निर्माण मंत्री जीवनराम वनचारी थे।

डीग के भवनों में महलों के साथ मुग़ल शैली के बड़े-बड़े चौकोर उद्यान हैं, जिनमें पानी की कृत्रिम व्यवस्था से चलने वाले फव्वारों की श्रृंखलाएं हैं।

फव्वारों की व्यवस्था[संपादित करें]

ईरानी-चार-बाग पद्धति पर आधारित फव्वारे

मुख्य द्वार सिंह-पोल उत्तर दिशा में उत्तर की और मुंह किये हुए हैं, जिसमें नन्द भवनों तक फव्वारों की श्रृंखलाएं हैं, जो वर्मान में भूमिगत हैं। वर्गाकार उद्यानों के मध्य में अष्ट फलक आकृति वाला ६० फ़ुट चौडाई में फव्वारों का एक अति सुन्दर समूह है। इस बिंदु को सभी भवनों से फव्वारों की पंक्तियाँ जोड़ती हैं। सूरज भवन व किशन भवन के मध्य में निर्मित एक भवन के प्रथम तल पर २। ६ लाख लीटर क्षमता का एक हौज बना हुआ है, जो पानी की कृत्रिम व्यवस्था का स्त्रोत है। इसमें मोरियां (Outlets) मिटटी की नालियों को पकाकर जोड़कर बने गयी हैं। जिन पर चूने की परत (Lime Coating ) चढी हुई है। [12]

उस समय इस हौज को लगभग ८ दिनों में दो जोड़ी बैलों की मदद से भरा जाता था। हौज में मोरियों की योजना इस प्रकार है कि सभी फव्वारे महलों व उद्यानों में रंग -बिरंगी छटा बिखेरते हैं। एक समय में एक पंक्ति में एक ही रंग व विभिन्न रंगों वाले , दोनों तरह के फव्वारे चलते हैं। जब ये फव्वारे चल कर बंद होते हैं तो उसके बाद उद्यान के बीच जड़े पत्थर रंगों से इस तरह सरोबर दिखते हैं जैसे लोगों ने टोलियाँ बनाकर होली खेली हो। फव्वारों की यह सम्पूर्ण व्यवस्था तकनीकी दृष्टि से अद्वितीय है। [12]

भवन के प्रथम तल पर बना अपार क्षमता का हौज जो २२५ वर्षों से आज भी अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य कर रहा है। ये फव्वारे भवनों को वातानुकूलित ही नहीं करते हैं बल्कि कृत्रिम वर्षा की अनुभूति भी कराते हैं। इन फव्वारों की विशेषता विधि, रूप-रंग के अलावा एक धारा तथा सहस्त्र धारा के रूप में देखने योग्य है। भवनों में कई जगह इन्हें झरने का रूप देने का सार्थक प्रयास किया गया है। फव्वारे व उद्यान कृत्रिम वर्षा एवं रंग-बिरंगे रूप से मुग़ल काल में निर्मित श्रीनगर के निशात बाग़ व शालीमार बाग़ की व्यवस्था से एक कदम आगे हैं। इन फव्वारों व उद्यानों का निर्माण ईरानी-चार-बाग पद्धति पर आधारित है। [12]

बारहदरी में फव्वारों की व्यवस्था उच्च तकनीक का बेमिसाल प्रयोग है। इसमें जल प्रवाह की गुप्त व्यवस्था है। बारहदरी की दूसरी छत का बीच का हिस्सा खोखला है, जिसमें लोहे के गोले हैं। पानी पहुँचने की व्यवस्था केपिलरी पद्धति पर आधारित है। जब फव्वारे चलते हैं तो पानी इस हिस्से में पहुँच कर गोलों को आपस में टकराता है जो बादल गरजने का आभास देता है। यह निर्माण अछे कला प्रेमी होने का प्रमाण तत्कालीन शासक को देता है। थर्टन का मत है -

"कीर्तिशिखर पर पहुँच कर राजा सूरजमल ने फव्वारों युक्त प्रसादों, जिन्हें भवन कहते हैं , का निर्माण कराया था। यह अनुपम डिजायन एवं शिल्प प्रवीणता में आगरा के ताज महल के अनुरूप भारत की थाती है। इन्होंने डीग को अति प्रसिद्ध स्थल बना दिया है। " [13]

हिन्दू शैली का एकमात्र महल[संपादित करें]

सम्पूर्ण भवनों के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में यह महल परिसर उत्तर भारत में अद्वितीय भारतीय वास्तुकला का केंद्र है। तकनीक, प्रारूप व्यवस्था एवं शैली इन सभी आधारों पर यह श्रेष्ठ भवन है। सम्पूर्ण उत्तर भारत में हिन्दू शैली के एकमात्र महल डीग के जल महल हैं। इन भवनों में काम लाई गई तकनीक आज भी आधुनिकतम बनी हुई है।[14]

महलों की ड्रेनेज व्यवस्था चाहे छत की हो या फर्श तल की , कुशल इंजीनियरिंग का प्रमाण है। आधुनिक विशेषज्ञों का मत है कि इन भवनों में नींव भरने में ताजमहल विधि का अनुसरण किया गया गया है। संभवतया इनके नीचे कमरेनुमा चौकोर कुंए बना कर उन पर भवनों का निर्माण किया गया है। गोवर्धन ड्रेन से गोपाल भवन में पानी आता है तथा जब गोपाल सागर पूरा भर जाता है तो अतिरिक्त जल साइफन विधि से स्वतः ही ड्रेन के जरिये सावन मंडपनन्द भवन के करीब से होता हुआ रूप सागर में चला जाता है।

