वेदांग
|
हिन्दू धर्म |
| इतिहास · देवता |
| सम्प्रदाय · आगम |
| विश्वास और दर्शनशास्त्र |
|---|
| पुनर्जन्म · मोक्ष |
| कर्म · पूजा · माया |
| दर्शन · धर्म |
| वेदान्त ·योग |
| शाकाहार · आयुर्वेद |
| युग · संस्कार |
| भक्ति {{हिन्दू दर्शन}} |
| ग्रन्थ |
| वेदसंहिता · वेदांग |
| ब्राह्मणग्रन्थ · आरण्यक |
| उपनिषद् · श्रीमद्भगवद्गीता |
| रामायण · महाभारत |
| सूत्र · पुराण |
| शिक्षापत्री · वचनामृत |
| सम्बन्धित विषय |
| दैवी धर्म · |
| विश्व में हिन्दू धर्म |
| गुरु · मन्दिर देवस्थान |
| यज्ञ · मन्त्र |
| शब्दकोष · हिन्दू पर्व |
| विग्रह |
| प्रवेशद्वार: हिन्दू धर्म |
| हिन्दू मापन प्रणाली |
वेदांग हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त - ये छ: वेदांग है।
- शिक्षा - इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है।
- कल्प - वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं- श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्मसूत्र।
- व्याकरण - इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है।
- निरुक्त - वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है।
- ज्योतिष - इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से मतलब `वेदांग ज्योतिष´ से है।
- छन्द - वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है।
छन्द को वेदों का पाद, कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक, और व्याकरण को मुख कहा गया है।
- छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते
- ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।
- शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्
- तस्मात्साङ्कमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ।।
अनुक्रम |
परिचय [संपादित करें]
वेदांग छह हैं; वेद का अर्थज्ञान होने के लिए इनका उपयोग होता है। वेदांग ये हैं -
शिक्षा [संपादित करें]
वेदों के स्वर, वर्ण आदि के शुद्ध उच्चारण करने की शिक्षा जिससे मिलती है, वह 'शिक्षा' है। वेदों के मंत्रों का पठन पाठन तथा उच्चारण ठीक रीति से करने की सूचना इस 'शिक्षा' से प्राप्त होती है। इस समय 'पाणिनीय शिक्षा' भारत में विशेष मननीय मानी जाती है।
स्वर, व्यंजन ये वर्ण हैं; ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत ये स्वर के उच्चारण के तीन भेद हैं। उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित ये भी स्वर के उच्चारण के भेद हैं। वर्णों के स्थान आठ हैं -
(1) छाती, (2) कंठ, (3) सिर, (4) जिह्वामूल, (5) दंत, (6) नासिका, (7) ओष्ठ, और (8) तालु।
इन आठ स्थानों में से यथायोग्य रीति से, जहाँ से जैसा होना चाहिए वैसा, वर्णोच्चार करने की शिक्षा यह पाणिनीय शिक्षा देती है। अत: हम इसको 'वर्णोच्चार शिक्षा' भी कह सकते हैं।
कल्पसूत्र [संपादित करें]
वेदोक्त कर्मो का विस्तारश् के साथ संपूर्ण वर्णन करने का कार्य कल्पसूत्र ग्रंथ करते हैं। ये कल्पसूत्र दो प्रकार के होते हैं। एक 'श्रौतसूत्र' हैं और दूसरे 'स्मार्तसूत्र' हैं। वेदों में जिस यज्ञयाग आदि कर्मकांड का उपदेश आया है, उनमें से किस यज्ञ में किन मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए, किसमें कौन सा अनुष्ठान किस रीति से करना चाहिए, इत्यादि कर्मकांड की सम्पूर्ण विधि इन कल्पसूत्र ग्रंथों में कही होती है। इसलिए कर्मकांड की पद्धति जानने के लिए इन कल्पसूत्र ग्रंथों की विशेष आवश्यकता होती है। यज्ञ आगादि का ज्ञान श्रौतसूत्र से होता है और षोडश संस्कारों का ज्ञान स्मार्तसूत्र से मिलता है।
वैदिक कर्मकांड में यज्ञों का बड़ा भारी विस्तार मिलता है। और हर एक यज्ञ की विधि श्रौतसूत्र से ही देखनी होती है। इसलिए श्रौतसूत्र अनेक हुए हैं। इसी प्रकार स्मार्तसूक्त भी सोलह संस्कारों का वर्णन करते हैं, इसलिए ये भी पर्याप्त विस्तृत हैं। श्रौतसूत्रों में यज्ञयाग के सब नियम मिलेंगे और स्मार्तसूत्रों में अर्थात् गृह्यसूत्रों में उपनयन, जातकर्म, विवाह, गर्भाधान, आदि षोडश संस्कारों का विधि विधान रहेगा।
व्याकरण [संपादित करें]
व्याकरण अनेक है जिनमें पाणिनि का व्याकरण आज भारत में प्रसिद्ध है। इसको अष्टाध्यायी कहते हैं, क्योंकि इसमें आठ ही अध्याय है। इसपर पतंजलि ऋषि का महाभाष्य है। और भट्टोजी दीक्षित की टीका, कौमुदी नाम की प्रकरणश: बनाई टीका, सुप्रसिद्ध है।
निरुक्त [संपादित करें]
शब्द की उत्पत्ति तथा व्युत्पत्ति कैसे हुई, यह निरुक्त बताता है। इसविषय पर यही महत्व का ग्रंथ है। यास्काचार्य जी का यह निरुक्त प्रसिद्ध है। इसको शब्द-व्युत्पत्ति-शास्त्र भी कह सकते हैं। वेद का यथार्थ अर्थ समझने के लिए इस निरुक्त की अत्यंत आवश्यकता है।
छंद [संपादित करें]
गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, वृहती आदि छंदों का ज्ञान होने के लिए छंद:शास्त्र की उपयोगिता है। प्रत्येक छंद के पाद कितने होते हैं और ह्रस्व दीर्घादि अक्षर प्रत्येक पाद में कैसे होने चाहिए, यह विषय इसका है।
ज्योतिष [संपादित करें]
खगोल में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि आदि ग्रह किस प्रकार गति करते हैं, सूर्य, चंद्र आदि के ग्रहण कब होंगे, अन्य तारकों की गति कैसी होती है, यह विषय ज्योतिष शास्त्र का है। वेदमंत्रों में यह नक्षत्रों का जो वर्णन है, उसे ठीक प्रकार से समझने के लिए ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान बहुत उपयोगी है।
इस प्रकार वेदांगों का ज्ञान वेद का उत्तम बोध होने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इन्हें भी देखें [संपादित करें]
बाहरी सूत्र [संपादित करें]
- वेदांग हिन्दू एन्साइक्लोपीडिया पर
|
||||||||||||||||||||