जैसा कि ऊपर लिखा गया है सूरज भवन को देख कर स्पष्ट होता है कि पूर्णतया मौलिक एवं हिन्दू स्थापत्य कला का बेजोड़ निर्माण है। नुकीले किनारे वाले महराब, वक्र, पत्तियों वाले अलंकृत स्तम्भ आदि सभी हिन्दू रूपक इस भवन में मौजूद हैं, जो कि उदयपुर और आमेर के महलों से साम्य रखते हैं। कई कमरों में छतों में हिन्दू रूपक उलटे कमल बने हुए हैं।[15]

बेलबूटे ताजमहललाल किले आगरा के किले के संगमरमर के निर्माण से साम्य रखते हैं तो इसका कारण यह है कि कारीगर मुग़ल दरबार का काम छोड़ कर आये थे यह उनकी कला का प्रदर्शन है न कि नक़ल करने का।

भरतपुर राज्य के भवनों की १९ वीं सदी में देखभाल करने वाले अभियंता श्री जे. अच. देवनिश ने इस बारे में कहा है कि - :"अब डीग में जो संगमरमर का एक भवन है वह बारीकियों की दृष्टि से मुग़ल कलाकृतियों से स्पष्टतः भिन्न है। "

इसकी सारी भावना हिन्दू है। डीग के महलों के निर्माताओं को इस बात की आवश्यकता बिलकुल नहीं थी कि वे मौलिकता के अभाव में नक़ल करते। या उन्हें और कहीं से लाकर खड़ा करते। ताप मान को नियंत्रित करने के लिए छतों की मोटाई सवा सात फ़ुट तक रखी गई है। परन्तु साथ ही भार कम करने के लिए मिट्टी के पके घड़ों का सही ढंग से प्रयोग किया गया है। भरतपुर व डीग के भवनों में एकरूपता कायम करने का सुन्दर प्रयास किया गया है। प्रारूप व योजना को जिन रूपक एवं अलंकरणों की मदद से सुन्दर रूप दिया है उससे एक योद्धा किन्तु कलाप्रिय महाराजा की एक संवेदनशील छवि उभरती है।

इन भवनों के बारे में प्रसिद्ध वास्तुविदों ने अपनी-अपनी राय व्यक्त की है। स्थापत्य कला मर्मग्य फर्ग्यूसन के अनुसार, :"राजस्थान के राजमहलों का निर्माण उनके प्रबंध के दृष्टिकोण से कम या अधिक अव्यवस्थित व बेडौल है और सभी पहाड़ी या ऊँची जगह पर बने हैं, जबकि डीग के राजमहल पूर्णतः समतल मैदान में बनाये गए हैंयह शिल्प सौन्दर्य और भावनात्मक महत्व की दृष्टि से राजपूतों के सभी महलों से उत्कृष्ट तथा अनुपम हैं। "

डीग दुर्ग के सम्बन्ध में इन्तकाखब्बूतवारीख में लिखा है -

"डीग और दिल्ली उस समय बराबर की शोभा और व्यापार के केंद्र बने हुए थे, डीग भारतवर्ष के दुर्गों की रक्षित स्थानों में प्रथम श्रेणी का था। " [16]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. "डीग". लेक पैराडाइस.कॉम. http://www.pressnote.in/travel/visitplace.php?id=28941. अभिगमन तिथि: २१ अप्रैल, २००७. 
  2. फर्ग्यूसन, जेम्स. हिस्ट्री ऑफ इण्डियन एण्ड ईस्टर्न आर्कीटेक्चर. 
  3. पिलानिया, डॉ ज्ञान प्रकाश. हेरिटेज ऑफ़ सवाई जयसिंह. pp. ९. 
  4. सिंह, डॉ नत्थन (२००४). जाट इतिहास. ग्वालियर. pp. २५५-२५६. 
  5. सिंह, डॉ नत्थन (२००४). जाट इतिहास. ग्वालियर. pp. २५८ -२५९. 
  6. के. नटवरसिंह: महाराजा सूरजमल, पृ.४१
  7. चांदावत, डॉ. प्रकाश चन्द्र (१९८२). महाराजा सूरजमल और उनका युग. आगरा. pp. २३६. 
  8. डॉ. प्रकाश चन्द्र चांदावत, महाराजा सूरजमल और उनका युग, आगरा, १९८२, पृ. २३६
  9. राघवेन्द्र कुमार रावत:जाट समाज आगरा, अक्टूबर-नवम्बर, २००७, पृ. ५१
  10. Prof Kalika Ranjan Qanungo: History of the Jats , 2003. M/S Originals (an imprint of low priced publications), Delhi, p. 37
  11. Tawarikh-i-Hunud (Pers. Ms.) 22a, Also see Dirgh (Hindi Ms.), 1-2, Ras Peeushnidhi in Somnath, 6; Qanungo, Jats, 287f.
  12. राघवेन्द्र कुमार रावत:'जाट समाज', आगरा, अक्टूबर-नवम्बर, २००७, पृ. ५२
  13. Jwala Sahai: History of Bharatpur, Printed by Lal Singh, in Moon Press, Agra, 1912, p.25
  14. राघवेन्द्र कुमार रावत:जाट समाज आगरा, अक्टूबर-नवम्बर, २००७, पृ. ५३
  15. राघवेन्द्र कुमार रावत:जाट समाज आगरा, अक्टूबर-नवम्बर, २००७, पृ. ५३
  16. Memoires des Jats, (Fr. Ms.), 44, See also Dirgh (Hindi Ms.), 1.